09-08-2026, 07:30 AM
भाग ~ २३
मंजू काकी को चोदने के बाद मैं कुछ देर में अपने घर आ गया था। मैं घर के बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाट पर लेट गया था। अपने चेहरे की खुशी को मैं चाह कर भी छुपा नहीं पा रहा था। पता नहीं क्यों मैं इस खुशी में बार बार मुस्कुरा उठता था। बार बार वही सब याद आ जाता और मैं फिर मुस्कुरा उठता।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवन में जब मैं किसी के साथ चुदाई करूंगा तो वो पहली इंसान मेरे ही परिवार की मेरी सगी काकी होगी। इसके पहले तो मैं अपने दोस्त बबलू के साथ ऐसे कामों के बस किस्से ही सुनता आया था। किस्सा सुनते वक्त जरूर मन करता था कि काश मैं भी ऐसा करूं लेकिन फिर बाद में ये सारे खयाल मन से निकल जाते थे। मगर पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ था उससे मेरे जीवन की जैसे दिशा की बदल गई थी। जिस अनैतिक सम्बन्ध को मैं अपने परिवार की किसी महिला अथवा लड़की के साथ अंजाम देने का सोच तक नहीं सकता था वो अनैतिक सम्बन्ध आज पूरे होशो हवास में मैं बना चुका था। हालांकि ऐसा करने वाला मैं पहला शख्स नहीं था बल्कि मुझसे पहले खुद मेरे बापू ने ही ऐसा किया था। ज़ाहिर है बाप का खून वैसी ही सोच वाला तो होगा ही। खैर जो भी हो पर मैं आज बहुत खुश था।
मंजू काकी ने मुझे समझाया था कि इस बारे में मैं भूल कर भी किसी से कुछ न बताऊं वरना अंजाम ठीक नहीं होगा हमारे लिए। मैं खुद भी ये बात अच्छे से समझता था इस लिए किसी से इस बात का जिक्र करने का सवाल ही नहीं था। इसके अलावा काकी ने जो खास बात कही थी वो ये थी कि हम कभी भी ऐसा काम दुबारा कर सकते हैं।
खैर ऐसे ही सोचो के साथ दिन गुजरा और वापस खेत पर जाने का समय हो गया। मां और बापू खेत के लिए निकल गए। जाते जाते मां ने कहा था कि थोड़ी देर में मैं भी अनीता को ले कर आ जाऊं।
अनीता की बात चली तो मुझे खयाल आया कि उसके साथ भी तो हमारी एक कहानी बनने जा रही थी मगर ऐन वक्त पर सब कुछ जैसे खत्म सा हो गया था। हालांकि बाद में मैंने स्थिति को सम्हाल लेने की पूरी कोशिश की थी और लगा भी था कि शायद हालात पहले जैसे हो जाएंगे मगर अब ये अनीता पर ही निर्भर था कि वो इस संबंध में क्या चाहती है?
सच कहूं तो जब मैं अनीता के साथ होता था तो मुझे एक अलग ही तरह का एहसास होता था। मेरा यही मन करता था कि उसके लिए वो सब कुछ कर जाऊं जो शायद मेरे बस में भी न हो। मेरे और उसके बीच का जो रिश्ता था उसमें हवस या वासना नहीं थी बल्कि एक प्रेम वाला भाव था। हां, कभी कभी मेरी नजरें उसकी चूचियों पर चली जाती थीं और मैं अपने भोलेपन या नादानी में उससे उल्टा सीधा बोल भी देता था मगर इस सबके बावजूद मेरे अंदर उसके प्रति कोई गलत भावना नहीं होती थी।
मैंने सोच लिया कि मैं अनीता को फिर से समझाने की कोशिश करूंगा। यानी मेरी कोशिश रहेगी कि हमारे बीच फिर से पहले जैसा माहौल बन जाए।
थोड़ी देर बाद मैं उठा और घर के अंदर चला गया। अंदर आया तो देखा अनीता नर्दे के पास बर्तन मांज रही थी। उसने हरे रंग का कुर्ता पहन रखा था। दुपट्टा उसने नहीं ले रखा था इस लिए कुर्ते के खुले गले से उसकी चूचियों के उभार दिख जाते थे।
"अभी कितनी देर लगेगी तुझे?" मैंने उसके सामने ही कुछ कदम की दूरी पर बैठ कर पूछा─"मां ने हमें खेत आने को कहा है।"
अनीता ने एक नजर मुझे देखा और फिर बर्तन धोने लगी। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया था। इससे मुझे अच्छा तो नहीं लगा लेकिन मैं गुस्सा भी नहीं हुआ। असल में मैं नहीं चाहता था कि हमारे बीच मामला बिगड़ जाए और हम दोनों वापस पहले की तरह लड़ना झगड़ना शुरू कर दें।
"अच्छा सुन, मैं लाला की दुकान पर जा रहा हूं।" मैं कुछ सोचते हुए बोला─"तुझे कुछ खाना हो तो बता दे।"
अनीता ने एक बार फिर नजर उठा कर मुझे देखा मगर इस बार भी वो कुछ न बोली। उसके इस बर्ताव पर मैं अंदर ही अंदर परेशान और बेचैन हो उठा।
"लगता है मेरी सबसे सुंदर बहन अभी भी नाराज है।" मैंने मायूस हो कर कहा─"हे भगवान अब तू ही बता मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरी बहन अपने भाई से बात करना शुरू कर दे?"
