14-08-2026, 12:30 PM
(This post was last modified: 14-08-2026, 12:35 PM by Motalund14. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
मैने मम्मी को बोला, "आप आराम करना अभी काम मत करने लग जाना।सारा दिन कम करती रहती हो।।" मेरा ऐसा कहने का कारण ये ये था के मम्मी मन से काम की टेंशन निकाल कर अच्छे से काम लीला में शामिल हो और मुझे देखने का मौका मिले।
"मैं घर से निकलकर तेज़ी से घर के पीछे वाले हिस्से की ओर बढ़ गया। । हमारा अपना एक छोटा सा प्लॉट था जो मुख्य घर से बिल्कुल सटा हुआ था। इस प्लॉट में एक छोटा सा स्टोर रूम और एक ढका हुआ बरामदा बना हुआ था। इस जगह की बनावट ही ऐसी थी कि यहाँ से पूरे घर की गतिविधियों पर नज़र रखना बहुत आसान था।
घर का पिछला हिस्सा एक अर्ध चंद्राकार (semi circle) आकार में बना था, जिसके कारण घर के सभी कमरों की खिड़कियाँ पीछे की तरफ ही खुलती थीं। स्टोर रूम और बरामदे के बीच जो खाली जगह थी, वह एक ऐसे केंद्र बिंदु की तरह थी जहाँ से घर के हर कमरे का कोण (angle) साफ़ दिखाई देता था। अगर मैं बरामदे के उस संकरे हिस्से में खड़ा होता, तो मेरी दृष्टि के दायरे में बाईं ओर का कमरा, बीच का मुख्य कमरा (पापा का कमरा), और दाईं ओर का कमरा तीनों एक ही लाइन में आ जाते थे।
सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि स्टोर रूम की खिड़की और बरामदे की रेलिंग के बीच एक ऐसा छोटा सा ढांचा या गैप था, जहाँ से मैं ईंटों का सहारा लेकर थोड़ा ऊपर चढ़ सकता था। इस ऊँचाई पर पहुँचते ही मेरी आँखें सीधे खिड़कियों के उस स्तर पर आ जाती थीं जहाँ से अंदर का नज़ारा बिना किसी रुकावट के देखा जा सकता था। चूँकि खिड़कियाँ बाहर की तरफ खुलती थीं, इसलिए मैं खिड़की के उस आधे खुले हिस्से का इस्तेमाल करके अंदर झाँकने के लिए एक सुरक्षित और सटीक जगह बना पाया।
"अभी भोर का समय था और आसमान में गहरा अंधेरा छाया हुआ था। सूरज निकलने में अभी काफी देर थी, चारों ओर एक ठंडी और शांत खामोशी थी। मैं उस छोटे से स्टोर रूम के पास अपने बनाए हुए चबूतरे पर दुबक कर बैठा था, मेरी आँखें पूरी तरह से सतर्क थीं। मेरे मन में एक बड़ी उलझन चल रही थी क्या वे लोग लाइट जलाएंगे या नहीं? अगर लाइट जलती है, तो अंधेरे के इस समय में कमरे के अंदर का नज़ारा मेरे लिए किसी फिल्म की तरह साफ़ होगा। लेकिन अगर वे लाइट नहीं जलाते, तो मुझे देखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ेगा। फिर भी, मुझे इस बात का पूरा निश्चय था कि आज पक्का 'चूदाई' होगी।
ये मै पहले ही जान चुका था के आज उनका प्रोग्राम पापा और मम्मी वाले रूम मे ही होगा,ये अंदाजा मुझे उनके हाव भाव से लग चुका था और अभी अभी मैने जब उनकी फुसफुसाहट भरी गुफ़्तगू सुन रहा था तो अंकल ने कहा भी था ,"आज तुम दोनों (मम्मी अंजली और पापा वेद प्रकाश)के पहले मिलन की गवाह स्थली को पवित्र करेंगे"।
यह वही कमरा है जहाँ पापा और मम्मी ने अपनी शादी के बाद का अपना सबसे खूबसूरत समय बिताया था। यह उनका अपना संसार था, उनका आशियाना था। और सच तो यह है कि आज भी जब पापा घर आते हैं, तो वे इसी कमरे में सोते हैं। मैंने कई बार रात के सन्नाटे में देखा है कि जब सब सो जाते हैं, तो मम्मी चुपके से पापा के पास उनके कमरे में चली जाती हैं।
