07-08-2026, 08:28 PM
ऑटो ऑफिस के गेट के सामने रुकी। रामू जी ने शीशा घुमाया, पीछे बैठी मुझे देखा और धीरे से मुस्कुराया। दाढ़ी में वो ही शरारती मुस्कान तैर रही थी।
“शाम को लेने आऊँगा… तैयार रहना।” उसने धीरे से कहा, एक आँख मारी और हँसते हुए चला गया।
मैं शर्म से पूरी लाल हो गई। जल्दी से उतर कर ऑफिस के अंदर घुस गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
वर्क एरिया में घुसते ही सोनिया सामने से मिली। उसने मुझे एक नजर में पढ़ लिया।
“अरे रुही… आज तो चेहरा पूरा खिल रहा है। इतनी गुलाबी क्यों हो? रामू ने कुछ कहा ना छोड़ते वक्त?”
मैंने आँखें झुकाईं। “बस… शाम को लेने आएगा बोल के चला गया।”
सोनिया तुरंत मेरे डेस्क के पास आ गई। कुर्सी घुमाकर बिल्कुल करीब बैठ गई और आवाज बहुत धीमी कर ली।
“शाम को? फिर से? रुही… अब तो पूरा बता। वो रात… रामू के छोटे से कमरे वाली सुहागरात। आज तक आधा-अधूरा सुनाया है तूने। आज सब कुछ बता… एक-एक करके।”
मेरे गाल जलने लगे। “सोनिया… मत पूछ… बहुत शर्म आती है।”
“शर्म किस बात की? तू खुद उसकी दुल्हन बनकर गई थी उस कमरे में। बता… कैसे बैठी थी तू?”
मैंने लंबी साँस ली। आवाज फुसफुसाहट में बदल गई। उंगलियाँ कीबोर्ड पर बेचैन हो रही थीं।
“उसके छोटे से कमरे में… एक चारपाई, एक खिड़की, हल्की सी रोशनी। मैं… मैं दुल्हन बनकर बैठी थी। लाल साड़ी, पूरा जेवर, घूँघट डाले। बाल खुले थे, मेकअप किया हुआ। रामू जी दरवाजा बंद करके आए… और बस मुझे घूरने लगे। उनकी आँखों में भूख थी।”
सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। “फिर?”
“वो मेरे पास आए… घूँघट धीरे से उठाया। फिर… मेरे होंठ पकड़ लिए। पहले हल्के-हल्के चूसने लगे। फिर जोर से। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस गई… बहुत अंदर तक। मैं… मैं उनका थूक पी रही थी। पूरा। उनकी दाढ़ी मेरे गालों पर रगड़ रही थी। मैं काँप रही थी सोनिया… पूरे शरीर में सिहरन थी।”
सोनिया की साँस तेज हो गई। “और स्तन?”
मैंने आँखें और झुका लीं। “उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू हटाया… ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। मेरे स्तन निकाल लिए। पहले सिर्फ देख रहे थे… फिर मुँह में ले लिया। एक को जोर-जोर से चूस रहे थे, निपल को दाँतों से हल्के से काट रहे थे। दूसरे को अपने बड़े हाथ से मसल रहे थे। इतने बड़े हाथ हैं उनके… पूरा स्तन उनकी हथेली में समा जाता है। मैं कराह रही थी… ‘रामू जी… छोड़ो…’ लेकिन अंदर से चाह रही थी कि और जोर से चूसें।”
“नंगा कैसे किया?”
“साड़ी पूरी खोल दी… पेटticoat, पैंटी… सब। मैं बिल्कुल नंगी हो गई उनकी चारपाई पर। वो खड़े-खड़े अपनी पैंट खोल रहे थे। जब उनका लंड बाहर आया तो… सोनिया… मैं डर गई। इतना मोटा… इतना लंबा… नसें फूली हुईं। सिर चमक रहा था। मैंने हाथ बढ़ाया तो पूरा मुट्ठी में नहीं आया। इतना मोटा था।”
सोनिया ने धीरे से सीटी बजाई। “तूने चूसा?”
