10-08-2026, 01:11 PM
(This post was last modified: 22-08-2026, 04:56 AM by Motalund14. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
दोस्तों, मैं पंजाब के एक छोटे से गाँव का रहने वाला हूँ। मेरा नाम रवि है और मेरी उम्र 22 साल है। आज जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वह पूरी तरह से सच्ची घटनाओं पर आधारित है। आशा है कि आपको यह पसंद आएगी। आप सभी से अनुरोध है कि कहानी पढ़ने के बाद कमेंट करके अपनी राय ज़रूर व्यक्त करते रहें।"
दोस्तों, जैसा कि मैंने बताया मेरा नाम रवि है, घर से थोड़ी ही दूरी पर मेरा अपना एक जनरल स्टोर है, जिसे मैं संभालता हूँ।
मेरे परिवार में मेरे पापा श्री वेद प्रकाश जी हैं, जिनकी उम्र लगभग 45 वर्ष है और वे इस समय कैनेडा की एक प्राइवेट कंपनी में सामान्य कर्मचारी (normal employee) के रूप में काम कर रहे हैं। मेरी माँ का नाम अंजली है, जिनकी उम्र 44 वर्ष है और वे एक गृहणी (housewife) हैं।"
हम कुल चार भाई-बहन हैं। मेरी बड़ी बहन नेहा, जो 26 साल की हैं, उनकी शादी लगभग दो साल पहले हो चुकी है। उनसे छोटी बहन अंकिता है, जिनकी उम्र 25 साल है और कुछ ही दिनों पहले उनकी भी शादी संपन्न हुई है। हमारा सबसे छोटा भाई, जो 18 वर्ष का है, इस समय पढ़ाई के सिलसिले में विदेश (videsh) में है। वैसे, उसका बचपन और ज़्यादातर समय हमारे मामा जी के घर पर ही बीता है, क्योंकि मामा जी की अपनी कोई संतान नहीं थी और उन्होंने उसे बहुत लाड-प्यार से पाला।"
पापा के एक बेहद करीबी दोस्त थे—प्रदीप अंकल। उनकी उम्र पापा से करीब तीन चार साल कम थी। प्रदीप अंकल हमारी दुकान पर काफी आते-जाते रहते थे और वे इसी इलाके में नौकरी करते थे। पापा के साथ उनकी गहरी दोस्ती की वजह से, पापा ने उन्हें हमारे घर में ही रहने के लिए एक कमरा दे रखा था।
बाद में जब पापा कैनेडा चले गए, तो घर में प्रदीप अंकल और मेरे छोटे भाई को मिलाकर कुल 6 सदस्य रहते थे—यानी मम्मी, मेरी दोनों बहनें, मैं, मेरा छोटा भाई और प्रदीप अंकल। जब कभी छोटा भाई मामा के घर चला जाता, तो पीछे घर में हम 5 लोग ही रह जाते थे।"
यह बात साल 2018 की है।उन दिनों हमारे घर के ही एक बाहरी कोने में हमारी जनरल स्टोर की दुकान थी। उस दुकान की बनावट कुछ ऐसी थी कि उसका एक बड़ा दरवाज़ा बाहर गली की तरफ खुलता था, जहाँ से ग्राहक आते थे। वहीं दुकान के अंदर एक छोटा दरवाज़ा भी था, जिसे हम सब घर में 'खिड़की' कहते थे, और वह खिड़की सीधे हमारे घर के आंगन की ओर खुलती थी।
पहले तो उस दुकान का पूरा काम मेरे पापा ही संभालते थे, लेकिन जब से वे नोएडा में नौकरी पर लगे थे, तब से पापा के जाने के बाद हम सभी परिवार वाले मिलजुल कर उस दुकान को संभालने लगे थे। दुकान की इस बनावट की वजह से घर और दुकान के बीच आना-जाना बहुत आसान रहता था।"
मैंने बचपन से ही घर में कई छोटी-बड़ी अजीब घटनाएँ देखी थीं, लेकिन उस दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे मन की उत्सुकता को और बढ़ा दिया। उस दिन मेरी दोनों बहनें किसी रिश्तेदारी में बाहर गई हुई थीं। घर पर सिर्फ मैं और मम्मी ही थे
सुबह से ही हमारी मम्मी के चेहरे पर एक अजीब सी कशमकश, बेचैनी और उत्सुकता साफ़ दिखाई दे रही थी। मेरे बालमन को यह बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मम्मी किस बात को लेकर इतनी उलझन में हैं और रह-रह कर दरवाज़े की तरफ क्यों देख रही हैं। लेकिन दोपहर के समय जैसे ही प्रदीप अंकल की तरफ से एक आदमी हमारी दुकान पर कुछ सामान लेने आया, मम्मी के चेहरे पर एक राहत की लहर दौड़ गई और उनकी आँखों में एक अनोखी चमक आ गई।
मम्मी ने उसे तुरंत सामान देकर विदा नहीं किया, बल्कि जानबूझकर बातों में उलझाकर और सामान निकालने के बहाने उसे तब तक रोके रखा, जब तक कि दुकान पर खड़े बाकी के कस्टमर सामान लेकर चले नहीं गए। जैसे ही दुकान पूरी तरह खाली हुई और मम्मी ने उस आदमी से कहा—'सुनो जग्गू, प्रदीप भाई साहब को बोलना कि आज घर पर कोई नहीं है, वे अपना काम जल्दी निपटा कर आज शाम को जल्दी आ जाएँ।'
