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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
#25
थोड़ी देर की  शांति के बाद, कमरे में अचानक चारपाई की चरचराहट और फिर गहरे, रसीले चुंबनों की आवाज़ गूँजने लगी। तभी मुझे मम्मी की एक थकी हुई सी फुसफुसाहट सुनाई दी, "नहीं... अब नहीं... मैं बहुत थक गई हूँ।"अंकल उनकी इस थकान को नज़रअंदाज़ कर रहे थे। उनकी आवाज़ में एक हताशा भरी ज़िद थी, "बड़ी मुश्किल से आज मौका मिला है, प्लीज करने दो ना।" मम्मी ने फिर से मना करते हुए कहा, "नहीं भाई जी, काफी टाइम हो गया है। मुझे पता है, दूसरी बार में तो तुम सुबह 5 बजे तक मुझे छोड़ोगे नहीं, फिर मेरे लिए मुश्किल हो जाएगी। ऐसा करो, कल दिन में पक्का।" अंकल ने आह भरते हुए कहा, "पर दिन में तो तुम काम में लगी रहती हो।"तभी मम्मी ने एक योजना बनाई, "कल पक्का !आप काम से छुट्टी कर लेना। मैं रवि को भी बोल दूँगी कि कॉलेज से छुट्टी ले ले, इससे उसे शक भी नहीं होगा कि आप क्यों घर पर हैं। और आप कर लेना अपनी मनमर्जी। रवि तो है ही भोला भाला, मैं उसे बोल दूँगी कि वो दुकान संभाल ले और मैं घर का काम कर लूँ।"इतना कहकर मम्मी उठीं और धीरे से मेरे पास आकर लेट गईं। उनके पास से पसीने की वह सोंधी और अजीब सी महक आ रही थी।जब मम्मी ने करवट बदल कर मुंह मेरी तरफ कर लियटो थोड़ी देर बाद मैने सोये होने  का बहाना करते हुए मैंने धीरे से अपना एक हाथ उनकी ऊपर और एक टांग  उनके  टांग पर रख दी। कुछ ही मिनटों के भीतर, पता नहीं किस अहसास के चलते, मम्मी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया यानी मुझे अपनी जाँफी में ले लिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह एक माँ का अपने बेटे के प्रति ममता भरा स्पर्श था या फिर कुछ और... मैं उस अहसास को पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था।थोड़ी ही देर बढ़ मुझे नींद आ गई। मम्मी के बदन के ममता भरे गरम स्पर्श,इतनी देर जागते रहने,और मुठ मारने के बाद मिली मानसिक और शारीरक संतुष्टि के कारण बहुत ही गहरी और मीठी नींद आई थी।
   सुबह के पाँच बजे मम्मी मेरे पास आईं और मेरे गाल पर किस करके बड़े प्यार से बोलीं, "बेटा रवि, उठो,मुँह हाथ धो लो। अगर नहाना है तो नहा लो, मैंने तो नहा लिया है, अब मैं पूजा करने जा रही हूँ।"मैने आँख खोली ,देखा मम्मी बहुत ही ही खूबसूरत लग रही  और शांत भी ,मै थोड़ा मुस्कुरा के हा का इशारा किया, मम्मी फिर बोली," बेटा आज कॉलेज से छुट्टी करलो मेरे काफी काम हैं घर के,तुम दुकान संभालना मै घर का काम निबटा लूंगी"। मै मन ही मन सोचने लगा के मम्मी कितनी चतुर है ,कितनी सफाई से उस प्लान पर काम शुरू कर दिया है जो रात को दोनों ने मिलकर कर बनाया था।मैं बोला," ठीक है है मम्मी मैं आज कॉलेज नहीं जाता"। इतना कहकर मैं मम्मी के जाने का इंतज़ार किया।मम्मी के बाहर जाते ही  झट से बेड के नीचे से अंडरवियर निकालकर बाथरूम में चला गया।
मम्मी जब सुबह नहाती थीं, तब मेरे कपड़े और तौलिया भी वहीं रख देती थीं। आप सोच रहे होंगे कि अंकल ने नहीं देखा? दरअसल, अंकल सुबह 4:30 बजे ही छत पर चले जाते थे और वहाँ कुछ कसरत करने लगते थे।तभी मेरी नज़र बाथरूम में धोने के लिए रखे कपड़ों की तरफ गई। मैंने देखा कि जो तौलिया कल मम्मी ने अंकल की चारपाई के पास टांगा था, वह भी गंदे कपड़ों के साथ वहीं पड़ा है। मैंने सोचा कि यह तौलिया तो किसी ने इस्तेमाल भी नहीं किया, तो फिर यह गंदे कपड़ों के साथ क्यों है? उत्सुकतावश मैंने तौलिया उठा लिया और मुझे महसूस हुआ कि इससे वैसी ही महक आ रही थी जैसी रात को मम्मी के शरीर से आ रही थी।मैंने थोड़ा पलट कर देखा तो तौलिया काफी जगहों से गीला था। पता नहीं मन मे  क्या आया कि मैंने  हाथ से छूकर देखा, तो मुझे चिपचिपाहट महसूस हुई। मैं इस उलझन में पड़ गया कि यह चिपचिपाहट कहाँ से आई? मैं सोच रहा था कि ऐसा ही चिपचिपा पानी तो मेरे लंड से भी निकला था, पर अंकल ने तो मम्मी की चूत के अंदर गिराया था, तो फिर तौलिया पर कैसे और  वो बी इतना ज्यादा ? तब तक मैं यही समझता था कि मर्द का माल औरत के अंदर ही रहता है, इसलिए मैं इस पहेली को सुलझा नहीं पा रहा था।अभ जब भी वो सीन  याद करता हु तो अपने भोलेपन पर मुस्कुरा देता हु।वैसे तो मैं दो साल पहले एक लड़की की ले चुका था,पर तब तो मेरी उमर और भी कम थी तो कुश सीख नहीं पाया था।उस लड़की की लेने का किस्सा भी बहुत मजेदार है(,इसी कहानी में शेयर करूगा )    खैर, मैंने नहाने के बाद अपना अंडरवियर पानी में भिगो दिया और कपड़े पहनकर बाथरूम से बाहर आ गयाl
