12-08-2026, 12:25 AM
राघव की आँखें धीरे-धीरे चैताली के बेहोश चेहरे पर टिक गईं। उसकी साँसें अनियमित थीं, होंठ थोड़े से अलग, जैसे कोई गहरी नींद में हो। उसके काले बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे, और राघव ने अपने हाथ से उन्हें सहलाते हुए चैताली के गाल को छुआ। उसकी त्वचा गर्म थी, नरम, जैसे रेशम के फूल की पंखुड़ियाँ।
धीरे से राघव ने अपने होंठ चैताली के होंठों पर टिका दिए। पहले तो बस एक हल्का स्पर्श, फिर धीरे-धीरे दबाव बढ़ता गया। उसकी साँसें चैताली के मुँह से मिल रही थीं, गर्म और मीठी। राघव ने अपनी जीभ से चैताली के होंठों को खोला, और जैसे ही उसके दाँतों के बीच से रास्ता मिला, उसकी जीभ अंदर घुस गई।
चैताली की जीभ निष्क्रिय पड़ी थी, लेकिन राघव ने उसे अपनी जीभ से उत्तेजित करना शुरू किया। वह धीरे-धीरे चारों ओर घूमती, चैताली के मुँह की गर्मी को महसूस करती, उसकी लार के साथ मिलती। कभी वह चैताली की जीभ के नीचे जाती, कभी ऊपर, एक लयबद्ध नृत्य की तरह। राघव के हाथ चैताली के गर्दन पर चले गए, उंगलियाँ उसकी त्वचा में धँसती हुई, जैसे वह उसे और पास खींच रहा हो।
होंठों का यह खेल मिनटों तक चला, राघव की साँसें तेज होती जा रही थीं, उसका शरीर चैताली के शरीर से चिपका हुआ, गर्मी और इच्छा से भरा हुआ।
इसी बीच, जब कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था और केवल एसी की धीमी सरसराहट सुनाई दे रही थी, अशोक चुपचाप सोफे के किनारे पर बैठा हुआ था। उसकी आँखें चैताली के बेहोश शरीर पर टिकी हुई थीं, जो सोफे पर लेटी हुई थी। उसके पैरों के पास बैठे हुए अशोक ने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को छूने से पहले सावधानी बरतता है। पहले उसने चैताली के पैरों को हल्का सा छुआ, फिर धीरे से उसकी साड़ी ऊपर की ओर उठाने लगा।
जैसे-जैसे साड़ी ऊपर चढ़ती गई, चैताली की सुडौल, सांवली जांघों का नज़ारा धीरे-धीरे उभरने लगा। अशोक की साँसें तेज़ हो गईं जब उसने उन जांघों को अपनी उंगलियों से सहलाना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ चैताली की चिकनी त्वचा पर नृत्य करने लगीं, कभी धीरे से दबाते हुए, कभी गोल-गोल घुमाते हुए। इसके साथ ही वह साड़ी को और ऊपर खींचता गया, जिससे अब चैताली की पतली काली पैंटी पूरी तरह से दिखाई देने लगी, जो उसके नितंबों को टाइट से ढ़के हुए थी।
अशोक की नज़रें उस पैंटी पर जम गईं, जो चैताली की त्वचा के रंग से एकदम विपरीत थी। उस काले कपड़े का उसकी सांवली त्वचा के साथ विषम संयोजन अशोक को और भी उत्तेजित कर रहा था। वह अपनी उंगलियों को चैताली की जांघों के बीच तक ले गया, जहाँ पैंटी की किनारी उसकी त्वचा में थोड़ी सी दबी हुई थी, जिससे एक मनमोहक निशान बन गया था। अशोक की साँसें और तेज़ हो गईं जब उसने उस निशान को अपने अंगूठे से सहलाया, जबकि उसका दूसरा हाथ साड़ी को और ऊपर खींच रहा था, जिससे चैताली का निचला हिस्सा पूरी तरह से उसकी नज़रों के सामने आ गया।


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