मैं शर्म से पानी-पानी हो गई। “हाँ… उन्होंने मेरे बाल पकड़कर मेरे मुँह के पास लाया। मैंने पहले चाटा… फिर मुँह में ले लिया। पूरा नहीं जा रहा था… गला भर गया। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। मैं आँखें बंद किए उनकी लंड चूस रही थी… उनकी उंगलियाँ मेरे बालों में थीं। वो कराह रहे थे… ‘और ले… दुल्हन… और चूस।’”
मैंने थोड़ा रुका। सोनिया ने मेरे घुटने पर हाथ रखा। “अब बता… कैसे चोदा? किस-किस पोज में?”
मेरी आवाज काँप रही थी। “पहले… उन्होंने मुझे चित लिटाया। मेरी दोनों टाँगें उठाईं… अपने कंधों पर रख दीं। फिर लंड मेरे छेद पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेल दिया। पहली बार… इतना दर्द हुआ कि मैं चिल्ला पड़ी। ‘आह्ह… रामू जी… दर्द हो रहा है…’ लेकिन उन्होंने रुके नहीं। पूरा अंदर तक डाल दिया। फिर हिले… पहले धीरे… फिर तेज। मेरी चीखें निकल रही थीं। चारपाई चरमरा रही थी।”
“और?”
“फिर उन्होंने मुझे कुत्ते की तरह कर दिया। पीछे से। मेरे बाल पकड़कर खींच रहे थे। हर धक्के के साथ मेरी चीख निकल रही थी। ‘उह्ह… अह्ह… रामू जी… और जोर से…’ मैं खुद बोल रही थी। उनके बड़े हाथ मेरी कमर पकड़े हुए थे… इतनी जोर से कि निशान पड़ गए।”
सोनिया ने और करीब आकर पूछा, “तीसरी पोज?”
“हाँ… उन्होंने मुझे ऊपर बैठाया। मैं उनकी छाती पर बैठ गई। उनका लंड पूरा अंदर था। उन्होंने मेरी कमर पकड़कर मुझे ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया। मेरे स्तन उनके मुँह के पास आ-जा रहे थे… वो बीच-बीच में चूस लेते थे। मैं उनकी छाती पर नाखून गाड़ रही थी… चीख-चीख कर बोल रही थी। इतनी जोर से चिल्लाई कि गला बैठ गया।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। याद आते ही शरीर में फिर से गर्मी फैल गई।
“रात में… दो बार पूरा किया। दूसरी बार के बाद… जब वो बाहर निकाले… तो मैं उनके चरणों में गिर गई। उनके पैर पकड़कर चूमने लगी। उनके हाथ चाटने लगी… उंगलियाँ मुँह में ले लीं। रोते-रोते बोल रही थी, ‘रामू जी… मैं आपकी हूँ… सिर्फ आपकी… सनी की नहीं।’ उन्होंने मेरे बाल सहलाए और बोले, ‘मेरी दुल्हन… अब हर रात मेरी रहेगी।’”
सोनिया कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, “रुही… तू तो पूरी पागल हो गई है उसकी। इतनी डिटेल याद है तुझे… मतलब अभी भी गीली हो जाती होगी याद करके।”
मैंने जल्दी से सिर उठाया। गाल जल रहे थे। “सोनिया… दत्त चुप कर! बहुत शर्म आती है मुझे। अब काम कर… बॉस आ जाएगा।”
सोनिया हँस पड़ी, आवाज दबाते हुए। “ठीक है… ठीक है। लेकिन शाम को जब वो लेने आए… तो मुझे जरूर बताना। और अगली बार… जब वो फिर से तुझे उस छोटे कमरे में ले जाए… तो और डिटेल याद रखना।”
मैंने मुँह फेर लिया। कंप्यूटर की स्क्रीन पर नजरें गड़ा दीं, लेकिन दिमाग कहीं और था। रामू जी का वो मोटा लंड, उनके बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी मेरे स्तनों पर, और मेरी खुद की चीखें… बार-बार कानों में गूँज रही थीं। जाँघों के बीच हल्की सी सनसनाहट हो रही थी।
मन ही मन एक ही बात घूम रही थी—शाम को… तैयार रहना।
“शाम को लेने आऊँगा… तैयार रहना।” उसने धीरे से कहा, एक आँख मारी और हँसते हुए चला गया।
मैं शर्म से पूरी लाल हो गई। जल्दी से उतर कर ऑफिस के अंदर घुस गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
वर्क एरिया में घुसते ही सोनिया सामने से मिली। उसने मुझे एक नजर में पढ़ लिया।
“अरे रुही… आज तो चेहरा पूरा खिल रहा है। इतनी गुलाबी क्यों हो? रामू ने कुछ कहा ना छोड़ते वक्त?”
