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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
नया मोड़ —1
 
शेर झटके से अपनी आँखें खोलकर बिस्तर पर उठ बैठा। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं और पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था।
 
जैसे ही उसने अपनी जाँघों के पास महसूस हुई उस अजीब सी चिपचिपाहट की तरफ ध्यान दिया, उसका मुँह खुला का खुला रह गया। उसका पजामा उसके अपने ही गाढ़े वीर्य से पूरी तरह गंदा और गीला हो चुका था।
 
कुछ पलों तक तो शेर बदहवास सा कमरे की दीवारों और छत को ताकता रहा। धीरे-धीरे उसका दिमाग ठिकाने आया और उसे हकीकत का अहसास हुआ। दोपहर में तांत्रिक के ठिकाने से लौटने के बाद वह अपने कमरे में आकर सो गया था।
 
वह पूरा कामुक नज़ारा—मीरा का फव्वारे के नीचे नंगे होकर नहाना, उसका पैंटी चाटना, मीरा की चूत में जीभ और उंगली डालना, और फिर उसे दीवार से सटाकर बेरहमी से पेलना—सब कुछ महज एक बेहद  कामुक सपना था!
 
हकीकत सामने आते ही शेर का सारा मज़ा काफूर हो गया और गुस्से के मारे उसका चेहरा लाल पड़ गया।
 
शेर (बिस्तर पर ज़ोर से मुक्का मारते हुए और खुद को गालियाँ देते हुए चीखा): "अबे चूतिया है क्या बे तू शेर?! साला हरामज़ादा! पूरी ज़िंदगी बस ऐसे ही हिला-हिलाकर मुट्ठ ही मारता रहेगा क्या?! कितनी बार सपने में मुट्ठ मार-मार के ही काम चलाएगा तू?!"
 
वह बिस्तर से उठा और पजामे के उस गीले धब्बे को देखकर नफरत और खीझ से भर गया।
 
शेर (दाँत भींचकर कमरे में टहलते हुए, मीरा को कोसने लगा): "साली मीरा... तूने तो मेरा जीना हराम करके रख दिया है! न दिन को चैन है, न रात को सुकून! हकीकत में तो नखरे दिखाती है, और सपनों में आकर भी ऐसे तड़पाती है! साला पागल बनाकर छोड़ दिया है उस औरत ने मुझे!"
 
शेर ने नफरत से अपना गंदा पजामा उतारा और बाथरूम की तरफ बढ़ा, ताकि उस गीलेपन को धो सके।
 
लेकिन उसके दिमाग में तांत्रिक का दिया हुआ वो टोटका और मीरा के जिस्म की वही आग अब भी सुलग रही थी।
 
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शाम ढलने लगी थी । सरताज घर वापस लौटे थे, लेकिन उनके पीछे-पीछे जब चंदन बाबा की चिर-परिचित, शांत और सौम्य काया भीतर दाखिल हुई, तो मानों पूरे घर का बोझिल माहौल एक पल में ही छंट गया। घर का सूनापन अचानक एक गहरी मिठास और अपनत्व से भर गया।
 
चंदन बाबा को इस तरह अचानक घर की देहलीज पर खड़ा देखकर मीरा और ज्योति की आँखें अविश्वास और असीम खुशी से चमक उठीं।
 
ज्योति, जो अब तक अपने खिलौनों में व्यस्त थी, चंदन बाबा का चेहरा देखते ही अपनी सुध-बुध खो बैठी। वह खिलौने वहीं छोड़कर उनके पास भागी और बिना एक पल गँवाए उनसे कसकर लिपट गई।
 
चंदन बाबा के चेहरे पर एक तृप्त मुस्कान खिल उठी। उन्होंने तुरंत अपनी मजबूत और ममतामयी बांहों में ज्योति को ऊपर उठा लिया, उसे अपने सीने से सटाया और माथा चूमते हुए गद्गद आवाज में बोले, "मेरी लाडली! अरे, मैंने अपनी प्यारी राजकुमारी बेटिया को बहुत मिस किया रे! इतने दिन बीत गए, मेरी नटखट बिटिया को देखे बिना जैसे चैन ही नहीं मिल रहा था।"
 
ज्योति ने उनके गाल पर अपना नन्हा हाथ फेरा और अपने चुलबुले अंदाज में शिकायत करते हुए बोली, "बाबा! आप इतने दिन कहाँ गायब थे? आपको मेरी याद नहीं आती थी क्या? देखिए, मैंने आपके बिना कोई शरारत भी नहीं की।"
चंदन बाबा खिलखिलाकर हंस पड़े, "अरे मेरी रानी, तेरी याद तो हर घड़ी आती थी। बस जरा काम का फेर था। अब देख, तेरा बाबा आ गया न!"
 
