Thread Rating:
  • 16 Vote(s) - 2 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल...
#98
अब आगे..

ऐसे ही बुदबदाते हुए रिशा अपनी गांड जोर जोर से राजू के लंड पर पटक रही थी और इसी बीच चुत फिर से फड़क उठी और चरमसुख के उन्माद में वो फिर झड़ गई। इस बार चूत से किसी पिचकारी की तरह रस फूट पड़ा। रस की फ़ुहार ने राजू की जाँघों को और गीला करते हुए उसके लिंग और अंडकोष को भी गीला कर दिया। लिंग पर लगे ताज़ा ताज़ा योनि रस ने लंड और गांड की चिकनाहट बढ़ा दी। लंड और चिकना होकर सटासट गांड में दाख़िल होने लगा फिर से। चूत अभी भी पिचकारी पे पिचकारी दे रही थी। इतना सब रिशा से बर्दाश्त ना हुआ और उसने अलिंगन छोड़ कर दोनों हाथों से अपनी चूत थाम ली। ज़ालिम लौड़े के वारों से इतना झड़ कर चूत भी फूल गयी थी। रिशा ने अंजुलियों में अपना रिसता हुआ सोमरस भर लिया और राजू के होठों के पास ले आई। हवस के नशे में राजू भी जीभ निकल कर उसकी चूत का पानी लपलपाने लगा मानो जैसी बिल्ली!



उसे ऐसे देख रिशा हौले से मस्काई और सारा माल उसके बदन पर फेला दिया। पसीने के साथ योनि रस के मिलन से अजीब खुशबू उठी। सांसों में मादकता का तूफान भर आया। रिशा ने उसका एक जोरदार चुम्बन लेते हुए अपने बदन से चिपका लिया। फिर एक बार कड़क निप्पल और गुदाज बदन का गर्म स्पर्श होते ही राजू ने राहत की सांस ली। फ़िर रिशा बोली, "अब अपना रसपान भी तो कराओ ना देवर रज्जा!!, अब और देर ना करो, ये प्यासी भाभी अब भूखी बन चुकी है" ये सुनते ही राजू के तन बदन में कोई चिंगारी दौड़ गई। रिशा के मांसल नितंबों को मज़बूती से जकड़ कर वो घुटनो पे आ गया। रिशा का पांव उसकी कमर पर कस गया। उसने उसके बगीचे में अपनी कोमल बाहें पीरो दी। रिशा की गांड को थामे राजू ने निशाना साधा कर कमर का एक दमदार झटका लगाया। फौलादी लोहा गांड को चीरता हुआ जड़ तक धंस गया। जोरदार हमले से रिशा चिल्ला उठी, "आआआआअह्हह्हह!!! ऊह्ह्हमाआआ!!!"। लंड काफ़ी देर तक छेद में फंसे रहने से गांड फैल गई थी तो कोई दर्द तो ना हुआ लेकिन बदन में इस झटके से करंट दौड़ गया। रिशा को बड़ा मजा आया. उसने भी कमर पर अपनी पैर कस दिए जिससे राजू के बदन पर वो किसी नागिन जैसी लिपट गई।

 

"हाययययी.... क्या दमदार मर्दाना वार किया है देवर रज्जा!!! चलो अब दिखाओ कितना दम है तुम्हारी मर्दानगी में.. मारो अपनी प्यासी भाभी की गांड'' ललकारते हुए रिशा बोली और अपनी जीभ राजू के मुंह में घुसा दी। राजू ने चुनौती स्वीकार कर ली. अपना कूल्हा पीछे खींच कर फिर से लिंग बाहर तक खींच और फिर जड़ तक गांड में पेल दिया। इस बार शॉट इतना तेज़ पड़ा कि उसके गोटे नितंबों पर टकरा गए। "आआहाहाहाहाहा!!!" रिशा मारे ख़ुशी के झूम उठी. राजू ने अच्छा जवाब दिया. अगली टक्कर पहले से भी जबरदस्त थी। राजू ने बिफरे सांड जैसे गांड का मर्दन शुरू कर दिया था। उसकी उंगलियां नितंबों के मुलायम गद्देदार मांस में ढांसी जा रही थी। दोनों एक दूसरे की जीभ से जीभ लड़ा रहे थे। पसीने में लथपथ चिकने बदन एक दूसरे से लिपटे उबाल मार रहे थे। चुदाई का घमासान फिर से शुरू हो गया. राजू एक के बाद एक दम उखाड़ देने वाले झटके लगाता और रिशा उसका लंड अपनी गांड में ऐसे ले लेती जैसे पूरा खा जाएगी।