अनीता ने ये सुना तो उसने इस बार थोड़ा घूर कर देखा मुझे। मैं ये सोच कर खुश हुआ कि इस बार वो गुस्से में ही सही लेकिन कुछ न कुछ जरूर कहेगी लेकिन उसने कुछ न कहा। बल्कि वापस बर्तन धोने में लग गई। मेरा तो भेजा ही घूम गया। समझ में ही न आया कि अब क्या करूं?
"देख अगर तू मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं फिर से बबलू के साथ घूमना फिरना शुरू कर दूंगा।" मैंने इस बार नाराज होने का नाटक किया─"सिर्फ तेरे कहने पर मैंने उससे दोस्ती खत्म की है मगर अब जब तू ही ऐसा करेगी तो मैं क्या करूंगा?"
"खबरदार अगर तूने उस कमीने के साथ घूमने का सोचा।" अनीता इस बार आँखें तरेर कर बोल पड़ी।
"हां तो तू भी ऐसे मुंह न मोड़ मुझसे।" मैंने थोड़ा उसके पास सरक कर कहा─"तू मुझसे बात नहीं करेगी तो मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा।"
"क्यों अच्छा नहीं लगेगा तुझे?" अनीता ने शंकित भाव से मुझे देखा।
"बस नहीं लगेगा तो नहीं लगेगा।" मैंने हाथ झटक कर कहा।
"ऐसा तो तभी होता है जब किसी की प्रेमिका अपने प्रेमी से बात नहीं करती।" अनीता ने घूरते हुए कहा─"इसका मतलब तू मुझे अपनी प्रेमिका ही मान रहा है, है ना?"
"यार क्यों फालतू की बात सोचती है?" मैं झल्ला कर बोला।
"क्यों न सोचूं?" अनीता ने कहा─"तेरी बातों से यही तो महसूस हो रहा है मुझे।"
"तुझे सिर्फ प्रेमी प्रेमिका ही महसूस हो रहा है?" मैं हताश हो कर बोला─"तुझे भाई बहन का प्यार महसूस नहीं हो रहा?"
"अगर ऐसा होता तो मुझे जरूर महसूस होता।" अनीता ने कहा─"मगर तेरी बातें मुझे कुछ और ही महसूस करवाती हैं।"
"अगर मैं तुझे प्रेमिका समझता तो तुझसे वैसा ही बर्ताव करता।" मैंने कहा─"तुझसे वो भी करने को कहता जो प्रेमी प्रेमिका करते हैं लेकिन क्या मैंने ऐसा कुछ करने को कहा तुझसे?"
इस बार अनीता कुछ न बोली। वो एकटक मुझे देखती रही। चेहरे पर असमंजस के साथ साथ कशमकश के भी भाव थे।
"देख, तू बेकार में ये सब सोच रही है।" मैंने कहा─"जरा सोच कि पिछले कुछ दिनों से हमारे बीच कितना लगाव हो गया था। हम दोनों कितना खुश थे। हम दोनों को इस तरह साथ देख मां भी कितना खुश हो गई थी।"
अनीता को जैसे जवाब न सूझा। वो इधर उधर देखने लगी। बर्तन धोना तो जैसे वो भूल ही गई थी।
"अच्छा सुन हम दोनों एक काम करते हैं।" मैंने कहा─"हम अभी जब खेत चलेंगे तो वहां श्यामू काका से इस बारे में पूछेंगे।"
"ये क्या कह रहा है तू?"
"अरे मेरा मतलब है कि मैं उनसे पूछूंगा कि क्या भाई बहन का प्यार प्रेमी प्रेमिका के प्यार जैसा होता है?" मैंने कहा─"मेरे पूछने पर काका खुद ही बताएंगे कि ऐसा होता है कि नहीं?"
"न...नहीं नहीं तू उनसे कुछ नहीं पूछेगा।" अनीता ने हड़बड़ा कर कहा।
"क्यों?"
"तू न सच में पागल है।" अनीता ने आँखें दिखाते हुए कहा─"जब तू उनसे पूछेगा तो क्या सोचेंगे वो? "
"अब भला वो क्या सोचेंगे?" मैंने कहा─"वो तो यही सोचेंगे न कि मैं बस उनसे पूछ रहा हूं।"
"एकदम बुद्धू है तू।" अनीता ने अपने माथे पर हल्के से मार कर कहा─"अरे! वो तेरे पूछने पर ये सोच सकते हैं कि कहीं तेरे और मेरे बीच में ऐसा ही कुछ तो नहीं है जिससे तू उनसे ये पूछ रहा है?"
"अरे हां यार।" मैं एकदम से हैरान हो कर बोल पड़ा─"ये तो मैंने सोचा ही नहीं।"
"इसी लिए कहा बुद्धू है तू।" अनीता ने घूरते हुए कहा─"तुझे उनसे इस बारे में कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है।"
"तो फिर किससे पूछूँ?"
"आख़िर तुझे किसी से पूछना ही क्यों है?"
"वो इस लिए कि तुझे भरोसा हो जाए कि मैं तुझे प्रेमिका नहीं बल्कि अपनी बहन मान कर ही प्यार करता हूँ।"
अनीता खामोशी से देखने लगी मुझे।
"तू जा यहां से और मुझे बर्तन धोने दे।"
"पहले बता कि क्या अब भी मुझसे नाराज है?"
