12-08-2026, 01:49 PM
आज जब मैं काफ़ी साल बाद अपनी जिंदगी के इस सबसे बड़े राज़ को आप सबके सामने लिख रहा हूँ, तो मेरे मन में यह बात साफ़ है कि उस रात कमरे में घना अंधेरा था। एक पाठक के तौर पर आपके मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि जब वहाँ ज़रा सी भी रोशनी नहीं थी, तो मुझे उन बारीक शारीरिक हरकतों का एक-एक विवरण इतनी साफ़-साफ़ कैसे मालूम चला? सच कहूँ तो, उस रात बिस्तर पर लेटे-लेटे मैंने केवल उन दोनों की तेज़ होती साँसों की आवाज़ें, कपड़ों के सरकने की सरसराहट और मम्मी के मुँह से निकली बेहद धीमी सिस्कियाँ ही सुनी थीं। लेकिन आज, जब मैं एक वयस्क हो चुका हूँ और इन गुप्त संबंधों के खेल को पूरी तरह समझता हूँ, तो अपनी उसी समझ, कल्पना और बाद मे मिली कड़ियों के आधार पर मैंने उस अंधेरे के पीछे छिपी एक-एक बारीक सच्चाई को यहाँ बयां किया है। उस समय भले ही मेरा बालमन केवल आवाज़ों को सुनकर कशमकश में डूबा था, पर आज मैं उस अंधेरे के भीतर छिपे हर एक कामुक पल को बिल्कुल साफ़-साफ़ बयां कर पा रहा हूँ।"
तभी चारपाई पर हल्की सी हलचल हुई और कपड़ों की हल्की सरसराहट की आवाज़ आने लगी। शायद उन दोनों ने करवट बदली थी ताकि वे एक-दूसरे के आमने-सामने आ सकें। इसके बाद कुछ देर तक कोई बड़ी हलचल नहीं हुई, लेकिन आपस में फुसफुसाहट की बहुत ही धीमी आवाज़ सुनाई देने लगी। वह आवाज़ कुछ अस्पष्ट थी, इसलिए मैंने बहुत धीरे से करवट बदली और उनकी बातों को समझने की कोशिश करने लगा।
लेकिन अब वहाँ फुसफुसाहट नहीं, बल्कि चूमने (kiss) की धीमी-धीमी आवाज़ें आने लगी थीं। उस अंधेरे में यह समझ पाना मुश्किल था कि कौन, किसको और कहाँ पर किस कर रहा है। तभी अचानक मम्मी की एक हल्की सी सिस्कारी सुनाई दी—'सीइइइइइ... काटो मत, निशान पड़ जाएगा।' उनके इस वाक्य को सुनते ही मुझे तुरंत समझ आ गया कि प्रदीप अंकल मम्मी को चूम रहे हैं।
अब मैं बिस्तर पर लेटे-लेटे पूरी टकटकी लगाकर उस अंधेरे में देखने लगा। धीरे-धीरे मेरी आँखें अंधेरे की आदी हो चुकी थीं, जिससे मुझे दो धुंधले साये दिखाई देने लगे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उन दोनों में से एक जना उठकर दूसरे के ऊपर लेट गया हो। इसके बाद चूमने की आवाज़ें पहले से थोड़ी और ज़्यादा तेज़ आने लगीं। ऐसा लग रहा था कि दोनों पूरी तन्मयता से एक-दूसरे को चूम रहे हैं, पर अब तक मैं यह साफ़ नहीं समझ पा रहा था कि नीचे कौन है और ऊपर कौन। इधर उन दोनों की इस हलचल को सुनकर मेरी उत्सुकता और उत्तेजना से बुरी हालत हो रही थी। मेरा दिल अंदर ही अंदर कर रहा था कि काश! काश ये दोनों लाइट जलाकर एक्शन में आएँ, ताकि मैं सब कुछ साफ़-साफ़ देख सकूँ।"
