07-08-2026, 08:38 PM
लंच ब्रेक की घंटी बजते ही सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“चल… साइड में। आज पूरा पूछूँगी।”
वो मुझे स्टाफ रूम के पीछे वाली छोटी सी बालकनी में ले गई, जहाँ आमतौर पर कोई नहीं आता। दरवाज़ा बंद किया, फिर मेरे सामने खड़ी हो गई। आँखों में शरारत थी।
“अब बोल रुही… सुबह तो आधा-अधूरा बताया। अब बता… जब रामू जी का वो मोटा लंड पहली बार तेरी चूत में घुसा था, तब सच में क्या महसूस हुआ?”
मैंने दीवार की तरफ पीठ टिका ली। गाल पहले से ही लाल थे। आँखें झुकाईं।
“सोनिया… मत ले नाम… बहुत शर्म आती है।”
“क्यों शर्म? रामू जी का लंड ना लूँ क्या?” उसने हँसते हुए मेरा ठुड्डी उठाया। “बोल… कैसा लगा जब उन्होंने अपना मोटा, काला, नसों वाला लंड तेरे टाइट छेद में धकेला?”
मेरी साँस अटक गई। याद आते ही जाँघों के बीच गर्मी फैल गई।
“बहुत… बहुत मोटा था सोनिया। पहली बार लगा जैसे कुछ फट जाएगा। दर्द हुआ… लेकिन साथ में एक अजीब सी मिठास भी। उन्होंने धीरे-धीरे पूरा अंदर तक डाल दिया… और जब उनकी झांट मेरी झांट से छुई तो… मैं काँप उठी। उनके बड़े हाथ मेरी कमर पकड़े हुए थे… इतनी मजबूती से कि मैं हिल भी नहीं पा रही थी।”
सोनिया ने और करीब आकर फुसफुसाया, “और जब उन्होंने हिले? तेज-तेज?”
मैंने आँखें बंद कर लीं। आवाज काँप रही थी।
“जब तेज किया… तो मेरी चीखें निकलने लगीं। ‘आह्ह… रामू जी… धीरे…’ लेकिन वो नहीं माने। हर धक्के के साथ उनका लंड इतना गहरा जा रहा था कि मुझे लग रहा था मेरी कोख में समा जाएगा। मैं उनकी छाती पर नाखून गाड़ रही थी… और खुद बोल रही थी, ‘और जोर से… और अंदर…’”
सोनिया हँसी। “देखा! तू खुद माँग रही थी रामू जी का लंड। और जब उन्होंने तुझे ऊपर बैठाया?”
“जब ऊपर बैठाया… तो उनका लंड पूरा अंदर था। मैं उनकी गोद में बैठी हिल रही थी… और वो मेरे स्तन चूस रहे थे। इतनी जोर से चूस रहे थे कि निपल सूज गए थे। मैं उनकी गर्दन में मुँह छुपाए कराह रही थी। उस पल… सच में लगा कि मैं सिर्फ उनकी हूँ।”
सोनिया ने मेरा बाल पीछे किया और धीरे से बोली, “रुही सिंह… या अब रुही कामत?”
मेरी आँखें भर आईं। गला बैठ गया।
“सोनिया… हाँ। मैं… मैं रुही सिंह से रुही कामत बन गई हूँ दिल से। सनी का सिर्फ नाम है। लेकिन दिल… पूरा दिल रामू जी का हो चुका है। उनके बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी, उनका वो मोटा लंड… सब कुछ। मैं… मैं उनसे प्यार करने लगी हूँ। सच्चा प्यार।”
सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। “प्यार? या सिर्फ उनकी चोदने की आदत?”
मैंने सिर उठाया। आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज में सच्चाई।
“प्यार सोनिया। जब वो मुझे दुल्हन बनाकर चोदते हैं… जब मेरे चरण चूमने को कहते हैं… जब मेरे बाल सहलाते हुए बोलते हैं ‘मेरी औरत’… तो लगता है जैसे मेरी पूरी जिंदगी उन्हीं के लिए है। मैं… मैं जीवन भर उनकी सेवा करना चाहती हूँ। उनके पैर दबाना, उनका खाना बनाना, रात को उनकी लंड चूसना, जितनी बार चाहें चोदने देना… सब। मैं उनकी रखैल सही… लेकिन दिल से उनकी पत्नी बनना चाहती हूँ।”
सोनिया कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से मुस्कुराई। आवाज में मजाक भी था, थोड़ी सी जलन भी।
“वाह रुही कामत… रामू जी की पूरी रंडी बनने वाली हो। उनके मोटे लंड की गुलाम। बता… क्या-क्या सेवा करेगी तू?”
