08-08-2026, 03:10 AM
खौफ और साजिश—9
उसकी सांसें शेर की सांसों से भी ज़्यादा तेज़ हो चुकी थीं। भले ही उसका दिमाग इस कृत्य से नफरत कर रहा था, लेकिन उसके बदन के भीतर छिपी उत्तेजना अब धीरे-धीरे उसके आंसुओं पर हावी हो रही थी।
उसके मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ अब हल्की-हल्की कामुक आहों में बदलने लगी थीं— "आह्ह्... उफ़्फ़... श्श्श्..."—जिसे देखकर शेर की आँखों में जीत का वहशीपन और गहरा हो गया।
शेर ने मीरा के गालों पर बहते आंसुओं को देखा, तो उसने अपने हाथों की पकड़ को थोड़ा सा ढीला किया । उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और मीरा के गाल पर बहते गरम आँसू को बेशर्मी से चाट लिया।
शेर (आँसू चाटने के बाद जीभ से चिढ़ाता है): "अरे-अरे मेमसाब! रोना बंद कीजिए... अगर अब एक भी आँसू आपकी इस गोरी आँख से टपका, तो मैं फिर से आपका पूरा चेहरा अपनी जीभ से चाट डालूँगा! समझे आप?"
मीरा (कांपते हुए, अपनी आँखें भींचकर सिसकती है): "नहीं... शेर... मुझे छोड़ दो... मैं बर्बाद हो जाऊँगी... आह्ह्..."
शेर (कुटिल मुस्कान के साथ, उसकी कमर पर अपनी उंगलियाँ नचाते हुए ताना कसता है): "अरे कैसी बर्बादी मेमसाब? हमारा वो समझौता याद है न? यह कोई ज़बरदस्ती थोड़े ही है! ज़रा सोचिए... अपनी लाडली ज्योति बिटिया की उस अनमोल जिंदगी के सामने, इस गोरे जिस्म का यह थोड़ा सा मज़ा क्या मायने रखता है? मैंने तो आपके परिवार के लिए अपना खून बहाया है मेमसाब, और आप इस गरीब नौकर को अपनी इस जवानी का थोड़ा सा रस देने में इतना नखरा दिखा रही हैं?"
शेर (कामुक ठहाका लगाते हुए आगे जोड़ता है): "और सच-सच बताइए मेमसाब... आपका यह गरम बदन जो ऐसे थिरक रहा है और मुँह से 'आह्ह्-उफ़्फ़' निकल रहा है, क्या इसे सच में इस नौकर की छुअन पसंद नहीं आ रही? बदन तो आपका पूरा मज़ा ले रहा है!"
मीरा (शर्म और बेकाबू कामुक अहसास से बेबस होकर आह भरती है): "उफ़्फ़... श्श्श्... शेर... ऐसा मत बोलो... प्लीज..."
शेर (अपनी आँखें सिकोड़कर, सीधे मीरा की आँखों में ताकते हुए हुक्म देता है): "तो फिर प्यारी मेमसाब, मेरी रानी... इन गोरे-गोरे हाथों को आगे बढ़ाइए।"
शेर (ज़हरीली फुसफुसाहट में कहता है): "अपने हाथों से अपने इस नीले ब्लाउज के बटनों को एक-एक करके खोलिए... और फिर अपनी उस चोली को भी उतारकर फेंक दीजिए। मुझे अपनी इस प्यारी मालकिन के उन दोनों रसीले, सुडौल मम्मों को बिल्कुल नंगा देखना है। खोलो बटन मेमसाब... देर मत करो, अपनी इस जवानी का पूरा खजाना आज अपने इस नौकर-सह-राजा के हवाले कर दो!"
