11-08-2026, 04:34 PM
रामू जी की बाँहों में मेरा शरीर पूरी तरह समाया हुआ था। उनके बड़े, मज़बूत हाथ मेरी कमर पर थे, उंगलियाँ साड़ी की पिन को धीरे-धीरे खोल रही थीं। कमरे में हल्की सी रोशनी थी, खिड़की से आने वाली गली की आवाजें दूर होती जा रही थीं। उनकी साँसें मेरे बालों में उलझ रही थीं।
उनकी मर्दाना गंध—तंबाकू, पसीना और कुछ पुरानी मिट्टी सी—मेरे नथुनों में समा गई थी। वो गंध मुझे पागल बना रही थी। मैं उनकी छाती से चिपक गई, साँस लेते हुए वो खुशबू और अंदर खींचने लगी।
“रामू जी…” मेरी आवाज़ काँप रही थी, “आपकी खुशबू… मुझे कुछ हो रहा है। दिल जोर-जोर से धड़क रहा है।”
उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए मेरे माथे पर चुम्बन लिया। दाढ़ी मेरे माथे को छू रही थी।
“ये तेरे असली मर्द की खुशबू है मेरी दुल्हन। आदत डाल ले। आज रात बहुत सूँघेगी तू इसे।”
उनके हाथ साड़ी के पल्लू को धीरे से खींचने लगे। लाल कपड़ा मेरे कंधे से सरकते हुए नीचे गिरने लगा। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खुल रहे थे। हर हुक खुलते समय उनकी उंगलियाँ मेरी त्वचा को छू जातीं। मैं काँप रही थी।
“रामू जी… धीरे… मेरा दिल नहीं सम्भल रहा।”
“सम्भालने की ज़रूरत नहीं।” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज तू पूरी तरह मेरी है। सनी दूर है… और तू मेरे कमरे में, मेरी बाँहों में।”
ब्लाउज खुल गया। उनके बड़े हाथ पीछे से ब्रा का हुक खोलने लगे। एक क्लिक की आवाज़ हुई और ब्रा ढीली पड़ गई। उन्होंने धीरे से उसे भी उतार दिया। मेरे स्तन आज़ाद हो गए। ठंडी हवा ने छूते ही निपल तन गए।
रामू जी ने मुझे थोड़ा दूर किया, आँखों से पूरा निहारा। उनकी आँखों में भूख साफ दिख रही थी।
“इतनी गोरी… इतनी नरम। ये स्तन सिर्फ मेरे मुँह के लिए बने हैं।” उन्होंने दोनों हाथों से मेरे स्तन थाम लिए, हल्के से मसला। “बोल… किसके हैं ये?”
मैं शर्म से आँखें झुकाए हुए थी, लेकिन जवाब दिया, “आपके… सिर्फ आपके रामू जी।”
उन्होंने झुककर एक निपल मुँह में ले लिया। गर्म जीभ और दाढ़ी की खुशबू एक साथ लगी। मैं कराह उठी, उनकी गर्दन में उंगलियाँ गाड़ दीं।
“आह्ह… रामू जी…”
वो चूसते हुए बोले, “मैं तुझे दुल्हन बनाऊँगा आज। धीरे-धीरे। पहले तेरे कपड़े उतारूँगा… फिर तुझे चूसूँगा… फिर अपनी दुल्हन को पूरी रात चोदूँगा।”
पेटticoat का नाड़ा खुल चुका था। कपड़ा मेरे पैरों पर गिर गया। अब सिर्फ पैंटी बची थी। रामू जी ने मुझे चारपाई पर बैठाया, खुद घुटनों के बल बैठ गए। दोनों हाथों से मेरी पैंटी के किनारे पकड़कर धीरे-धीरे नीचे खींचने लगे।
मैंने उनकी आँखों में देखा। “रामू जी… मैं… मैं पूरी नंगी हो जाऊँगी आपके सामने।”
“हो जा। मेरी औरत को शर्म किस बात की?” उन्होंने पैंटी पूरी तरह उतार दी और एक तरफ फेंक दी। अब मैं बिल्कुल नंगी थी उनकी चारपाई पर। उनके सामने।
रामू जी खड़े हो गए। अपनी बनियान उतारी, फिर पैंट का बटन खोला। उनकी मर्दाना गंध और तेज़ हो गई। जब पैंट नीचे गिरी तो उनका मोटा, काला, नसों वाला लंड सीधा खड़ा था। मैंने निगलते हुए देखा।