मैं शर्म से और लाल हो गई, लेकिन अब रोक नहीं पा रही थी।
“सब कुछ। सुबह उठकर उनके पैर छूना… उनका लंड मुँह में लेकर जगाना। दिन में जितनी बार बोलें, साड़ी उठाकर खड़ी-खड़ी चोदने देना। रात को उनके नीचे लेटना… या ऊपर बैठना… या कुत्ते की तरह… जो भी वो चाहें। उनके थूक पीना, उनके वीर्य को निगलना… सब। मैं… मैं उनकी हूँ सोनिया। पूरी तरह।”
सोनिया ने मेरी कमर पर हाथ रखा और कान में फुसफुसाया, “और अगर रामू जी तुझे किसी और के साथ चोदने को कहें? या किसी के सामने?”
मेरी साँस रुक गई। दिल जोर से धड़का।
“तो… तो चोदूँगी। क्योंकि मैं उनकी हूँ। उनकी इच्छा ही मेरी इच्छा है अब।”
सोनिया ने मेरा गाल सहलाया। “पागल हो गई तू रामू जी के लंड पर। चल… लंच कर ले। वरना लोग ढूँढेंगे। लेकिन शाम को जब वो लेने आए… तो मुझे मैसेज करना। और कल… और डिटेल सुननी है। खासकर जब तू उनके चरण चूम रही थी।”
मैंने सिर झुकाया। बाल चेहरे पर गिर गए।
“ठीक है… लेकिन इतना मत छेड़ सोनिया। दिल से शर्म आती है… और… और बहुत मजा भी।”
हम दोनों अंदर की तरफ मुड़ीं। मेरे कदम भारी थे। मन में सिर्फ एक ही चेहरा घूम रहा था—रामू जी का। उनकी दाढ़ी, उनके बड़े हाथ, और वो मोटा लंड जो अब मेरी जिंदगी का केंद्र बन चुका था।
रुही सिंह खत्म हो चुकी थी।
अब सिर्फ रुही कामत बची थी… रामू जी की।
“चल… साइड में। आज पूरा पूछूँगी।”
वो मुझे स्टाफ रूम के पीछे वाली छोटी सी बालकनी में ले गई, जहाँ आमतौर पर कोई नहीं आता। दरवाज़ा बंद किया, फिर मेरे सामने खड़ी हो गई। आँखों में शरारत थी।
“अब बोल रुही… सुबह तो आधा-अधूरा बताया। अब बता… जब रामू जी का वो मोटा लंड पहली बार तेरी चूत में घुसा था, तब सच में क्या महसूस हुआ?”
मैंने दीवार की तरफ पीठ टिका ली। गाल पहले से ही लाल थे। आँखें झुकाईं।
“सोनिया… मत ले नाम… बहुत शर्म आती है।”
“क्यों शर्म? रामू जी का लंड ना लूँ क्या?” उसने हँसते हुए मेरा ठुड्डी उठाया। “बोल… कैसा लगा जब उन्होंने अपना मोटा, काला, नसों वाला लंड तेरे टाइट छेद में धकेला?”
मेरी साँस अटक गई। याद आते ही जाँघों के बीच गर्मी फैल गई।
“बहुत… बहुत मोटा था सोनिया। पहली बार लगा जैसे कुछ फट जाएगा। दर्द हुआ… लेकिन साथ में एक अजीब सी मिठास भी। उन्होंने धीरे-धीरे पूरा अंदर तक डाल दिया… और जब उनकी झांट मेरी झांट से छुई तो… मैं काँप उठी। उनके बड़े हाथ मेरी कमर पकड़े हुए थे… इतनी मजबूती से कि मैं हिल भी नहीं पा रही थी।”
सोनिया ने और करीब आकर फुसफुसाया, “और जब उन्होंने हिले? तेज-तेज?”
मैंने आँखें बंद कर लीं। आवाज काँप रही थी।
“जब तेज किया… तो मेरी चीखें निकलने लगीं। ‘आह्ह… रामू जी… धीरे…’ लेकिन वो नहीं माने। हर धक्के के साथ उनका लंड इतना गहरा जा रहा था कि मुझे लग रहा था मेरी कोख में समा जाएगा। मैं उनकी छाती पर नाखून गाड़ रही थी… और खुद बोल रही थी, ‘और जोर से… और अंदर…’”
सोनिया हँसी। “देखा! तू खुद माँग रही थी रामू जी का लंड। और जब उन्होंने तुझे ऊपर बैठाया?”