जब मैं नहाकर बाहर निकला, तो लॉबी में मेरा सामना मम्मी से हुआ। वह अभी अभी पूजा करके पूजा घर से बाहर निकली थीं।
उस वक्त जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था, वह इतना सुंदर और पवित्र था कि मैं बस देखता ही रह गया। मम्मी का वह रूप एकदम दिव्य और धार्मिक लग रहा था। उनकी वह **दूधिया गोरी त्वचा** सुबह की मद्धम रोशनी में चमक रही थी, और उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। माथे पर लगा वह गहरा लाल कुमकुम का तिलक और आँखों के बीच सजी वह छोटी सी बिंदी उनके चेहरे की सुंदरता में चार चाँद लगा रही थी। उनकी नाक में सजी वह छोटी सी नथनी और कानों के झुमके सुबह की मद्धम रोशनी में चमक रहे थे, जो उनके चेहरे की सुंदरता को और भी निखार रहे थे। उनकी माँग में भरा वह गहरा लाल सिंदूर और उनके चेहरे की वह असीम शांति उन्हें एक **धर्मपरायण सुहागन और एक आदर्श पतिव्रता स्त्री** के रूप में दर्शा रही थी। वह दृश्य इतना पवित्र था कि उन्हें देखकर मन में श्रद्धा अपने आप जाग उठी।"
उनके गीले बाल और चेहरे पर छाई वह पवित्र चमक देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई देवी साक्षात सामने खड़ी हों।
वह पूरी तरह से भक्ति में लीन लग रही थीं। उनके हाथों में पूजा की थाली की महक और अगरबत्ती का हल्का धुआँ हवा में तैर रहा था। उनकी सादगी और उस धार्मिक रूप ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था। मैं बस वहीं लॉबी में खड़ा होकर उन्हें निहारता रहा। उनके चेहरे की वह सौम्यता और वह पवित्र आभा इतनी प्रभावशाली थी कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा और भी बढ़ गई। वह पल बहुत ही शांत और गरिमामय था, जहाँ सिर्फ उनकी सुंदरता और उस धार्मिक वातावरण का जादू छाया हुआ था।"
मैं अपने कमरे में गया और जूते पहनकर बाहर निकलने की तैयारी करने लगा। आमतौर पर तैयार होने और जूते पहनने में मुझे १० १५ मिनट लग जाते थे, लेकिन आज जैसे मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी मैं बस जल्दी से बाहर निकलना चाहता था। देखते ही देखते सिर्फ दो मिनट में ही मैं बाहर आ गया।
सबसे पहले मैं मम्मी के कमरे में गया, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। मम्मी अंदर नहीं थीं। तभी अचानक मुझे बगल वाले कमरे से, यानी अंकल के कमरे से कुछ हल्की हल्की फुसफुसाहट की आवाज़ सुनाई दी। मेरा ध्यान उस आवाज़ की ओर खिंचा चला गया। मैं दबे पाँव उस आधे खुले दरवाज़े के पास पहुँचा और कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा।
अंदर से अंकल की आवाज़ आ रही थी। वह मम्मी से कुछ कह रहे थे, 'अरे, अब मुझे भी भोग लगवाओ ना...' उनकी आवाज़ में एक तरह की ज़िद थी। मम्मी ने बहुत ही धीमी और संभली हुई आवाज़ में जवाब दिया, 'पर मैंने आपसे कहा था ना कि जब रवि दुकान पर चला जाएगा, तब कर लेना।'
तभी अंकल ने तुरंत टोकते हुए कहा, 'अरे छोड़ो भी, तुम खाना बनाने लग जाओगी बाद में, अभी ही मौका है। मैं दोपहर तक इंतज़ार नहीं कर सकता।' उनकी बातों से लग रहा था कि वह बहुत बेताब थे।"

अंकल की बातें सुनकर मेरा दिमाग चकरा गया। मुझे अचानक याद आया कि इनका दोपहर का प्रोग्राम तो बिल्कुल पक्का है। पर अब समस्या यह थी कि मैं इसे देख कैसे पाऊँगा? दोपहर के समय तो दुकान पर ग्राहकों की भारी भीड़ होती है और मैं वहाँ से एक पल के लिए भी नहीं हट सकता। मैं चाहकर भी उस समय वहाँ नहीं पहुँच पाऊँगा।

तभी अचानक मेरे दिमाग में एक योजना आई। मैंने सोचा कि अगर मुझे यह सब देखना है, तो मुझे कुछ अलग करना होगा। मैं दबे पाँव वापस अपने कमरे में गया और फिर बहुत ही सावधानी से, ताकि किसी को शक न हो, मैंने मम्मी को आवाज़ लगाई, 'मम्मी... ओ मम्मी! ज़रा सुनना!' मेरी आवाज़ में एक ऐसी बनावट थी जैसे मैं कोई साधारण काम बता रहा हूँ, ताकि अंकल को भी कुछ महसूस न हो।"
"मम्मी तुरंत लॉबी में आ गईं और बड़े प्यार से पूछा, 'क्या हुआ बेटा? क्यों आवाज़ दे रहे हो?'