"मैं नाराज नहीं हूं।"
"तो फिर बात क्यों नहीं कर रही?"
"बस ऐसे ही। अब तू जा।"
"ठीक है जा रहा हूं।" मैंने उठते हुए कहा─"पर ये तो बता कि लाला की दुकान से तेरे लिए क्या ले कर आऊं?"
"मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
"ठीक है, फिर मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीद लूंगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा।
"क्या बोला तूने?" अनीता ने चौंक कर मुझे देखा─"तू...तू मतलब तू...सच में...।"
"अरे गलत समझ रही है तू।" मैंने उसकी बात बीच में ही काट कर कहा─"मैं तुझे अपनी प्रेमिका थोड़ी कह रहा हूं। वो तो मैं किसी और को बोल रहा हूं।"
"कि..किसी और को??" अनीता के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया─"तेरी कोई प्रेमिका भी है?"
"और नहीं तो क्या?" मैंने एकाएक गर्व से सीना फुला लिया।
"क..कौन है वो?" अनीता ने आँखें फैला कर पूछा─"जल्दी बता कौन है तेरी प्रेमिका?"
"नहीं बताऊंगा।" मैंने दो टूक भाव से कहा।
"राजू बता दे नहीं तो मां को बता दूंगी।"
"बोला न, नहीं बताऊंगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"वैसे तू क्यों जानना चाहती है?"
अनीता को जवाब न सूझा। वो बगले झांकने लगी मगर जल्दी ही खुद को सम्हाला उसने।
"देख राजू ये तू गलत कर रहा है।" फिर उसने कहा─"मां बापू को पता चला तो सोच ले क्या होगा?"
"चिंता मत कर तू।" मैंने कहा─"मैं उन्हें पता ही नहीं लगने दूंगा। अच्छा अब तू बर्तन धो, मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीदने जा रहा हूं।"
इससे पहले कि अनीता कुछ बोलती मैं तेजी से बाहर की तरफ निकल गया। मैंने पलट कर ये भी नहीं देखा कि मेरे इस बर्ताव से अनीता पर क्या प्रभाव पड़ा है।
***********
मंजू काकी ने मुझे दो रुपए दिए थे। उसी पैसे से मैंने लाला की दुकान से नमकीन गुड़ खरीदा और फिर वापस घर की तरफ चल पड़ा। एक तरफ जहां मैं काकी के बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पा रहा था वहीं अब मैं अनीता को भी भुला नहीं पा रहा था।
अनीता से मैंने कह तो दिया था कि अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीदने जा रहा हूं जबकि असल में मेरी कोई प्रेमिका थी ही नहीं। मैं तो बस उसे चिढ़ा रहा था और देखना चाहता था कि मेरी ऐसी बात से उस पर क्या असर पड़ता है?
मंद मंद मुस्कुराता हुआ मैं थोड़ी ही देर में घर पहुंच गया। गुड़ और नमकीन को मैंने अपनी साफी में बांध लिया था और उसे इस तरह छुपा लिया था कि वो आसानी से किसी को दिखे न।
घर पहुंचा तो देखा अनीता बरामदे में बैठी थी और कुछ सोच रही थी। बर्तन धोने के बाद अब वो खेत चलने के लिए तैयार थी। जैसे ही उसे मेरे आने का आभास हुआ तो उसने सिर उठा कर मुझे देखा।
"तो खरीद लाया अपनी प्रेमिका के लिए सामान?" फिर उसने अजीब भाव से पूछा।
"हां खरीद लाया।" मैं बरबस ही मुस्कुरा उठा─"अच्छा अब अगर तू तैयार हो गई है तो चल हमें खेत जाना है।"
"मैं तो तैयार ही बैठी हूं।" अनीता ने कहा─"पर तू अपनी प्रेमिका के लिए जो खरीदने गया था उसे देने नहीं गया क्या?"
"हां वो जाना है मुझे।" मैंने मन ही मन मुस्कुरा कर कहा─"सोच रहा हूं कि तुझे खेत छोड़ दूंगा और फिर सबकी नजर बचा के चुपके से अपनी प्रेमिका के पास निकल जाऊंगा।"
"अच्छा।" अनीता की आँखें फैलीं─"तू खेत चल। मैं वहां सबको बताऊंगी कि तू क्या गुल खिला रहा है आजकल।"
"देख तू मेरी बहन है तो तुझे इसमें मेरा ही साथ देना चाहिए।" मैंने कहा─"ये नहीं कि सबसे अपने भाई को पिटवाए।"
"मैं जरूर साथ देती लेकिन तू काम ही ऐसा कर रहा है कि तुझे पिटवाना ही पड़ेगा।"
"हाय कितनी जालिम बहन दी है भगवान ने मुझे।" मैंने ऊपर आसमान की तरफ देखा और फिर उससे बोला─"कोई बात नहीं, अपनी प्रेमिका के लिए तेरा ये जुल्म भी सह लूंगा। वैसे भी मैंने सुना है कि जो प्रेमी प्रेमिका होते हैं उनकी डगर कभी भी आसान नहीं होती। मतलब पग पग पर उन्हें ये दुनिया वाले दुख दर्द ही देते हैं।"
"ओहो तुझे ये सब भी मालूम है??"
