11-08-2026, 09:40 AM
उस आदमी के दुकान से सामान लेकर जाने के बाद, मम्मी के चेहरे की वह रहस्यमयी मुस्कान काफी देर तक बनी रही। जैसे ही उन्हें यह पक्का भरोसा हो गया कि आज शाम को अंकल आना बिल्कुल निश्चित है, घर के अंदर उनकी व्यस्तता और गति दोगुनी हो गई। वैसे तो मम्मी रोज़ ही सलीके से रहती थीं, लेकिन उस दिन वे कुछ ज़्यादा ही खूबसूरती से तैयार हुई थीं। उन्होंने खुद को बहुत अच्छे से संवारा था और उनका वो हल्का गुलाब करती और काली सलवार उनके बदन को बहुत ही आकर्षक बना रहे थेे। रसोई में उनको खाना बनाते देखकर मेरे बालमन को तो यही लग रहा था कि मम्मी सिर्फ रात के खाने की तैयारी में जुटी हैं, लेकिन वास्तव में उनके भीतर एक अलग ही उत्सुकता हिलोरे ले रही थी। रसोई से प्रदीप अंकल के पसंदीदा पकवानों और मसालों की खुशबू आ रही थी। मम्मी ने न सिर्फ उनकी पसंद के विशेष खाने की तैयारी की थी, बल्कि उनके लिए कुछ खास मीठा भी बनाया था, जिसका वे हमेशा पूरा ख्याल रखती थीं। वे बार-बार रसोई से निकलकर बैठक के बड़े शीशे के सामने जातीं, अपनी कपड़ों को थको ठीक करतीं, अपने बालों को संवारतीं और फिर एक गहरी साँस लेकर वापस काम में लग जातीं। दोपहर ढलकर शाम होने को आई, तो मम्मी ने एक बार फिर उनके कमरे का चक्कर लगाया, वहाँ की चादर को बिल्कुल ठीक किया और खिड़की के पर्दों को एक खास कोण पर सेट कर दिया।
आखिरकार, शाम के करीब सात बजे जब बाहर थोड़ा अंधेरा घिरने लगा, तो दुकान के सामने एक जानी-पहचानी मोटरसाइकिल आकर रुकी। प्रदीप अंकल आ चुके थे। चूँकि वे लगभग रोज़ ही हमारे घर आते थे, इसलिए उनके आने में कोई औपचारिकता नहीं थी। उनके आते ही मम्मी के चेहरे पर जो चमक आई, वह देखने लायक थी। वे तुरंत रसोई से बाहर आईं। अंकल ने हेलमेट उतारा और बहुत ही शालीनता से मम्मी से कहा—'नमस्ते बहन जी, ' मम्मी ने बहुत ही सलीके से मुस्कुराते हुए जवाब दिया—'नमस्ते भाई साहब, आइए अंदर बैठिए, मैं आपके लिए चाय लाती हूँ।'
सब लोगों के सामने उनका एक-दूसरे को 'बहन जी' और 'भाईसाहब' कहना इतना स्वाभाविक था कि कोई भी उनके बीच के असली रिश्ते का अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। लेकिन जैसे ही अंकल दुकान के अंदर आये, मम्मी ने बिल्कुल मेरे सामने खड़े होकर ही अंकल की तरफ देखा और अपनी आँखें हल्की सी मटकाकर बहुत ही कामुक अंदाज़ में मुस्कुरा दीं। वह इशारा सीधे मेरी आँखों के सामने हुआ था, लेकिन मेरी नासमझी और भोलेपन का आलम यह था कि मैं उसे देखकर भी कुछ समझ नहीं पाया। मुझे लगा कि यह तो बस रोज़ की तरह एक सामान्य बातचीत और स्वागत है। अंकल मम्मी के उस बेझिझक इशारे का मतलब समझकर अपनी धीमी मुस्कान दबाते हुए आकर मेरे पास दुकान पर बैठ गए। शायद इसलिए कि यदि उसी समय घर के अंदर चले जाते तो लोग गलत मतलब निकाल लेते,मैं इस बात से बेहद खुश था कि आज अंकल आ गए हैं और रात को मुझे फिर से उनसे मज़ेदार कहानियाँ और जोक्स सुनने को मिलेंगे, लेकिन मुझे यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आज की रात मेरे और उनके बीच के इस पूरे समीकरण को हमेशा के लिए बदलने वाली है।"