मीरा ने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा, जहाँ शायद उसका भगवान भी आज खामोश था। उसके बदन में उठती कामुक तरंगें और दिमाग में बेटी का खौफ—दोनों मिलकर उसकी रूह को छलनी कर रहे थे।
उसकी काँपती हुई उंगलियाँ अब धीरे-धीरे उसके ब्लाउज के बटनों को एक-एक करके ढीला करने लगीं। हर बटन के खुलने के साथ उसकी छाती की धड़कनें तेज़ हो रही थीं ।
शेर (उत्तेजना से अपनी राल टपकाते हुए, उसकी छाती को घूरते हुए): "हाँ... मेमसाब... ऐसे ही... धीरे-धीरे। देखो, इस शेर का दिल कितनी ज़ोर से धड़क रहा है। रोना मत, बस खोलती जाओ..."
मीरा के हाथों ने जैसे खुद को किसी मशीन के हवाले कर दिया था। उसने दूसरा, फिर तीसरा और आखिरकार ब्लाउज का आखिरी हुक भी अलग कर दिया।
ब्लाउज के दोनों हिस्से दरक कर दोनों तरफ फैल गए, जिससे उसके भीतर की गहरे नीले रंग की महीन ब्रा और उससे दबा हुआ उसका भरा-पूरा वक्षस्थल आधा बेपर्दा हो गया।
शेर की आँखें वासना के मारे फटने को हो गईं।
शेर (अपनी जीभ होठों पर फेरते हुए, ब्रा के हुक पर हाथ टिकाता है): "आह्ह् मीरा रानी! क्या गज़ब के मम्मे हैं आपके... ब्रा के इस पतले कपड़े में से भी कैसे बाहर आने को तड़प रहे हैं! अब देर मत कीजिए रानी साहब, इस आखरी रुकावट को भी हटा ही दीजिए।"
मीरा ने थरथराते हाथों से ब्रा की पट्टी को पीछे सरकाया और ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा के ढीले होते ही उसके दोनों भरे-पूरे, गोरे मम्मे पूरी तरह आज़ाद होकर शेर की नज़रों के सामने बेपर्दा हो गए।
शेर ने मीरा के दोनों सुडौल मम्मों को बिल्कुल नंगा देखा, तो कुछ पलों के लिए उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह उनकी बेमिसाल खूबसूरती को देखकर पूरी तरह भौंचक्का रह गया।
मीरा का वक्षस्थल बेहद सुडौल, कसा हुआ और कसावट से भरा था—उसमें ज़रा सा भी ढीलापन नहीं था। उनके अग्रभाग पर सजे गुलाबी निप्पल इस वक्त खौफ, ठंडक और जिस्मानी उत्तेजना के मिले-जुले अहसास से पूरी तरह अकड़कर बाहर की तरफ तन चुके थे।
शेर अपनी भूखी नज़रों से उसके मम्मों की खूबसूरती को पीता रहा, फिर उसने अपनी आँखें ऊपर उठाकर सीधे मीरा की डबडबाई, बेबस आँखों में झांका।
शेर (कामुक उन्माद में हांफते हुए, अपनी उंगलियों से उसके कसावदार मम्मे की गोलाई को सहलाकर फुसफुसाया): "आह्ह् मीरा रानी... कसम से, दिल ही नहीं भरता इन रसीले उभारों को देखने से!"
शेर (चेहरे पर एक शैतानी, चिढ़ाने वाली मुस्कान लाते हुए ताना कसता है): "कल भी देखा था मैंने इन मम्मों का कमाल... कल तो तुमने इन्हें मेरी छाती पर बुरी तरह रगड़ा था, याद है न? पर देखो... आज फिर से इन्हें इस तरह बेपर्दा देखकर यह शेर पूरी तरह पागल हो गया है!"
शेर (उसके अकड़े हुए गुलाबी निप्पल पर चुटकी काटते हुए ज़हरीली फुसफुसाहट में बोला): "और ज़रा देखिए तो सही रानी साहब... आपकी यह छाती कैसे फड़क रही है, और ये गुलाबी निप्पल कैसे अकड़कर खड़े हैं! अब बताओ रानी... यह डर के मारे तन गए हैं, या फिर इस नौकर के हाथों से कुचले जाने की वासना में?"