मम्मी ने यह बात सीधे मेरे सामने ही बोली थी। उस समय मेरी नासमझी का आलम यह था कि मैं यही समझ रहा था कि आज घर में कोई नहीं है और मम्मी अकेलेपन या किसी डर की वजह से अंकल को जल्दी बुला रही हैं ताकि घर में कोई पुरुष मौजूद रहे। वैसे तो वे रोजाना ही हमारे घर आ जाते थे, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि वे बाहर ही किसी दोस्त के यहाँ रुक जाते थे। इसलिए मम्मी ने वह मैसेज विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए भिजवाया था कि आज उनका घर आना बिल्कुल पक्का हो जाए। मैसेज देने के बाद मम्मी अचानक पूरी तरह आश्वस्त होकर खुश हो गईं, और उनका यह अचानक बदलता रूप मेरे बालमन के लिए एक ऐसी पहेली था जिसे मैं सुलझा नहीं पा रहा था।
सच कहूँ तो, अंकल के आने की बात सुनकर कहीं न कहीं मैं भी अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रहा था। मेरे खुश होने का कारण था कि वे जब भी घर आते थे, तो मेरे पास बैठकर बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते थे, मुझे मज़ेदार जोक्स सुनाते थे और कई तरह की कहानियाँ सुनाकर मेरा मनोरंजन करते थे। उनके आने से घर का माहौल खुशनुमा हो जाता था, इसलिए वह एक उतावलापन और खुशी मेरे चेहरे पर भी साफ दिख रही थी।
लेकिन मुझे क्या पता था कि उस सीधे से संदेश के पीछे असली खेल कुछ और ही था। जब मम्मी उस आदमी से बात कर रही थीं, वे दोनों चुपके से एक-दूसरे को देख रहे थे। मम्मी ने अपनी आँखें हल्की सी झपकाईं और उस आदमी ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। वे दोनों मेरे सामने ही आँखों ही आँखों में और इशारों में कुछ ऐसी गुप्त बातें कर रहे थे, जिसे मैं चाहकर भी नहीं समझ पा रहा था। शायद वह आदमी मम्मी के उस संदेश को बहुत अच्छी तरह समझ गया था, जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई। वह रहस्यमयी अंदाज़ में मुस्कुराया और सामान लेकर चला गया, जबकि मैं अपनी ही दुनिया में खुश था कि आज शाम को अंकल जल्दी आने वाले हैं और मुझे फिर से उनकी कहानियाँ सुनने को मिलेंगी
दोस्तों, जैसा कि मैंने बताया मेरा नाम रवि है, घर से थोड़ी ही दूरी पर मेरा अपना एक जनरल स्टोर है, जिसे मैं संभालता हूँ।
मेरे परिवार में मेरे पापा श्री वेद प्रकाश जी हैं, जिनकी उम्र लगभग 45 वर्ष है और वे इस समय कैनेडा की एक प्राइवेट कंपनी में सामान्य कर्मचारी (normal employee) के रूप में काम कर रहे हैं। मेरी माँ का नाम अंजली है, जिनकी उम्र 44 वर्ष है और वे एक गृहणी (housewife) हैं।"
हम कुल चार भाई-बहन हैं। मेरी बड़ी बहन नेहा, जो 26 साल की हैं, उनकी शादी लगभग दो साल पहले हो चुकी है। उनसे छोटी बहन अंकिता है, जिनकी उम्र 25 साल है और कुछ ही दिनों पहले उनकी भी शादी संपन्न हुई है। हमारा सबसे छोटा भाई, जो 18 वर्ष का है, इस समय पढ़ाई के सिलसिले में विदेश (videsh) में है। वैसे, उसका बचपन और ज़्यादातर समय हमारे मामा जी के घर पर ही बीता है, क्योंकि मामा जी की अपनी कोई संतान नहीं थी और उन्होंने उसे बहुत लाड-प्यार से पाला।"
पापा के एक बेहद करीबी दोस्त थे—प्रदीप अंकल। उनकी उम्र पापा से करीब तीन चार साल कम थी। प्रदीप अंकल हमारी दुकान पर काफी आते-जाते रहते थे और वे इसी इलाके में नौकरी करते थे। पापा के साथ उनकी गहरी दोस्ती की वजह से, पापा ने उन्हें हमारे घर में ही रहने के लिए एक कमरा दे रखा था।
बाद में जब पापा कैनेडा चले गए, तो घर में प्रदीप अंकल और मेरे छोटे भाई को मिलाकर कुल 6 सदस्य रहते थे—यानी मम्मी, मेरी दोनों बहनें, मैं, मेरा छोटा भाई और प्रदीप अंकल। जब कभी छोटा भाई मामा के घर चला जाता, तो पीछे घर में हम 5 लोग ही रह जाते थे।"