"प्रेम की डगर में चलने वालों को धीरे धीरे सब पता चल ही जाता है।"
"राजू सच सच बता, क्या सच में तेरी कोई प्रेमिका है?" अनीता ने इस बार थोड़ा गंभीर हो कर पूछा।
"अब तुझसे झूठ क्यों बोलूंगा भला?"
अनीता एकटक देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव गर्दिश करते दिखे। इधर मैं उसकी हालत को समझने की कोशिश कर रहा था।
"अब चल न, देर क्यों कर रही है?" मैंने बात को बदलते हुए कहा─"तुझे खेत छोड़ने के बाद मुझे अपनी प्रेमिका से मिलने भी जाना है।"
अनीता ने मुझे बड़ी गहरी नजरों से देखा। उसकी काली कजरारी आंखों में अजीब सा खिंचाव महसूस किया मैंने। वो मेरे एकदम पास ही खड़ी थी। वो बस थोड़ी सी ही सांवली थी लेकिन उसके नैन नक्श बड़े ही आकर्षक थे। तभी तो मैं उसकी तरफ खिंच रहा था। उसमें एक अलग ही आकर्षण था। उसे अपलक देखते हुए मैं यही सोच रहा था कि सचमुच मेरी बहन बहुत सुंदर है और मासूम भी। अचानक मैं थोड़ा चौंक पड़ा क्योंकि तभी उसकी कजरारी आंखों में मुझे हल्के आंसू तैरते नजर आए।
"अब तुझे क्या हुआ?" मैं अंदर ही अंदर हिल गया।
मेरे पूछने पर उसने एकदम से मेरा हाथ पकड़ा और उसे उठा कर अपने सिर पर रख लिया, फिर बोली─"मेरे सिर की कसम खा कर बोल कि सच में तेरी कोई प्रेमिका है।"
"पागल है क्या?" मैंने हड़बड़ा कर झट से अपना हाथ खींच लिया─"मैं क्यों फालतू में कसम खाऊं? और वैसे भी तुझे इस बात से मतलब ही क्या है?"
"नहीं, तुझे मेरी कसम खा कर बताना ही होगा।"
"तूने आज भांग वांग खा लिया है क्या?" मैं उससे दो कदम पीछे हो कर बोला─"ये कैसी फालतू की बात कर रही है? अब देर मत कर। खेत चल जल्दी।"
"देख राजू तंग न कर मुझे।" अनीता रुआंसे स्वर में बोली─"मुझे सच सच बता दे तेरी कोई प्रेमिका है कि नहीं?"
"बताया तो है तुझे।" मैंने कहा─"बार बार क्यों पूछ रही है?"
"मैं तब तक पूछूंगी जब तक तू मेरी कसम खा कर नहीं बताएगा।"
"मुझे नहीं खाना तेरी कसम।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा─"तुझे मानना है तो मान या न मान। अब खेत चल....और अगर नहीं चलना तो मैं अकेले ही जा रहा हूं।"
कहने के साथ ही मैं बाहर की तरफ चल पड़ा। मैं जानता था कि मेरी बातों ने अनीता को दुख पहुंचा दिया है लेकिन उसे वापस पटरी पर लाने का मेरे पास अब यही एक रास्ता था।
मेरे बाहर आते ही वो भी भागते हुए आ गई। नीम के पेड़ के पास खड़े हो कर मैंने देखा उसने घर का दरवाजा बंद किया, फिर उसमें ताला लगाने लगी। कुछ ही पलों में ताला लगा कर वो मेरी तरफ आने लगी। सच कहूं तो मुझे वो बहुत ही प्यारी लग रही थी। अपने सीने के उभारों को छुपाने के लिए उसने दुपट्टे को अच्छे से फैला रखा था।
जब वो मेरे एकदम पास आ गई तो मैंने देखा उसके चेहरे पर दुख के भाव थे। मैं जब चल पड़ा तो वो भी मेरे पीछे चल पड़ी। मेरे अंदर हलचल मची हुई थी। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मन कर रहा था कि उससे बात करूं लेकिन खुद को रोके हुए था।
पूरे रास्ते हमारे बीच बात नहीं हुई। ऐसे ही हम दोनों खेत पहुंच गए। जब हम खेत पहुंच गए तो वो मुझे बार बार देखने लगी। शायद वो ये देखना चाहती थी कि मैं अपनी प्रेमिका से मिलने जा रहा हूं या नहीं? और जब मैं खेत से कहीं न गया तो उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए। वो पूछना चाहती थी कि मैं क्यों नहीं जा रहा मगर सबके सामने नहीं पूछा। एक बात और उसने ये बात किसी को बताई भी नहीं, जोकि मैं पहले से ही जानता था।
खैर खलिहान में गहाई का काम शुरू हो चुका था। हम दोनों अपने अपने पाले में बैलों के पीछे पीछे चलने लगे थे। बीच बीच में हम दोनों की नज़रें आपस में मिलतीं लेकिन न वो कुछ कहती ना ही मैं।
कुछ समय बाद छोटे काका के कहने पर हम दोनों को आराम करने का मौका मिला। हमारी जगह पर सुनीता और रानी ने पाला सम्हाल लिया था। मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा फिर आम के बाग की तरफ अकेले ही चल पड़ा। मैंने अनीता से साथ चलने को नहीं कहा था।
जारी है...........