मीरा (निप्पल पर उसकी छुअन महसूस होते ही तड़प उठती है, उसके मुँह से बेकाबू आह निकल जाती है): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... श्श्श्... ऐसा... ऐसा मत बोलो... प्लीज..."
शेर ने अपने दोनों मजबूत हाथों को मीरा की नंगी, चिकनी कमर पर जमाया और एक झटके में खींचकर उसे अपनी फैलाकर रखी जाँघ पर बैठा लिया।
अब मीरा शेर की एक जाँघ पर लाचार और बेबस बैठी हुई थी। शेर की चौड़ी जाँघ मीरा की दोनों नंगी जाँघों के बिल्कुल बीचों-बीच आ फँसी थी, जिससे उसका घुटना सीधे मीरा की योनि के सबसे नाज़ुक हिस्से से जा टकराया।
कपड़े का नामोनिशान नहीं बचा था; साड़ी कमर तक लिपटी हुई बेतरतीब बिखरी थी और ऊपर से उसकी पूरी छाती, उसके दोनों सुडौल मम्मे और गुलाबी निप्पल पूरी तरह नंगे होकर दोपहर की रोशनी में चमक रहे थे।
शेर (मीरा की योनि पर अपनी जाँघ का सीधा दबाव बनाते हुए कामुक हँसी हँसा): "वाह मीरा रानी... वाह! अब आई न तुम सही जगह पर। ज़रा देखो तो सही कि मालकिन और नौकर का यह मिलन कितना सुंदर लग रहा है!"
शेर की जाँघ का सख्त स्पर्श सीधे अपनी योनि पर महसूस होते ही मीरा के वजूद में खौफ और कामुकता की एक ऐसी भयानक बिजली दौड़ी कि वह सिहर उठी। खौफ और तेज़ सांसों के चलने के कारण उसके नंगे मम्मे बड़ी तेज़ी से ऊपर-नीचे फड़कने लगे।
मीरा (सांसें फूलने और घबराहट के मारे तड़पते हुए): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... प्लीज... यह क्या कर रहे हो... मत दबाओ वहाँ... श्श्श्..."
शेर (उसकी नंगी छाती के तेज़ थिरकन को वासना से ताकते हुए चिढ़ाता है): "अरे-अरे रानी साहब! ज़रा संभालिए अपने इन रसीले उभारों को... कैसे थर-थर कांप रहे हैं! आपकी योनि से लेकर इस सीने तक जो आग लगी है, वो साफ़ बता रही है कि आपको मेरी जाँघ का यह दबाव कितना मज़ा दे रहा है।"
शेर को अपनी जाँघ के सीधे दबाव से मीरा की पैंटी वाले हिस्से की नमी और गीलापन साफ़ महसूस हो रहा था। लेकिन उसकी निगाहें तो मीरा के उन दोनों नंगे सुडौल मम्मों पर टिकी थीं, जो इस वक्त उसके मुँह के ठीक थे।
शेर (मीरा के नंगे, कड़क निप्पलों को घूरते हुए): "वाह! इन्हीं रसीले उभारों से मीरा रानी ने कभी ज्योति को दूध पिलाया था..."
शेर यह अच्छी तरह जानता था कि ज्योति मीरा और उसके पति की गोद ली हुई बेटी है, जिसे बचाने का अहसान उसने अपनी जान दांव पर लगाकर चुकाया था।
शेर (मीरा की नंगी छाती के करीब अपना चेहरा लाते हुए में फुसफुसाया): "ज़रा सोचिए मीरा रानी... जिस ज्योति को बचाने के लिए मैंने अपना खून बहाया, उसी बेटी की जान की सलामती के बदले इस गरीब शेर का भी तो हक बनता है न कि वह अपनी रानी के इन मम्मों से अपनी प्यास बुझाए?"