यह कमरा कोई साधारण कमरा नहीं था; वह पापा और मम्मी का वह निजी कोना था जहाँ शादी के शुरुआती सालों में वे दोनों घंटों बैठकर एक दूसरे के प्यार में डूबे रहते थे। उस कमरे की दीवारों में आज भी उनके पुराने रोमांस और प्यार की महक बसी हुई थी।
वही कमरा जहाँ कभी वेद(पापा) और अंजली (मम्मी)ने एक दूसरे को पहली बार छुआ था, आज वही कमरा एक नए और बेहद कामुक खेल का गवाह बनने वाला था। अंकल का इरादा उस पुराने रोमांस की यादों को अपने कामुक स्पर्श से पूरी तरह से बदल देने का था। वे उस कमरे की शांति को ,अपनी और मम्मी की कामुकता की आवाज़ों से भंग करने वाले थे। मैं बस उसी कमरे की खिड़की की ओर टकटकी लगाए बैठा था, इस इंतज़ार में कि कब पापा के कमरे का दरवाज़ा खुलेगा और उस पुराने प्यार के मंदिर में आज एक नया और अनचाहा रोमांच शुरू होगा।"
"तभी सन्नाटे को चीरती हुई हल्की आहट सुनाई दी। मैंने अपनी साँसें रोक लीं। कमरे का दरवाज़ा बहुत ही धीरे से खुला। अंधेरे में मुझे केवल दो धुंधली आकृतियाँ दिखाई दे रही थीं अंकल और मम्मी। वे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे, लगभग दबे पाँव कमरे के अंदर दाखिल हो रहे थे।
"जैसे ही मम्मी ने स्विच दबाया, तेज रोशनी से पूरा कमरा जगमगा उठा। उस रोशनी के अचानक फैलते ही मेरे सामने का दृश्य ऐसा था कि मेरी सांसें थम गईं। सामने मम्मी और अंकल एक दूसरे के साथ में लिपटे खड़े थे। मम्मी की आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे वह सहमी हुई हों, लेकिन उन आंखों में कई तरह के मिले जुले भाव थे शायद डर, शायद समर्पण और शायद कुछ और भी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था। वहीं दूसरी ओर अंकल की आंखों में एक गहरी मक्कारी थी। उनकी आंखों में ऐसे भाव थे जैसे कोई पाप का देवता अपनी किसी खास मुहिम पर हों, जैसे उन्हें अपनी इस हरकत पर कोई पछतावा नहीं, बल्कि एक अजीब सा गर्व महसूस हो रहा हो।
दीवारों पर टंगी उन तस्वीरों को देखकर मेरा मन भर आता है। एक तरफ पापा और मम्मी की शादी के दिनों की वह बड़ी सी तस्वीर है, दोनों के चेहरों पर वह मासूमियत और वह नयापन देखकर लगता है जैसे वक्त वहीं ठहर गया हो। वहीं दूसरी तरफ कुछ छोटी छोटी मनभावन कलाकृतियाँ हैं और एक कोने में भगवान की वह छोटी सी तस्वीर है। यह कमरा मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक रहा है। लेकिन आज, इसी पवित्रता के बीच जो होने वाला था, वह मेरी आत्मा को झकझोर रहा था। वह रोशनी उस पवित्रता और उस आने वाले दृश्य के बीच के अंतर को इतनी बेरहमी से दिखा रही थी कि मैं चाहकर भी अपनी नज़रें नहीं हटा पा रहा था।
मेरे भीतर एक अजीब सी जंग चल रही थी। मुझे खुद पर बहुत ग्लानि हो रही थी, एक भारी सी गिल्ट महसूस हो रही थी। मुझे लग रहा था कि अपनी इस तीव्र जिज्ञासा को शांत करने के चक्कर में, मैं भी इस पाप का एक हिस्सा बनता जा रहा हूँ। मैं एक गवाह से कहीं बढ़कर इस गुनाह का भागीदार बनता जा रहा था। मेरा विवेक मुझे रोक रहा था, मेरा मन चीख रहा था कि यह गलत है, पर मेरा शरीर और मेरी आँखें जैसे मेरे बस में नहीं थीं। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था उस दृश्य को देखने की उस अदम्य इच्छा को, जो मुझे अंदर ही अंदर जला रही थी