मैंने आँखें झुकाईं। “बस… शाम को लेने आएगा बोल के चला गया।”
सोनिया तुरंत मेरे डेस्क के पास आ गई। कुर्सी घुमाकर बिल्कुल करीब बैठ गई और आवाज बहुत धीमी कर ली।
“शाम को? फिर से? रुही… अब तो पूरा बता। वो रात… रामू के छोटे से कमरे वाली सुहागरात। आज तक आधा-अधूरा सुनाया है तूने। आज सब कुछ बता… एक-एक करके।”
मेरे गाल जलने लगे। “सोनिया… मत पूछ… बहुत शर्म आती है।”
“शर्म किस बात की? तू खुद उसकी दुल्हन बनकर गई थी उस कमरे में। बता… कैसे बैठी थी तू?”
मैंने लंबी साँस ली। आवाज फुसफुसाहट में बदल गई। उंगलियाँ कीबोर्ड पर बेचैन हो रही थीं।
“उसके छोटे से कमरे में… एक चारपाई, एक खिड़की, हल्की सी रोशनी। मैं… मैं दुल्हन बनकर बैठी थी। लाल साड़ी, पूरा जेवर, घूँघट डाले। बाल खुले थे, मेकअप किया हुआ। रामू जी दरवाजा बंद करके आए… और बस मुझे घूरने लगे। उनकी आँखों में भूख थी।”
सोनिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। “फिर?”
“वो मेरे पास आए… घूँघट धीरे से उठाया। फिर… मेरे होंठ पकड़ लिए। पहले हल्के-हल्के चूसने लगे। फिर जोर से। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस गई… बहुत अंदर तक। मैं… मैं उनका थूक पी रही थी। पूरा। उनकी दाढ़ी मेरे गालों पर रगड़ रही थी। मैं काँप रही थी सोनिया… पूरे शरीर में सिहरन थी।”
सोनिया की साँस तेज हो गई। “और स्तन?”
मैंने आँखें और झुका लीं। “उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू हटाया… ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। मेरे स्तन निकाल लिए। पहले सिर्फ देख रहे थे… फिर मुँह में ले लिया। एक को जोर-जोर से चूस रहे थे, निपल को दाँतों से हल्के से काट रहे थे। दूसरे को अपने बड़े हाथ से मसल रहे थे। इतने बड़े हाथ हैं उनके… पूरा स्तन उनकी हथेली में समा जाता है। मैं कराह रही थी… ‘रामू जी… छोड़ो…’ लेकिन अंदर से चाह रही थी कि और जोर से चूसें।”
“नंगा कैसे किया?”
“साड़ी पूरी खोल दी… पेटticoat, पैंटी… सब। मैं बिल्कुल नंगी हो गई उनकी चारपाई पर। वो खड़े-खड़े अपनी पैंट खोल रहे थे। जब उनका लंड बाहर आया तो… सोनिया… मैं डर गई। इतना मोटा… इतना लंबा… नसें फूली हुईं। सिर चमक रहा था। मैंने हाथ बढ़ाया तो पूरा मुट्ठी में नहीं आया। इतना मोटा था।”
सोनिया ने धीरे से सीटी बजाई। “तूने चूसा?”