चारपाई से आने वाली उन मदहोश करने वाली आवाज़ों और आहों को सुनकर बिस्तर पर लेटे-लेटे मेरी हालत खराब हो रही थी। यह सब देखना और सुनना मेरे दिमाग को पूरी तरह सुन्न कर रहा था और मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धक-धक करने लगा था। उस अंधेरे कमरे में मेरा मन कई तरह की कल्पनाओं में खो गया था—कभी दिल करता कि काश वे दोनों मुझे भी अपने पास उसी चारपाई पर बुला लें, तो कभी मन में यह अजीब सी इच्छा जागती कि मम्मी खुद अंकल को छोड़कर मेरे पास आएँ और मेरे साथ भी वही सब कुछ करें जो अभी वहाँ चल रहा था।
सच कहूँ तो, मेरे सामने होने वाला वह नज़ारा मेरी उम्र के हिसाब से मुझे हद से ज़्यादा उत्तेजित कर रहा था। उस चरम उत्तेजना के कारण मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ने लगी थी और बिना सोचे-समझे, ना जाने कब मेरा हाथ अपनी पैंट के अंदर मेरे lund पर चला गया। उस समय तक वह पूरी तरह से कड़ा होकर खड़ा हो चुका था। अपनी इस अनजानी और तीव्र शारीरिक प्रतिक्रिया से मैं खुद हैरान था, लेकिन उस रोमांच को रोक नहीं पा रहा था और अंधेरे में लेटे-लेटे ही मैं उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा ताकि अपनी उस बेचैनी को थोड़ा शांत कर सकूँ।"
तभी अंधेरे में मम्मी की बेहद हल्की और घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी—'कपड़े मत उतारो, यदि रवि जाग गया तो मुश्किल हो जाएगी।' प्रदीप अंकल ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा—अरे रंडी फुदी मारने का असली मजा तो पूरे कपड़े उतार कर ही आता है।' मम्मी थोड़ा हिचकिचाते हुए बोलीं—'नहीं भाई साहब, इसीलिए तो आज मैंने यह नाइटी पहनी है ताकि इसे पूरा उतारे बिना भी हमारे इस मज़े में कोई खलल ना पड़े।'
अंकल थोड़ा आक्रामक अंदाज़ में बोले, बहानचोद तू मानेगी नही,और तभी मुझे ऐसा लगा कि दो हाथों ने मम्मी की नाइटी को गले तक ऊपर की तरफ खिसका दिया है। इसके तुरंत बाद अंकल मम्मी के दोनों बूब्ज को अपने दोनों हाथों से दबाने लगे।
कमरे में मम्मी की धीमी सिसकियाँ और आहें गूँजने लगी थीं—'आह... सीइइ... हाँ, दबाओ मेरे राजा, मेरे बच्चे... आओ, आज मेरा दूध नहीं पियोगे आह... सीइइ... ओहो...'। तभी अंकल मम्मी के दूध बारी-बारी से मुँह में लेकर चूसने लगे। इस दौरान मम्मी पूरी तरह मजे के आलम में खो चुकी थीं; वे कभी अपनी उंगलियाँ अंकल के बालों में फिरा रही थीं, तो कभी उनकी पीठ को सहलाकर उन्हें और अपने करीब खींच रही थीं।"
मम्मी का मम्मा अंकल के मुँह में जाते ही चारपाई पर हलचल और बढ़ गई। नाइटी अब उनके सीने तक ही सिमटी पड़ी थी। अँधेरे में भी मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि अंकल के होंठ एक से दूसरे मम्मे पर घूम रहे हैं—कभी दायाँ दबाकर चूसते, कभी बायाँ। मम्मी की साँसें अब और तेज़ हो चुकी थी