मंजू काकी को चोदने के बाद मैं कुछ देर में अपने घर आ गया था। मैं घर के बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाट पर लेट गया था। अपने चेहरे की खुशी को मैं चाह कर भी छुपा नहीं पा रहा था। पता नहीं क्यों मैं इस खुशी में बार बार मुस्कुरा उठता था। बार बार वही सब याद आ जाता और मैं फिर मुस्कुरा उठता।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवन में जब मैं किसी के साथ चुदाई करूंगा तो वो पहली इंसान मेरे ही परिवार की मेरी सगी काकी होगी। इसके पहले तो मैं अपने दोस्त बबलू के साथ ऐसे कामों के बस किस्से ही सुनता आया था। किस्सा सुनते वक्त जरूर मन करता था कि काश मैं भी ऐसा करूं लेकिन फिर बाद में ये सारे खयाल मन से निकल जाते थे। मगर पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ था उससे मेरे जीवन की जैसे दिशा की बदल गई थी। जिस अनैतिक सम्बन्ध को मैं अपने परिवार की किसी महिला अथवा लड़की के साथ अंजाम देने का सोच तक नहीं सकता था वो अनैतिक सम्बन्ध आज पूरे होशो हवास में मैं बना चुका था। हालांकि ऐसा करने वाला मैं पहला शख्स नहीं था बल्कि मुझसे पहले खुद मेरे बापू ने ही ऐसा किया था। ज़ाहिर है बाप का खून वैसी ही सोच वाला तो होगा ही। खैर जो भी हो पर मैं आज बहुत खुश था।
मंजू काकी ने मुझे समझाया था कि इस बारे में मैं भूल कर भी किसी से कुछ न बताऊं वरना अंजाम ठीक नहीं होगा हमारे लिए। मैं खुद भी ये बात अच्छे से समझता था इस लिए किसी से इस बात का जिक्र करने का सवाल ही नहीं था। इसके अलावा काकी ने जो खास बात कही थी वो ये थी कि हम कभी भी ऐसा काम दुबारा कर सकते हैं।
खैर ऐसे ही सोचो के साथ दिन गुजरा और वापस खेत पर जाने का समय हो गया। मां और बापू खेत के लिए निकल गए। जाते जाते मां ने कहा था कि थोड़ी देर में मैं भी अनीता को ले कर आ जाऊं।
अनीता की बात चली तो मुझे खयाल आया कि उसके साथ भी तो हमारी एक कहानी बनने जा रही थी मगर ऐन वक्त पर सब कुछ जैसे खत्म सा हो गया था। हालांकि बाद में मैंने स्थिति को सम्हाल लेने की पूरी कोशिश की थी और लगा भी था कि शायद हालात पहले जैसे हो जाएंगे मगर अब ये अनीता पर ही निर्भर था कि वो इस संबंध में क्या चाहती है?
सच कहूं तो जब मैं अनीता के साथ होता था तो मुझे एक अलग ही तरह का एहसास होता था। मेरा यही मन करता था कि उसके लिए वो सब कुछ कर जाऊं जो शायद मेरे बस में भी न हो। मेरे और उसके बीच का जो रिश्ता था उसमें हवस या वासना नहीं थी बल्कि एक प्रेम वाला भाव था। हां, कभी कभी मेरी नजरें उसकी चूचियों पर चली जाती थीं और मैं अपने भोलेपन या नादानी में उससे उल्टा सीधा बोल भी देता था मगर इस सबके बावजूद मेरे अंदर उसके प्रति कोई गलत भावना नहीं होती थी।
मैंने सोच लिया कि मैं अनीता को फिर से समझाने की कोशिश करूंगा। यानी मेरी कोशिश रहेगी कि हमारे बीच फिर से पहले जैसा माहौल बन जाए।
थोड़ी देर बाद मैं उठा और घर के अंदर चला गया। अंदर आया तो देखा अनीता नर्दे के पास बर्तन मांज रही थी। उसने हरे रंग का कुर्ता पहन रखा था। दुपट्टा उसने नहीं ले रखा था इस लिए कुर्ते के खुले गले से उसकी चूचियों के उभार दिख जाते थे।
"अभी कितनी देर लगेगी तुझे?" मैंने उसके सामने ही कुछ कदम की दूरी पर बैठ कर पूछा─"मां ने हमें खेत आने को कहा है।"
अनीता ने एक नजर मुझे देखा और फिर बर्तन धोने लगी। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया था। इससे मुझे अच्छा तो नहीं लगा लेकिन मैं गुस्सा भी नहीं हुआ। असल में मैं नहीं चाहता था कि हमारे बीच मामला बिगड़ जाए और हम दोनों वापस पहले की तरह लड़ना झगड़ना शुरू कर दें।
"अच्छा सुन, मैं लाला की दुकान पर जा रहा हूं।" मैं कुछ सोचते हुए बोला─"तुझे कुछ खाना हो तो बता दे।"
अनीता ने एक बार फिर नजर उठा कर मुझे देखा मगर इस बार भी वो कुछ न बोली। उसके इस बर्ताव पर मैं अंदर ही अंदर परेशान और बेचैन हो उठा।
"लगता है मेरी सबसे सुंदर बहन अभी भी नाराज है।" मैंने मायूस हो कर कहा─"हे भगवान अब तू ही बता मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरी बहन अपने भाई से बात करना शुरू कर दे?"