"मैं घर से निकलकर तेज़ी से घर के पीछे वाले हिस्से की ओर बढ़ गया। । हमारा अपना एक छोटा सा प्लॉट था जो मुख्य घर से बिल्कुल सटा हुआ था। इस प्लॉट में एक छोटा सा स्टोर रूम और एक ढका हुआ बरामदा बना हुआ था। इस जगह की बनावट ही ऐसी थी कि यहाँ से पूरे घर की गतिविधियों पर नज़र रखना बहुत आसान था।
घर का पिछला हिस्सा एक अर्ध चंद्राकार (semi circle) आकार में बना था, जिसके कारण घर के सभी कमरों की खिड़कियाँ पीछे की तरफ ही खुलती थीं। स्टोर रूम और बरामदे के बीच जो खाली जगह थी, वह एक ऐसे केंद्र बिंदु की तरह थी जहाँ से घर के हर कमरे का कोण (angle) साफ़ दिखाई देता था। अगर मैं बरामदे के उस संकरे हिस्से में खड़ा होता, तो मेरी दृष्टि के दायरे में बाईं ओर का कमरा, बीच का मुख्य कमरा (पापा का कमरा), और दाईं ओर का कमरा तीनों एक ही लाइन में आ जाते थे।
सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि स्टोर रूम की खिड़की और बरामदे की रेलिंग के बीच एक ऐसा छोटा सा ढांचा या गैप था, जहाँ से मैं ईंटों का सहारा लेकर थोड़ा ऊपर चढ़ सकता था। इस ऊँचाई पर पहुँचते ही मेरी आँखें सीधे खिड़कियों के उस स्तर पर आ जाती थीं जहाँ से अंदर का नज़ारा बिना किसी रुकावट के देखा जा सकता था। चूँकि खिड़कियाँ बाहर की तरफ खुलती थीं, इसलिए मैं खिड़की के उस आधे खुले हिस्से का इस्तेमाल करके अंदर झाँकने के लिए एक सुरक्षित और सटीक जगह बना पाया।
"अभी भोर का समय था और आसमान में गहरा अंधेरा छाया हुआ था। सूरज निकलने में अभी काफी देर थी, चारों ओर एक ठंडी और शांत खामोशी थी। मैं उस छोटे से स्टोर रूम के पास अपने बनाए हुए चबूतरे पर दुबक कर बैठा था, मेरी आँखें पूरी तरह से सतर्क थीं। मेरे मन में एक बड़ी उलझन चल रही थी क्या वे लोग लाइट जलाएंगे या नहीं? अगर लाइट जलती है, तो अंधेरे के इस समय में कमरे के अंदर का नज़ारा मेरे लिए किसी फिल्म की तरह साफ़ होगा। लेकिन अगर वे लाइट नहीं जलाते, तो मुझे देखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ेगा। फिर भी, मुझे इस बात का पूरा निश्चय था कि आज पक्का 'चूदाई' होगी।
ये मै पहले ही जान चुका था के आज उनका प्रोग्राम पापा और मम्मी वाले रूम मे ही होगा,ये अंदाजा मुझे उनके हाव भाव से लग चुका था और अभी अभी मैने जब उनकी फुसफुसाहट भरी गुफ़्तगू सुन रहा था तो अंकल ने कहा भी था ,"आज तुम दोनों (मम्मी अंजली और पापा वेद प्रकाश)के पहले मिलन की गवाह स्थली को पवित्र करेंगे"।
यह वही कमरा है जहाँ पापा और मम्मी ने अपनी शादी के बाद का अपना सबसे खूबसूरत समय बिताया था। यह उनका अपना संसार था, उनका आशियाना था। और सच तो यह है कि आज भी जब पापा घर आते हैं, तो वे इसी कमरे में सोते हैं। मैंने कई बार रात के सन्नाटे में देखा है कि जब सब सो जाते हैं, तो मम्मी चुपके से पापा के पास उनके कमरे में चली जाती हैं।
यह कमरा कोई साधारण कमरा नहीं था; वह पापा और मम्मी का वह निजी कोना था जहाँ शादी के शुरुआती सालों में वे दोनों घंटों बैठकर एक दूसरे के प्यार में डूबे रहते थे। उस कमरे की दीवारों में आज भी उनके पुराने रोमांस और प्यार की महक बसी हुई थी।