मैं शर्म से पानी-पानी हो गई। “हाँ… उन्होंने मेरे बाल पकड़कर मेरे मुँह के पास लाया। मैंने पहले चाटा… फिर मुँह में ले लिया। पूरा नहीं जा रहा था… गला भर गया। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। मैं आँखें बंद किए उनकी लंड चूस रही थी… उनकी उंगलियाँ मेरे बालों में थीं। वो कराह रहे थे… ‘और ले… दुल्हन… और चूस।’”
मैंने थोड़ा रुका। सोनिया ने मेरे घुटने पर हाथ रखा। “अब बता… कैसे चोदा? किस-किस पोज में?”
मेरी आवाज काँप रही थी। “पहले… उन्होंने मुझे चित लिटाया। मेरी दोनों टाँगें उठाईं… अपने कंधों पर रख दीं। फिर लंड मेरे छेद पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेल दिया। पहली बार… इतना दर्द हुआ कि मैं चिल्ला पड़ी। ‘आह्ह… रामू जी… दर्द हो रहा है…’ लेकिन उन्होंने रुके नहीं। पूरा अंदर तक डाल दिया। फिर हिले… पहले धीरे… फिर तेज। मेरी चीखें निकल रही थीं। चारपाई चरमरा रही थी।”
“और?”
“फिर उन्होंने मुझे कुत्ते की तरह कर दिया। पीछे से। मेरे बाल पकड़कर खींच रहे थे। हर धक्के के साथ मेरी चीख निकल रही थी। ‘उह्ह… अह्ह… रामू जी… और जोर से…’ मैं खुद बोल रही थी। उनके बड़े हाथ मेरी कमर पकड़े हुए थे… इतनी जोर से कि निशान पड़ गए।”
सोनिया ने और करीब आकर पूछा, “तीसरी पोज?”
“हाँ… उन्होंने मुझे ऊपर बैठाया। मैं उनकी छाती पर बैठ गई। उनका लंड पूरा अंदर था। उन्होंने मेरी कमर पकड़कर मुझे ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया। मेरे स्तन उनके मुँह के पास आ-जा रहे थे… वो बीच-बीच में चूस लेते थे। मैं उनकी छाती पर नाखून गाड़ रही थी… चीख-चीख कर बोल रही थी। इतनी जोर से चिल्लाई कि गला बैठ गया।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। याद आते ही शरीर में फिर से गर्मी फैल गई।
“रात में… दो बार पूरा किया। दूसरी बार के बाद… जब वो बाहर निकाले… तो मैं उनके चरणों में गिर गई। उनके पैर पकड़कर चूमने लगी। उनके हाथ चाटने लगी… उंगलियाँ मुँह में ले लीं। रोते-रोते बोल रही थी, ‘रामू जी… मैं आपकी हूँ… सिर्फ आपकी… सनी की नहीं।’ उन्होंने मेरे बाल सहलाए और बोले, ‘मेरी दुल्हन… अब हर रात मेरी रहेगी।’”
सोनिया कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, “रुही… तू तो पूरी पागल हो गई है उसकी। इतनी डिटेल याद है तुझे… मतलब अभी भी गीली हो जाती होगी याद करके।”
मैंने जल्दी से सिर उठाया। गाल जल रहे थे। “सोनिया… दत्त चुप कर! बहुत शर्म आती है मुझे। अब काम कर… बॉस आ जाएगा।”
सोनिया हँस पड़ी, आवाज दबाते हुए। “ठीक है… ठीक है। लेकिन शाम को जब वो लेने आए… तो मुझे जरूर बताना। और अगली बार… जब वो फिर से तुझे उस छोटे कमरे में ले जाए… तो और डिटेल याद रखना।”
मैंने मुँह फेर लिया। कंप्यूटर की स्क्रीन पर नजरें गड़ा दीं, लेकिन दिमाग कहीं और था। रामू जी का वो मोटा लंड, उनके बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी मेरे स्तनों पर, और मेरी खुद की चीखें… बार-बार कानों में गूँज रही थीं। जाँघों के बीच हल्की सी सनसनाहट हो रही थी।
मन ही मन एक ही बात घूम रही थी—शाम को… तैयार रहना।


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