11-08-2026, 04:45 PM
रामू जी की बाँहों में मेरा नंगा शरीर पूरी तरह दब चुका था। उनकी छाती के बाल मेरे स्तनों से रगड़ खा रहे थे। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा और आँखों में आँखें डालकर बोले—
“देख मुझे। आज से तू सिर्फ मेरी है। ये मेरा मर्दाना हक़ है। सनी जैसा चूतिया सरदार तुझे क्या सम्भालेगा? साले ने इतना गरम, इतना रसभरा माल पाकर भी उसका ध्यान नहीं रखा। रोज़ दफ़्तर-दफ़्तर घुमाता रहा, और तू यहाँ मेरे कमरे में प्यासी पड़ी रहती थी।”
उनकी आवाज़ में मालिकाना अंदाज़ था। मैं शर्माते हुए उनकी आँखों में देखती रही।
“रामू जी… आप सही कह रहे हैं। उसने कभी मुझे ऐसे नहीं देखा जैसे आप देखते हैं।”
रामू जी ने मेरे गाल सहलाए, फिर स्तनों को दोनों हाथों से थाम लिया।
“कितनी खूबसूरत है तू मेरी रुही। ये गोरी-गुलाबी त्वचा, ये भरे हुए स्तन, ये पतली कमर, ये लंबे बाल… सब कुछ जैसे मेरे लिए ही बना हो। सनी जैसा बेवकूफ़ तुझे पहचान ही नहीं पाया। मैंने पहली नज़र में पहचान लिया था कि ये माल मेरे लंड के लिए बना है।”
मैं उनकी बातों से और भी गीली हो रही थी। धीरे से नीचे सरकी और उनके मोटे, काले लंड के पास पहुँच गई। उसे दोनों हाथों से पकड़ा और हल्के से चूम लिया। गरम, नमी भरा सिरा मेरे होंठों से छूते ही मैं फुसफुसाई—
“आप बहुत शैतान हो जी… आप जानवर बन जाते हो। मेरी वो प्यारी, छुई-मुई कली को फाड़ देते हो। इतनी बेरहमी से घुस जाते हो अंदर… बहुत निर्दयी हो आप। रोज़ मेरी कली को अपने मोटे लंड से चीर देते हो… फिर भी मैं बार-बार आपके पास आ जाती हूँ।”
मैंने लंड के सिरे को फिर चूमा, जीभ से चाटा। रामू जी ने मेरे बाल पकड़ लिए।
“चाट इसे। ये तेरा असली पति है। बोल, किसका लंड है ये?”
“आपका… सिर्फ आपका रामू जी।” मैंने फिर चूमा, “आप इसे इतना कड़ा कर लेते हो… फिर मेरी छोटी सी चूत में ज़बरदस्ती ठूस देते हो। मैं चीखती हूँ, रोती हूँ… फिर भी आप नहीं रुकते।”
फिर मैं उनके हाथों की तरफ मुड़ी। उनके बड़े, खुरदरे हाथों को दोनों हाथों में लेकर चूमने लगी। एक-एक उंगली मुँह में ले करके चूसने लगी। उनकी उंगलियों की खुरदरी त्वचा और तंबाकू की हल्की गंध मुझे और पागल बना रही थी।
“आपके ये हाथ…” मैंने एक उंगली चूसते हुए कहा, “कितने हार्ड और खुरदरे हैं। मेरी इन दोनों बेचारी दूध सी बहनों को निचोड़ डालते हैं। देखो… कैसे मेरे निपल्स को लाल-लाल कर देते हो। रोज़ मसल-मसल के सूजा देते हो। थोड़ा तो तरस किया करो मुझ पर रामू जी… ये बेचारी स्तन कितना सहते हैं आपके हाथों से।”
रामू जी हँस पड़े। उन्होंने अपना हाथ मेरे मुँह से निकाला और दोनों स्तनों को फिर से मज़बूती से पकड़ लिया। उंगलियों से निपल्स को दबाया।
“तरस? इन स्तनों पर तरस खाने की ज़रूरत नहीं। ये मेरे हैं। जितना चाहूँ निचोड़ूँ, जितना चाहूँ चूसूँ। तू तो मज़ा लेती है जब मैं इन्हें लाल कर देता हूँ।”
