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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
#37
कमरे के भीतर से आने वाली हल्की रोशनी और बाहर का गहरा सन्नाटा मेरे भीतर चल रहे उस तूफ़ान को और भी भयानक बना रहे थे। मेरा मन उस समय किसी उबलते हुए लावा की तरह था एक तरफ मेरी नैतिकता मुझे झकझोर रही थी कि मैं क्या कर रहा हूँ, और दूसरी तरफ मेरी वासना मुझे उस दृश्य के लिए पागल बना रही थी। मैं उस पल का इंतज़ार किसी भूखे शिकारी की तरह कर रहा था, जो अपने शिकार के पूरी तरह निहत्थे होने की प्रतीक्षा करता है।
मेरा आत्म मंथन मुझे भीतर से चीर रहा था। मैं खुद से सवाल कर रहा था, "रवि, तू क्या कर रहा है? क्या तू इतना गिर चुका है कि अपनी ही माँ और अंकल के बीच होने वाले उस वर्जित मिलन का मूक दर्शक बनना चाहता है?" लेकिन जैसे ही मैं यह सवाल करता, मेरे भीतर से एक गंदी और अश्लील आवाज़ आती जो कहती, "देख! देख कि कैसे वह पवित्रता अब भंग होने वाली है।" मेरा हृदय इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर लग रहा था कि कहीं मेरी धड़कनों की आवाज़ उस कमरे तक न पहुँच जाए। मैं उस पल की बेताबी में इतना डूबा हुआ था कि मुझे अपने शरीर की गर्मी और पसीने का एहसास भी होने लगा था।

मैं उस दृश्य के शुरू होने की प्रतीक्षा में काँप रहा था। मेरा मन उस 'ऊंचे पाप' की कल्पनाओं से भरा हुआ था। मैं सोच रहा था कि जब अंकल का हाथ मम्मी के शरीर पर पड़ेगा, जब वह उनकी मर्यादा को तार तार करेंगे, तो वह दृश्य कैसा होगा। मेरी आत्मा ग्लानि के बोझ से दबी हुई थी, लेकिन मेरा मांस उस अश्लीलता की प्यास में तड़प रहा था। मैं उस पाप के शुरू होने के क्षण के लिए इतना व्याकुल था कि मेरा पूरा अस्तित्व उस एक पल के लिए ठहर गया था एक ऐसा पल जहाँ नैतिकता का अंत होना था और वासना का साम्राज्य शुरू होना था।

उस कमरे की हवा में एक अजीब सी भारीपन और घुटन थी, जैसे वह दीवारें खुद भी किसी गहरे राज को दबाए बैठी हों। जब मैं उस अंधेरे कोने में खड़ा था, तो मेरी नज़रें कमरे की उन चीज़ों पर जा रही थीं जो अब मुझे किसी मज़ाक या डरावने सपने जैसी लग रही थीं। कमरे के ठीक सामने वाली दीवार पर मम्मी और पापा की शादी के दिनों की वह बड़ी सी तस्वीर टंगी थी उन दोनों के चेहरों पर वह मासूमियत और पवित्रता थी, जो आज इस कमरे में मौजूद अश्लीलता के सामने एक कड़वा मज़ाक लग रही थी। वह तस्वीर जैसे मुझे घूर रही थी, जैसे वह मेरे इस पाप का गवाह बन रही हो।
उस पवित्र तस्वीर के ठीक नीचे, एक छोटे से लकड़ी के स्टैंड पर भगवान की एक छोटी सी तस्वीर रखी थी। वह मूर्ति इतनी शांत और निर्लिप्त थी कि उसे देखकर मेरा मन और भी ज़्यादा ग्लानि से भर गया। एक तरफ वह पवित्रता थी और दूसरी तरफ वह वासनापूर्ण दृश्य जो अंकल और मम्मी के बीच घटित होने वाला था। यह विरोधाभास मेरे भीतर के द्वंद्व को और भी गहरा कर रहा था।

यह कमरा असल में पापा का खास कमरा था। यह वह जगह थी जहाँ पापा अपनी सारी थकान मिटाते थे ।अब भी जब पापा छुट्टी आते है तो इसी कमरे में सोते हैं नहीं तो ये कमरा बंद ही रहता है,हा मम्मी इस रूम की सफाई रोजाना करती है। अब जब हम बचे बढ़े हो गए है तो जब पापा आये होते है तो हम सब भाई बहनों के दो जाने के बाद मम्मी को मैंने उस कमरे में जाते देखा है। जब पापा घर आते थे, तो वे इसी कमरे में का इस्तेमाल करते थे कभी हमें प्यार देने के लिए, तो कभी हमें अनुशासन सिखाने के लिए। लेकिन आज, उसी कमरे में, जहाँ पापा की खुशबू और उनकी यादें बसी थीं, वहाँ अंकल मम्मी की मर्यादा को तार तार करने की तैयारी कर रहे थे। पापा के अरमानों से सजे इस कमरे का अब एक नया और गंदा चेहरा सामने आ रहा था। पापा के उस खास साम्राज्य में अब एक ऐसा पाप होने जा रहा था, जिसकी कल्पना पापा ने भी कभी नहीं की होगी।
जैसे ही अंकल और मम्मी कमरे में दाखिल हुए, उन्होंने एक झटके में सारी लाइटें जला दीं। उस अचानक हुई रोशनी ने मेरे भीतर के अंधेरे और उस कमरे की पवित्रता के बीच के अंतर को और भी क्रूर बना दिया। रोशनी के उस तेज़ प्रहार में मम्मी का रूप किसी दिव्य और विचलित कर देने वाली मूर्ति की तरह सामने आया। उनका वह दूध जैसा गोरा और चमकता हुआ रंग उस तेज़ रोशनी में और भी निखर उठा था। उनके गले में वह सुहागन का प्रतीक मंगलसूत्र उनकी पवित्रता और पतिव्रता होने की गवाही दे रहा था, लेकिन आज वही मंगलसूत्र उनकी मर्यादा के ढहने का गवाह बनने वाला था।