दोनों का यह निश्छल प्रेम देखकर मीरा के कदम अपने आप आगे बढ़ गए। उसकी आँखें आदर और उत्साह से भरी थीं। उसने तुरंत आगे बढ़कर चंदन बाबा के चरण स्पर्श करने के लिए अपने दोनों हाथ नीचे झुकाए।
 
लेकिन चंदन बाबा ने झटके से दो कदम पीछे हटते हुए मीरा को वहीं रोक दिया। उनके चेहरे पर संकोच और स्नेह का एक अनूठा भाव तैर आया। वे अपनी सहज और स्नेह भरे लहजे में झिझकते हुए बोले, "अरे-अरे मीरा बेटी! यह क्या कर रही हो? मुझ गरीब पर यह पाप मत चढ़ाओ। तुम तो इस घर की साक्षात लक्ष्मी हो, कुलवधू हो। मेरे जैसे सीधे-सादे इंसान के आगे ऐसे पैर मत छुओ बेटी।"
 
मीरा ने झुकी हुई नजरें उठाईं और उनकी आँखों में झांका, जहाँ केवल आदर और निश्छल अपनापा था।
 
उसने अपने हाथ जोड़ लिए और भरे गले से बोली, "बाबा, आप यह क्या कह रहे हैं? आप केवल इस घर के बड़े ही नहीं, हमारे लिए पिता समान हैं। बेटियों को अपने बड़ों का आशीर्वाद लेने से कोई कैसे रोक सकता है? आपके हाथ का स्पर्श ही हमारे लिए सबसे बड़ा सहारा है।"
 
चंदन बाबा ने ज्योति को गोद में संभाले रखते हुए ही मीरा के सिर पर अपना दाहिना हाथ रखा और भावुक होकर बोले, "बेटी, आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ ही है। पर सच पूछो तो तुम्हारे इस मान-सम्मान ने ही मुझे इस घर से बांध रखा है। वरना हम जैसे आम लोगों को भला इतना आदर कहाँ मिलता है?"
 
"आदर इंसान के पद से नहीं, उसके दिल और उसके कर्मों से होता है बाबा," मीरा की आँखों से अश्रुओं की एक बूंद ढुलककर गाल पर आ गई। "आपके आने से लगता है जैसे इस घर को उसकी रूह वापस मिल गई।"
 
चंदन बाबा के इन सादे, सहज और ममत्व भरे शब्दों को सुनकर मीरा का दिल भर आया था। उसकी आँखें आंसुओं से डबडबा गईं, पर वे आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस सुरक्षा और आत्मीयता के थे, जो चंदन बाबा के इस घर में कदम रखते ही सबने महसूस की थी।
 
मीरा ने मन ही मन राहत की एक लंबी और ठंडी सांस ली। उसके दिल पर जो एक भारी बोझ कई दिनों से बना हुआ था, वह कुछ पल के लिए हल्का होता हुआ महसूस हुआ।
 
वह चंदन बाबा की ओर देखते हुए सोचने लगी, "भगवान का लाख-लाख शुक्र है... अब चंदन बाबा के इस घर में रहने से उस हैवान शेर की रोज़-रोज़ की घटिया हरकतों और मानसिक टॉर्चर पर कुछ तो लगाम लगेगी। "
 
चंदन बाबा का एक अलग ही रोब और आदर है इस घर में। अब वो नीच इंसान कम से कम किसी बुजुर्ग की मौजूदगी में अपनी घिनौनी और घटिया हरकतें करने से पहले सौ बार सोचेगा। कम से कम बाबा के सामने तो उसे अपनी हैवानियत को दबाकर रखना ही पड़ेगा।
 
यह सोचकर मीरा के मन को जो सुकून मिला, उसकी झलक उसके चेहरे पर साफ तैर आई। उसकी आँखों में चमकती उसी खुशी और राहत के साथ वह मुड़ी और सरताज की ओर कदम बढ़ा दिए।
 