आह… धीरे… दाँत मत गड़ाओ…” उनकी आवाज़ कंपकंपा रही थी, फिर भी अंकल को रोक नहीं थी रही। “उधर थोड़ा नीचे… हाँ… वहीं…”मम्मी शायद कही और दबाने को कह रही थी।
अंकल ने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी आह सी आवाज़ निकाली और मम्मी के बूब्स को और ज़ोर से भींच लिया। नाइटी के ऊपर का हिस्सा अब पूरी तरह बेकार हो चुका था। मुझे कपड़े के और सरकने की आवाज़ सुनाई दी—अंकल का एक हाथ नीचे की तरफ़ बढ़ रहा था।
मम्मी अचानक सहम गईं।नहीं… वहाँ मत… रवि…”
“रवि सो रहा है,” अंकल की आवाज़ धीरे बोलने पर भी भारी थी। “और तू अब चुपचाप मज़ा ले, हरामजादी। इतने दिन बाद मिली है।”उनके हाथ ने नाइटी के नीचे घुसकर कुछ ऐसा किया कि मम्मी की जाँघें अपने-आप खुल गईं। मैंने साफ़ सुना—गीली सी, धीमी फिसलन की आवाज़। उँगली… या दो उँगलियाँ… अंदर-बाहर। “सीइइइ… अह्ह्ह… निकाल… नहीं… अंदर ही…” मम्मी की सिस्कारी अब दबी हुई भी काबू में नहीं रह रही थी। “भाई साहब… बाथरूम में… चलो न… यहाँ…रवि”
“चुप gasty यहीं चोद चोदकर तेरा भोसड़ा फाडूगा” अंकल ने साफ़ कहा। “तेरी नाइटी में ही। जैसे तू चाहती थी।”
चारपाई चरमराई। एक धुँधला साया उठकर दूसरे के बीच आ गया। कपड़ों के खुलने, सरकने और फिर शरीर के चिपकने की आवाज़ एक के बाद एक आई। मम्मी ने एक लंबी, थरथराने वाली साँस ली—जैसे कुछ मोटा, गरम और सख्त चुत में धकेल दिया गया हो।“आह्ह्ह… धीरे… पूरा… मत…डालो”
“पूरा ही जाएगा, रंडी। आज तू रो भी ले तो मैं नहीं रुकने वाला।”। हाईं… मर गई… मर गई मैं…”
“फट गई… भाई साब… फट गई मेरी…”
“अरे बाप रे… इतना मोटा… धीरे… धीरे न …करो”
“मम्मी… बच बचा लो मुझे… ये तो फाड़ देगा…”
“ह्ईं राम… पूरा अंदर… पूरा घुस गया…”हाय पापा,आज नहीं बचती तुम्हारी प्यार बेटी,
“निकल bhadve… थोड़ा बाहर निकाल… दर्द हो रहा है… हाय…”
“रंडी बना दीया मुझे… तूने… फट गई मेरी चूत…”
“बचा… बचा ले कोई… ये लंड तो मार डालेगा…”
“आह्ह… रुको… रुको भाई साहब… सहन नहीं हो रहा…”
“इतना अंदर… कोख तक… ह्ईं मर गई…”रवि बच्चा ले अपनी माँ को ,मर डालेगा ये हवसी
“ धीरे कर… फट जाएगी… पूरी फट जाएगी मेरी…”
“हाय माँ… ये हैवान… चोद के मार डालेगा…”
“निकाल ले बाहर … थोड़ा… फिर डाल… हाय… दर्द… मज़ा… दोनों
पूरा ले लिया… देख… पूरा लंड… अंदर है मेरी चूत में…”
“मा। मर गई रे… आज तो फट ही गई मेरी phudhy
अब धक्कों की आवाज़ शुरू हो गई थी।
धीमी, नियमित, चारपाई के साथ मिलकर। हर धक्के पर मम्मी की हल्की सिसकी—कभी दबी, कभी लंबे और गहरे सांस के रूप में। अंकल की साँसें उनके गले और कान के पास गरम-गरम टकरा रही होंगी;
मुझे अंकल की फुसफुसाहट सुनाई दी—
“कितनी गीली हो रही है तू… मेरे लंड के लिए… सोच,तेरा बेटा पास में सोया है…”
मम्मी -“चुप… करो… आह… और ,इतनी ज़ोर से मत…”
“मै तो तेज़ तेज़ ही चोदूंगा। बोल—किसका ले रही है?”