मैंने एक गहरी साँस ली और चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान लाते हुए कहा, 'मम्मी, मेरा मन कर रहा था कि मैं पास वाले मंदिर, जो हमारे घर से करीब दो किलोमीटर दूर है, वहाँ जाकर दर्शन कर आऊँ। इससे मेरी थोड़ी सैर भी हो जाएगी और मन भी शांत हो जाएगा। अभी साढ़े पाँच बज रहे हैं, तो मैं दो घंटे में वापस लौट आऊँगा, यानी सात साढ़े सात के आसपास तक घर पहुँच जाऊँगा। दुकान तो हमें आठ बजे ही खोलनी है, तब तक मैं सब संभाल लूँगा।'
मम्मी को मेरी बात पर रत्ती भर भी शक नहीं हुआ। पर असल में मेरा इरादा कुछ और ही था। मेरा असली प्लान तो कुछ और ही था मैं बस उन्हें वह मौका देना चाहता था ताकि वे दोनों पूरी तरह बेपरवाह होकर अपना क्रिया कलाप कर सकें।मैने  मम्मी को बोला, "आप आराम करना अभी काम मत करने लग जाना।सारा दिन कम करती रहती हो।।" मेरा ऐसा कहने का कारण ये ये था के मम्मी काम की टेंशन  मन से काम की टेंशन निकाल कर  अच्छे से काम लीला में शामिल हो और मुझे देखने का मौका मिले। मैं चाहता था कि जब घर में कोई न हो, तब मैं घर के पीछे वाले अपने प्लॉट में जाकर खिड़की के सहारे छिपकर अंदर का सारा नज़ारा देख सकूँ। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था क्योंकि मैं उस पल का इंतज़ार कर रहा था जिसे मैं अपनी आँखों से साक्षात देख पाऊँगा।"
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Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 08-08-2026, 11:20 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 10-08-2026, 02:12 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Suhana. - 12-08-2026, 07:15 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by shalini - 12-08-2026, 07:35 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 13-08-2026, 09:39 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Sara Khan - 13-08-2026, 02:05 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Fanfunda - 14-08-2026, 04:58 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Sumitra Sen - 22-08-2026, 06:55 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Eswar P - 10-09-2026, 05:43 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by MARVIN - 10-09-2026, 07:32 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Viraj007 - 14-09-2026, 12:55 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-09-2026, 07:28 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-09-2026, 06:16 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Bulldozer - 14-09-2026, 07:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 16-09-2026, 11:40 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Blackheart - 16-09-2026, 11:56 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 16-09-2026, 07:47 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 16-09-2026, 07:49 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 16-09-2026, 09:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 16-09-2026, 09:44 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Farah - 16-09-2026, 09:55 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Sharmin Shila - 16-09-2026, 10:03 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Pakeeza chut - 16-09-2026, 10:13 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 17-09-2026, 08:38 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 17-09-2026, 04:55 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 17-09-2026, 05:14 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by saya - 18-09-2026, 02:45 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 19-09-2026, 04:41 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - Yesterday, 11:38 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Rohit - 2 hours ago



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