हम दोनों आपस में बैठकर बातें कर ही रहे थे कि थोड़ी देर बाद मम्मी अंदर मंदिर में आरती-पूजा निपटा कर बाहर दुकान पर आईं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। उन्होंने बहुत ही कोमल मुस्कान के साथ हम दोनों को दुकान पर ही भोग का प्रसाद दिया। उस समय भी मम्मी और अंकल की नजरें एक पल के लिए आपस में मिलीं, लेकिन मैं प्रसाद खाने में व्यस्त था।
देखते-देखते रात के करीब आठ बज गए। अब दुकान पर ग्राहकों का आना बिल्कुल बंद हो चुका था और बाहर गली में धीरे-धीरे गहरा सन्नाटा पसरने लगा था। अंकल की बाइक को हमने पहले ही एहतियातन घर के अंदर सुरक्षित खड़ा कर दिया था। इसके बाद मैंने और अंकल ने मिलकर दुकान के शटर गिराए, ताला लगाया और हम सब घर के अंदर चले गए।
रसोई में मम्मी ने पहले ही अंकल की पसंद का सारा खाना और मीठा तैयार रखा था। जब हम सब रात के भोजन के लिए बैठे, तो खाने के दौरान मम्मी और अंकल के बीच लगातार आँखों ही आँखों में कुछ रहस्यमयी इशारे हो रहे थे। मम्मी कभी मुस्कुराकर अंकल को देखतीं, तो कभी अंकल अपनी नजरों से कोई गुप्त संदेश उन तक पहुँचाते। मेरा बालमन उस समय भी इतना भोला था कि मैं उनके इस मूक संवाद का असली मतलब ज़रा भी नहीं समझ पाया; मुझे लगा कि वे बस सामान्य रूप से एक-दूसरे के प्रति आदर दिखा रहे हैं।
खाना पीना खत्म होने के बाद, मैं और मम्मी और प्रदीप अंकल एक ही कमरे में सोने के लिए आए। कमरे में एक डबल बेड था, जिस पर मैं और मम्मी साथ सो गए। उसी बेड के पास लगी एक चारपाई पर प्रदीप अंकल सो गए। चारपाई पर लेटने के बाद अंकल ने हर बार की तरह अपनी पुरानी राजा-रानी वाली कहानी सुनाना शुरू किया। अंकल की आवाज़ का वह धीमा प्रवाह और दिनभर की थकान का असर ऐसा हुआ कि कहानी सुनते-सुनते मम्मी थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गईं। मम्मी के सोने के बाद भी अंकल कुछ देर तक कहानी सुनाते रहे
कुछ देर बाद अंकल ने कहानी खत्म की और मुझसे बेहद धीमी आवाज़ में कहा—'चलो रवि बेटा, कहानी अब समाप्त हो गई है। अब तुम भी चुपचाप आँखें बंद करके सो जाओ और लाइट बंद कर दी।' उस समय रात के ठीक 10 बज चुके थे। पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया, लेकिन मेरी आँखों में आज नींद का एक कतरा भी नहीं था; मेरा दिल किसी अनजानी उत्सुकता से तेज़ी से धड़क रहा था।
मैं बेड पर बिल्कुल शांत और सीधा लेटा रहा, मानो गहरी नींद में हूँ, लेकिन मेरी पूरी चेतना अंकल की हर एक हरकत पर टिकी थी। समय धीरे-धीरे सरकता रहा। जब रात के करीब 10:45बजे, अंधेरे में मुझे प्रदीप अंकल के हिलने-डुलने की आवाज़ आई। उन्होंने बहुत ही धीरे से, बिना कोई आवाज़ किए बेड पर करवट बदली और सोती हुई मम्मी को हौले से सहलाते हुए उठाने की कोशिश करने लगे..."
