14-08-2026, 07:27 PM
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए।
हर शाम रामू जी ऑफिस के बाहर खड़े मिलते। कभी जल्दी छोड़ देते, कभी देर तक गलियों में घुमाते, कभी अपने छोटे से कमरे में ले जाकर अधूरी सी मुलाकात करते। लेकिन हर बार जब रुही घर लौटती, तो मन अधूरा रह जाता। सनी की मौजूदगी, समय की कमी, और वो अधूरी रातें… दोनों के अंदर एक भूख सी बढ़ती जा रही थी।
एक शाम, ऑफिस के बाद, रामू जी ने ऑटो बस्ती की तरफ नहीं मोड़ी। सीधा शहर के बाहर वाली पुरानी सड़क पर ले गए, जहाँ रोशनी कम थी और गाड़ियाँ कम चलती थीं। ऑटो रोककर उन्होंने पीछे मुड़ा। रुही की आँखों में वो भूख साफ दिख रही थी।
रामू जी ने धीरे से कहा, “इधर आ।”
रुही आगे वाली सीट पर सरक आई। रामू जी के बड़े हाथ ने उसकी कमर पकड़ ली।
“बोल,” उन्होंने कम आवाज़ में कहा, “क्या सोच रही है इतने दिन से?”
रुही ने उनकी आँखों में देखा। थोड़ी देर चुप रही, फिर धीरे से बोली, “रामू जी… मुझे पूरी रात आपके साथ बितानी है। एक पूरी रात। जहाँ सुबह की जल्दी न हो, जहाँ सनी का फोन न आए, जहाँ मुझे आपके बिस्तर से उठकर भागना न पड़े।”
रामू जी की दाढ़ी में हल्की मुस्कान तैर गई। उन्होंने रुही का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया।
“पूरी रात?” उन्होंने दोहराया, “तू जानती है न इसका मतलब क्या होता है? सुबह तक मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं। न तेरे शरीर को, न तेरी साँसों को।”
रुही की आवाज़ काँप उठी, लेकिन उसमें डर नहीं, चाहत थी। “जानती हूँ। इसीलिए तो कह रही हूँ। इतने दिन से… जब आप मुझे अधूरा छोड़ देते हो, तो रात भर मेरी नींद नहीं आती। शरीर जलता रहता है। मन में सिर्फ यही रहता है कि काश मैं आपकी बाँहों में सो जाती।”
रामू जी ने उसका माथा अपनी दाढ़ी से छुआ। “और सनी?”
“सनी…” रुही ने आँखें झुकाईं, “वो अगले हफ्ते दो दिन के लिए बाहर जा रहा है। बिज़नेस ट्रिप। शुक्रवार शाम को निकलेगा, रविवार रात को लौटेगा। पूरे दो दिन…”
रामू जी की आँखें चमक उठीं। “दो दिन?”
“हाँ।” रुही ने उनकी छाती पर हाथ रखा। “रामू जी… मुझे अपने कमरे में रख लो। पूरे दो दिन। मैं आपकी रहूँगी। सुबह-शाम, दोपहर, रात… जैसी आपकी मर्ज़ी। खाना बनाऊँगी, आपके पैर दबाऊँगी, आपकी सेवा करूँगी… और जब आप चाहेंगे, तब आपको अपना शरीर दूँगी।”
रामू जी ने उसकी ठुड्डी ऊपर उठाई। “तू सच में इतनी दूर जाने को तैयार है? बस्ती में रहना, मेरे गंदे कमरे में, जहाँ लोग बातें करते हैं?”