शेर (उसके गुलाबी निप्पल पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए ताना कसता है): "ज़रा देखिए तो सही रानी जी... कैसे ये गुलाबी निप्पल फुलाकर मुझे पुकार रहे हैं! चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि 'आ शेर... आ और इन्हें अपने मुँह में भरकर ज़ोर-ज़ोर से चूस ले!'"
शेर (कामुक ठहाका लगाकर): "जब आपकी नीयत ही पिघल चुकी है और मम्मे मुझे न्योता दे रहे हैं, तो इस नौकर को भला इंकार करने का क्या हक?"
मीरा (उसकी बातें सुनकर और मम्मों पर उसकी सांसों की तपन महसूस करके तड़प उठती है): "आह्ह्... उफ़्फ़... शेर... नहीं... प्लीज...ऐसा नीच ख्याल भी मुँह पर मत लाओ… श्श्श्..."
"ख्याल क्यों न लाऊँ मेमसाब? मेरा तो पूरा हक बनता है!"
इतना कहते ही शेर ने अपना मुँह आगे बढ़ाया और मीरा के एक सुडौल मम्मे पर सीधे डाका डाल दिया। उसके ने उस मखमली उभार को कसकर अपने भीतर भर लिया और वह उसके गुलाबी निप्पल को किसी भूखे नवजात बच्चे की तरह ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा।
उसका एक चौड़ा हाथ मीरा की पूरी तरह नंगी पीठ पर जा जमा, ताकि वह उसके तड़पते जिस्म को मजबूती से सहारा दे सके और उसे पीछे न हटने दे।
वहीं, नीचे शेर ने अपनी जाँघ को मीरा की टाँगों के बीच और गहराई में रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी सख्त जाँघ का सीधा हमला अब मीरा की पूरी तरह गीली हो चुकी चूत पर होने लगा था, जहाँ हर रगड़ के साथ कपड़ों के आर-पार भी तीखा दबाव पड़ रहा था।
मीरा (ऊपर मम्मे पर तीखे चूसने के अहसास और नीचे चूत पर होते ज़बरदस्त हमले से तड़प उठी, उसकी आँखें मुँद गईं): "आअाह्ह्... उफ़्फ़... श्श्श्... शेर... छोड़ो... मर जाऊँगी... आह्ह्!"
शेर (मम्मे को मुँह में भरे-भरे ही गुर्राते हुए, अपनी जीभ से उसके कड़क निप्पल को चूस-चूस कर मसलता रहा): "उम्मम्म्म... आह्ह् रानी... क्या मक्खन जैसा रस है... नीचे से तो चूत पानी छोड़ रही है और ऊपर से मम्मे मुँह में पिघल रहे हैं!"
पूरी तरह से एक मम्मे को चूसने और उसकी छाती पर अपनी लार की छाप छोड़ने के बाद, शेर ने आखिरकार अपना मुँह ऊपर उठाया। उसने सीधे मीरा आँखों में अपनी नज़रें गाड़ दीं।
शेर (कमीनेपन से मुस्कुराया): "क्यों मेमसाब? क्या अब भी आप यह कहना चाहती हैं कि इस सब में आपकी रज़ामंदी नहीं है?"
मीरा इस घोर अपमान और अपने ही बदन के इस धोखे को सह नहीं सकी। उसने शर्म और गिल्ट के मारे अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाने की कोशिश की।
लेकिन शेर उसकी इस खामोशी से रुकने वाला नहीं था। उसने तुरंत अपना एक हाथ नीचे बढ़ाया और उसकी साड़ी को सरकाते हुए उसकी नंगी जाँघों के बीच गहराई में घुसा दिया। बिना एक पल गँवाए, उसने उसकी गीली पैंटी को एक तरफ खिसकाया और अपनी एक उंगली सीधे उसकी चूत में गहराई तक घुसा दी।
मीरा (अचानक हुए इस तीखे हमले से तड़प उठी): "आह्ह्ह्! शेर... मर गई... निकालो इसे... प्लीज!"
