11-08-2026, 04:58 PM
Meri soch mujh se hee
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सनी उस वक्त होटल के डिनर टेबल पर बैठा था। क्लाइंट के साथ हँस रहा था, वाइन की चुस्कियाँ ले रहा था, बिज़नेस की बातें कर रहा था। फोन टेबल पर रखा था, स्क्रीन की तरफ कभी-कभी नजर जाती तो सिर्फ यह देखने के लिए कि कोई मैसेज तो नहीं आया। कोई मैसेज नहीं था।
उसे लग रहा था कि रुही घर पर होगी। खाना खाकर टीवी देख रही होगी, या शायद सोने की तैयारी कर रही होगी। उसने सोचा, “रात को जाकर उसे सरप्राइज दूँगा। थक गई होगी बेचारी अकेली।”
उसके मन में रत्ती भर शक नहीं था।
उसे नहीं पता था कि उसकी बीवी इस समय शहर की एक गंदी बस्ती के छोटे से कमरे में पूरी नंगी लेटी हुई है।
उसे नहीं पता था कि रामू नाम के एक ऑटो वाले के बड़े खुरदरे हाथ उसकी बीवी के स्तनों को मसल रहे हैं।
उसे नहीं पता था कि रुही इस पल अपने मन में खुद से कह रही है — “रुही, तू रुही सिंह नहीं रह गई। तू कामत की बहू है। तू इसी समर्पण के लिए बनी है।”
सनी हँस रहा था क्लाइंट की बात पर।
और कुछ किलोमीटर दूर, उस छोटे से कमरे में, रुही की आँखों से आँसू बह रहे थे — प्यार और समर्पण के आँसू। रामू जी का मोटा लंड उसकी जाँघ के अंदर धंसा हुआ था, धीरे-धीरे हिले जा रहा था। रुही दोनों हाथों से रामू जी का चेहरा पकड़े हुए उनकी आँखों में देख रही थी।
“रामू जी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “सनी को कुछ पता नहीं। वो सोच रहा होगा मैं घर पर हूँ। और मैं यहाँ… आपकी बाँहों में… आपकी पूरी औरत बनकर पड़ी हूँ।”
रामू जी ने गहरा धक्का दिया। रुही की आँखें बंद हो गईं, मुँह से हल्की सी कराह निकली।
“पता रहने दो उसे,” रामू जी ने गुर्राहट भरी आवाज़ में कहा, “चूतिया सरदार है वो। इतना गरम माल पाकर भी सम्भाल नहीं पाया। अब ये माल मेरा है। तू मेरी है। तेरी चूत, तेरे स्तन, तेरी आत्मा… सब मेरी।”
रुही ने उनकी गर्दन से चिपकते हुए फुसफुसाया,
“हाँ… सब आपकी। मुझे अच्छा लग रहा है कि उसे कुछ पता नहीं। जितना अनजान रहेगा, उतना ही मैं आपकी हो पाऊँगी पूरी तरह। उसके घर में रहूँगी… लेकिन दिल से आपकी बहू बनी रहूँगी। कामत परिवार की।”
उसने आँखें खोलीं। आँसू अभी भी थे, लेकिन उनमें एक अजीब सी शांति थी।
“रामू जी… मुझे और चोदिए। इस अनजानपन में… इस छुपे हुए पाप में… मुझे और गहराई तक अपना बना लीजिए। मैं इसी के लिए बनी हूँ। आपके लिए। आपके लंड के लिए। आपके नाम के लिए।”
सनी उस वक्त मिठाई का ऑर्डर दे रहा था।
और रुही, उसके अनजान होने की मिठास में डूबी हुई, रामू जी के नीचे पूरी तरह खुल चुकी थी — शरीर से भी, और आत्मा से भी।
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सनी उस वक्त होटल के डिनर टेबल पर बैठा था। क्लाइंट के साथ हँस रहा था, वाइन की चुस्कियाँ ले रहा था, बिज़नेस की बातें कर रहा था। फोन टेबल पर रखा था, स्क्रीन की तरफ कभी-कभी नजर जाती तो सिर्फ यह देखने के लिए कि कोई मैसेज तो नहीं आया। कोई मैसेज नहीं था।
उसे लग रहा था कि रुही घर पर होगी। खाना खाकर टीवी देख रही होगी, या शायद सोने की तैयारी कर रही होगी। उसने सोचा, “रात को जाकर उसे सरप्राइज दूँगा। थक गई होगी बेचारी अकेली।”
उसके मन में रत्ती भर शक नहीं था।
उसे नहीं पता था कि उसकी बीवी इस समय शहर की एक गंदी बस्ती के छोटे से कमरे में पूरी नंगी लेटी हुई है।
उसे नहीं पता था कि रामू नाम के एक ऑटो वाले के बड़े खुरदरे हाथ उसकी बीवी के स्तनों को मसल रहे हैं।
उसे नहीं पता था कि रुही इस पल अपने मन में खुद से कह रही है — “रुही, तू रुही सिंह नहीं रह गई। तू कामत की बहू है। तू इसी समर्पण के लिए बनी है।”
सनी हँस रहा था क्लाइंट की बात पर।
और कुछ किलोमीटर दूर, उस छोटे से कमरे में, रुही की आँखों से आँसू बह रहे थे — प्यार और समर्पण के आँसू। रामू जी का मोटा लंड उसकी जाँघ के अंदर धंसा हुआ था, धीरे-धीरे हिले जा रहा था। रुही दोनों हाथों से रामू जी का चेहरा पकड़े हुए उनकी आँखों में देख रही थी।
“रामू जी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “सनी को कुछ पता नहीं। वो सोच रहा होगा मैं घर पर हूँ। और मैं यहाँ… आपकी बाँहों में… आपकी पूरी औरत बनकर पड़ी हूँ।”
रामू जी ने गहरा धक्का दिया। रुही की आँखें बंद हो गईं, मुँह से हल्की सी कराह निकली।
“पता रहने दो उसे,” रामू जी ने गुर्राहट भरी आवाज़ में कहा, “चूतिया सरदार है वो। इतना गरम माल पाकर भी सम्भाल नहीं पाया। अब ये माल मेरा है। तू मेरी है। तेरी चूत, तेरे स्तन, तेरी आत्मा… सब मेरी।”
रुही ने उनकी गर्दन से चिपकते हुए फुसफुसाया,
“हाँ… सब आपकी। मुझे अच्छा लग रहा है कि उसे कुछ पता नहीं। जितना अनजान रहेगा, उतना ही मैं आपकी हो पाऊँगी पूरी तरह। उसके घर में रहूँगी… लेकिन दिल से आपकी बहू बनी रहूँगी। कामत परिवार की।”
उसने आँखें खोलीं। आँसू अभी भी थे, लेकिन उनमें एक अजीब सी शांति थी।
“रामू जी… मुझे और चोदिए। इस अनजानपन में… इस छुपे हुए पाप में… मुझे और गहराई तक अपना बना लीजिए। मैं इसी के लिए बनी हूँ। आपके लिए। आपके लंड के लिए। आपके नाम के लिए।”
सनी उस वक्त मिठाई का ऑर्डर दे रहा था।
और रुही, उसके अनजान होने की मिठास में डूबी हुई, रामू जी के नीचे पूरी तरह खुल चुकी थी — शरीर से भी, और आत्मा से भी।


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