अनीता ने ये सुना तो उसने इस बार थोड़ा घूर कर देखा मुझे। मैं ये सोच कर खुश हुआ कि इस बार वो गुस्से में ही सही लेकिन कुछ न कुछ जरूर कहेगी लेकिन उसने कुछ न कहा। बल्कि वापस बर्तन धोने में लग गई। मेरा तो भेजा ही घूम गया। समझ में ही न आया कि अब क्या करूं?
"देख अगर तू मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं फिर से बबलू के साथ घूमना फिरना शुरू कर दूंगा।" मैंने इस बार नाराज होने का नाटक किया─"सिर्फ तेरे कहने पर मैंने उससे दोस्ती खत्म की है मगर अब जब तू ही ऐसा करेगी तो मैं क्या करूंगा?"
"खबरदार अगर तूने उस कमीने के साथ घूमने का सोचा।" अनीता इस बार आँखें तरेर कर बोल पड़ी।
"हां तो तू भी ऐसे मुंह न मोड़ मुझसे।" मैंने थोड़ा उसके पास सरक कर कहा─"तू मुझसे बात नहीं करेगी तो मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा।"
"क्यों अच्छा नहीं लगेगा तुझे?" अनीता ने शंकित भाव से मुझे देखा।
"बस नहीं लगेगा तो नहीं लगेगा।" मैंने हाथ झटक कर कहा।
"ऐसा तो तभी होता है जब किसी की प्रेमिका अपने प्रेमी से बात नहीं करती।" अनीता ने घूरते हुए कहा─"इसका मतलब तू मुझे अपनी प्रेमिका ही मान रहा है, है ना?"
"यार क्यों फालतू की बात सोचती है?" मैं झल्ला कर बोला।
"क्यों न सोचूं?" अनीता ने कहा─"तेरी बातों से यही तो महसूस हो रहा है मुझे।"
"तुझे सिर्फ प्रेमी प्रेमिका ही महसूस हो रहा है?" मैं हताश हो कर बोला─"तुझे भाई बहन का प्यार महसूस नहीं हो रहा?"
"अगर ऐसा होता तो मुझे जरूर महसूस होता।" अनीता ने कहा─"मगर तेरी बातें मुझे कुछ और ही महसूस करवाती हैं।"
"अगर मैं तुझे प्रेमिका समझता तो तुझसे वैसा ही बर्ताव करता।" मैंने कहा─"तुझसे वो भी करने को कहता जो प्रेमी प्रेमिका करते हैं लेकिन क्या मैंने ऐसा कुछ करने को कहा तुझसे?"
इस बार अनीता कुछ न बोली। वो एकटक मुझे देखती रही। चेहरे पर असमंजस के साथ साथ कशमकश के भी भाव थे।
"देख, तू बेकार में ये सब सोच रही है।" मैंने कहा─"जरा सोच कि पिछले कुछ दिनों से हमारे बीच कितना लगाव हो गया था। हम दोनों कितना खुश थे। हम दोनों को इस तरह साथ देख मां भी कितना खुश हो गई थी।"
अनीता को जैसे जवाब न सूझा। वो इधर उधर देखने लगी। बर्तन धोना तो जैसे वो भूल ही गई थी।
"अच्छा सुन हम दोनों एक काम करते हैं।" मैंने कहा─"हम अभी जब खेत चलेंगे तो वहां श्यामू काका से इस बारे में पूछेंगे।"
"ये क्या कह रहा है तू?"
"अरे मेरा मतलब है कि मैं उनसे पूछूंगा कि क्या भाई बहन का प्यार प्रेमी प्रेमिका के प्यार जैसा होता है?" मैंने कहा─"मेरे पूछने पर काका खुद ही बताएंगे कि ऐसा होता है कि नहीं?"
"न...नहीं नहीं तू उनसे कुछ नहीं पूछेगा।" अनीता ने हड़बड़ा कर कहा।
"क्यों?"
"तू न सच में पागल है।" अनीता ने आँखें दिखाते हुए कहा─"जब तू उनसे पूछेगा तो क्या सोचेंगे वो? "
"अब भला वो क्या सोचेंगे?" मैंने कहा─"वो तो यही सोचेंगे न कि मैं बस उनसे पूछ रहा हूं।"
"एकदम बुद्धू है तू।" अनीता ने अपने माथे पर हल्के से मार कर कहा─"अरे! वो तेरे पूछने पर ये सोच सकते हैं कि कहीं तेरे और मेरे बीच में ऐसा ही कुछ तो नहीं है जिससे तू उनसे ये पूछ रहा है?"
"अरे हां यार।" मैं एकदम से हैरान हो कर बोल पड़ा─"ये तो मैंने सोचा ही नहीं।"
"इसी लिए कहा बुद्धू है तू।" अनीता ने घूरते हुए कहा─"तुझे उनसे इस बारे में कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है।"
"तो फिर किससे पूछूँ?"
"आख़िर तुझे किसी से पूछना ही क्यों है?"
"वो इस लिए कि तुझे भरोसा हो जाए कि मैं तुझे प्रेमिका नहीं बल्कि अपनी बहन मान कर ही प्यार करता हूँ।"
अनीता खामोशी से देखने लगी मुझे।
"तू जा यहां से और मुझे बर्तन धोने दे।"
"पहले बता कि क्या अब भी मुझसे नाराज है?"