मीरा उस वक्त एक बेहद खूबसूरत और नफासत भरी काली साड़ी पहने हुए थी। काली साड़ी के उस गहरे रंग में उसका गोरा रंग और भी ज्यादा खिल रहा था, और साड़ी का पल्लू उसके कंधों पर सलीके से ढला हुआ था।
 
मीरा ने सरताज के करीब जाकर खुद को उसकी बांहों के घेरे में सौंप दिया। उसने बेहद प्यार और अपनत्व से सरताज के सीने पर अपना सिर टिकाया और शिकायत भरे, पर बेहद मीठे लहजे में बोली, "आपने तो मुझे बताया ही नहीं? मन ही मन इतनी बड़ी बात छिपाकर रखी थी... आप इतने बड़े-बड़े सरप्राइज कब से देने लग गए?"
 
सरताज ने मुस्कुराते हुए मीरा को अपनी बांहों में कस लिया। उसके हाथ मीरा की पतली कमर और पेट पर आ टिके, जहाँ काली साड़ी का रेशमी कपड़ा उसकी त्वचा को स्पर्श कर रहा था। सरताज की उंगलियों की गर्माहट और उसकी बांहों की मजबूत पकड़ ने मीरा के भीतर एक अजीब सा सुकून और सुरक्षा का एहसास भर दिया।
 
सरताज ने मीरा की ओर देखा, उसकी आँखों में झांका और मीरा को अपने और करीब खींचते हुए उसके कान के पास धीरे से कहा, "मैं तुम्हारे इस खूबसूरत चेहरे पर हमेशा ऐसी ही बेफिक्र और सच्ची खुशी देखना चाहता था मीरा। पिछले कुछ दिनों से तुम्हारा मन उदास रहता था, और मैं बस तुम्हें इस तरह मुस्कुराते हुए देखना चाहता था... तभी तो यह सरप्राइज छिपाकर रखा था।"
 
सरताज की बातें सुनकर मीरा के होठों पर एक शर्मीली और दिलकश मुस्कान आ गई। वह उसकी बांहों की गर्माहट में कुछ पल के लिए अपनी सारी परेशानियां भूल जाना चाहती थी।
 
तभी सरताज ने हल्के से मुस्कुराते हुए उसकी पीठ सहलाई और कहा, "चलो, अब ऐसे ही दरवाजे पर ही खड़े रहोगे क्या? बाबा थके हुए आए हैं, अब उन्हें प्यार से अंदर ले के चलो और उनके विश्राम का प्रबंध करो।"
 
सरताज के चेहरे पर भी मीरा को इतना खुश देखकर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई थी। अपनी पत्नी के इस खिलखिलाते रूप को तरसते हुए उन्होंने न जाने कितने दिन गुजारे थे।
 
दरअसल, घर आते वक्त गाड़ी चलाते समय ही उन्होंने चंदन बाबा को अकेले में एक बेहद अहम हिदायत दे दी थी। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि बाबा को बिना किसी की नज़र में आए मीरा की परेशानी और उसके खिंचाव की असली वजह ढूंढनी है।
 
लेकिन इस पूरे मिशन में सबसे सख्त शर्त यही थी कि यह बात बिल्कुल राज़ रहनी चाहिए। मीरा या घर के किसी भी सदस्य को जरा सा भी शक नहीं होना चाहिए।
 
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घर पहुँचकर सरताज ने चंदन बाबा को रहने के लिए वही आउटहाउस वाला क्वार्टर दे दिया, जहाँ शेर पहले से रह रहा था। अब मजबूरी यह थी कि दोनों को एक ही क्वार्टर में साथ रहना था।
 
जब शेर को पता चला कि चंदन बाबा पूरी तरह ठीक होकर वापस आ गए हैं, तो उसने तुरंत अपने चेहरे पर झूठी खुशी का नकाब ओढ़ लिया।
 
शेर (चंदन बाबा के गले मिलते हुए, बाहर से बेहद खुश होने का नाटक करते हुए बोला): "वाह बाबा! आपकी वापसी देखकर तो दिल बाग-बाग हो गया! भगवान का शुक्र है कि आप बिल्कुल भले-चंगे होकर लौट आए। अब आपके रहने से क्वार्टर में भी रौनक रहेगी!"
 