मैंने कराहते हुए कहा, “हाँ… लेती हूँ। आपके खुरदरे हाथ जब इन्हें मसलते हैं तो… बहुत मज़ा आता है। लेकिन फिर भी… थोड़ा तो कोमलता दिखाया करो जी। ये निपल्स रोज़ आपके दाँतों और उंगलियों से इतने लाल हो जाते हैं कि साड़ी के अंदर भी चुभते हैं।”
रामू जी ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया। मेरा चेहरा उनके चेहरे के बिल्कुल करीब था।
“कोमलता बाद में मिलेगी। पहले मैं अपना मर्दाना हक़ पूरा करूँगा। सनी जैसा चूतिया तुझे सिर्फ़ नाम का पति मिला था। असली मर्द तो मैं हूँ। आज रात मैं तुझे इतना चोदूँगा कि तू भूल जाएगी कि कभी किसी और ने तुझे छुआ भी था।”
मैंने उनकी गर्दन में मुँह छुपा लिया। उनकी मर्दाना गंध फिर से मुझे घेर रही थी।
“चोद लो रामू जी… जितना चाहो। मैं आपकी हूँ। आपके लंड की, आपके हाथों की, आपकी बाँहों की। सनी को भूल गई मैं… बिल्कुल भूल गई।”
उनके बड़े हाथ मेरी कमर से होते हुए मेरी गोल चूत तक पहुँच गए। एक उंगली ने धीरे से मेरे गीले छेद को छुआ।
“इतनी गीली हो चुकी है मेरी दुल्हन। चल… अब इसे अपने असली मालिक के लंड से मिलवाती हूँ।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शर्म, प्यार और हवस सब एक साथ मेरे अंदर उमड़ रहे थे। रामू जी की बाँहों में, उनके गंदे कमरे में, उनकी गंध में… मैं पूरी तरह उनकी हो चुकी थी।
“देख मुझे। आज से तू सिर्फ मेरी है। ये मेरा मर्दाना हक़ है। सनी जैसा चूतिया सरदार तुझे क्या सम्भालेगा? साले ने इतना गरम, इतना रसभरा माल पाकर भी उसका ध्यान नहीं रखा। रोज़ दफ़्तर-दफ़्तर घुमाता रहा, और तू यहाँ मेरे कमरे में प्यासी पड़ी रहती थी।”
उनकी आवाज़ में मालिकाना अंदाज़ था। मैं शर्माते हुए उनकी आँखों में देखती रही।
“रामू जी… आप सही कह रहे हैं। उसने कभी मुझे ऐसे नहीं देखा जैसे आप देखते हैं।”
रामू जी ने मेरे गाल सहलाए, फिर स्तनों को दोनों हाथों से थाम लिया।
“कितनी खूबसूरत है तू मेरी रुही। ये गोरी-गुलाबी त्वचा, ये भरे हुए स्तन, ये पतली कमर, ये लंबे बाल… सब कुछ जैसे मेरे लिए ही बना हो। सनी जैसा बेवकूफ़ तुझे पहचान ही नहीं पाया। मैंने पहली नज़र में पहचान लिया था कि ये माल मेरे लंड के लिए बना है।”
मैं उनकी बातों से और भी गीली हो रही थी। धीरे से नीचे सरकी और उनके मोटे, काले लंड के पास पहुँच गई। उसे दोनों हाथों से पकड़ा और हल्के से चूम लिया। गरम, नमी भरा सिरा मेरे होंठों से छूते ही मैं फुसफुसाई—
“आप बहुत शैतान हो जी… आप जानवर बन जाते हो। मेरी वो प्यारी, छुई-मुई कली को फाड़ देते हो। इतनी बेरहमी से घुस जाते हो अंदर… बहुत निर्दयी हो आप। रोज़ मेरी कली को अपने मोटे लंड से चीर देते हो… फिर भी मैं बार-बार आपके पास आ जाती हूँ।”
मैंने लंड के सिरे को फिर चूमा, जीभ से चाटा। रामू जी ने मेरे बाल पकड़ लिए।
“चाट इसे। ये तेरा असली पति है। बोल, किसका लंड है ये?”
