11-08-2026, 05:01 PM
Ramu jee ki bahoo mein padi mai apne app ko justify karti hoon, mai apne ramu jee ke liye apne app ko aur bhi tayar karti sochti hoon.....
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रुही की मानसिक स्थिति इस पल बहुत गहरी, उलझी और खतरनाक हद तक स्पष्ट थी।
उसके शरीर के ऊपर रामू जी का वजन था। उनका मोटा लंड उसके अंदर धीरे-धीरे हिले जा रहा था, लेकिन रुही का मन शरीर से भी कहीं ज्यादा सक्रिय था। आँखें आधी खुली थीं, होश पूरी तरह मौजूद था, और फिर भी वो एक तरह के मीठे नशे में डूबी हुई थी।
अंदर क्या चल रहा था:
वो खुद को खोता हुआ महसूस कर रही थी — और खोने में उसे अजीब सी शांति मिल रही थी।
“रुही सिंह” नाम का जो चेहरा सालों से उसने संभाला था, वो अब धीरे-धीरे मिट रहा था। उसकी जगह एक नई स्त्री जन्म ले रही थी — रुही कामत। जो सिर्फ एक मर्द की थी। जो सिर्फ एक कमरे की थी। जो सिर्फ एक लंड की थी।
उसके मन में बार-बार एक ही बात घूम रही थी:
मुझे पता है मैं क्या कर रही हूँ।
मुझे पता है ये गलत है।
मुझे पता है सनी इस वक्त कहीं डिनर कर रहा है और सोच रहा है कि मैं घर पर सुरक्षित हूँ।
फिर भी मैं यहाँ हूँ।
और मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती।
ये “फिर भी” वाली भावना सबसे ज्यादा तीव्र थी। अपराधबोध था, लेकिन अपराधबोध अब उत्तेजना का हिस्सा बन चुका था। जितना वो सोचती कि सनी अनजान है, उतना ही उसका शरीर और भी गीला हो जाता। छुपाव का नशा, धोखे का नशा, और समर्पण का नशा तीनों मिलकर उसे मानसिक रूप से बांध चुके थे।
वो खुद से बार-बार सवाल कर रही थी और खुद ही जवाब दे रही थी:
क्या मैं पतित हो गई हूँ?
हाँ। और इस पतन में मुझे अपनी असली जगह मिल गई है।
क्या मैं कमजोर हूँ?
नहीं। मैंने खुद चुना है कमजोर होना। अपने आप को पूरी तरह सौंप देना मेरी ताकत है।
क्या मैं रामू जी से सच में प्यार करती हूँ?
प्यार शब्द छोटा पड़ रहा है। मैं उनकी भूखी हूँ। उनकी आदी हूँ। उनकी दासी बनना चाहती हूँ। उनके खुरदरे हाथों से मसली जाना, उनके लंड से फाड़ी जाना, उनकी गंध में साँस लेना — यही मेरी जिंदगी का मतलब बन चुका है।
उसके अंदर एक और खतरनाक विचार बार-बार आ रहा था —
काश ये रात कभी खत्म न हो।
काश सनी हमेशा लेट रहे।
काश मैं हमेशा के लिए इसी छोटे से कमरे में रह जाऊँ। उनके नीचे। उनकी बाँहों में। उनके नाम से।
शर्म अभी भी थी। लेकिन शर्म अब उसके शरीर को और संवेदनशील बना रही थी। जब रामू जी उसके कान में गंदे शब्द बोलते, जब वो उसके स्तनों को जोर से निचोड़ते, जब वो कहते “तू मेरी रंडी है”, तो रुही के मन में एक आवाज कहती —
हाँ, कहो। और कहो। मुझे और गिराओ। जितना गिराओगी, उतना ही मैं हल्की महसूस करूँगी।
वो मानसिक रूप से पूरी तरह समर्पित हो चुकी थी। शरीर तो पहले ही उनका था, अब दिमाग भी उनका हो रहा था। भविष्य के बारे में सोचना बंद कर दिया था। सिर्फ वर्तमान था — रामू जी का वजन, उनका लंड, उनकी साँसें, उनकी गंध।
और सबसे गहराई में एक शांत, ठंडी स्वीकृति बैठ गई थी:
मैं वापस नहीं जा सकती।
शरीर चाहे सनी के घर चला जाए, लेकिन जो स्त्री यहाँ इस कमरे में पैदा हुई है, वो यहीं रहेगी।
रुही कामत अब मरने वाली नहीं।
उसने रामू जी की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और आँखें बंद करके मन ही मन दोहराया —
