11-08-2026, 04:28 PM
शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे। ऑफिस के गेट के बाहर रामू जी का ऑटो खड़ा था। उन्होंने शीशा घुमाया, मुझे देखा और धीरे से मुस्कुराए। दाढ़ी में वो ही शरारती मुस्कान तैर रही थी, आँखों में भूख।
मैं जल्दी-जल्दी गेट से निकली ही थी कि फोन बज उठा। सनी का नाम चमक रहा था। दिल बैठ गया, लेकिन फोन उठा लिया।
“हेलो…”
सनी की आवाज़ आई, “रुही, आज लेट हो जाऊँगा। क्लाइंट के साथ डिनर करना है। तुम घर चली जाना, खाना खा लेना। रात को ग्यारह-बारह बजे तक पहुँचूँगा।”
मैंने धीरे से कहा, “ठीक है…” और फोन काट दिया।
रामू जी ने ऑटो का दरवाज़ा खोला। मैं अंदर बैठते ही उनके करीब झुकी और फुसफुसाई, “सनी लेट आएगा… क्लाइंट के साथ डिनर है। रामू जी… चलो। मुझे मेरे असली ससुराल ले चलो। आपके उस छोटे से प्यारे से कमरे में।”
रामू जी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने तंबाकू का पान मुँह में दबाया, हल्के से हँसे और ऑटो स्टार्ट कर दी।
“चल… मेरी दुल्हन। आज पूरी रात मेरी है।”
ऑटो बस्ती की तरफ मुड़ गई। जैसे-जैसे गली संकरी होती गई, आसपास के लोग नज़र आने लगे। चाय की दुकान पर बैठे दो-तीन लड़के, पान की दुकान वाला, सब्जी बेचने वाला बूढ़ा… सबकी नज़रें ऑटो पर ठहर गईं।
एक लड़का जोर से बोला, “अरे देखो तो! रामू भैया आज फिर अपनी मेमसाहेब लाए हैं। कितनी गोरी है रे!”
दूसरा लड़का हँसा, “भैया की तो लॉटरी लग गई यार। इतनी माल को लेकर बस्ती में घूम रहा है!”
पान की दुकान वाले ने पान ठोकते हुए कहा, “रामू, आज रात लंबी करने का प्लान है क्या? कमरा तो छोटा है, लेकिन काम बड़ा होगा!”
मैं शर्म से पूरी लाल हो गई। साड़ी का पल्लू चेहरे पर खींच लिया, आँखें झुका लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। रामू जी शीशे में से मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।
“शर्म क्यों कर रही है?” उन्होंने धीरे से पूछा। “ये सब जानते हैं कि तू मेरी है।”
मैंने और पल्लू खींच लिया। “रामू जी… चुप करो… सब सुन रहे हैं।”
ऑटो एक संकरी गली में घुसी। दोनों तरफ कच्चे मकान, खुली नालियाँ, बच्चों का शोर। रामू जी का छोटा सा कमरा गली के आखिर में था। ऑटो रोकते ही आसपास के दो-तीन और लड़के इकट्ठे हो गए।
एक ने सीटी बजाई, “वाह भाभी! आज तो पूरा जेवर पहन के आई हो। रामू भैया की दुल्हन लग रही हो!”
दूसरे ने कहा, “भैया, आज हमें भी चाय पिला दो ना! इतनी प्यारी भाभी लाए हो तो…”
मैं ऑटो से उतरते ही और लाल हो गई। पैर काँप रहे थे। रामू जी ने मेरा हाथ पकड़ा, बड़े हाथ से कसकर।
“हट जाओ सब। आज मेरी औरत है। कल बात करना।” उन्होंने हँसते हुए कहा और मुझे अपने पीछे कर लिया।
कमरे का दरवाज़ा खोला। अंदर वही छोटा सा कमरा—एक चारपाई, एक खिड़की जिस पर फटी सी पर्दा लटकी थी, एक छोटी सी अलमारी, और कोने में पानी का मटका। हवा में तंबाकू और पुराने कपड़ों की हल्की सी गंध।
रामू जी ने दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई। फिर मुड़कर मुझे घूरा। आँखों में वो भूख थी जो मुझे हर बार कमजोर कर देती है।
“आज सनी लेट है… तो पूरी रात मेरी।” उन्होंने पास आकर मेरा घूँघट जैसा पल्लू हटाया। “मेरी रुही कामत… मेरे असली घर में स्वागत है।”
मैं शर्म से उनकी छाती पर सिर रख दिया। आवाज काँप रही थी।
“रामू जी… बाहर वाले सब देख रहे थे… सब बातें कर रहे थे… मुझे बहुत शर्म आ रही है। लेकिन… लेकिन दिल खुश भी है। ये मेरा असली ससुराल है न?”