इतनी जबरदस्त चुदाई से उसकी योनि राजू के पेड़ू पे चपचप रिस रही थी। झड़ने की इंतेहां हो चुकी थी। उसकी पनियाई चुत से बस रस की एक धार टपक रही थी। चिपचिपा रस फिसल कर लिंग पे फैल रहा था। लिंग की चिकनाई बरकरार रहने से राजू का मुसल बहुत आराम से और गहरी गांड में जा रहा था। नितंब और मजबूत जांघों की टक्कर से कमरे में फिर से थप थप का मधुर संगीत बजने लगा। उस बीच दोनों की आहें और एक दूसरे के लिए अश्लील बोल भी समा बाँध रहे थे। थप थपा ओ!!! "आह!! और जोर से!!" रिशा चीखी.

"ये लो भाभी" तगड़ा वार करते राजू बोला।


 

"फिर से" उसके होंठ काटते हुए रिशा बोली।

"हन्ह्ह..लो मेरी प्यासी भाभी.. खा जा अपने आशिक का लंड"

"बस इतना ही जोर है क्या?? इतना तो मैं अपनी गांड लचका कर लगा लू!! और जोर से ईईईईईईआआआहहहह!!!!"

ये ले!! और ले!! हाहा!! हम्म्फ!! अब आया मजा!! और लोगी? ये लो!! अपनी ओखली में मेरा मुसल कैसा लग रहा भाभी?!!!"

“बस पेलते रहो रज्जाजी!!! आआअहह!!!" मेरा फिर पानी छुड़ा दो एक बार!! मैं बस अपनाआहह!! बहता रस तुम्हें पिलानाहह!!! चाहती हूंउन्नहह!!

पलंगतोड़ चुदाई की अब ताल बन चुकी थी। जिस्मो के टकराव की आवाज, और रिशा की आहें संगीत जैसी गूंज रही थी। घप्प!! "आह!!" फच्च!! "आह!!" फच्च!! "और तेज़!!!!!आआह्ह्ह्ह!!" थप्पपक!! "हाहाहाहाहाहा! मजादार देवरजीIII.. फिर से!!" ताड़!! "हाअइइइइइइइइइइइइइइ!!" घप्प!! "आह!!" घप्प!! "आह!!" घप्प!! घप्प!! घप्प!! घप्प!! घप्प!! घप्प!! फचाक!!! फचाक!!! "!!!!!!!!!!!! मैं ग…ई देवर जी!! मैं गई उफ़्फ़्फ़्फ़!!! मैं गई!!!!!!!!" चीखते हुए रिशा निडाल होकर राजू पर झूल गई मानो बेहोश हो चुकी हो। राजू ने मज़बूती से थामा और बिस्तर पर चित लिटा दिया। रिशा का पूरा जिस्म कांप रहा था और उसका मुँह एक खामोश चीख में खुला हुआ था। आखें सर में घूम गई थी. राजू ने उसके पैरो के पंजे पकड़ कर तांगे फेला दी और लिंग का सुपाड़ा उसकी फूली चूत पर रख दिया। गरम कोयले जैसा टोपा जैसे ही रिशा की भागनसे पर लगा उसका फव्वारा फिर फूट पड़ा। बिना मौका गँवाये राजू ने पनियाई चूत में जड़ तक लंड फँसा दिया। रिशा की चूत बहुत गरम हो चुकी थी। ऐसा लगा जैसे गरम लावे में अपना लोहा डाल दिया हो। गर्मी से भभकति चुत ने पूरा लंड ले लिया. राजू ने कमर हिला हिला कर शॉट लगाने शुरू किया तो चूत का फव्वारा और तेजी से झड़ने लगा। बस इतना ही नज़ारा शायद काफ़ी था। राजू से भी रुका ना गया और वो तेजी से झड़ने लगा। काफ़ी सारा वीर्य रिशा की चूत में उतारने के बाद उसने लंड बाहर खींच कर टोपे को उंगलियों से दबा लिया और रिशा के चेहरे के पास बैठ गया। फिर सुपाड़ा रिशा के खुले होठों के बीच पेल दिया। बचा हुआ सारा वीर्य रिशा के गले में उतरने लगा जिसे वो पूरा गटक गई। एक दो मिनट तक ऐसा ही लंड चूसते चाटते आधी बेहोसी में उसने पूरा रस पी लिया। उसकी चूत और गांड से भी काफ़ी माल रिस रहा था. राजू ने धीरे से अपना लंड बाहर खींचा और सुपाड़े से मुलायम गालों पर हल्की चोट करी जिससे आखिरी कुछ बूंदें रिशा के मुलायम गालों पर टपका दी। रिशा ने नशे में ही अपनी उंगलियाँ से उन बून्दों को पोंछ लिया और अपनी उंगलियाँ चाटते हुए निडाल हो गई। उसकी आँखें आधी बंद थी। साँसें भारी थी. उसके सीने के उभार ऊपर नीचे हो रही थे।