"मैं नाराज नहीं हूं।"
"तो फिर बात क्यों नहीं कर रही?"
"बस ऐसे ही। अब तू जा।"
"ठीक है जा रहा हूं।" मैंने उठते हुए कहा─"पर ये तो बता कि लाला की दुकान से तेरे लिए क्या ले कर आऊं?"
"मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
"ठीक है, फिर मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीद लूंगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा।
"क्या बोला तूने?" अनीता ने चौंक कर मुझे देखा─"तू...तू मतलब तू...सच में...।"
"अरे गलत समझ रही है तू।" मैंने उसकी बात बीच में ही काट कर कहा─"मैं तुझे अपनी प्रेमिका थोड़ी कह रहा हूं। वो तो मैं किसी और को बोल रहा हूं।"
"कि..किसी और को??" अनीता के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया─"तेरी कोई प्रेमिका भी है?"
"और नहीं तो क्या?" मैंने एकाएक गर्व से सीना फुला लिया।
"क..कौन है वो?" अनीता ने आँखें फैला कर पूछा─"जल्दी बता कौन है तेरी प्रेमिका?"
"नहीं बताऊंगा।" मैंने दो टूक भाव से कहा।
"राजू बता दे नहीं तो मां को बता दूंगी।"
"बोला न, नहीं बताऊंगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"वैसे तू क्यों जानना चाहती है?"
अनीता को जवाब न सूझा। वो बगले झांकने लगी मगर जल्दी ही खुद को सम्हाला उसने।
"देख राजू ये तू गलत कर रहा है।" फिर उसने कहा─"मां बापू को पता चला तो सोच ले क्या होगा?"
"चिंता मत कर तू।" मैंने कहा─"मैं उन्हें पता ही नहीं लगने दूंगा। अच्छा अब तू बर्तन धो, मैं अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीदने जा रहा हूं।"
इससे पहले कि अनीता कुछ बोलती मैं तेजी से बाहर की तरफ निकल गया। मैंने पलट कर ये भी नहीं देखा कि मेरे इस बर्ताव से अनीता पर क्या प्रभाव पड़ा है।
***********
मंजू काकी ने मुझे दो रुपए दिए थे। उसी पैसे से मैंने लाला की दुकान से नमकीन गुड़ खरीदा और फिर वापस घर की तरफ चल पड़ा। एक तरफ जहां मैं काकी के बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पा रहा था वहीं अब मैं अनीता को भी भुला नहीं पा रहा था।
अनीता से मैंने कह तो दिया था कि अपनी प्रेमिका के लिए कुछ खरीदने जा रहा हूं जबकि असल में मेरी कोई प्रेमिका थी ही नहीं। मैं तो बस उसे चिढ़ा रहा था और देखना चाहता था कि मेरी ऐसी बात से उस पर क्या असर पड़ता है?
मंद मंद मुस्कुराता हुआ मैं थोड़ी ही देर में घर पहुंच गया। गुड़ और नमकीन को मैंने अपनी साफी में बांध लिया था और उसे इस तरह छुपा लिया था कि वो आसानी से किसी को दिखे न।
घर पहुंचा तो देखा अनीता बरामदे में बैठी थी और कुछ सोच रही थी। बर्तन धोने के बाद अब वो खेत चलने के लिए तैयार थी। जैसे ही उसे मेरे आने का आभास हुआ तो उसने सिर उठा कर मुझे देखा।
"तो खरीद लाया अपनी प्रेमिका के लिए सामान?" फिर उसने अजीब भाव से पूछा।
"हां खरीद लाया।" मैं बरबस ही मुस्कुरा उठा─"अच्छा अब अगर तू तैयार हो गई है तो चल हमें खेत जाना है।"
"मैं तो तैयार ही बैठी हूं।" अनीता ने कहा─"पर तू अपनी प्रेमिका के लिए जो खरीदने गया था उसे देने नहीं गया क्या?"
"हां वो जाना है मुझे।" मैंने मन ही मन मुस्कुरा कर कहा─"सोच रहा हूं कि तुझे खेत छोड़ दूंगा और फिर सबकी नजर बचा के चुपके से अपनी प्रेमिका के पास निकल जाऊंगा।"
"अच्छा।" अनीता की आँखें फैलीं─"तू खेत चल। मैं वहां सबको बताऊंगी कि तू क्या गुल खिला रहा है आजकल।"
"देख तू मेरी बहन है तो तुझे इसमें मेरा ही साथ देना चाहिए।" मैंने कहा─"ये नहीं कि सबसे अपने भाई को पिटवाए।"
"मैं जरूर साथ देती लेकिन तू काम ही ऐसा कर रहा है कि तुझे पिटवाना ही पड़ेगा।"
"हाय कितनी जालिम बहन दी है भगवान ने मुझे।" मैंने ऊपर आसमान की तरफ देखा और फिर उससे बोला─"कोई बात नहीं, अपनी प्रेमिका के लिए तेरा ये जुल्म भी सह लूंगा। वैसे भी मैंने सुना है कि जो प्रेमी प्रेमिका होते हैं उनकी डगर कभी भी आसान नहीं होती। मतलब पग पग पर उन्हें ये दुनिया वाले दुख दर्द ही देते हैं।"
"ओहो तुझे ये सब भी मालूम है??"