उसका दिमाग चीख-चीख कर इस कृत्य से नफरत कर रहा था, सरताज का चेहरा याद करके ग्लानी से भर रहा था, लेकिन उसका ३२ साल का जवां और कामुक बदन इस लगातार हो रहे तीखे शारीरिक आक्रमण के आगे अपनी सुध-बुध खोने लगा था।
शेर ने उस उंगली को कुछ पलों तक उसकी कामुक नमी में अंदर-बाहर किया, जिससे मीरा का पूरा शरीर थरथरा उठा। फिर उसने झटके से उंगली को बाहर निकाला और उस चूत के रस से भीगी हुई गीली उंगली को सीधे मीरा की आँखों के सामने ला दिया।
शेर (अपनी भीगी हुई उंगली को उसकी आँखों के सामने नचाते हुए): "अब बोलिए मेमसाब! क्या अब भी कहेंगी कि इसमें आपकी मर्ज़ी नहीं है? आपकी ज़ुबान तो झूठ बोल सकती है, पर आपकी चूत से टपका यह रस कभी झूठ नहीं बोलता!"
शेर (उस उंगली को अपनी जीभ से बेशर्मी से चाटते हुए मुस्कुराया): "देखिए... आपकी ही जवानी की गवाही दे रहा है यह पानी!"
मीरा ने अपने कांपते हाथों से शेर की भीगी उंगली को अपने चेहरे के सामने से हटाया। उसकी आँखों में बेबसी के साथ-साथ एक अजीब सी जलती हुई नफरत थी।
मीरा (अपनी बहती आँखों को पोंछते हुए, कांपती लेकिन सख्त आवाज़ में बोली): "नहीं शेर... जो तू सोच रहा है वो सच नहीं है! मैंने कल भी तुझसे यही कहा था, और आज फिर कह रही हूँ... मैं सिर्फ अपनी कसम से बंधी हुई हूँ, वरना तुझे अपने शरीर पर हाथ भी न लगाने देती!"
मीरा ( हांफते स्वर में बोली): "यह आहें, यह बदन की उत्तेजना... यह किसी भी औरत के जिस्म में हो जाएगी अगर तू इस तरह उसके बदन को छुएगा! यह शरीर की एक अनजानी लाचारी है, मेरी रज़ामंदी नहीं!"
मीरा (शेर की जाँघ से खुद को अलग करने का प्रयास करते हुए गिल्ट और दर्द में सिसक उठी): "इसका सबूत मैंने तुझे कल भी दिया था और आज भी दे रही हूँ... मैं जा रही हूँ अपने कमरे में। आज के लिए बहुत हुआ! यह इस बात का सबूत है कि मैं जो भी सह रही हूँ, सिर्फ और सिर्फ अपनी औलाद के लिए सह रही हूँ।"
मीरा (शेर की आँखों में घूरते हुए, अपनी रुंधी हुई आवाज़ में चीख पड़ी): "तू जानता है कि ज्योति मेरी सगी नहीं, अपनाई हुई बेटी है... फिर भी मेरा कलेजा कांप जाता है कि मेरी बच्ची को कुछ हो न जाए! और एक तू है नीच... जो मेरी इस ममता और मेरी कसम का बार-बार नज़ायज़ फ़ायदा उठाए जा रहा है!"