तुम्हारा…”
“साफ़ बोल।”
“प्रदीप… आपका… लंड… ले रही हूँ… आह्ह्ह…”
मेरा हाथ अपनी पैंट के अंदर अब और तेज़ी से चल रहा था। अँधेरे ने सब कुछ छुपा रखा था, पर आवाज़ें इतनी साफ़ थीं कि दिमाग खुद-ब-खुद तस्वीर बना रहा था—मम्मी की नाइटी कमर तक उठी हुई, जाँघें खुली, अंकल उनके ऊपर या पीछे, कमर झुकाए, पूरे जोर से अपना लंड अंदर घुसेड़ते हुए। कभी-कभी चारपाई ज़ोर से हिलती; कभी मम्मी का हाथ अंकल की पीठ या बालों में उलझने की हल्की आवाज़ आती।
“मैं… आने... वाली … हूँ… बस… और… अंदर…” उनकी आवाज़ अब टूट-टूटकर निकल रही थी। “आज… बाहर...निकालना… मत… अंदर ही… गिरा दो... गिरा दो ...अंदर ही अपना अमृत। अंकल हँसा
—अंदर ही दूंगा। तेरी कोख में। फिर देखना सुबह कैसे सती सावित्री बनती है रवि के सामने।”
धक्के अब तेज़ हो गए थे। मांस और पसीने की हल्की सी गंध कमरे में घुलने लगी थी—या शायद वह मेरी ही उत्तेजना का भ्रम था। मम्मी की आहों ने एक लय पकड़ ली थी; हर बार अंकल का लंड पूरा अंदर जाता तो तो उनके मुंह से आह की आवाज़ और मम्मी के मुंह से अलग अलग रूप में सिसकियां एक लयबद्ध रूप में निकलती। मैंने अपने लंड को और कसकर पकड़ा। उस नादानी वाली उम्र में भी शरीर समझ चुका था कि यह खेल अब चरम के करीब है।कुश ही पल बाद मेरे लंड से पिचकारी निकली जिसे मैने अपने अंडरवियर में ही रोक लिया और पूरी तरह निकलने के बाद मैने धीरे से पहले पेंट खोली फिर अंडरवियर से, लंड से निकले लावे को साफ किया और बेड के नीचे दूर तक फेंक दिया ताकि कोई भी पहले उठे तो उसे दिखाई न दे और पैंट पहन ली।
तभी मम्मी की एक लंबी, दबी हुई चीख निकली—तकिए में मुँह गड़ाकर। शरीर की कंपन की आवाज़ चारपाई तक आई। अंकल ने कुछ पल और ज़ोर लगाया, फिर एक गहरी, जानवर जैसी आवाज़ के साथ रुक गया। कमरे में कुछ क्षणों तक सिर्फ़ दोनों की हाँफती साँसें गूँजती रही।
भर दिया…” अंकल ने धीरे से कहा। “पूरा।”
मम्मी ने जवाब में सिर्फ़ एक थकी, काँपती सिसकारी दी ।थोड़ी देर बाद ममी धीरे से बोली,,"निकालो बाहर चिप चिप हो रही है“”अंकल बोले
“अंदर ही रहने दे। सुबह तक। मेरा निशान।”
नाइटी फिर से नीचे खिसकाई गई। कपड़ों के व्यवस्थित होने की हल्की सरसराहट। चारपाई पर दोनों फिर करवट लेकर लेट गए—जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर कमरे की हवा अब पहले जैसी नहीं थी। और न मैं।
मैं अँधेरे में पत्थर की तरह पड़ा रहा। और कान उन आखिरी साँसों पर टिके हुए थे। उस रात मैंने कुछ नहीं बोला। न हिला। । बस लेटा रहा—और पहली बार समझा कि कुछ राज़ आवाज़ों से भी साफ़ सुनाई दे जाते हैं
दोस्तों, कहानी का यह भाग आपको कैसा लगा? मेरे इस वयस्क नजरिए और उस रात की रहस्यमयी शुरुआत ने आपके मन में कितनी उत्सुकता जगाई है, मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएं। आपका एक-एक कमेंट मुझे आगे की कहानी को और भी बारीकी और रफ्तार से लिखने के लिए बहुत मोटिवेट (motivate) करेगा। इस पूरी घटना में आपको हमारी मम्मी का रूप, उनकी कशमकश या उनका वह गुप्त अंदाज़ कैसा लगा? मम्मी के किरदार के बारे में आपके मन में जो भी विचार आ रहे हों—चाहे अच्छे हों या बुरे—आप नीचे कमेंट बॉक्स में पूरी तरह खुलकर लिख सकते हैं। आपके हर एक कमेंट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!"