"प्रेम की डगर में चलने वालों को धीरे धीरे सब पता चल ही जाता है।"
"राजू सच सच बता, क्या सच में तेरी कोई प्रेमिका है?" अनीता ने इस बार थोड़ा गंभीर हो कर पूछा।
"अब तुझसे झूठ क्यों बोलूंगा भला?"
अनीता एकटक देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव गर्दिश करते दिखे। इधर मैं उसकी हालत को समझने की कोशिश कर रहा था।
"अब चल न, देर क्यों कर रही है?" मैंने बात को बदलते हुए कहा─"तुझे खेत छोड़ने के बाद मुझे अपनी प्रेमिका से मिलने भी जाना है।"
अनीता ने मुझे बड़ी गहरी नजरों से देखा। उसकी काली कजरारी आंखों में अजीब सा खिंचाव महसूस किया मैंने। वो मेरे एकदम पास ही खड़ी थी। वो बस थोड़ी सी ही सांवली थी लेकिन उसके नैन नक्श बड़े ही आकर्षक थे। तभी तो मैं उसकी तरफ खिंच रहा था। उसमें एक अलग ही आकर्षण था। उसे अपलक देखते हुए मैं यही सोच रहा था कि सचमुच मेरी बहन बहुत सुंदर है और मासूम भी। अचानक मैं थोड़ा चौंक पड़ा क्योंकि तभी उसकी कजरारी आंखों में मुझे हल्के आंसू तैरते नजर आए।
"अब तुझे क्या हुआ?" मैं अंदर ही अंदर हिल गया।
मेरे पूछने पर उसने एकदम से मेरा हाथ पकड़ा और उसे उठा कर अपने सिर पर रख लिया, फिर बोली─"मेरे सिर की कसम खा कर बोल कि सच में तेरी कोई प्रेमिका है।"
"पागल है क्या?" मैंने हड़बड़ा कर झट से अपना हाथ खींच लिया─"मैं क्यों फालतू में कसम खाऊं? और वैसे भी तुझे इस बात से मतलब ही क्या है?"
"नहीं, तुझे मेरी कसम खा कर बताना ही होगा।"
"तूने आज भांग वांग खा लिया है क्या?" मैं उससे दो कदम पीछे हो कर बोला─"ये कैसी फालतू की बात कर रही है? अब देर मत कर। खेत चल जल्दी।"
"देख राजू तंग न कर मुझे।" अनीता रुआंसे स्वर में बोली─"मुझे सच सच बता दे तेरी कोई प्रेमिका है कि नहीं?"
"बताया तो है तुझे।" मैंने कहा─"बार बार क्यों पूछ रही है?"
"मैं तब तक पूछूंगी जब तक तू मेरी कसम खा कर नहीं बताएगा।"
"मुझे नहीं खाना तेरी कसम।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा─"तुझे मानना है तो मान या न मान। अब खेत चल....और अगर नहीं चलना तो मैं अकेले ही जा रहा हूं।"
कहने के साथ ही मैं बाहर की तरफ चल पड़ा। मैं जानता था कि मेरी बातों ने अनीता को दुख पहुंचा दिया है लेकिन उसे वापस पटरी पर लाने का मेरे पास अब यही एक रास्ता था।
मेरे बाहर आते ही वो भी भागते हुए आ गई। नीम के पेड़ के पास खड़े हो कर मैंने देखा उसने घर का दरवाजा बंद किया, फिर उसमें ताला लगाने लगी। कुछ ही पलों में ताला लगा कर वो मेरी तरफ आने लगी। सच कहूं तो मुझे वो बहुत ही प्यारी लग रही थी। अपने सीने के उभारों को छुपाने के लिए उसने दुपट्टे को अच्छे से फैला रखा था।
जब वो मेरे एकदम पास आ गई तो मैंने देखा उसके चेहरे पर दुख के भाव थे। मैं जब चल पड़ा तो वो भी मेरे पीछे चल पड़ी। मेरे अंदर हलचल मची हुई थी। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मन कर रहा था कि उससे बात करूं लेकिन खुद को रोके हुए था।
पूरे रास्ते हमारे बीच बात नहीं हुई। ऐसे ही हम दोनों खेत पहुंच गए। जब हम खेत पहुंच गए तो वो मुझे बार बार देखने लगी। शायद वो ये देखना चाहती थी कि मैं अपनी प्रेमिका से मिलने जा रहा हूं या नहीं? और जब मैं खेत से कहीं न गया तो उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए। वो पूछना चाहती थी कि मैं क्यों नहीं जा रहा मगर सबके सामने नहीं पूछा। एक बात और उसने ये बात किसी को बताई भी नहीं, जोकि मैं पहले से ही जानता था।
खैर खलिहान में गहाई का काम शुरू हो चुका था। हम दोनों अपने अपने पाले में बैलों के पीछे पीछे चलने लगे थे। बीच बीच में हम दोनों की नज़रें आपस में मिलतीं लेकिन न वो कुछ कहती ना ही मैं।
कुछ समय बाद छोटे काका के कहने पर हम दोनों को आराम करने का मौका मिला। हमारी जगह पर सुनीता और रानी ने पाला सम्हाल लिया था। मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा फिर आम के बाग की तरफ अकेले ही चल पड़ा। मैंने अनीता से साथ चलने को नहीं कहा था।
जारी है...........
It's Rajan 


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