रामू जी ने मेरे बाल सहलाए, फिर ठुड्डी उठाकर मेरे होंठों पर हल्का सा चुम्बन लिया।
“हाँ। ये तेरा असली घर है। और तू मेरी असली औरत। आज रात मैं तुझे दुल्हन की तरह चोदूँगा… धीरे-धीरे… पूरी रात।”
बाहर गली में अभी भी हल्की-हल्की हँसी और टिप्पणियाँ सुनाई दे रही थीं। मैंने आँखें बंद कर लीं। शर्म और उत्तेजना दोनों एक साथ पूरे शरीर में दौड़ रही थीं। रामू जी के बड़े हाथ मेरी कमर पर थे, उनकी दाढ़ी मेरे माथे को छू रही थी।
“रामू जी…” मैंने फुसफुसाया, “आज रात… मुझे अपनी दुल्हन बना लो। पूरी तरह।”
उन्होंने दरवाज़े की तरफ एक नजर डाली, फिर मुझे चारपाई की तरफ खींच लिया। बाहर की आवाजें धीरे-धीरे दूर होती गईं… और कमरे के अंदर सिर्फ हमारी साँसें रह गईं।
मैं जल्दी-जल्दी गेट से निकली ही थी कि फोन बज उठा। सनी का नाम चमक रहा था। दिल बैठ गया, लेकिन फोन उठा लिया।
“हेलो…”
सनी की आवाज़ आई, “रुही, आज लेट हो जाऊँगा। क्लाइंट के साथ डिनर करना है। तुम घर चली जाना, खाना खा लेना। रात को ग्यारह-बारह बजे तक पहुँचूँगा।”
मैंने धीरे से कहा, “ठीक है…” और फोन काट दिया।
रामू जी ने ऑटो का दरवाज़ा खोला। मैं अंदर बैठते ही उनके करीब झुकी और फुसफुसाई, “सनी लेट आएगा… क्लाइंट के साथ डिनर है। रामू जी… चलो। मुझे मेरे असली ससुराल ले चलो। आपके उस छोटे से प्यारे से कमरे में।”
रामू जी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने तंबाकू का पान मुँह में दबाया, हल्के से हँसे और ऑटो स्टार्ट कर दी।
“चल… मेरी दुल्हन। आज पूरी रात मेरी है।”
ऑटो बस्ती की तरफ मुड़ गई। जैसे-जैसे गली संकरी होती गई, आसपास के लोग नज़र आने लगे। चाय की दुकान पर बैठे दो-तीन लड़के, पान की दुकान वाला, सब्जी बेचने वाला बूढ़ा… सबकी नज़रें ऑटो पर ठहर गईं।
एक लड़का जोर से बोला, “अरे देखो तो! रामू भैया आज फिर अपनी मेमसाहेब लाए हैं। कितनी गोरी है रे!”
दूसरा लड़का हँसा, “भैया की तो लॉटरी लग गई यार। इतनी माल को लेकर बस्ती में घूम रहा है!”
पान की दुकान वाले ने पान ठोकते हुए कहा, “रामू, आज रात लंबी करने का प्लान है क्या? कमरा तो छोटा है, लेकिन काम बड़ा होगा!”
मैं शर्म से पूरी लाल हो गई। साड़ी का पल्लू चेहरे पर खींच लिया, आँखें झुका लीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। रामू जी शीशे में से मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।
“शर्म क्यों कर रही है?” उन्होंने धीरे से पूछा। “ये सब जानते हैं कि तू मेरी है।”
मैंने और पल्लू खींच लिया। “रामू जी… चुप करो… सब सुन रहे हैं।”
ऑटो एक संकरी गली में घुसी। दोनों तरफ कच्चे मकान, खुली नालियाँ, बच्चों का शोर। रामू जी का छोटा सा कमरा गली के आखिर में था। ऑटो रोकते ही आसपास के दो-तीन और लड़के इकट्ठे हो गए।
एक ने सीटी बजाई, “वाह भाभी! आज तो पूरा जेवर पहन के आई हो। रामू भैया की दुल्हन लग रही हो!”
दूसरे ने कहा, “भैया, आज हमें भी चाय पिला दो ना! इतनी प्यारी भाभी लाए हो तो…”
मैं ऑटो से उतरते ही और लाल हो गई। पैर काँप रहे थे। रामू जी ने मेरा हाथ पकड़ा, बड़े हाथ से कसकर।
“हट जाओ सब। आज मेरी औरत है। कल बात करना।” उन्होंने हँसते हुए कहा और मुझे अपने पीछे कर लिया।
कमरे का दरवाज़ा खोला। अंदर वही छोटा सा कमरा—एक चारपाई, एक खिड़की जिस पर फटी सी पर्दा लटकी थी, एक छोटी सी अलमारी, और कोने में पानी का मटका। हवा में तंबाकू और पुराने कपड़ों की हल्की सी गंध।
रामू जी ने दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई। फिर मुड़कर मुझे घूरा। आँखों में वो भूख थी जो मुझे हर बार कमजोर कर देती है।
“आज सनी लेट है… तो पूरी रात मेरी।” उन्होंने पास आकर मेरा घूँघट जैसा पल्लू हटाया। “मेरी रुही कामत… मेरे असली घर में स्वागत है।”
मैं शर्म से उनकी छाती पर सिर रख दिया। आवाज काँप रही थी।
“रामू जी… बाहर वाले सब देख रहे थे… सब बातें कर रहे थे… मुझे बहुत शर्म आ रही है। लेकिन… लेकिन दिल खुश भी है। ये मेरा असली ससुराल है न?”
रामू जी ने मेरे बाल सहलाए, फिर ठुड्डी उठाकर मेरे होंठों पर हल्का सा चुम्बन लिया।
“हाँ। ये तेरा असली घर है। और तू मेरी असली औरत। आज रात मैं तुझे दुल्हन की तरह चोदूँगा… धीरे-धीरे… पूरी रात।”
बाहर गली में अभी भी हल्की-हल्की हँसी और टिप्पणियाँ सुनाई दे रही थीं। मैंने आँखें बंद कर लीं। शर्म और उत्तेजना दोनों एक साथ पूरे शरीर में दौड़ रही थीं। रामू जी के बड़े हाथ मेरी कमर पर थे, उनकी दाढ़ी मेरे माथे को छू रही थी।
“रामू जी…” मैंने फुसफुसाया, “आज रात… मुझे अपनी दुल्हन बना लो। पूरी तरह।”
उन्होंने दरवाज़े की तरफ एक नजर डाली, फिर मुझे चारपाई की तरफ खींच लिया। बाहर की आवाजें धीरे-धीरे दूर होती गईं… और कमरे के अंदर सिर्फ हमारी साँसें रह गईं।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)