इतना कहकर मीरा ने अपनी साड़ी और पल्लू को किसी तरह संभाला और अपने कांपते पैरों से रसोई से बाहर अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए, जबकि उसका पूरा वजूद इस घोर अपमान से कांप रहा था।
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मीरा के कमरे की तरफ जाते ही रसोई में सन्नाटा छा गया। शेर अपनी कुर्सी पर ही बैठा रह गया, लेकिन उसका चेहरा गुस्से और निराशा से लाल हो चुका था।
उसने अपने ही सिर पर हाथ मारा और दाँत भींचकर खुद को गालियाँ देने लगा।
शेर (मन ही मन खुद पर झुंझलाते हुए, गुस्से में बड़बड़ाया): "अबे चूतिया है क्या बे तू शेर?! क्या ज़रूरत थी तुझे फिर से वही गंदा सवाल पूछने की?! जब सब कुछ इतना सही और स्मूथ चल रहा था, तो तुझे अपनी औकात दिखाने की क्या खुजली मची थी?!"
वह अपनी उसी गीली उंगली को देखने लगा, जिसे थोड़ी देर पहले मीरा के चेहरे के सामने लहराकर अपनी जीत की डफली बजा रहा था।
शेर (कुर्सी पर मुक्का मारते हुए खुद को कोसता है): "साला बनी-बनाई बात बिगाड़ दी! मालकिन अपने हाथ से अपने मम्मे दे रही थी, बदन पिघल रहा था... और तूने एक फालतू सवाल पूछकर सारा खेल ही खराब कर दिया! अब देख, फिर से वही कसम, वही ज्योति, और वही नफरत का राग शुरू हो गया।"
शेर (ठंडी सांस खींचता है): "सब्र नहीं है तेरे में शेर... थोड़ा और सब्र रखता तो आज मालकिन पूरी की पूरी तेरी ज़द में होती। पर नहीं, तुझे तो तुरंत मालकिन का गुरूर तोड़ना था! अब बैठ यहाँ अकेले, पूरी प्रोग्रेस का सत्यानाश करके!"
शेर ने कुर्सी से उठकर अपनी पेंट में तने हुए सख्त लंड को सुधारा और रसोई के दरवाजे की तरफ देखा, जहाँ से मीरा अभी-अभी निकली थी।
मीरा के वे आखिरी शब्द उसके कानों में फिर से गूंजे— "आज के लिए बहुत हुआ..."
शेर (अपने होंठों पर अपनी जीभ फिराते हुए, एक धूर्त और उम्मीद से भरी मुस्कान लाया): "रुक... उसने क्या कहा था? 'आज के लिए बहुत हुआ'... इसका मतलब... इसका मतलब कल फिर चांस है! खेल खत्म नहीं हुआ है बे शेर!"
वह अपनी जाँघों को सहलाने लगा जहाँ थोड़ी देर पहले मीरा की नंगी, मखमली टाँगें फँसी हुई थीं, और वह गीलापन अब भी उसकी पैंट पर मौजूद था।
शेर (पछतावे से सिर झटकते हुए फिर से बड़बड़ाया): "पर यार... काश मैं वो चूतियापा न करता! साला कितना बेवकूफ हूँ मैं। अभी तो सिर्फ एक उंगली घुसाई थी... चूत से इतना रस बह रहा था कि अगर थोड़ी देर और अपनी ज़ुबान बंद रखता और बस मम्मे चूसता रहता, तो कसम से आज ही यह मालकिन मेरा पूरा लंड अपने मुँह में या चूत में ले लेती!"
शेर (अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए कमीनेपन से मुस्कुराया): "कोई बात नहीं शेर... सब्र का फल मीठा होता है। आज उसने मम्मे खुद नंगे किए, चूत में उंगली भी सह ली... कल जब ज्योति बिटिया के नाम की कसम दोबारा याद दिलाऊँगा, तो मालकिन को पूरी तरह इस शेर के नीचे आना ही पड़ेगा।
कल का सूरज इस शेर के लिए और रंगीन होने वाला है!"