यह बात साल 2018 की है।उन दिनों हमारे घर के ही एक बाहरी कोने में हमारी जनरल स्टोर की दुकान थी। उस दुकान की बनावट कुछ ऐसी थी कि उसका एक बड़ा दरवाज़ा बाहर गली की तरफ खुलता था, जहाँ से ग्राहक आते थे। वहीं दुकान के अंदर एक छोटा दरवाज़ा भी था, जिसे हम सब घर में 'खिड़की' कहते थे, और वह खिड़की सीधे हमारे घर के आंगन की ओर खुलती थी।
पहले तो उस दुकान का पूरा काम मेरे पापा ही संभालते थे, लेकिन जब से वे नोएडा में नौकरी पर लगे थे, तब से पापा के जाने के बाद हम सभी परिवार वाले मिलजुल कर उस दुकान को संभालने लगे थे। दुकान की इस बनावट की वजह से घर और दुकान के बीच आना-जाना बहुत आसान रहता था।"
मैंने बचपन से ही घर में कई छोटी-बड़ी अजीब घटनाएँ देखी थीं, लेकिन उस दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे मन की उत्सुकता को और बढ़ा दिया। उस दिन मेरी दोनों बहनें किसी रिश्तेदारी में बाहर गई हुई थीं। घर पर सिर्फ मैं और मम्मी ही थे
सुबह से ही हमारी मम्मी के चेहरे पर एक अजीब सी कशमकश, बेचैनी और उत्सुकता साफ़ दिखाई दे रही थी। मेरे बालमन को यह बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मम्मी किस बात को लेकर इतनी उलझन में हैं और रह-रह कर दरवाज़े की तरफ क्यों देख रही हैं। लेकिन दोपहर के समय जैसे ही प्रदीप अंकल की तरफ से एक आदमी हमारी दुकान पर कुछ सामान लेने आया, मम्मी के चेहरे पर एक राहत की लहर दौड़ गई और उनकी आँखों में एक अनोखी चमक आ गई।
मम्मी ने उसे तुरंत सामान देकर विदा नहीं किया, बल्कि जानबूझकर बातों में उलझाकर और सामान निकालने के बहाने उसे तब तक रोके रखा, जब तक कि दुकान पर खड़े बाकी के कस्टमर सामान लेकर चले नहीं गए। जैसे ही दुकान पूरी तरह खाली हुई और मम्मी ने उस आदमी से कहा—'सुनो जग्गू, प्रदीप भाई साहब को बोलना कि आज घर पर कोई नहीं है, वे अपना काम जल्दी निपटा कर आज शाम को जल्दी आ जाएँ।'
मम्मी ने यह बात सीधे मेरे सामने ही बोली थी। उस समय मेरी नासमझी का आलम यह था कि मैं यही समझ रहा था कि आज घर में कोई नहीं है और मम्मी अकेलेपन या किसी डर की वजह से अंकल को जल्दी बुला रही हैं ताकि घर में कोई पुरुष मौजूद रहे। वैसे तो वे रोजाना ही हमारे घर आ जाते थे, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि वे बाहर ही किसी दोस्त के यहाँ रुक जाते थे। इसलिए मम्मी ने वह मैसेज विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए भिजवाया था कि आज उनका घर आना बिल्कुल पक्का हो जाए। मैसेज देने के बाद मम्मी अचानक पूरी तरह आश्वस्त होकर खुश हो गईं, और उनका यह अचानक बदलता रूप मेरे बालमन के लिए एक ऐसी पहेली था जिसे मैं सुलझा नहीं पा रहा था।
सच कहूँ तो, अंकल के आने की बात सुनकर कहीं न कहीं मैं भी अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रहा था। मेरे खुश होने का कारण था कि वे जब भी घर आते थे, तो मेरे पास बैठकर बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते थे, मुझे मज़ेदार जोक्स सुनाते थे और कई तरह की कहानियाँ सुनाकर मेरा मनोरंजन करते थे। उनके आने से घर का माहौल खुशनुमा हो जाता था, इसलिए वह एक उतावलापन और खुशी मेरे चेहरे पर भी साफ दिख रही थी।
लेकिन मुझे क्या पता था कि उस सीधे से संदेश के पीछे असली खेल कुछ और ही था। जब मम्मी उस आदमी से बात कर रही थीं, वे दोनों चुपके से एक-दूसरे को देख रहे थे। मम्मी ने अपनी आँखें हल्की सी झपकाईं और उस आदमी ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। वे दोनों मेरे सामने ही आँखों ही आँखों में और इशारों में कुछ ऐसी गुप्त बातें कर रहे थे, जिसे मैं चाहकर भी नहीं समझ पा रहा था। शायद वह आदमी मम्मी के उस संदेश को बहुत अच्छी तरह समझ गया था, जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई। वह रहस्यमयी अंदाज़ में मुस्कुराया और सामान लेकर चला गया, जबकि मैं अपनी ही दुनिया में खुश था कि आज शाम को अंकल जल्दी आने वाले हैं और मुझे फिर से उनकी कहानियाँ सुनने को मिलेंगी


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