तभी चारपाई पर हल्की सी हलचल हुई और कपड़ों की हल्की सरसराहट की आवाज़ आने लगी। शायद उन दोनों ने करवट बदली थी ताकि वे एक-दूसरे के आमने-सामने आ सकें। इसके बाद कुछ देर तक कोई बड़ी हलचल नहीं हुई, लेकिन आपस में फुसफुसाहट की बहुत ही धीमी आवाज़ सुनाई देने लगी। वह आवाज़ कुछ अस्पष्ट थी, इसलिए मैंने बहुत धीरे से करवट बदली और उनकी बातों को समझने की कोशिश करने लगा।
लेकिन अब वहाँ फुसफुसाहट नहीं, बल्कि चूमने (kiss) की धीमी-धीमी आवाज़ें आने लगी थीं। उस अंधेरे में यह समझ पाना मुश्किल था कि कौन, किसको और कहाँ पर किस कर रहा है। तभी अचानक मम्मी की एक हल्की सी सिस्कारी सुनाई दी—'सीइइइइइ... काटो मत, निशान पड़ जाएगा।' उनके इस वाक्य को सुनते ही मुझे तुरंत समझ आ गया कि प्रदीप अंकल मम्मी को चूम रहे हैं।
अब मैं बिस्तर पर लेटे-लेटे पूरी टकटकी लगाकर उस अंधेरे में देखने लगा। धीरे-धीरे मेरी आँखें अंधेरे की आदी हो चुकी थीं, जिससे मुझे दो धुंधले साये दिखाई देने लगे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उन दोनों में से एक जना उठकर दूसरे के ऊपर लेट गया हो। इसके बाद चूमने की आवाज़ें पहले से थोड़ी और ज़्यादा तेज़ आने लगीं। ऐसा लग रहा था कि दोनों पूरी तन्मयता से एक-दूसरे को चूम रहे हैं, पर अब तक मैं यह साफ़ नहीं समझ पा रहा था कि नीचे कौन है और ऊपर कौन। इधर उन दोनों की इस हलचल को सुनकर मेरी उत्सुकता और उत्तेजना से बुरी हालत हो रही थी। मेरा दिल अंदर ही अंदर कर रहा था कि काश! काश ये दोनों लाइट जलाकर एक्शन में आएँ, ताकि मैं सब कुछ साफ़-साफ़ देख सकूँ।"
चारपाई से आने वाली उन मदहोश करने वाली आवाज़ों और आहों को सुनकर बिस्तर पर लेटे-लेटे मेरी हालत खराब हो रही थी। यह सब देखना और सुनना मेरे दिमाग को पूरी तरह सुन्न कर रहा था और मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धक-धक करने लगा था। उस अंधेरे कमरे में मेरा मन कई तरह की कल्पनाओं में खो गया था—कभी दिल करता कि काश वे दोनों मुझे भी अपने पास उसी चारपाई पर बुला लें, तो कभी मन में यह अजीब सी इच्छा जागती कि मम्मी खुद अंकल को छोड़कर मेरे पास आएँ और मेरे साथ भी वही सब कुछ करें जो अभी वहाँ चल रहा था।