लेकिन जैसे ही वह चंदन बाबा से अलग हुआ और उसकी नज़र मुस्कुराती हुई मीरा पर पड़ी, उसके मन के भीतर गुस्से और गालियों का भयानक बवंडर फूट पड़ा। उसने साफ़ देख लिया था कि इस बुड्ढे के आते ही मीरा का चेहरा कैसे खिल उठा था और वह कितनी राहत महसूस कर रही थी।
 
शेर (मन ही मन सरताज, चंदन और मीरा को मां-बहन की नंगी गालियाँ देते हुए, नफरत से बड़बड़ाया): "भोसड़ी के सरताज की औलाद! साले मादरचोद को चैन ही नहीं है! एक तो खुद दिन-रात चूतियापा फैलाता है, और ऊपर से इस रांड के पिल्ले, गांडू बुड्ढे को सीधे मेरी ही छाती पर लाके पटक दिया! साला बहन का लौड़ा सरताज और यह भड़वा चंदन... दोनों मिलकर मेरी गाँड मारने में लगे हैं!"
 
शेर (मीरा के राहत भरे चेहरे को घूरते हुए ज़हर उगलता है): "और इस साली रंडी मीरा को देखो... कैसे मुँह फाड़-फाड़ के बत्तीसी दिखा रही है! साली सोच रही होगी कि इस बुड्ढे के आने से मेरे हाथ से बच गई! साली को लगता है कि अब शेर उसका कुछ उखाड़ नहीं पाएगा। साली को पता ही नहीं है कि शेर किस खेत की मूली है! तेरी चूत का घमंड तो मैं ही तोड़ूँगा, चाहे जो हो जाए!"
 
शेर (खौलते गुस्से में बड़बड़ाया): "हाँ, इस भड़वे चंदन के चौबीसों घंटे मेरी छाती पर चढ़े रहने से मालकिन के साथ टाइम बिताना और उसे पेले में लेना थोड़ा मुश्किल ज़रूर होगा... पर साली रंडी, तू ज़्यादा हवा में मत उड़! कुछ न कुछ जुगाड़ तो बैठा ही लूँगा। इस बुड्ढे की आँख बचाकर भी तुझे अपनी जाँघों के नीचे न लाया, तो मेरा नाम भी शेर नहीं!"
 
अब एक ही छत के नीचे दो अलग-अलग इरादे पनप रहे थे—एक तरफ चंदन बाबा सरताज के कहने पर घर की शांति और मीरा का सच जानने की टोह में थे, तो दूसरी तरफ शेर अपनी वासना और गंदी साजिशों के बीच इस नई रुकावट को चीरने का रास्ता खोजने में जुट गया था।

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रात गहराने लगी थी और सब लोग रात के खाने के लिए एक साथ इकट्ठा हुए। चंदन बाबा ने अपनी संकोची आदत के मुताबिक मेज पर बैठने से हिचकिचाते हुए मना कर दिया और कहा कि वे बाद में  खा लेंगे।
 
लेकिन मीरा ने चंदन बाबा का हाथ पकड़ लिया और उन्हें आदरपूर्वक खींचते हुए सीधे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बिठा दिया। उसने बड़े लाड और हक से कहा, "बाबा, आज बिल्कुल भी नखरे नहीं चलेंगे! आप कल से तो वैसे भी अपने काम पर लग ही जाओगे, और आज का सारा काम शेर संभाल रहा है। इसलिए आज आप हमारे ही साथ बैठकर खाना खाएंगे।"
 
शेर यह सब दूर खड़ा चुपचाप देख रहा था और अंदर ही अंदर ईर्ष्या की आग में बुरी तरह सुलग रहा था। मीरा का चंदन बाबा का हाथ पकड़ना उसे सख्त नागवार गुजर रहा था, जैसे उसकी आँखों में मिर्च लग गई हो।
 
वह मन ही मन गंदी-गंदी गालियां बकते हुए सोचने लगा, "साली रांड! पहले तो इसे सिर्फ सरताज के साथ चिपकते और लाड जताते देखना पड़ता था, और अब इस सड़ियल बुड्ढे के साथ भी वही नौटंकी चल रही है! आज तक कभी मेरा हाथ पकड़कर तो मुझे इतनी इज्जत से डाइनिंग टेबल पर नहीं बिठाया इसने!"
 