“मैं आपकी हूँ… पूरी तरह… दिमाग से भी।”
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रुही की मानसिक स्थिति इस पल बहुत गहरी, उलझी और खतरनाक हद तक स्पष्ट थी।
उसके शरीर के ऊपर रामू जी का वजन था। उनका मोटा लंड उसके अंदर धीरे-धीरे हिले जा रहा था, लेकिन रुही का मन शरीर से भी कहीं ज्यादा सक्रिय था। आँखें आधी खुली थीं, होश पूरी तरह मौजूद था, और फिर भी वो एक तरह के मीठे नशे में डूबी हुई थी।
अंदर क्या चल रहा था:
वो खुद को खोता हुआ महसूस कर रही थी — और खोने में उसे अजीब सी शांति मिल रही थी।
“रुही सिंह” नाम का जो चेहरा सालों से उसने संभाला था, वो अब धीरे-धीरे मिट रहा था। उसकी जगह एक नई स्त्री जन्म ले रही थी — रुही कामत। जो सिर्फ एक मर्द की थी। जो सिर्फ एक कमरे की थी। जो सिर्फ एक लंड की थी।
उसके मन में बार-बार एक ही बात घूम रही थी:
मुझे पता है मैं क्या कर रही हूँ।
मुझे पता है ये गलत है।
मुझे पता है सनी इस वक्त कहीं डिनर कर रहा है और सोच रहा है कि मैं घर पर सुरक्षित हूँ।
फिर भी मैं यहाँ हूँ।
और मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती।
ये “फिर भी” वाली भावना सबसे ज्यादा तीव्र थी। अपराधबोध था, लेकिन अपराधबोध अब उत्तेजना का हिस्सा बन चुका था। जितना वो सोचती कि सनी अनजान है, उतना ही उसका शरीर और भी गीला हो जाता। छुपाव का नशा, धोखे का नशा, और समर्पण का नशा तीनों मिलकर उसे मानसिक रूप से बांध चुके थे।
वो खुद से बार-बार सवाल कर रही थी और खुद ही जवाब दे रही थी:
क्या मैं पतित हो गई हूँ?
हाँ। और इस पतन में मुझे अपनी असली जगह मिल गई है।
क्या मैं कमजोर हूँ?
नहीं। मैंने खुद चुना है कमजोर होना। अपने आप को पूरी तरह सौंप देना मेरी ताकत है।
क्या मैं रामू जी से सच में प्यार करती हूँ?
प्यार शब्द छोटा पड़ रहा है। मैं उनकी भूखी हूँ। उनकी आदी हूँ। उनकी दासी बनना चाहती हूँ। उनके खुरदरे हाथों से मसली जाना, उनके लंड से फाड़ी जाना, उनकी गंध में साँस लेना — यही मेरी जिंदगी का मतलब बन चुका है।
उसके अंदर एक और खतरनाक विचार बार-बार आ रहा था —
काश ये रात कभी खत्म न हो।
काश सनी हमेशा लेट रहे।
काश मैं हमेशा के लिए इसी छोटे से कमरे में रह जाऊँ। उनके नीचे। उनकी बाँहों में। उनके नाम से।
शर्म अभी भी थी। लेकिन शर्म अब उसके शरीर को और संवेदनशील बना रही थी। जब रामू जी उसके कान में गंदे शब्द बोलते, जब वो उसके स्तनों को जोर से निचोड़ते, जब वो कहते “तू मेरी रंडी है”, तो रुही के मन में एक आवाज कहती —
हाँ, कहो। और कहो। मुझे और गिराओ। जितना गिराओगी, उतना ही मैं हल्की महसूस करूँगी।
वो मानसिक रूप से पूरी तरह समर्पित हो चुकी थी। शरीर तो पहले ही उनका था, अब दिमाग भी उनका हो रहा था। भविष्य के बारे में सोचना बंद कर दिया था। सिर्फ वर्तमान था — रामू जी का वजन, उनका लंड, उनकी साँसें, उनकी गंध।
और सबसे गहराई में एक शांत, ठंडी स्वीकृति बैठ गई थी:
मैं वापस नहीं जा सकती।
शरीर चाहे सनी के घर चला जाए, लेकिन जो स्त्री यहाँ इस कमरे में पैदा हुई है, वो यहीं रहेगी।
रुही कामत अब मरने वाली नहीं।
उसने रामू जी की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और आँखें बंद करके मन ही मन दोहराया —
“मैं आपकी हूँ… पूरी तरह… दिमाग से भी।”


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