सच कहूँ तो, मेरे सामने होने वाला वह नज़ारा मेरी उम्र के हिसाब से मुझे हद से ज़्यादा उत्तेजित कर रहा था। उस चरम उत्तेजना के कारण मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ने लगी थी और बिना सोचे-समझे, ना जाने कब मेरा हाथ अपनी पैंट के अंदर मेरे lund पर चला गया। उस समय तक वह पूरी तरह से कड़ा होकर खड़ा हो चुका था। अपनी इस अनजानी और तीव्र शारीरिक प्रतिक्रिया से मैं खुद हैरान था, लेकिन उस रोमांच को रोक नहीं पा रहा था और अंधेरे में लेटे-लेटे ही मैं उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा ताकि अपनी उस बेचैनी को थोड़ा शांत कर सकूँ।"
तभी अंधेरे में मम्मी की बेहद हल्की और घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी—'कपड़े मत उतारो, यदि रवि जाग गया तो मुश्किल हो जाएगी।' प्रदीप अंकल ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा—अरे रंडी फुदी मारने का असली मजा तो पूरे कपड़े उतार कर ही आता है।' मम्मी थोड़ा हिचकिचाते हुए बोलीं—'नहीं भाई साहब, इसीलिए तो आज मैंने यह नाइटी पहनी है ताकि इसे पूरा उतारे बिना भी हमारे इस मज़े में कोई खलल ना पड़े।'
अंकल थोड़ा आक्रामक अंदाज़ में बोले, बहानचोद तू मानेगी नही,और तभी मुझे ऐसा लगा कि दो हाथों ने मम्मी की नाइटी को गले तक ऊपर की तरफ खिसका दिया है। इसके तुरंत बाद अंकल मम्मी के दोनों बूब्ज को अपने दोनों हाथों से दबाने लगे।
कमरे में मम्मी की धीमी सिसकियाँ और आहें गूँजने लगी थीं—'आह... सीइइ... हाँ, दबाओ मेरे राजा, मेरे बच्चे... आओ, आज मेरा दूध नहीं पियोगे आह... सीइइ... ओहो...'। तभी अंकल मम्मी के दूध बारी-बारी से मुँह में लेकर चूसने लगे। इस दौरान मम्मी पूरी तरह मजे के आलम में खो चुकी थीं; वे कभी अपनी उंगलियाँ अंकल के बालों में फिरा रही थीं, तो कभी उनकी पीठ को सहलाकर उन्हें और अपने करीब खींच रही थीं।"
मम्मी का मम्मा अंकल के मुँह में जाते ही चारपाई पर हलचल और बढ़ गई। नाइटी अब उनके सीने तक ही सिमटी पड़ी थी। अँधेरे में भी मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि अंकल के होंठ एक से दूसरे मम्मे पर घूम रहे हैं—कभी दायाँ दबाकर चूसते, कभी बायाँ। मम्मी की साँसें अब और तेज़ हो चुकी थी
आह… धीरे… दाँत मत गड़ाओ…” उनकी आवाज़ कंपकंपा रही थी, फिर भी अंकल को रोक नहीं थी रही। “उधर थोड़ा नीचे… हाँ… वहीं…”मम्मी शायद कही और दबाने को कह रही थी।
अंकल ने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी आह सी आवाज़ निकाली और मम्मी के बूब्स को और ज़ोर से भींच लिया। नाइटी के ऊपर का हिस्सा अब पूरी तरह बेकार हो चुका था। मुझे कपड़े के और सरकने की आवाज़ सुनाई दी—अंकल का एक हाथ नीचे की तरफ़ बढ़ रहा था।