शेर कड़वाहट और जहर का घूंट पीकर रह गया, और न चाहते हुए भी चेहरे पर नकली मुस्कान लाकर सबके लिए खाना परोसने लगा।
 
लेकिन जब भी किसी का ध्यान उस पर नहीं होता, शेर की गंदी निगाहें मीरा की ओर घूम जातीं। मीरा की काली साड़ी के बीच से झांकता उसका गोरा, नंगा पेट शेर की नजरों में चढ़ चुका था, और वह मौका मिलते ही चोरी-छिपे उसकी कमर और पेट के हिस्से को अपनी हवस भरी आँखों से घूरने से बाज नहीं आ रहा था।

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डिनर के बाद सरताज अपने कमरे में बिस्तर पर लेटे हुए सीलिंग की तरफ ताक रहे थे। उनके दिमाग में रह-रहकर बस मीरा का चेहरा ही घूम रहा था। वे अच्छी तरह जानते थे कि मीरा के मन में कुछ न कुछ ऐसा जरूर चल रहा है जो उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रहा है।
 
"आखिर ऐसी क्या बात है जो मीरा को इतना परेशान कर रही है?" सरताज ने सोचते हुए एक गहरी सांस ली। "चंदन बाबा के घर में कदम रखते ही उनका मूड एकदम से बदल गया। उनके आते ही चेहरे पर जो सुकून और राहत आई, वो साफ बता रही थी कि वो किसी गहरे तनाव में थीं। लेकिन वो मुझसे यह बात क्यों छिपा रही हैं?"
 
इस सोच के साथ ही सरताज के दिल में एक कसक और मलाल सा उठने लगा। उन्हें दुख हुआ कि मीरा अपनी परेशानी अपने पति से न बांटकर मन ही मन घुट रही थी। "क्या हमारे बीच दूरी आ गई है? क्या वो अब मुझ पर पहले जितना भरोसा नहीं करती कि अपनी तकलीफ शेयर कर सके?"
 
लेकिन अगले ही पल सरताज ने अपने इस ख्याल को झटक दिया। "नहीं... ऐसा नहीं हो सकता। आज शाम को ही तो वो कितने प्यार से मेरे पास आई थी, मेरी बांहों में खुद को समेट लिया था। उसके स्पर्श में वही पुराना समर्पण और मोहब्बत थी।"
 
उन्होंने खुद को ही कोसते हुए सोचा, "शायद गलती मेरी ही है। मेरी नौकरी, मेरी व्यस्तताओं और काम के झंझटों की वजह से मैं उसे वक्त ही नहीं दे पाता। आज इतने दिनों बाद सिर्फ चंदन बाबा को वापस लाने के एक छोटे से सरप्राइज से वो कितनी खुश हो गई थी! उसका खिलखिलाता चेहरा बता रहा था कि वो बस मेरे थोड़े से ध्यान और वक्त की भूखी है।"
 
सरताज ने मन ही मन एक ठोस फैसला किया। "मुझे अपना यह शेड्यूल बदलना ही होगा। काम तो जिंदगी भर चलता रहेगा, पर मैं अपनी मीरा को इस तरह इग्नोर नहीं कर सकता। वो अगर सीधी है, अपने मुंह से अपनी तकलीफें या मांगें नहीं बोलती, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मैं उसे 'ग्रंटेड' ले लूं। मैं जल्द ही सब कुछ मैनेज करके मीरा को कहीं दूर किसी अच्छे वेकेशन पर लेकर जाऊंगा, ताकि हम दोनों एक-दूसरे को फिर से वो वक्त दे सकें जिसके हम हकदार हैं।"
 
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उधर बाथरुम के भीतर, सफेद रंग की सिल्क स्लिप पहने मीरा शीशे के सामने खड़ी खुद को निहार रही थी। पानी की कुछ बूंदें उसकी गर्दन और कंधों से ढुलक रही थीं। शीशे में अपनी परछाई को देखते हुए वह एक बार फिर गहरी सोच में डूब गई।
 
"सरताज मुझे कितना प्यार करते हैं..." उसने एक लंबी सांस खींचते हुए मन ही मन सोचा। "बिना मेरे कहे ही वे समझ गए कि कोई बात मुझे अंदर ही अंदर परेशान कर रही है। मेरी उसी परेशानी को दूर करने के लिए वे चंदन बाबा को वापस घर ले आए, ताकि मुझे कोई तकलीफ न हो। और एक मैं हूँ, जो अपनी इतनी बड़ी मुसीबत उनके साथ शेयर ही नहीं कर पा रही।"
 