शेर मुस्कुरा ही रहा था कि अचानक उसके दिमाग की बत्ती जली। उसे मीरा का वो बेबाक अंदाज़ और सीधे उठकर चले जाना याद आया।
शेर (गंभीर होकर ,सोचने लगा): "अबे शेर, ज़्यादा हवा में मत उड़! इस कसम की भी एक हद है। आज जैसे ही बात हद से आगे बढ़ी, मालकिन अपनी कसम और ज्योति को भूलकर सीधे उठकर चली गई। अगर इसे पूरी तरह गुलाम बनाना है, तो सिर्फ ज़ुबान की कसम से काम नहीं चलेगा... इसे आंखों के सामने खौफ दिखाना पड़ेगा कि अगर यह पलटी, तो ज्योति की जान सच में खतरे में पड़ जाएगी। तभी यह मालकिन पूरी तरह घुटने टेकेगी।"
उसे याद आया कि तांत्रिक ने उससे ज्योति के बाल लाने को कहा था, ताकि वह कोई ऐसा टोटका या विद्या बना सके जिससे मीरा के दिल में खौफ का सीधा शिकंजा कस जाए।
शेर तुरंत चुपचाप घर के अंदर वाले बाथरूम की तरफ बढ़ा। उसने इधर-उधर देखा और बेसिन के पास रखी कंघी उठाई, जिसमें ज्योति के कुछ टूटे हुए बाल उलझे हुए थे। उसने बड़ी होशियारी से उन बालों को समेटा और एक छोटी सी पुड़िया में लपेटकर अपनी जेब में डाल लिया।
काम खत्म होते ही घर के दरवाजे से बाहर निकल आया। सड़क पर आकर उसने एक ऑटो को हाथ दिया और उसमें बैठकर सीधे उस पुराने तांत्रिक के ठिकाने की तरफ निकल पड़ा।
शेर (ऑटो में बैठकर खिड़की से बाहर ताकते हुए, कुटिलता से मुस्कुराया): "अब आएगा असली मज़ा मीरा रानी... एक बार तांत्रिक बाबा का यह काळा जादू और खौफ तुम्हारे सिर चढ़ा, फिर तुम खुद चलकर इस शेर की सेज पर आओगी और कभी इनकार करने की हिम्मत नहीं कर पाओगी!"
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कमरे में पहुँचते ही मीरा ने अंदर से कुंडी बंद कर ली और सीधे ड्रेसिंग टेबल के बड़े से शीशे के सामने जाकर खड़ी हो गई।
वह ज़ोर-ज़ोर से सिसक रही थी, उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और चेहरा आंसुओं से पूरी तरह भीगा हुआ था।
जैसे ही उसकी नज़र शीशे में अपने अक्स पर पड़ी, उसकी रूह कांप उठी। उसकी साड़ी बेतरतीब लटकी हुई थी और नीले रंग का ब्लाउज पूरी तरह खुला पड़ा था।
मीरा ने कांपती उंगलियों से अपने पेट के पास देखा—जहाँ नाभि के ठीक बगल में शेर के तीखे दाँतों का गहरा, लाल-बैंगनी कट का निशान चमक रहा था। उस ज़ख्म पर शेर की लार का गीलापन अब भी सूखा नहीं था।
फिर उसने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसके दोनों भरे-पूरे, सुडौल मम्मे शेर के हाथों से बेरहमी से मसले जाने के कारण पूरी तरह लाल पड़े हुए थे। गुलाबी निप्पल अब भी कसकर अकड़े हुए थे, जो चीख-चीखकर उस वहशी छुअन की कहानी बयां कर रहे थे।
मीरा (अपने पेट के लाल निशान को छूते हुए, सिसकियों के बीच नफरत से बोली): "जानवर है साला... एक नंबर का नीच और हैवान है!"