“जब ऊपर बैठाया… तो उनका लंड पूरा अंदर था। मैं उनकी गोद में बैठी हिल रही थी… और वो मेरे स्तन चूस रहे थे। इतनी जोर से चूस रहे थे कि निपल सूज गए थे। मैं उनकी गर्दन में मुँह छुपाए कराह रही थी। उस पल… सच में लगा कि मैं सिर्फ उनकी हूँ।”
सोनिया ने मेरा बाल पीछे किया और धीरे से बोली, “रुही सिंह… या अब रुही कामत?”
मेरी आँखें भर आईं। गला बैठ गया।
“सोनिया… हाँ। मैं… मैं रुही सिंह से रुही कामत बन गई हूँ दिल से। सनी का सिर्फ नाम है। लेकिन दिल… पूरा दिल रामू जी का हो चुका है। उनके बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी, उनका वो मोटा लंड… सब कुछ। मैं… मैं उनसे प्यार करने लगी हूँ। सच्चा प्यार।”
सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। “प्यार? या सिर्फ उनकी चोदने की आदत?”
मैंने सिर उठाया। आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज में सच्चाई।
“प्यार सोनिया। जब वो मुझे दुल्हन बनाकर चोदते हैं… जब मेरे चरण चूमने को कहते हैं… जब मेरे बाल सहलाते हुए बोलते हैं ‘मेरी औरत’… तो लगता है जैसे मेरी पूरी जिंदगी उन्हीं के लिए है। मैं… मैं जीवन भर उनकी सेवा करना चाहती हूँ। उनके पैर दबाना, उनका खाना बनाना, रात को उनकी लंड चूसना, जितनी बार चाहें चोदने देना… सब। मैं उनकी रखैल सही… लेकिन दिल से उनकी पत्नी बनना चाहती हूँ।”
सोनिया कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से मुस्कुराई। आवाज में मजाक भी था, थोड़ी सी जलन भी।
“वाह रुही कामत… रामू जी की पूरी रंडी बनने वाली हो। उनके मोटे लंड की गुलाम। बता… क्या-क्या सेवा करेगी तू?”
मैं शर्म से और लाल हो गई, लेकिन अब रोक नहीं पा रही थी।
“सब कुछ। सुबह उठकर उनके पैर छूना… उनका लंड मुँह में लेकर जगाना। दिन में जितनी बार बोलें, साड़ी उठाकर खड़ी-खड़ी चोदने देना। रात को उनके नीचे लेटना… या ऊपर बैठना… या कुत्ते की तरह… जो भी वो चाहें। उनके थूक पीना, उनके वीर्य को निगलना… सब। मैं… मैं उनकी हूँ सोनिया। पूरी तरह।”
सोनिया ने मेरी कमर पर हाथ रखा और कान में फुसफुसाया, “और अगर रामू जी तुझे किसी और के साथ चोदने को कहें? या किसी के सामने?”
मेरी साँस रुक गई। दिल जोर से धड़का।
“तो… तो चोदूँगी। क्योंकि मैं उनकी हूँ। उनकी इच्छा ही मेरी इच्छा है अब।”
सोनिया ने मेरा गाल सहलाया। “पागल हो गई तू रामू जी के लंड पर। चल… लंच कर ले। वरना लोग ढूँढेंगे। लेकिन शाम को जब वो लेने आए… तो मुझे मैसेज करना। और कल… और डिटेल सुननी है। खासकर जब तू उनके चरण चूम रही थी।”
मैंने सिर झुकाया। बाल चेहरे पर गिर गए।
“ठीक है… लेकिन इतना मत छेड़ सोनिया। दिल से शर्म आती है… और… और बहुत मजा भी।”
हम दोनों अंदर की तरफ मुड़ीं। मेरे कदम भारी थे। मन में सिर्फ एक ही चेहरा घूम रहा था—रामू जी का। उनकी दाढ़ी, उनके बड़े हाथ, और वो मोटा लंड जो अब मेरी जिंदगी का केंद्र बन चुका था।
रुही सिंह खत्म हो चुकी थी।
अब सिर्फ रुही कामत बची थी… रामू जी की।


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