 
एक करवट लेकर उसने राजू से मुंह फेर लिया और राजू उसके पीछे जाकर लेट गया। उसकी गांड की दरार में अपना लंड चिपका कर लेट गया और धीरे धीरे उसके स्तन सहलाने लगा। रिशा अभी भी अपनी उंगलियों पर लगा रस चूस रही थी। इतने काम क्रीड़ा के बाद राजू का उसके स्तन सहलाना बहुत सुकून दे रहा था। थोड़ी देर यूँ ही वो उसके स्तनो से खेलता रहा। जोरा जोरी में रिशा के मुलायम बदन पर गुलाबी निशान पड़ गए थे। वो सब धीरे-धीरे हल्के पड़ने लगे। बस नितांबों का गुलाबीपन बरकारर था। राजू ने हाथ नीचे ले जा कर उसके निताम्बो को सहलाना शुरू कर दिया। उसके मुलायम स्पर्श से रिशा ने एक घुटी हुई राहत भारी सांस छोड़ी। इतना हल्का सुकून भरा स्पर्श पाकर वो मंद मंद ही मुस्कुराने लगी।

 
चुंकी राजू बस एक बार झड़ा था उसका लिंग दोनों जिस्मो के बीच दबा हुआ धीरे-धीरे उत्तेजित हो रहा था। निताम्बो की दरार के बीच उसका लोहा धीमी आंच में सिक रहा था। आधे खड़े लिंग का सुपाडा जैसे ही उसके छेद पर चुभा रिशा ने अलसाई नज़र घुमा कर राजू को देखा। दोनों की आंखें टकराईं और एकटक राजू को देखते हुए वो बड़े ही मादक अंदाज में अपनी उंगलियां दांतों तले दबा कर चुसने लगी। राजू भी उसे निहार रहा था.. उसके लिंग में तनाव बढ़ता चला गया और लिंग का सुपाड़ा फिर से गांड के छेद पर दस्तक देने लगा। रिशा स्पर्श से बरबस ही सिसक उठी "स्स्स्स्स....म्म्म्ह्ह्ह्ह"। चुदाई बड़ी दमदार रही थी, और उसने अनमना सा विरोध भी नहीं किया। राजू भी इशारा समझ रहा था. उससे भी रहा नहीं गया और हौले से उसने कमर का एक झटका दिया; सुपाड़ा फच्च से गांड में चला गया.. "हहहहहहहहहह!!" “ओह्ह ….. भाभ्भीईईई…तुम्हें दर्द नहीं हुआ ना?” और जवाब में रिशा ने अपने छेद से सुपाड़े को जोर से दबा दिया।

 
समझदार को इशारा काफी था। बिना रुके राजू ने कमर पीछे खींची और फिर से हल्का धक्का लगाया। लिंग थोड़ा और अंदर तक चला गया। गांड की गर्मी ने फिर से राजू को मतवाला कर दिया। उसने रिशा की कमर को जोर से पकड़ लिया और फिर एक जोरदार झटका दिया। इस बार लिंग जड़ तक अंदर धंस गया। रिशा उखड़ी हुई सांस के साथ सिस्कार उठी "आअहहहाआआहहसस्सशशशशशशशशशशशशशशशशशशशशशशशशशश... म्म्म्ममममममममममममम" उसकी थकन भारी सिस्कारियां और आहें राजू को मतवाला करती जा रही थी। जिस्म करीब होने के कारण दोनों की सांसों की ताल मिल गई। एक साथ सांसें चलने से लिंग हल्के हल्के से गांड में खुद ही अंदर बाहर होने लगा। दोनों एक दूसरे को कस कर पकड़े हुए थे और हल्की चुदाई का आनंद ले रहे थे। सांसों की रफ़्तार धीरे-धीरे तेज़ होती जा रही थी। राजू की हवस के सामने रिशा ने भी हथियार डाल दिये। वो बस उस आग में जलना चाहती थी। आखों में लाल हवास की डोरियाँ फिर तन गई। छेद चौड़ा होकर लिंग खाते जा रहा था। लेकिन अब चिकनाहट कम होने से घर्षण तेज हो रहा था। मीठी जलन से निताम्बो के बीच सुरसुरी सी मचने लगी। रिशा की कराहें बस आहो में बदलने ही वाली थीं तभी फोन की घंटी बजी।