वही कमरा जहाँ कभी वेद(पापा) और अंजली (मम्मी)ने एक दूसरे को पहली बार छुआ था, आज वही कमरा एक नए और बेहद कामुक खेल का गवाह बनने वाला था। अंकल का इरादा उस पुराने रोमांस की यादों को अपने कामुक स्पर्श से पूरी तरह से बदल देने का था। वे उस कमरे की शांति को ,अपनी और मम्मी की कामुकता की आवाज़ों से भंग करने वाले थे। मैं बस उसी कमरे की खिड़की की ओर टकटकी लगाए बैठा था, इस इंतज़ार में कि कब पापा के कमरे का दरवाज़ा खुलेगा और उस पुराने प्यार के मंदिर में आज एक नया और अनचाहा रोमांच शुरू होगा।"
"तभी सन्नाटे को चीरती हुई हल्की आहट सुनाई दी। मैंने अपनी साँसें रोक लीं। कमरे का दरवाज़ा बहुत ही धीरे से खुला। अंधेरे में मुझे केवल दो धुंधली आकृतियाँ दिखाई दे रही थीं अंकल और मम्मी। वे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे, लगभग दबे पाँव कमरे के अंदर दाखिल हो रहे थे।
"जैसे ही मम्मी ने स्विच दबाया, तेज रोशनी से पूरा कमरा जगमगा उठा। उस रोशनी के अचानक फैलते ही मेरे सामने का दृश्य ऐसा था कि मेरी सांसें थम गईं। सामने मम्मी और अंकल एक दूसरे के साथ में लिपटे खड़े थे। मम्मी की आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे वह सहमी हुई हों, लेकिन उन आंखों में कई तरह के मिले जुले भाव थे शायद डर, शायद समर्पण और शायद कुछ और भी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था। वहीं दूसरी ओर अंकल की आंखों में एक गहरी मक्कारी थी। उनकी आंखों में ऐसे भाव थे जैसे कोई पाप का देवता अपनी किसी खास मुहिम पर हों, जैसे उन्हें अपनी इस हरकत पर कोई पछतावा नहीं, बल्कि एक अजीब सा गर्व महसूस हो रहा हो।
दीवारों पर टंगी उन तस्वीरों को देखकर मेरा मन भर आता है। एक तरफ पापा और मम्मी की शादी के दिनों की वह बड़ी सी तस्वीर है, दोनों के चेहरों पर वह मासूमियत और वह नयापन देखकर लगता है जैसे वक्त वहीं ठहर गया हो। वहीं दूसरी तरफ कुछ छोटी छोटी मनभावन कलाकृतियाँ हैं और एक कोने में भगवान की वह छोटी सी तस्वीर है। यह कमरा मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक रहा है। लेकिन आज, इसी पवित्रता के बीच जो होने वाला था, वह मेरी आत्मा को झकझोर रहा था। वह रोशनी उस पवित्रता और उस आने वाले दृश्य के बीच के अंतर को इतनी बेरहमी से दिखा रही थी कि मैं चाहकर भी अपनी नज़रें नहीं हटा पा रहा था।
मेरे भीतर एक अजीब सी जंग चल रही थी। मुझे खुद पर बहुत ग्लानि हो रही थी, एक भारी सी गिल्ट महसूस हो रही थी। मुझे लग रहा था कि अपनी इस तीव्र जिज्ञासा को शांत करने के चक्कर में, मैं भी इस पाप का एक हिस्सा बनता जा रहा हूँ। मैं एक गवाह से कहीं बढ़कर इस गुनाह का भागीदार बनता जा रहा था। मेरा विवेक मुझे रोक रहा था, मेरा मन चीख रहा था कि यह गलत है, पर मेरा शरीर और मेरी आँखें जैसे मेरे बस में नहीं थीं। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था उस दृश्य को देखने की उस अदम्य इच्छा को, जो मुझे अंदर ही अंदर जला रही थी


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)