“आपका… सिर्फ आपका रामू जी।” मैंने फिर चूमा, “आप इसे इतना कड़ा कर लेते हो… फिर मेरी छोटी सी चूत में ज़बरदस्ती ठूस देते हो। मैं चीखती हूँ, रोती हूँ… फिर भी आप नहीं रुकते।”
फिर मैं उनके हाथों की तरफ मुड़ी। उनके बड़े, खुरदरे हाथों को दोनों हाथों में लेकर चूमने लगी। एक-एक उंगली मुँह में ले करके चूसने लगी। उनकी उंगलियों की खुरदरी त्वचा और तंबाकू की हल्की गंध मुझे और पागल बना रही थी।
“आपके ये हाथ…” मैंने एक उंगली चूसते हुए कहा, “कितने हार्ड और खुरदरे हैं। मेरी इन दोनों बेचारी दूध सी बहनों को निचोड़ डालते हैं। देखो… कैसे मेरे निपल्स को लाल-लाल कर देते हो। रोज़ मसल-मसल के सूजा देते हो। थोड़ा तो तरस किया करो मुझ पर रामू जी… ये बेचारी स्तन कितना सहते हैं आपके हाथों से।”
रामू जी हँस पड़े। उन्होंने अपना हाथ मेरे मुँह से निकाला और दोनों स्तनों को फिर से मज़बूती से पकड़ लिया। उंगलियों से निपल्स को दबाया।
“तरस? इन स्तनों पर तरस खाने की ज़रूरत नहीं। ये मेरे हैं। जितना चाहूँ निचोड़ूँ, जितना चाहूँ चूसूँ। तू तो मज़ा लेती है जब मैं इन्हें लाल कर देता हूँ।”
मैंने कराहते हुए कहा, “हाँ… लेती हूँ। आपके खुरदरे हाथ जब इन्हें मसलते हैं तो… बहुत मज़ा आता है। लेकिन फिर भी… थोड़ा तो कोमलता दिखाया करो जी। ये निपल्स रोज़ आपके दाँतों और उंगलियों से इतने लाल हो जाते हैं कि साड़ी के अंदर भी चुभते हैं।”
रामू जी ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया। मेरा चेहरा उनके चेहरे के बिल्कुल करीब था।
“कोमलता बाद में मिलेगी। पहले मैं अपना मर्दाना हक़ पूरा करूँगा। सनी जैसा चूतिया तुझे सिर्फ़ नाम का पति मिला था। असली मर्द तो मैं हूँ। आज रात मैं तुझे इतना चोदूँगा कि तू भूल जाएगी कि कभी किसी और ने तुझे छुआ भी था।”
मैंने उनकी गर्दन में मुँह छुपा लिया। उनकी मर्दाना गंध फिर से मुझे घेर रही थी।
“चोद लो रामू जी… जितना चाहो। मैं आपकी हूँ। आपके लंड की, आपके हाथों की, आपकी बाँहों की। सनी को भूल गई मैं… बिल्कुल भूल गई।”
उनके बड़े हाथ मेरी कमर से होते हुए मेरी गोल चूत तक पहुँच गए। एक उंगली ने धीरे से मेरे गीले छेद को छुआ।
“इतनी गीली हो चुकी है मेरी दुल्हन। चल… अब इसे अपने असली मालिक के लंड से मिलवाती हूँ।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शर्म, प्यार और हवस सब एक साथ मेरे अंदर उमड़ रहे थे। रामू जी की बाँहों में, उनके गंदे कमरे में, उनकी गंध में… मैं पूरी तरह उनकी हो चुकी थी।


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