अंधेरे में मुझे बार-बार एक हाथ अपने शरीर के पास टच होता हुआ महसूस हो रहा था। । चूँकि मैं उनके बीच पहले भी कुछ अजीब शरारतें देख चुका था, इसलिए मुझे अंदाज़ा तो था, लेकिन उस उम्र में मैं इस रहस्य को समझ नहीं पाता था। बस मन में एक गहरी उत्सुकता होती थी कि वे दोनों आपस में ऐसा क्यों करते हैं।"
ना जाने किस उत्सुकता में मैंने अपना एक हाथ मम्मी के ऊपर रख दिया। तभी मुझे अंधेरे में ऐसा महसूस हुआ जैसे हमारे पलंग के पास कोई साया खड़ा है और मम्मी को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहा है। उसी पल मुझे एक बहुत ही धीमी और फुसफुसाती हुई आवाज़ सुनाई दी—'आ जा अब...'। लेकिन मम्मी दिनभर घर और दुकान के काम के कारण बुरी तरह थकी हुई थीं, इसलिए वे बहुत गहरी नींद में सो रही थीं।
तभी अंधेरे में प्रदीप अंकल ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और शायद मम्मी का हाथ समझकर, उन्होंने मेरी बाज़ू को अपनी तरफ खींच लिया। इस अचानक हुई हलचल की वजह से मम्मी की नींद टूट गई और वे उठकर बोलीं—'क्या हुआ?' अंकल ने बहुत धीरे से कहा—'होना क्या है यार, आज इतना सुनहरा मौका मिला है और तुम हो कि इतनी गहरी नींद में सो रही हो।'
यह सुनकर मम्मी बेड पर उठकर बैठ गईं और बोलीं—'एक मिनट, लाइट जलाओ भाई साहब।' जी हाँ, मम्मी अंकल को 'भाई साहब' ही बुलाती थीं और अंकल भी मम्मी को 'बहनजी' ही कहते थे। जब मम्मी बेड से उठने लगीं, तो मैंने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं ताकि उन्हें लगे कि मैं गहरी नींद में सो रहा हूँ। मम्मी ने मुझे आवाज़ दी—'रवि बेटा...'। उनके दो-तीन बार पुकारने के बाद मैंने आँखें खोलीं और बोला—'क्या है मम्मी?' मम्मी बोलीं—'चलो, उठो और बाथरूम कर लो।'
वैसे तो मम्मी रोज़ाना मुझे रात को 12 या 1 बजे उठाकर बाथरूम करवाती थीं, लेकिन जब मैंने सामने दीवार घड़ी पर देखा, तो अभी सिर्फ 11 ही बज रहे थे। खैर, मैंने उस समय ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और बाथरूम करके वापस आकर लेट गया—यानी दोबारा सोने का नाटक करने लगा। मम्मी किचन में गईं और जो थोड़ा-बहुत काम बाकी था, उसे निपटाकर वापस कमरे में आईं। उन्होंने मुझे एक-दो बार आवाज़ देकर देखा और बुदबुदाईं—'सो गया दोबारा।' इसके बाद उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी। मैंने सोचा कि मम्मी अब वापस आकर मेरे पास बेड पर सो जाएँगी, लेकिन तभी जो हुआ उसने मुझे चौंका दिया... मम्मी बहुत धीरे से सीधे जाकर चारपाई पर अंकल के साथ लेट गईं।"
आखिरकार, शाम के करीब सात बजे जब बाहर थोड़ा अंधेरा घिरने लगा, तो दुकान के सामने एक जानी-पहचानी मोटरसाइकिल आकर रुकी। प्रदीप अंकल आ चुके थे। चूँकि वे लगभग रोज़ ही हमारे घर आते थे, इसलिए उनके आने में कोई औपचारिकता नहीं थी। उनके आते ही मम्मी के चेहरे पर जो चमक आई, वह देखने लायक थी। वे तुरंत रसोई से बाहर आईं। अंकल ने हेलमेट उतारा और बहुत ही शालीनता से मम्मी से कहा—'नमस्ते बहन जी, ' मम्मी ने बहुत ही सलीके से मुस्कुराते हुए जवाब दिया—'नमस्ते भाई साहब, आइए अंदर बैठिए, मैं आपके लिए चाय लाती हूँ।'