मम्मी अचानक सहम गईं।नहीं… वहाँ मत… रवि…”
“रवि सो रहा है,” अंकल की आवाज़ धीरे बोलने पर भी भारी थी। “और तू अब चुपचाप मज़ा ले, हरामजादी। इतने दिन बाद मिली है।”उनके हाथ ने नाइटी के नीचे घुसकर कुछ ऐसा किया कि मम्मी की जाँघें अपने-आप खुल गईं। मैंने साफ़ सुना—गीली सी, धीमी फिसलन की आवाज़। उँगली… या दो उँगलियाँ… अंदर-बाहर। “सीइइइ… अह्ह्ह… निकाल… नहीं… अंदर ही…” मम्मी की सिस्कारी अब दबी हुई भी काबू में नहीं रह रही थी। “भाई साहब… बाथरूम में… चलो न… यहाँ…रवि”
“चुप gasty यहीं चोद चोदकर तेरा भोसड़ा फाडूगा” अंकल ने साफ़ कहा। “तेरी नाइटी में ही। जैसे तू चाहती थी।”
चारपाई चरमराई। एक धुँधला साया उठकर दूसरे के बीच आ गया। कपड़ों के खुलने, सरकने और फिर शरीर के चिपकने की आवाज़ एक के बाद एक आई। मम्मी ने एक लंबी, थरथराने वाली साँस ली—जैसे कुछ मोटा, गरम और सख्त चुत में धकेल दिया गया हो।“आह्ह्ह… धीरे… पूरा… मत…डालो”
“पूरा ही जाएगा, रंडी। आज तू रो भी ले तो मैं नहीं रुकने वाला।”। हाईं… मर गई… मर गई मैं…”
“फट गई… भाई साब… फट गई मेरी…”
“अरे बाप रे… इतना मोटा… धीरे… धीरे न …करो”
“मम्मी… बच बचा लो मुझे… ये तो फाड़ देगा…”
“ह्ईं राम… पूरा अंदर… पूरा घुस गया…”हाय पापा,आज नहीं बचती तुम्हारी प्यार बेटी,
“निकल bhadve… थोड़ा बाहर निकाल… दर्द हो रहा है… हाय…”
“रंडी बना दीया मुझे… तूने… फट गई मेरी चूत…”
“बचा… बचा ले कोई… ये लंड तो मार डालेगा…”
“आह्ह… रुको… रुको भाई साहब… सहन नहीं हो रहा…”
“इतना अंदर… कोख तक… ह्ईं मर गई…”रवि बच्चा ले अपनी माँ को ,मर डालेगा ये हवसी
“ धीरे कर… फट जाएगी… पूरी फट जाएगी मेरी…”
“हाय माँ… ये हैवान… चोद के मार डालेगा…”
“निकाल ले बाहर … थोड़ा… फिर डाल… हाय… दर्द… मज़ा… दोनों
पूरा ले लिया… देख… पूरा लंड… अंदर है मेरी चूत में…”
“मा। मर गई रे… आज तो फट ही गई मेरी phudhy
अब धक्कों की आवाज़ शुरू हो गई थी।
धीमी, नियमित, चारपाई के साथ मिलकर। हर धक्के पर मम्मी की हल्की सिसकी—कभी दबी, कभी लंबे और गहरे सांस के रूप में। अंकल की साँसें उनके गले और कान के पास गरम-गरम टकरा रही होंगी;
मुझे अंकल की फुसफुसाहट सुनाई दी—
“कितनी गीली हो रही है तू… मेरे लंड के लिए… सोच,तेरा बेटा पास में सोया है…”
मम्मी -“चुप… करो… आह… और ,इतनी ज़ोर से मत…”
“मै तो तेज़ तेज़ ही चोदूंगा। बोल—किसका ले रही है?”