मम्मी के चेहरे के भावों में एक अजीब सी कशमकश थी। उनकी आँखों में एक धर्मसंकट था एक तरफ वह गहरी धार्मिकता और पतिव्रता होने का गौरव था जो उनके चेहरे की सौम्यता में झलकता था, और दूसरी तरफ एक अनजानी, दबी हुई लज्जा और समर्पण का भाव था। उनके चेहरे की वह सुंदरता, जो किसी मंदिर की मूर्ति जैसी शांत और पवित्र लगती थी, अब एक अनचाही उत्तेजना और डर के बीच झूल रही थी। वह एक ऐसी 'सुहागन' लग रही थीं जिनकी पवित्रता को अब एक गंदा स्पर्श छूने वाला था।
वहीं दूसरी ओर, अंकल के चेहरे के भाव पूरी तरह से अलग और भयावह थे। उनके चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक शिकारी की तरह क्रूर और वासनापूर्ण चमक थी। उनकी आँखों में एक ऐसी अधिकारवादी भावना थी, जैसे वे मम्मी की पवित्रता को छीनने का पूरा हक समझते हों। उनके चेहरे पर एक गहरी, गंदी तृप्ति और उत्तेजना साफ दिखाई दे रही थी। उनकी नज़रें मम्मी के उस दूध जैसे गोरे शरीर और उनके सुहागन रूप को ऐसे निहार रही थीं जैसे कोई भूखा जानवर किसी को निगल जाने के लिए तैयार हो। एक तरफ जहाँ मम्मी का चेहरा धर्म और मर्यादा की पुकार कर रहा था, वहीं अंकल का चेहरा उस मर्यादा को कुचलने की अश्लील ज़िद लिए खड़ा था।कमरे की वह तेज़ रोशनी अब उस दृश्य की क्रूरता को और भी स्पष्ट कर रही थी। अंकल के भारी हाथों ने जैसे ही मम्मी के कपड़ों की सरहद को छूना शुरू किया, कमरे की हवा में एक अजीब सी घबराहट और गर्मी घुल गई। कपड़ों की वह कशमकश शुरू हुई एक धीमी, थरथराती हुई प्रक्रिया। जब अंकल के उंगलियों ने मम्मी के साड़ी के पल्लू को धीरे से सरकाना शुरू किया, तो उस रेशमी कपड़े की सरसराहट मेरे कानों में किसी बिजली की कड़क की तरह महसूस हो रही थी। कपड़ों का वह धीरे धीरे खुलना केवल वस्त्रों का उतरना नहीं था, बल्कि मम्मी की बरसों की मर्यादा और सामाजिक ढाल का गिरना था।
मम्मी की मनोदशा उस समय एक टूटते हुए बांध की तरह थी। जैसे जैसे उनके शरीर का गोरापन उन कपड़ों की परतों से बाहर झांक रहा था,उनके भीतर एक भीषण युद्ध छिड़ गया था। उनके मन में एक तरफ अपने पति के प्रति निष्ठा और उस मंदिर जैसी पवित्रता का बोध था जो उन्होंने जीवन भर संजोकर रखी थी, और दूसरी तरफ उस स्पर्श की अनजानी और वर्जित उत्तेजना थी जो उनके शरीर को झकझोर रही थी। उनकी बंद आँखों के पीछे जैसे भगवान की वह छोटी सी तस्वीर और पापा की वह मुस्कान घूम रही थी, जो उन्हें इस पाप से बचने की चेतावनी दे रही थी। वह एक ऐसी 'पतिव्रता' लग रही थीं जिनका धर्म और वासना के बीच का संतुलन पूरी तरह से डगमगा गया था। उनके होंठ कांप रहे थे और उनके गले का मंगलसूत्र उनके उतरते हुए वस्त्रों के साथ एक अजीब सी छटपटाहट पैदा कर रहा था।
दूसरी ओर, अंकल की मनोदशा में केवल एक शिकारी की भूख थी। उनके लिए मम्मी की वह धार्मिकता और वह सुहागन रूप केवल एक बाधा नहीं, बल्कि उस स्वाद को और भी गहरा बनाने का जरिया था जिसे वे चखना चाहते थे। उनकी आँखों में एक ऐसी क्रूर तृप्ति थी जैसे वे उस पवित्रता को अपवित्र करने के आनंद में डूबे हों। वे उस मर्यादा को कुचलते हुए देख रहे थे जो मम्मी ने सालों से ओढ़ रखी थी।
और मैं, रवि, उस अंधेरे कोने में खड़ा यह सब देख रहा था। मेरी मनोदशा ग्लानि और एक भयावह जिज्ञासा के बीच फंसी थी। एक तरफ मेरा विवेक चिल्ला रहा था कि यह पाप है, कि यह मम्मी के उस पवित्र स्वरूप का अपमान है जिसे मैंने बचपन से पूजा है, लेकिन दूसरी तरफ उस दृश्य की तीव्रता और उस कमरे की भारी हवा मेरे होश उड़ा रही थी। मैं खुद को अपराधी महसूस कर रहा था कि मैं देख रहा हूँ, फिर भी मेरी नज़रें उस गिरती हुई मर्यादा से हटने को तैयार नहीं थीं।
जैसे ही साड़ी का वह पल्लू पूरी तरह से अंकल के हाथों से फिसलकर ज़मीन पर गिरा, कमरे की वह भारी चुप्पी और भी गहरी हो गई। मम्मी का वह आधा खुला हुआ गोरा बदन, जो अब तक कपड़ों की ओट में सुरक्षित था, उस तेज़ रोशनी में पूरी तरह बेनकाब होने लगा। उनके शरीर की वह पवित्र चमक अब एक ऐसी असुरक्षा के साथ चमक रही थी जो हृदय विदारक थी। उनके मन में चल रहा धार्मिक द्वंद्व अब चरम पर था उनके भीतर का वह 'पतिव्रता' स्वरूप चीख चीख कर इस अपमान का विरोध करना चाहता था, लेकिन उनके शरीर की अनजानी प्रतिक्रियाएँ और अंकल के आक्रामक स्पर्श ने उन्हें जैसे जड़ बना दिया था। वह एक ऐसी देवी की तरह लग रही थीं जिनका गर्भगृह कोई अपवित्र शक्ति लूट रही हो।