“देख इसे।” उन्होंने अपना लंड हाथ में लिया, हल्के से हिलाया। “ये तेरा असली पति है अब। सनी का नाम भूल जा आज रात।”
मैं चारपाई पर बैठी-बैठी उनके करीब हो गई। उनके लंड की गंध मेरे चेहरे तक आ रही थी। मैंने दोनों हाथों से उसे पकड़ा—पूरा मुट्ठी में नहीं आ रहा था।
“रामू जी… ये इतना… बड़ा है। मुझे डर भी लगता है और… और बहुत अच्छा भी लगता है।”
उन्होंने मेरे बाल सहलाए। “डर मत। धीरे-धीरे लेगी तू। आज रात मैं तुझे सिखाऊँगा कि असली मर्द कैसे चोदता है अपनी औरत को।”
मैंने उनकी जाँघों पर सिर रख दिया, उनकी खुशबू और गहरी साँस लेकर खींची। उनके हाथ मेरे बालों में थे। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें और बाहर गली की दूर होती आवाजें थीं।
“रामू जी…” मैंने फुसफुसाया, आँखें बंद किए हुए, “मुझे अपने पास रखो। हमेशा के लिए। मैं आपकी बाँहों में ही मरना चाहती हूँ।”
उन्होंने मुझे उठाया, अपनी गोद में लिटा लिया। नंगी त्वचा उनकी गर्म छाती से सट गई। उनके लंड का सिरा मेरी जाँघ के अंदर छू रहा था।
“मेरी रुही कामत… आज रात तू सिर्फ मेरी है। और मैं तुझे इतना प्यार करूँगा कि तू भूल जाएगी कि कभी सनी नाम का कोई आदमी था भी।”
उनके होंठ मेरे होंठों पर आ गए। गहरा, लंबा चुम्बन। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने उनकी जीभ चूसी, उनका थूक पिया। उनकी मर्दाना गंध, उनके बड़े हाथ, उनका गरम शरीर—सब कुछ मुझे पागल बना रहा था।
चारपाई पर लेटे-लेटे हम एक-दूसरे से चिपके रहे। कपड़े पूरी तरह दूर फेंक दिए गए थे। सिर्फ त्वचा, साँसें और प्यार भरी, गंदी बातें बाकी थीं।
उनकी मर्दाना गंध—तंबाकू, पसीना और कुछ पुरानी मिट्टी सी—मेरे नथुनों में समा गई थी। वो गंध मुझे पागल बना रही थी। मैं उनकी छाती से चिपक गई, साँस लेते हुए वो खुशबू और अंदर खींचने लगी।
“रामू जी…” मेरी आवाज़ काँप रही थी, “आपकी खुशबू… मुझे कुछ हो रहा है। दिल जोर-जोर से धड़क रहा है।”
उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए मेरे माथे पर चुम्बन लिया। दाढ़ी मेरे माथे को छू रही थी।
“ये तेरे असली मर्द की खुशबू है मेरी दुल्हन। आदत डाल ले। आज रात बहुत सूँघेगी तू इसे।”
उनके हाथ साड़ी के पल्लू को धीरे से खींचने लगे। लाल कपड़ा मेरे कंधे से सरकते हुए नीचे गिरने लगा। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खुल रहे थे। हर हुक खुलते समय उनकी उंगलियाँ मेरी त्वचा को छू जातीं। मैं काँप रही थी।
“रामू जी… धीरे… मेरा दिल नहीं सम्भल रहा।”
“सम्भालने की ज़रूरत नहीं।” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज तू पूरी तरह मेरी है। सनी दूर है… और तू मेरे कमरे में, मेरी बाँहों में।”
ब्लाउज खुल गया। उनके बड़े हाथ पीछे से ब्रा का हुक खोलने लगे। एक क्लिक की आवाज़ हुई और ब्रा ढीली पड़ गई। उन्होंने धीरे से उसे भी उतार दिया। मेरे स्तन आज़ाद हो गए। ठंडी हवा ने छूते ही निपल तन गए।
रामू जी ने मुझे थोड़ा दूर किया, आँखों से पूरा निहारा। उनकी आँखों में भूख साफ दिख रही थी।
“इतनी गोरी… इतनी नरम। ये स्तन सिर्फ मेरे मुँह के लिए बने हैं।” उन्होंने दोनों हाथों से मेरे स्तन थाम लिए, हल्के से मसला। “बोल… किसके हैं ये?”