 
उसने तुरंत होश संभालते हुए खुद को राजू से अलग किया। लंड फक्क करके गांड से बाहर निकल आया. औंधे मुह बिस्तर के बगल में मेज़ से फ़ोन उठा कर देखा तो उमा का कॉल था। हड़बड़ा कर वो अचानक घुटनो के बल बैठ गई और कॉल पिकअप किया।

"हैलो... हां उमा.. अरे कहां रह गई? तेरी राह देखते मेरी आंख लग गई।"

"दीदी मैं आज नई आ पाऊंगी। मेरी फ्लाइट कैंसिल हो गई है। मुझे अगली फ्लाइट अब सुबह 5 बजे मिलेगी। तो मैं कल ही आ पाऊंगी.... सॉरी"।

"अरी पगली। सॉरी काहे का? ध्यान रख अपना। और कुछ लगे तो फोन कर देना मुझे। कोई ना तू सुबह आ जाना" पीछे बिस्तर पर लेटा राजू ये सब सुन रहा था। उसकी नज़रें रिशा की नंगी पीठ से होती हुई उसकी गदराई गांड पे जा टिकी। वो बात करते करते घुटनो के बाल बैठ गई थी और थोड़े आगे को झुक कर एक हाथ के सहारे बिस्तर पर टिकी हुई थी। उसकी योनि की फाँके फूल कर गुलाबी दमक रही थी और गांड का छेद हल्का सा उसकी सांसों के साथ खुल बंद हो रहा था।

राजू ने दूसरी मेज से वैसलीन उठाई और ढेर सारा अपने सुपाड़े पर लगा लिया। ढेर सारा वैसलीन फिर अंगूठे पर लगाते हुए ही वो रिशा की तरफ बढ़ा। धीरे से अपनी जिह्वा निकल कर उसने मखमली नितंबों को चाट लिया।

बीच बात में ही हमला हुआ और रिशा खुद को कहने से रोक न पाई। "और अपना ध्यान रखना-आहह!!!"

"दीदी? क्या हुआ? चोट लगी क्या?"

"नही नही, कुछ नई हुआ। वो बस अंगूठा फंस गया दराज में-हाहाआह!!!"

इतना कहना ही था कि राजू अपना वैसलीन चुपड़ा अंगूठा और एक उंगली उसकी गांड में घुसा दी।


 
"आह-तू-हम्म- अपना ध्यान रख-ए-ए-और सुबह जल्दी आजा। ठीक-ठीक है?"

"हां दीदी। ठीक है। बस रखती हूं कल फ्लाइट से संदेश डाल दूंगी"

"ओह-ओह-ओहकैय"...कह कर रिशा ने फोन काट दिया।

अब तक राजू का दूसरा हाथ फिसल कर रिशा की जाँघों से होता हुआ आगे उनके बीच आकार फंस गया। दो मोटी मोटी उंगलियां के चूत की फाँके फेला कर उसने पूरी मज़बूती से बीच की उंगली उसकी चूत में धंस दी।

"आआहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहा हम्म"।

मौका ताड़ कर गांड से अंगूठा निकला और अपना सुपाड़ा छेद पर चिपका दिया। रिशा ऐसी छटपटाई जैसे घोड़े को गरम नाल चुभा दी गई हो। राजू ने दूसरा हाथ भी आगे बढ़ाया और उसकी उंगलियां भी चूत में पेल दी। अब चूत इतनी भर चुकी थी मानो मुसल ही घुसा हुआ हो. मर्दाना उंगलियाँ फिर रिशा की भग्नासे से रगड़ खाने लगी। उसने राजू की कलाइयाँ थाम कर उसको इशारों में रुकने की गुज़ारिश की। लेकिन रुकने की जगह राजू ने अपनी उंगलियां निकालीं और रिशा की कलाईयां थाम कर उसकी उंगलियां ही उसकी योनि में डाल दी। अपनी ही उंगलियों पर अपनी ही गरम चूत की भाप पड़ते रिशा के होठ थरथरा उठे। राजू के हाथ रिशा के बदन का इंच इंच नापते हुए ऊपर उसके उरेजो पर जा टिके। उसकी उंगलियों के स्पर्श से निपल और कड़क हो कर तन गई। दोनों स्तनो को मुट्ठी में भींचते हुए राजू ने उसे अपने पास खींच लिया। दोनों जिस्म आपस में चिपक गए. रिशा के नितंब फिसल कर राजू की जांघो पर टिक गए, और लंड नितंबों की दरार में जड़ तक धंस गया।