तुम्हारा…”
“साफ़ बोल।”
“प्रदीप… आपका… लंड… ले रही हूँ… आह्ह्ह…”
मेरा हाथ अपनी पैंट के अंदर अब और तेज़ी से चल रहा था। अँधेरे ने सब कुछ छुपा रखा था, पर आवाज़ें इतनी साफ़ थीं कि दिमाग खुद-ब-खुद तस्वीर बना रहा था—मम्मी की नाइटी कमर तक उठी हुई, जाँघें खुली, अंकल उनके ऊपर या पीछे, कमर झुकाए, पूरे जोर से अपना लंड अंदर घुसेड़ते हुए। कभी-कभी चारपाई ज़ोर से हिलती; कभी मम्मी का हाथ अंकल की पीठ या बालों में उलझने की हल्की आवाज़ आती।
“मैं… आने... वाली … हूँ… बस… और… अंदर…” उनकी आवाज़ अब टूट-टूटकर निकल रही थी। “आज… बाहर...निकालना… मत… अंदर ही… गिरा दो... गिरा दो ...अंदर ही अपना अमृत। अंकल हँसा
—अंदर ही दूंगा। तेरी कोख में। फिर देखना सुबह कैसे सती सावित्री बनती है रवि के सामने।”
धक्के अब तेज़ हो गए थे। मांस और पसीने की हल्की सी गंध कमरे में घुलने लगी थी—या शायद वह मेरी ही उत्तेजना का भ्रम था। मम्मी की आहों ने एक लय पकड़ ली थी; हर बार अंकल का लंड पूरा अंदर जाता तो तो उनके मुंह से आह की आवाज़ और मम्मी के मुंह से अलग अलग रूप में सिसकियां एक लयबद्ध रूप में निकलती। मैंने अपने लंड को और कसकर पकड़ा। उस नादानी वाली उम्र में भी शरीर समझ चुका था कि यह खेल अब चरम के करीब है।कुश ही पल बाद मेरे लंड से पिचकारी निकली जिसे मैने अपने अंडरवियर में ही रोक लिया और पूरी तरह निकलने के बाद मैने धीरे से पहले पेंट खोली फिर अंडरवियर से, लंड से निकले लावे को साफ किया और बेड के नीचे दूर तक फेंक दिया ताकि कोई भी पहले उठे तो उसे दिखाई न दे और पैंट पहन ली।
तभी मम्मी की एक लंबी, दबी हुई चीख निकली—तकिए में मुँह गड़ाकर। शरीर की कंपन की आवाज़ चारपाई तक आई। अंकल ने कुछ पल और ज़ोर लगाया, फिर एक गहरी, जानवर जैसी आवाज़ के साथ रुक गया। कमरे में कुछ क्षणों तक सिर्फ़ दोनों की हाँफती साँसें गूँजती रही।
भर दिया…” अंकल ने धीरे से कहा। “पूरा।”
मम्मी ने जवाब में सिर्फ़ एक थकी, काँपती सिसकारी दी ।थोड़ी देर बाद ममी धीरे से बोली,,"निकालो बाहर चिप चिप हो रही है“”अंकल बोले
“अंदर ही रहने दे। सुबह तक। मेरा निशान।”
नाइटी फिर से नीचे खिसकाई गई। कपड़ों के व्यवस्थित होने की हल्की सरसराहट। चारपाई पर दोनों फिर करवट लेकर लेट गए—जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर कमरे की हवा अब पहले जैसी नहीं थी। और न मैं।
मैं अँधेरे में पत्थर की तरह पड़ा रहा। और कान उन आखिरी साँसों पर टिके हुए थे। उस रात मैंने कुछ नहीं बोला। न हिला। । बस लेटा रहा—और पहली बार समझा कि कुछ राज़ आवाज़ों से भी साफ़ सुनाई दे जाते हैं
दोस्तों, कहानी का यह भाग आपको कैसा लगा? मेरे इस वयस्क नजरिए और उस रात की रहस्यमयी शुरुआत ने आपके मन में कितनी उत्सुकता जगाई है, मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएं। आपका एक-एक कमेंट मुझे आगे की कहानी को और भी बारीकी और रफ्तार से लिखने के लिए बहुत मोटिवेट (motivate) करेगा। इस पूरी घटना में आपको हमारी मम्मी का रूप, उनकी कशमकश या उनका वह गुप्त अंदाज़ कैसा लगा? मम्मी के किरदार के बारे में आपके मन में जो भी विचार आ रहे हों—चाहे अच्छे हों या बुरे—आप नीचे कमेंट बॉक्स में पूरी तरह खुलकर लिख सकते हैं। आपके हर एक कमेंट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!"



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