उसके मन में अचानक झल्लाहट और बेबसी का बवंडर उठने लगा। "लेकिन मैं भी क्या करूँ? अगर मैंने सरताज को सच बताया, तो वह कसम... उस कसम का खौफ मुझे तोड़े दे रहा है। वह हैवान शेर किस तरह उस कसम का वास्ता देकर रोज मुझे अंदर तक नोच रहा है, मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहा है। और अगर सरताज को ज़रा सा भी इस बात का पता चल गया, तो वे अपने गुस्से में उस शेर को जिंदा ही गाड़ देंगे! फिर इस घर का, हमारे परिवार का क्या होगा?"
 
शीशे में अपनी उदास आँखों को देखते हुए मीरा का इरादा अचानक सख्त हो गया।
 
उसने अपने मन को मजबूत किया, "नहीं, मुझे ही हिम्मत दिखानी होगी। मुझे ही शेर को सीधे-सीधे समझाना होगा कि वह मुझे उस कसम के जाल से आजाद करे। अगर वह अब भी बाज नहीं आया और नहीं माना, तो भाड़ में जाए सब कुछ... मैं सरताज को खुद अपने मुंह से सारा सच-सच बता दूंगी। चाहे जो अंजाम हो!"
 
यह फैसला करते ही जैसे उसके दिल का एक बड़ा बोझ हल्का हो गया। वह बाथरुम का दरवाजा खोलकर बाहर कमरे में आई।
 
कमरे की हल्की डिम लाइट में सरताज बिस्तर पर उसका ही इंतजार कर रहे थे। मीरा बिना एक पल गंवाए सीधे बिस्तर पर आई और सरताज के सीने से सटकर उनकी मजबूत बांहों के घेरे में आ बैठी।
 
सरताज ने भी तुरंत अपने हाथ उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस लिए और उसकी जुल्फों को सहलाने लगे। मीरा ने अपना चेहरा उनके सीने में छुपा लिया, उस सुकून और सुरक्षा को महसूस करते हुए जो उसे सिर्फ अपने पति की आगोश में मिलती थी।
 
मीरा ने सरताज के सीने पर अपना सिर टिके-टिके ही धीरे से कहा, "थैंक यू सरताज..."
 
सरताज ने उसकी मुलायम जुल्फों में उंगलियां फेरते हुए हल्के से मुस्कुराकर पूछा, "किस लिए बाबा? अचानक यह थैंक यू किस बात का?"
 
मीरा ने अपना चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया और सरताज की आँखों में देखते हुए कहा, "आप सब जानते हैं... मुझे थोड़ा वक्त दीजिए, पर मुझ पर इस तरह भरोसा बनाए रखने के लिए बहुत-बहुत थैंक यू।"
 
सरताज ने उसे अपनी बांहों के मजबूत घेरे में और कसकर भींच लिया। उनकी आवाज़ में बेइंतहा मोहब्बत और भरोसा था, "मीरा, मैंने तुम पर कभी शक किया ही नहीं। तुम मेरी जिंदगी हो। बस... मैं तुम्हारे इस हसीन चेहरे पर हमेशा वही पुरानी हंसी और बेफिक्र मुस्कान देखना चाहता हूँ।"
 
मीरा कुछ पल के लिए सरताज के इस निश्छल प्यार में खो गई।
 
फिर उसके मन में चल रही कसम की कशमकश अचानक उसकी जुबान पर आ गई। उसने हिचकिचाते हुए कहा, "सरताज... आपसे एक सलाह लेनी थी।"
 
"हाँ पूछो, कैसी सलाह?" सरताज ने प्यार से उसकी ओर देखा।
 
मीरा ने अपनी घबराहट को छुपाने की कोशिश करते हुए पूछा, "क्या... अगर मैं किसी की कसम खा लूं, और गलती से या मजबूरी में मुझसे वह कसम टूट जाए... तो जिसके नाम की कसम खाई गई हो, क्या सच में उसको कोई हानि या नुकसान हो सकता है?"
 
यह सवाल सुनते ही सरताज का माथा ठनका। वे हैरान रह गए और सीधे होकर बैठते हुए मीरा की आँखों में आँखें डालकर पूछने लगे, "मीरा... तुम अचानक ऐसा अजीब सवाल क्यों पूछ रही हो? क्या बात है?"
 