रुही ने उनकी आँखों में देखकर कहा, “लोगों की बातों से मुझे अब डर नहीं लगता। मुझे सिर्फ आपके बिना रहने से डर लगता है। रामू जी… मैं रुही कामत बन चुकी हूँ। दिल से। मुझे अपने असली घर में रख लो। बस दो दिन ही सही।”
रामू जी चुपचाप उसे घूरते रहे। फिर अचानक उन्होंने रुही को अपनी तरफ खींच लिया और उसके होठों पर जोर से चुम्बन कर लिया। लंबा, गहरा, भूखा सा चुम्बन। जब उन्होंने होंठ अलग किए, तो दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।
“ठीक है,” रामू जी ने भारी आवाज़ में कहा, “शुक्रवार शाम को सनी जैसे ही निकले, तू मुझे फोन कर। मैं तुझे लेने आऊँगा। और तब से लेकर रविवार रात तक… तू सिर्फ मेरी रहेगी। कोई सनी नहीं, कोई ऑफिस नहीं, कोई दुनिया नहीं। सिर्फ तू और मैं। मेरा कमरा, मेरा बिस्तर, मेरा लंड… और तेरी पूरी हवस।”
रुही की आँखें भर आईं। उसने रामू जी का हाथ पकड़कर अपने गाल से लगा लिया। “धन्यवाद… रामू जी। मैं तैयार रहूँगी। पूरा सामान लेकर। जैसे… जैसे दुल्हन अपने ससुराल जा रही हो।”
रामू जी हँसे, लेकिन उनकी हँसी में मर्दाना जलन थी। “दुल्हन नहीं। मेरी औरत। मेरी रखैल। मेरी प्यासी रुही कामत। जो दो दिन तक सिर्फ मेरे नीचे रहेगी।”
रुही ने उनकी उंगलियों को चूमते हुए फुसफुसाया, “हाँ… सिर्फ आपके नीचे। जितना चाहो, जितनी बार चाहो। मैं हूँ न आपके लिए।”
ऑटो में दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। बाहर अंधेरा घना हो चुका था। रामू जी के बड़े हाथ रुही की कमर पर थे, और रुही का सिर उनकी छाती से सटा हुआ था। दोनों के मन में अब एक ही बात घूम रही थी—
दो दिन।
पूरी रातें।
कोई रुकावट नहीं।
और दोनों जानते थे कि इस बार मुलाकात अधूरी नहीं रहने वाली।
हर शाम रामू जी ऑफिस के बाहर खड़े मिलते। कभी जल्दी छोड़ देते, कभी देर तक गलियों में घुमाते, कभी अपने छोटे से कमरे में ले जाकर अधूरी सी मुलाकात करते। लेकिन हर बार जब रुही घर लौटती, तो मन अधूरा रह जाता। सनी की मौजूदगी, समय की कमी, और वो अधूरी रातें… दोनों के अंदर एक भूख सी बढ़ती जा रही थी।
एक शाम, ऑफिस के बाद, रामू जी ने ऑटो बस्ती की तरफ नहीं मोड़ी। सीधा शहर के बाहर वाली पुरानी सड़क पर ले गए, जहाँ रोशनी कम थी और गाड़ियाँ कम चलती थीं। ऑटो रोककर उन्होंने पीछे मुड़ा। रुही की आँखों में वो भूख साफ दिख रही थी।
रामू जी ने धीरे से कहा, “इधर आ।”
रुही आगे वाली सीट पर सरक आई। रामू जी के बड़े हाथ ने उसकी कमर पकड़ ली।
“बोल,” उन्होंने कम आवाज़ में कहा, “क्या सोच रही है इतने दिन से?”
रुही ने उनकी आँखों में देखा। थोड़ी देर चुप रही, फिर धीरे से बोली, “रामू जी… मुझे पूरी रात आपके साथ बितानी है। एक पूरी रात। जहाँ सुबह की जल्दी न हो, जहाँ सनी का फोन न आए, जहाँ मुझे आपके बिस्तर से उठकर भागना न पड़े।”
रामू जी की दाढ़ी में हल्की मुस्कान तैर गई। उन्होंने रुही का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया।
“पूरी रात?” उन्होंने दोहराया, “तू जानती है न इसका मतलब क्या होता है? सुबह तक मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं। न तेरे शरीर को, न तेरी साँसों को।”
रुही की आवाज़ काँप उठी, लेकिन उसमें डर नहीं, चाहत थी। “जानती हूँ। इसीलिए तो कह रही हूँ। इतने दिन से… जब आप मुझे अधूरा छोड़ देते हो, तो रात भर मेरी नींद नहीं आती। शरीर जलता रहता है। मन में सिर्फ यही रहता है कि काश मैं आपकी बाँहों में सो जाती।”
रामू जी ने उसका माथा अपनी दाढ़ी से छुआ। “और सनी?”