सब लोगों के सामने उनका एक-दूसरे को 'बहन जी' और 'भाईसाहब' कहना इतना स्वाभाविक था कि कोई भी उनके बीच के असली रिश्ते का अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। लेकिन जैसे ही अंकल दुकान के अंदर आये, मम्मी ने बिल्कुल मेरे सामने खड़े होकर ही अंकल की तरफ देखा और अपनी आँखें हल्की सी मटकाकर बहुत ही कामुक अंदाज़ में मुस्कुरा दीं। वह इशारा सीधे मेरी आँखों के सामने हुआ था, लेकिन मेरी नासमझी और भोलेपन का आलम यह था कि मैं उसे देखकर भी कुछ समझ नहीं पाया। मुझे लगा कि यह तो बस रोज़ की तरह एक सामान्य बातचीत और स्वागत है। अंकल मम्मी के उस बेझिझक इशारे का मतलब समझकर अपनी धीमी मुस्कान दबाते हुए आकर मेरे पास दुकान पर बैठ गए। शायद इसलिए कि यदि उसी समय घर के अंदर चले जाते तो लोग गलत मतलब निकाल लेते,मैं इस बात से बेहद खुश था कि आज अंकल आ गए हैं और रात को मुझे फिर से उनसे मज़ेदार कहानियाँ और जोक्स सुनने को मिलेंगे, लेकिन मुझे यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आज की रात मेरे और उनके बीच के इस पूरे समीकरण को हमेशा के लिए बदलने वाली है।"
हम दोनों आपस में बैठकर बातें कर ही रहे थे कि थोड़ी देर बाद मम्मी अंदर मंदिर में आरती-पूजा निपटा कर बाहर दुकान पर आईं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। उन्होंने बहुत ही कोमल मुस्कान के साथ हम दोनों को दुकान पर ही भोग का प्रसाद दिया। उस समय भी मम्मी और अंकल की नजरें एक पल के लिए आपस में मिलीं, लेकिन मैं प्रसाद खाने में व्यस्त था।
देखते-देखते रात के करीब आठ बज गए। अब दुकान पर ग्राहकों का आना बिल्कुल बंद हो चुका था और बाहर गली में धीरे-धीरे गहरा सन्नाटा पसरने लगा था। अंकल की बाइक को हमने पहले ही एहतियातन घर के अंदर सुरक्षित खड़ा कर दिया था। इसके बाद मैंने और अंकल ने मिलकर दुकान के शटर गिराए, ताला लगाया और हम सब घर के अंदर चले गए।
रसोई में मम्मी ने पहले ही अंकल की पसंद का सारा खाना और मीठा तैयार रखा था। जब हम सब रात के भोजन के लिए बैठे, तो खाने के दौरान मम्मी और अंकल के बीच लगातार आँखों ही आँखों में कुछ रहस्यमयी इशारे हो रहे थे। मम्मी कभी मुस्कुराकर अंकल को देखतीं, तो कभी अंकल अपनी नजरों से कोई गुप्त संदेश उन तक पहुँचाते। मेरा बालमन उस समय भी इतना भोला था कि मैं उनके इस मूक संवाद का असली मतलब ज़रा भी नहीं समझ पाया; मुझे लगा कि वे बस सामान्य रूप से एक-दूसरे के प्रति आदर दिखा रहे हैं।
खाना पीना खत्म होने के बाद, मैं और मम्मी और प्रदीप अंकल एक ही कमरे में सोने के लिए आए। कमरे में एक डबल बेड था, जिस पर मैं और मम्मी साथ सो गए। उसी बेड के पास लगी एक चारपाई पर प्रदीप अंकल सो गए। चारपाई पर लेटने के बाद अंकल ने हर बार की तरह अपनी पुरानी राजा-रानी वाली कहानी सुनाना शुरू किया। अंकल की आवाज़ का वह धीमा प्रवाह और दिनभर की थकान का असर ऐसा हुआ कि कहानी सुनते-सुनते मम्मी थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गईं। मम्मी के सोने के बाद भी अंकल कुछ देर तक कहानी सुनाते रहे
कुछ देर बाद अंकल ने कहानी खत्म की और मुझसे बेहद धीमी आवाज़ में कहा—'चलो रवि बेटा, कहानी अब समाप्त हो गई है। अब तुम भी चुपचाप आँखें बंद करके सो जाओ और लाइट बंद कर दी।' उस समय रात के ठीक 10 बज चुके थे। पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया, लेकिन मेरी आँखों में आज नींद का एक कतरा भी नहीं था; मेरा दिल किसी अनजानी उत्सुकता से तेज़ी से धड़क रहा था।
मैं बेड पर बिल्कुल शांत और सीधा लेटा रहा, मानो गहरी नींद में हूँ, लेकिन मेरी पूरी चेतना अंकल की हर एक हरकत पर टिकी थी। समय धीरे-धीरे सरकता रहा। जब रात के करीब 10:45बजे, अंधेरे में मुझे प्रदीप अंकल के हिलने-डुलने की आवाज़ आई। उन्होंने बहुत ही धीरे से, बिना कोई आवाज़ किए बेड पर करवट बदली और सोती हुई मम्मी को हौले से सहलाते हुए उठाने की कोशिश करने लगे..."