अंकल की सांसें अब तेज़ और भारी होने लगी थीं। उन्होंने मम्मी के उस दूध जैसे गोरे कंधे को अपने मज़बूत हाथों से जकड़ लिया। उनके चेहरे पर वह क्रूरता और वासना का मिश्रण अब स्पष्ट रूप से उभर आया था। वे मम्मी की उस धार्मिक छटपटाहट को देख रहे थे और उन्हें और भी अधिक उत्तेजित कर रहे थे। उनके लिए मम्मी का वह कांपता हुआ शरीर और उनकी आँखों से छलकती हुई ग्लानि, उस विजय का हिस्सा थी जो वे इस पवित्रता को भंग करके प्राप्त करना चाहते थे।
मैं, रवि, उस कोने में अपनी साँसें रोककर खड़ा था। मेरा गला सूख रहा था और मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी महापाप का साक्षी बन रहा हूँ। मम्मी का वह सुहागन रूप, उनका वह मंगलसूत्र जो अब उनके ढीले होते कपड़ों के बीच झूल रहा था, मेरी आँखों के सामने एक ऐसी त्रासदी की तरह था जिसे मैं चाहकर भी रोक नहीं पा रहा था। कमरे की वह गर्मी अब असहनीय हो गई थी, और कपड़ों की वह सरसराहट अब पूरी तरह से समाप्त होकर एक भयानक और भारी सन्नाटे में बदल गई थी।
जैसे ही साड़ी का वह भारी रेशमी कपड़ा पूरी तरह से नीचे गिरकर फर्श पर एक ढेर बन गया, मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से नग्न नहीं था, बल्कि वह उस स्थिति में थी जहाँ वे सबसे अधिक असुरक्षित और विवश लग रही थीं। उनके शरीर के निचले हिस्से पर अभी भी उनके अंतःवस्त्रों की एक पतली सी परत बाकी थी, जो उनके गोरेपन और उस दृश्य के बीच एक अंतिम, संघर्षपूर्ण ढाल की तरह खड़ी थी। वह आधा खुला हुआ स्वरूप उन्हें और भी अधिक कामुक और साथ ही अत्यंत पीड़ित बना रहा था।
मम्मी की मनोदशा अब उस चरम बिंदु पर थी जहाँ उनकी धार्मिकता और नैतिकता का बांध टूट चुका था। उनके मन में एक भयानक ग्लानि थी उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वे अपने आराध्य और अपने दिवंगत पति के सामने अपराधी हैं। उनकी बंद आँखों से एक आँसू चुपके से निकलकर उनके गालों को भिगो गया, जो उनके उस 'पवित्र' स्वरूप के टूटने का प्रतीक था। वह एक ऐसी देवी की तरह महसूस कर रही थीं जिनका मंदिर अब अपवित्र हो चुका है, फिर भी उनके शरीर की अनजानी उत्तेजना उन्हें इस पाप की गहराई में धकेल रही थी।
अंकल की मनोदशा अब पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी। उनके लिए मम्मी का वह आधा ढका हुआ, कांपता हुआ शरीर किसी तपस्या को भंग करने के आनंद जैसा था। उनकी आँखों में एक ऐसी क्रूर तृप्ति थी जो उस अंतिम अवरोध (अंतःवस्त्रों) को भी मिटा देने के लिए बेताब थी। वे मम्मी की उस धार्मिक छटपटाहट और उनकी आँखों के आँसुओं को अपनी जीत मान रहे थे।
और मैं, रवि, उस कोने में खड़ा अपनी ही आत्मा के विरुद्ध लड़ रहा था। मेरी मनोदशा एक भयानक द्वंद्व में फंसी थी। एक तरफ मम्मी के प्रति मेरा सम्मान और वह धार्मिक संस्कार था जो मुझे आँखें फेर लेने को कह रहा था, और दूसरी तरफ वह आदिम जिज्ञासा जो इस दृश्य की तीव्रता को और करीब से देखना चाहती थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं स्वर्ग और नर्क के बीच की एक ऐसी सीमा पर खड़ा हूँ जहाँ से वापस लौटना असंभव है।
जैसे ही अंकल के भारी हाथों ने मम्मी के शरीर पर बचे उस अंतिम वस्त्र के किनारे को पकड़ा, कमरे की हवा में एक ऐसा तनाव पैदा हो गया जैसे कोई तूफान आने से पहले की शांति हो। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उस कपड़े को एक झटके में नीचे की ओर खींच दिया। अब मम्मी का वह दूध जैसा गोरा और सुडौल बदन पूरी तरह से उस तेज़ रोशनी के सामने निहत्था और बेनकाब खड़ा था। वह पूर्ण नग्नता अब केवल शारीरिक नहीं थी, बल्कि वह उनके उस 'मर्यादापूर्ण' जीवन के पूर्ण समर्पण और पतन का प्रतीक बन चुकी थी। उनके शरीर का वह गोरापन उस कमरे की क्रूर रोशनी में किसी चमकते हुए संगमरमर की तरह लग रहा था, जो अब पूरी तरह से अपवित्र होने के लिए तैयार था।