“सनी…” रुही ने आँखें झुकाईं, “वो अगले हफ्ते दो दिन के लिए बाहर जा रहा है। बिज़नेस ट्रिप। शुक्रवार शाम को निकलेगा, रविवार रात को लौटेगा। पूरे दो दिन…”
रामू जी की आँखें चमक उठीं। “दो दिन?”
“हाँ।” रुही ने उनकी छाती पर हाथ रखा। “रामू जी… मुझे अपने कमरे में रख लो। पूरे दो दिन। मैं आपकी रहूँगी। सुबह-शाम, दोपहर, रात… जैसी आपकी मर्ज़ी। खाना बनाऊँगी, आपके पैर दबाऊँगी, आपकी सेवा करूँगी… और जब आप चाहेंगे, तब आपको अपना शरीर दूँगी।”
रामू जी ने उसकी ठुड्डी ऊपर उठाई। “तू सच में इतनी दूर जाने को तैयार है? बस्ती में रहना, मेरे गंदे कमरे में, जहाँ लोग बातें करते हैं?”
रुही ने उनकी आँखों में देखकर कहा, “लोगों की बातों से मुझे अब डर नहीं लगता। मुझे सिर्फ आपके बिना रहने से डर लगता है। रामू जी… मैं रुही कामत बन चुकी हूँ। दिल से। मुझे अपने असली घर में रख लो। बस दो दिन ही सही।”
रामू जी चुपचाप उसे घूरते रहे। फिर अचानक उन्होंने रुही को अपनी तरफ खींच लिया और उसके होठों पर जोर से चुम्बन कर लिया। लंबा, गहरा, भूखा सा चुम्बन। जब उन्होंने होंठ अलग किए, तो दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।
“ठीक है,” रामू जी ने भारी आवाज़ में कहा, “शुक्रवार शाम को सनी जैसे ही निकले, तू मुझे फोन कर। मैं तुझे लेने आऊँगा। और तब से लेकर रविवार रात तक… तू सिर्फ मेरी रहेगी। कोई सनी नहीं, कोई ऑफिस नहीं, कोई दुनिया नहीं। सिर्फ तू और मैं। मेरा कमरा, मेरा बिस्तर, मेरा लंड… और तेरी पूरी हवस।”
रुही की आँखें भर आईं। उसने रामू जी का हाथ पकड़कर अपने गाल से लगा लिया। “धन्यवाद… रामू जी। मैं तैयार रहूँगी। पूरा सामान लेकर। जैसे… जैसे दुल्हन अपने ससुराल जा रही हो।”
रामू जी हँसे, लेकिन उनकी हँसी में मर्दाना जलन थी। “दुल्हन नहीं। मेरी औरत। मेरी रखैल। मेरी प्यासी रुही कामत। जो दो दिन तक सिर्फ मेरे नीचे रहेगी।”
रुही ने उनकी उंगलियों को चूमते हुए फुसफुसाया, “हाँ… सिर्फ आपके नीचे। जितना चाहो, जितनी बार चाहो। मैं हूँ न आपके लिए।”
ऑटो में दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। बाहर अंधेरा घना हो चुका था। रामू जी के बड़े हाथ रुही की कमर पर थे, और रुही का सिर उनकी छाती से सटा हुआ था। दोनों के मन में अब एक ही बात घूम रही थी—
दो दिन।
पूरी रातें।
कोई रुकावट नहीं।
और दोनों जानते थे कि इस बार मुलाकात अधूरी नहीं रहने वाली।


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