मैं शर्म से आँखें झुकाए हुए थी, लेकिन जवाब दिया, “आपके… सिर्फ आपके रामू जी।”
उन्होंने झुककर एक निपल मुँह में ले लिया। गर्म जीभ और दाढ़ी की खुशबू एक साथ लगी। मैं कराह उठी, उनकी गर्दन में उंगलियाँ गाड़ दीं।
“आह्ह… रामू जी…”
वो चूसते हुए बोले, “मैं तुझे दुल्हन बनाऊँगा आज। धीरे-धीरे। पहले तेरे कपड़े उतारूँगा… फिर तुझे चूसूँगा… फिर अपनी दुल्हन को पूरी रात चोदूँगा।”
पेटticoat का नाड़ा खुल चुका था। कपड़ा मेरे पैरों पर गिर गया। अब सिर्फ पैंटी बची थी। रामू जी ने मुझे चारपाई पर बैठाया, खुद घुटनों के बल बैठ गए। दोनों हाथों से मेरी पैंटी के किनारे पकड़कर धीरे-धीरे नीचे खींचने लगे।
मैंने उनकी आँखों में देखा। “रामू जी… मैं… मैं पूरी नंगी हो जाऊँगी आपके सामने।”
“हो जा। मेरी औरत को शर्म किस बात की?” उन्होंने पैंटी पूरी तरह उतार दी और एक तरफ फेंक दी। अब मैं बिल्कुल नंगी थी उनकी चारपाई पर। उनके सामने।
रामू जी खड़े हो गए। अपनी बनियान उतारी, फिर पैंट का बटन खोला। उनकी मर्दाना गंध और तेज़ हो गई। जब पैंट नीचे गिरी तो उनका मोटा, काला, नसों वाला लंड सीधा खड़ा था। मैंने निगलते हुए देखा।
“देख इसे।” उन्होंने अपना लंड हाथ में लिया, हल्के से हिलाया। “ये तेरा असली पति है अब। सनी का नाम भूल जा आज रात।”
मैं चारपाई पर बैठी-बैठी उनके करीब हो गई। उनके लंड की गंध मेरे चेहरे तक आ रही थी। मैंने दोनों हाथों से उसे पकड़ा—पूरा मुट्ठी में नहीं आ रहा था।
“रामू जी… ये इतना… बड़ा है। मुझे डर भी लगता है और… और बहुत अच्छा भी लगता है।”
उन्होंने मेरे बाल सहलाए। “डर मत। धीरे-धीरे लेगी तू। आज रात मैं तुझे सिखाऊँगा कि असली मर्द कैसे चोदता है अपनी औरत को।”
मैंने उनकी जाँघों पर सिर रख दिया, उनकी खुशबू और गहरी साँस लेकर खींची। उनके हाथ मेरे बालों में थे। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें और बाहर गली की दूर होती आवाजें थीं।
“रामू जी…” मैंने फुसफुसाया, आँखें बंद किए हुए, “मुझे अपने पास रखो। हमेशा के लिए। मैं आपकी बाँहों में ही मरना चाहती हूँ।”
उन्होंने मुझे उठाया, अपनी गोद में लिटा लिया। नंगी त्वचा उनकी गर्म छाती से सट गई। उनके लंड का सिरा मेरी जाँघ के अंदर छू रहा था।
“मेरी रुही कामत… आज रात तू सिर्फ मेरी है। और मैं तुझे इतना प्यार करूँगा कि तू भूल जाएगी कि कभी सनी नाम का कोई आदमी था भी।”
उनके होंठ मेरे होंठों पर आ गए। गहरा, लंबा चुम्बन। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने उनकी जीभ चूसी, उनका थूक पिया। उनकी मर्दाना गंध, उनके बड़े हाथ, उनका गरम शरीर—सब कुछ मुझे पागल बना रहा था।
चारपाई पर लेटे-लेटे हम एक-दूसरे से चिपके रहे। कपड़े पूरी तरह दूर फेंक दिए गए थे। सिर्फ त्वचा, साँसें और प्यार भरी, गंदी बातें बाकी थीं।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)