लेकिन अगले ही पल, जब उसने शीशे में अपने बेपर्दा मम्मों की रंगत और अपने बदन की उस खौफनाक उत्तेजना को देखा, तो उसकी आत्मा गिल्ट के भयानक बोझ से दब गई।
मीरा (अपनी छाती पर हाथ रखते हुए, रोते-रोते खुद पर लानत भेजने लगी): "पर... पर हे भगवान! मेरी यह देह क्यों बहक जाती है उसके एक स्पर्श से? क्यों मेरा बदन उस हैवान के छूते ही ऐसे पिघलने लगता है? मैं सरताज से प्यार करती हूँ... फिर इस ज़िल्लत और दर्द में भी मेरा जिस्म उस नीच नौकर के आगे घुटने क्यों टेक देता है?"
वह फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर फूट-फूट कर रोने लगी। अपनी मासूम बेटी ज्योति को बचाने की कीमत पर वह हर पल अपनी ही नज़र में गिरती जा रही थी—एक तरफ माँ का फर्ज था, और दूसरी तरफ उसके अपने ही बदन का यह खौफनाक धोखा।
मीरा ने भारी कदमों से बाथरूम की तरफ रुख किया। उसका सिर्फ एक ही मकसद था—उस हैवान की लार, थूक और गंदे स्पर्श की एक-एक छाप को साबुन और पानी से अपने जिस्म से धो डालना।
बाथरूम का दरवाजा बंद करके उसने कांपते हाथों से अपनी बची-कुची साड़ी, ब्लाउज और ब्रा को पूरी तरह उतारकर फर्श पर फेंक दिया।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी नीली रेशमी पैंटी को नीचे सरकाया, उसकी नज़र उस पर पड़ी नमी पर जा टिकी। पैंटी का बीच का हिस्सा पूरी तरह गीला और चिपचिपा हो चुका था।
मीरा (उस नमी को देखकर खौफ और घोर आत्म-ग्लानि से कांप उठी): "हे ईश्वर... नहीं..."
उसे तुरंत रसोई का वो खौफनाक पल याद आ गया—जब शेर ने उसकी जाँघों को अपनी जाँघों में दबोचकर अपनी एक खुरदुरी उंगली उसकी योनि में बेदर्दी से घुसा दी थी। उस वक्त उसका पूरा शरीर एक तीखे झटके से अकड़ गया था और योनि से कामुक रस का फव्वारा छूट पड़ा था।
जैसे ही बाथरूम के एकांत में मीरा के दिमाग में उस उंगली की घुसावट और ज़बरदस्ती का ख्याल दोबारा कौंधा, उसके बदन ने एक बार फिर खौफनाक प्रतिक्रिया दे दी।
मीरा ने महसूस किया कि उसकी योनि के अंदर फिर से वही हल्की सी थिरकन और नमी रिसने लगी थी। इतना ही नहीं, उसके दोनों नंगे मम्मे—जो शेर के हाथों से मसले जाने के कारण पहले से ही लाल और दर्द से भरे थे—इस ख्याल मात्र से ही एक बार फिर कसकर अकड़ गए और उनके गुलाबी निप्पल कड़क होकर दुखने लगे।
मीरा (अपनी नंगी छाती को अपने दोनों हाथों से भींचकर, रोते-हांफते हुए घुटनों पर बैठ गई): "उफ़्फ़... आह्ह्... यह क्या हो रहा है मुझे? सिर्फ सोचने भर से मेरा जिस्म फिर से गीला हो रहा है?! क्यों... क्यों मेरा बदन उस हैवान की हैवानियत को इस तरह याद रख रहा है?"
शीशे के सामने खड़ी नंगी मीरा अपनी ही देह से नफरत करने लगी थी। उसने तुरंत फव्वारा (शावर) चालू किया और ठंडे पानी की धार के नीचे खड़ी हो गई। वह साबुन से अपने पेट, मम्मों और जाँघों को बेरहमी से रगड़ने लगी, मानो अपनी त्वचा को छीलकर उस नीच नौकर के हर नामोनिशान को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना चाहती हो।
Deepak Kapoor
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