मीरा सरताज की उस तीखी और फिक्रमंद नजरों का सामना नहीं कर पाई। उसे लगा कि कहीं सरताज को उसके डर का अंदाजा न लग जाए, इसलिए उसने तुरंत अपना चेहरा सरताज के चौड़े सीने में छुपा लिया।
 
वह उसके दिल की धड़कनों को महसूस करते हुए रुंधे गले से बोली, "प्लीज... आप बस मेरे इस सवाल का जवाब दे दीजिए ना, प्लीज।"
 
सरताज ने मीरा को अपने सीने से और थोड़ा सटा लिया और उसकी उंगलियों को अपने हाथ में थामते हुए शांति से समझाया, "मीरा, मैं सिख धर्म का पालन करता हूँ और हमारे धर्म के हिसाब से ऐसी कसमों का कोई वजूद या मतलब नहीं होता। हमारा धर्म हमें बस यही सिखाता है—सच्चे रहो, ईमानदार बनो, हर इंसान को इज्जत दो, लेकिन इसके साथ ही किसी भी अन्याय या गलत बात को बर्दाश्त मत करो।"
 
उन्होंने मीरा के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और उसकी आँखों में सीधे देखते हुए आगे कहा, "मैं जानता हूँ कि तुम * धर्म में पली-बढ़ी हो, जहाँ बहुत से लोग कसमों की पवित्रता और उनके प्रभाव पर गहरा विश्वास रखते हैं। लेकिन एक इंसान के नाते मेरा यही मानना है कि अगर तुम किसी का नाम लेकर कसम खाती भी हो, तो तुम्हारे कसम तोड़ने से उस इंसान का कोई अहित या नुकसान कभी नहीं हो सकता।"
 
सरताज ने मीरा को दिलासा देते हुए कहा, "और सबसे बड़ी बात—अगर कोई इंसान किसी गलत काम को अंजाम देने के लिए या तुम्हें दबाने के लिए कसम का सहारा ले रहा है, तो ऐसी कसम को तोड़ देना ही सबसे सही और धर्म का काम है।"
 
सरताज के मुंह से यह बात सुनते ही मीरा को मानों जीवन की सबसे बड़ी राहत मिल गई।
 
उसके दिल पर पत्थरों जैसा जो भारी बोझ टिका हुआ था, वह एक झटके में उतर गया। उसकी आँखों में एक नया उजाला और आत्मबल आ गया।
 
उसने मन ही मन पक्का इरादा कर लिया कि अब वह उस हैवान शेर को अपनी नन्हीं बेटी ज्योति के सिर पर झूठी कसम का सहारा लेकर अपना नाजायज फायदा उठाने नहीं देगी। चाहे कुछ भी हो जाए, अब वह शेर के हाथों की कठपुतली बनकर मानसिक और शारीरिक टॉर्चर नहीं सहेगी।
 
उधर, सरताज बिस्तर पर लेटे-लेटे मीरा के चेहरे के बदलते भावों को गौर से देख रहे थे। उनके दिमाग में रह-रहकर यही ख्याल कौंध रहा था कि मीरा का यह कसम वाला सवाल कहीं न कहीं उसकी मौजूदा परेशानी से ही जुड़ा हुआ है। वे अभी इस बात की गहराई में जाने का सोच ही रहे थे कि मीरा ने उन्हें सोचने का मौका ही नहीं दिया।
 
मीरा, जो अब कसम के उस खौफनाक जाल से आजाद हो चुकी थी, एक नए अहसास और आजादी की उमंग से भर उठी थी।
 
उसने आगे बढ़कर बिना कुछ कहे सरताज के होठों पर अपने होंठ टिका दिए और उन्हें एक बेबाक और शिद्दत भरे प्यार की आगोश में खींच लिया। सरताज भी अपनी पत्नी के इस दीवानेपन और समर्पण में बह गए। दोनों के बीच की दूरियां और खिंचाव उस रात पूरी तरह मिट गए, और उन्होंने एक-दूसरे को बेपनाह और रूहानी मोहब्बत में डुबो दिया।
 
जुनून और तृप्ति से भरी इस हसीन रात के बाद, लगभग 10:30 बजे के आसपास दोनों एक-दूसरे की बांहों में सिमटकर सुकून की गहरी नींद में सो गए।