मम्मी की मनोदशा अब एक गहरे शून्य में डूब चुकी थी। उनके भीतर का वह 'पतिव्रता' अब पूरी तरह से हार चुका था। जब उन्होंने महसूस किया कि अब उनके शरीर पर ढाल देने के लिए कुछ भी शेष नहीं है, तो उनके मन में एक ऐसी चीख उठी जो उनके गले से बाहर नहीं आ सकी। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी आत्मा उनके शरीर को छोड़कर भाग जाना चाहती है। उनकी आँखों से बहते आँसू अब रुक नहीं रहे थे, और उनके कांपते हुए शरीर की हर हरकत उनके भीतर चल रहे उस भीषण नैतिक विनाश को बयां कर रही थी। वे एक ऐसी पवित्र मूर्ति की तरह लग रही थीं जिसे किसी ने सरेआम खंडित कर दिया हो।
अंकल की मनोदशा अब एक हिंसक तृप्ति की ओर बढ़ रही थी। मम्मी के उस पूर्ण नग्न और कांपते हुए स्वरूप को देखकर उनकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं। उनके लिए मम्मी का वह समर्पण और उनकी वह विवशता किसी नशीले पदार्थ की तरह काम कर रही थी। वे अब केवल एक पुरुष नहीं, बल्कि एक ऐसे शिकारी लग रहे थे जिसने अपने सबसे कीमती शिकार को पूरी तरह से जकड़ लिया हो। उनके स्पर्श में अब एक ऐसी अधिकारपूर्ण क्रूरता थी जो मम्मी की गरिमा को पूरी तरह कुचल देने पर आमादा थी।
और मैं, रवि, उस कोने में खड़ा अब अपनी सुध बुध खो चुका था। मम्मी का वह पूर्ण रूप, जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, मेरी आँखों के सामने एक ऐसी सच्चाई बनकर खड़ा था जो मेरे बचपन और मेरे संस्कारों को जलाकर राख कर रहा था। मेरी आँखों में ग्लानि थी, लेकिन मेरा शरीर उस दृश्य की भयावहता और सुंदरता के बीच एक अजीब सी जड़ता में जकड़ा हुआ था। मैं देख रहा था कि कैसे एक पवित्रता का अंत हो रहा है और कैसे एक नया, वर्जित और अंधकारमय अध्याय शुरू हो रहा है।
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Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 08-08-2026, 11:20 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 10-08-2026, 01:11 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 10-08-2026, 02:12 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 10-08-2026, 06:16 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 09:40 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 11-08-2026, 10:19 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 10:21 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 11-08-2026, 10:33 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 11-08-2026, 01:46 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 11-08-2026, 08:41 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 10:18 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 01:49 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Ella - 12-08-2026, 02:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 02:31 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Renuka Shahane - 12-08-2026, 02:34 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 04:10 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Nomita - 12-08-2026, 04:17 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 05:13 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Suhana. - 12-08-2026, 07:15 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 10:09 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by shalini - 12-08-2026, 07:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 10:11 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 13-08-2026, 09:39 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 13-08-2026, 12:08 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 12:19 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Sara Khan - 13-08-2026, 02:05 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-08-2026, 08:17 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 03:48 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-08-2026, 12:30 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 14-08-2026, 01:31 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 14-08-2026, 01:32 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 14-08-2026, 03:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Fanfunda - 14-08-2026, 04:58 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 04:58 