अंधेरे में मुझे बार-बार एक हाथ अपने शरीर के पास टच होता हुआ महसूस हो रहा था। । चूँकि मैं उनके बीच पहले भी कुछ अजीब शरारतें देख चुका था, इसलिए मुझे अंदाज़ा तो था, लेकिन उस उम्र में मैं इस रहस्य को समझ नहीं पाता था। बस मन में एक गहरी उत्सुकता होती थी कि वे दोनों आपस में ऐसा क्यों करते हैं।"
ना जाने किस उत्सुकता में मैंने अपना एक हाथ मम्मी के ऊपर रख दिया। तभी मुझे अंधेरे में ऐसा महसूस हुआ जैसे हमारे पलंग के पास कोई साया खड़ा है और मम्मी को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहा है। उसी पल मुझे एक बहुत ही धीमी और फुसफुसाती हुई आवाज़ सुनाई दी—'आ जा अब...'। लेकिन मम्मी दिनभर घर और दुकान के काम के कारण बुरी तरह थकी हुई थीं, इसलिए वे बहुत गहरी नींद में सो रही थीं।
तभी अंधेरे में प्रदीप अंकल ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और शायद मम्मी का हाथ समझकर, उन्होंने मेरी बाज़ू को अपनी तरफ खींच लिया। इस अचानक हुई हलचल की वजह से मम्मी की नींद टूट गई और वे उठकर बोलीं—'क्या हुआ?' अंकल ने बहुत धीरे से कहा—'होना क्या है यार, आज इतना सुनहरा मौका मिला है और तुम हो कि इतनी गहरी नींद में सो रही हो।'
यह सुनकर मम्मी बेड पर उठकर बैठ गईं और बोलीं—'एक मिनट, लाइट जलाओ भाई साहब।' जी हाँ, मम्मी अंकल को 'भाई साहब' ही बुलाती थीं और अंकल भी मम्मी को 'बहनजी' ही कहते थे। जब मम्मी बेड से उठने लगीं, तो मैंने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं ताकि उन्हें लगे कि मैं गहरी नींद में सो रहा हूँ। मम्मी ने मुझे आवाज़ दी—'रवि बेटा...'। उनके दो-तीन बार पुकारने के बाद मैंने आँखें खोलीं और बोला—'क्या है मम्मी?' मम्मी बोलीं—'चलो, उठो और बाथरूम कर लो।'
वैसे तो मम्मी रोज़ाना मुझे रात को 12 या 1 बजे उठाकर बाथरूम करवाती थीं, लेकिन जब मैंने सामने दीवार घड़ी पर देखा, तो अभी सिर्फ 11 ही बज रहे थे। खैर, मैंने उस समय ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और बाथरूम करके वापस आकर लेट गया—यानी दोबारा सोने का नाटक करने लगा। मम्मी किचन में गईं और जो थोड़ा-बहुत काम बाकी था, उसे निपटाकर वापस कमरे में आईं। उन्होंने मुझे एक-दो बार आवाज़ देकर देखा और बुदबुदाईं—'सो गया दोबारा।' इसके बाद उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी। मैंने सोचा कि मम्मी अब वापस आकर मेरे पास बेड पर सो जाएँगी, लेकिन तभी जो हुआ उसने मुझे चौंका दिया... मम्मी बहुत धीरे से सीधे जाकर चारपाई पर अंकल के साथ लेट गईं।"


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