रिशा की आंखें नशे में पथरा गईं। चौतरफा हमले से वो स्थिर राजू के पाश में फंसी हुई थी। हल्के से खुले मुँह में एक कच्ची आह अटक गई।

"हाहा--"

राजू ने धीरे से जब लंड बाहर खींचा तो उसकी कराह छूटी। "-आआह्ह्ह्ह"।

राजू ने उसको चूचियों के सहारे दबोच रखा था और हौले हौले केवल कमर हिला हिला कर उसकी गांड पेलने लगा।

उसके हर झटके पर रिशा की सिस्की फूट जाती है। "आह. आह. आह. आह. आह. आह. आह. आह.आ. आ. आ. आ.."

धीरे धीरे चुदाई की स्पीड बढ़ने लगी. धक्के अब ठोकरों में तबदील हो गई।

कमरे में थप थप का मधुर संगीत फिर गूंजने लगा। रिशा का गला अब करहते हुये रूंध हो गया था। इतना मधुर एहसास उसे जीवन भर कभी नहीं हुआ था। चाहे वो उसकी सहेली के साथ गुजारे 3 दिन हो या जियोग्राफी सर के प्राइवेट ट्यूशन।। राजू की मर्दानगी के आगे सब फेल। इधर राजू की मुसलाधर शॉट्स की बारिश रुकने का नाम नई ले रही थी। रिशा भी बस फूली फूली सांसें लेकर मैदान में टिकी हुई थी।

लगतार चुदाई में उसे पता भी नहीं चला कि कब वो अपनी ही योनि में दनादन अपनी उंगली पेलने लगी थी। चरमसुख की मुस्कान चेहरे पर फेल हो गई। इतना प्यारा एहसास था कि उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसू छलक गये। अपनी ही उंगलियों पर उसका कामरस बहना लगा। उसकी गांड का छेद भी टाइट होता जा रहा था। उधर राजू भी पूरी मस्ती में किसी हवस भरे जानवर जैसा अपना मुसल रिशा की गांड में लगतार पेले जा रहा था। अचानक उसका पूरा जिस्म अकड गया। उसने फिर एक और जोरदार शॉट रिशा की गांड पर किया। रिशा इस शॉट से लगभग बिस्तर से उछल पड़ी। राजू के कामरस से गांड की दीवारें भीगती चली गईं। उसने अपना लिंग पूरा अंदर तक धंस रखा था। वीर्य की गरमी पाते ही रिशा भी झड़ने लगी। हांफती सांसों के बीच उसने उगलियां चुत में पूरी गहरायी तक पेल दी। फचाफच रिसते कामरस से बिस्तर गीला हो चुका था। उन्माद के बादल हट चुके थे और अंधेरे कमरे में छन्न कर आती चाँद की रोशनी में दोनों प्रेमियो का जिस्म दमक रहे थे। दोनों आगोश में ही निडाल होकर आगे को गिर पड़े। लंड की पिचकारियां अभी भी गांड में जारी थीं. काफ़ी सारा वीर्य छेद से बहार को रिसने लगा था। राजू के गोटे अब योनि पर टिके हुए थे।

फुलती सांसें अब धीरे धीरे मद्धम हो रही थी। दोनों इसी हालात में काफी देर पड़े रहे। लंड अब स्थिर होकर छेद से बाहर आ चुका था। छेद का मुँह फैल कर चौड़ा हो गया था और अभी भी वीर्य उससे रिस रहा था। राजू ने बिस्तर के बगल से फोन उठाया और ऑनलाइन खाना ऑर्डर करने लगा। रिशा ने चेहरा घुमा कर उसकी तरफ कर लिया और एकटक उसे देखने लगी। उससे जाने क्यों इतना प्यार आ रहा था अपने देवर पर। वो उसे देखते हुए मुस्कुराने लगी। राजू ने भी खाना ऑर्डर कर के फोन बगल में रखा और रिशा को निहारने लगा। उसका बिखरा काजल और पसीने में नहाया बदन बड़ा आकर्षित लग रहा था। हाथ आगे बढ़ा कर उसने उसकी उंगलियां थाम ली और दोनों एक दूसरे को देखते-देखते नींद के आगोश में चले गए।
[+] 1 user Likes nitya.bansal3's post
Like Reply


Messages In This Thread
RE: लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल... - by nitya.bansal3 - 09-08-2026, 06:46 PM



Users browsing this thread: 1 Guest(s)