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 05:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 05:24 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 05:43 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 15-08-2026, 10:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 09:46 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 16-08-2026, 12:37 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Nehapatel - 16-08-2026, 03:26 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Loveakb18 - 17-08-2026, 06:50 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Fattu - 17-08-2026, 09:28 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Huzmakhan - 18-08-2026, 01:53 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Rijwana Ansaari - 18-08-2026, 02:13 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by SweetSonali - 18-08-2026, 02:24 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Loveakb18 - 18-08-2026, 08:10 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 19-08-2026, 05:41 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Sumitra Sen - 22-08-2026, 06:55 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 22-08-2026, 10:10 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 22-08-2026, 10:51 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 22-08-2026, 03:37 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by srider69 - 22-08-2026, 07:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 22-08-2026, 08:51 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by wetpussy - 23-08-2026, 02:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Jasmin. - 23-08-2026, 03:06 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 23-08-2026, 06:25 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 23-08-2026, 06:29 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Sumitra Sen - 24-08-2026, 07:09 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 24-08-2026, 07:24 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 24-08-2026, 09:10 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 24-08-2026, 10:09 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Jasmin. - 24-08-2026, 12:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 24-08-2026, 02:45 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Monticute - 24-08-2026, 04:01 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Monticute - 24-08-2026, 04:02 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 25-08-2026, 07:31 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 24-08-2026, 05:20 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Kodom Ali Mastan - 25-08-2026, 07:24 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 25-08-2026, 07:33 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Rizwan007 - 25-08-2026, 01:40 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by बहनचोद - 25-08-2026, 01:53 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Prativa Rani Saha - 25-08-2026, 02:05 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 25-08-2026, 02:40 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 25-08-2026, 02:43 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Nova Dewan - 27-08-2026, 12:26 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Anusree - 27-08-2026, 01:36 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Rinkp219 - 28-08-2026, 11:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 29-08-2026, 12:34 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 29-08-2026, 01:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by KGB - 30-08-2026, 10:26 AM
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