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रात के 12 बज चुके थे। पूरे कोठी परिसर में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। शेर हाथ में बीड़ी दबाए बगीचे के अंधेरे कोने में टहल रहा था।
 
उसका दिमाग खौल रहा था—क्वार्टर में चंदन बुड्ढा घोड़े बेचकर सो रहा था, लेकिन शेर की आँखों से नींद गायब थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस बुड्ढे के रहते मीरा तक कैसे पहुँचे।
 
तभी उसकी नज़र मुख्य कोठी की तरफ गई। मीरा और सरताज के बेडरूम की लाइट बंद हो चुकी थी।
 
सब कुछ शांत था कि अचानक सरताज के फोन की घंटी बजी। कुछ ही पलों में सरताज फोन कान से लगाए ड्राइंग रूम की तरफ आता दिखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जल्दबाज़ी थी।
 
बातचीत खत्म होते ही सरताज ने बिना वक्त गँवाए अपनी सिक्युरिटी की वर्दी पहनी, और तेज़ी से बाहर निकलकर अपनी ऑफिशियल गाड़ी की तरफ बढ़ा। शायद शहर में कोई बड़ी इमरजेंसी या सरकारी काम आ पड़ा था।
 
गाड़ी का सायरन हल्का सा बजा और उसकी हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई मेन गेट से बाहर निकल गईं।
 
गाड़ी के जाते ही शेर के शातिर दिमाग में एक ज़बरदस्त बत्ती जली!
 
शेर (अंधेरे में कमीनी मुस्कान लाते हुए मन ही मन फुसफुसाया): "अबे भाई! किस्मत हो तो ऐसी! साला साहब खुद ही रास्ता साफ़ करके चला गया! यानी इस वक्त कोठी के उस बड़े बेडरूम में मीरा रानी अकेली सो रही है... बिल्कुल बेखबर और अकेली!"
 
शेर ने तुरंत अपनी बीड़ी ज़मीन पर मसलकर बुझा दी।
 
शेर (मूंछों पर हाथ फेरते हुए): "चंदन क्वार्टर में सो रहा है, साहब ड्यूटी पर निकल गया... और मालकिन बिस्तर पर अकेली है। अगर चुपचाप दबे पाँव अंदर घुस जाऊँ और सीधा उसके बिस्तर पर जाकर उसके बगल में लेट जाऊँ? रात के इस गहरे अंधेरे में, नींद के आगोश में लिपटी मीरा को बिना शोर मचाए दबाने और छूने का इससे बेहतरीन मौका फिर नहीं मिलेगा!"
 
उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। पूरा बगीचा और कोठी अंधेरे की चादर में लिपटी थी। शेर ने दबे पाँव,  मुख्य कोठी के पिछले दरवाज़े की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। उसके दिल की धड़कनें तेज़ थीं, और दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी—अंधेरे कमरे में अकेली सो रही मीरा का वो गर्म जिस्म।
 
उधर मुख्य बेडरूम में मीरा बिल्कुल बेखबर, गहरी नींद के आगोश में सो रही थी। कमरे में एसी की हल्की ठंडक थी। मीरा ने उस वक्त बदन पर सिर्फ एक पतली सी सफेद स्लिप और नीची कमर की काली पैंटी पहन रखी थी।
 
वह स्लिप बेहद छोटी थी जो मुश्किल से उसकी सुडौल हिप्स तक पहुँचकर खत्म हो रही थी। उसकी दोनों मखमली, गोरी टाँगें पूरी तरह नंगी थीं, हालांकि उसने अपने जिस्म पर एक पतली सी चादर ओढ़ रखी थी।
 
सरताज इतनी खामोशी में बाहर निकले थे कि मीरा को उनके जाने की भनक तक नहीं लगी।
 
इसी बीच, शेर ने बड़ी शातिरता से बेडरूम का दरवाज़ा ढकेला और एक साये की तरह चुपचाप कमरे के अंदर दाखिल हो गया।
 
उसने अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन कर ली थी और हाथ को इस तरह ढका हुआ था कि रोशनी सिर्फ ज़मीन और बिस्तर के आसपास ही पड़े, ताकि कोई अचानक जाग न जाए।
 
मोबाइल की हल्की सी पीली रोशनी में जैसे ही शेर की नज़र सामने बड़े से किंग-साइज़ बेड पर पड़ी, उसकी साँसें अटक गईं।
Deepak Kapoor
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