07-08-2026, 07:44 PM
(This post was last modified: 07-08-2026, 07:47 PM by Lovewinni22. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
रात भर सनी जी के साथ जो कुछ हुआ था, वो सब अभी भी मेरे शरीर पर चिपका हुआ था। उनके पसीने की हल्की सी गंध, मेरे जांघों पर उनके नाखूनों के निशान, और गर्दन पर उनके चुम्बन के निशान… लेकिन जब आँखें खुलीं तो पहला ख्याल रामू जी का आया।
सुबह की रोशनी खिड़की से छनकर आ रही थी। मैं बिस्तर पर करवट लेकर लेटी थी, आँखें आधी खुली। शरीर में सुन्नता थी, लेकिन मन में चिड़चिड़ापन। सनी जी अभी भी गहरी नींद में थे। मैं धीरे से उठी, साड़ी ठीक की, बालों को बिखरा छोड़ दिया। आईने में देखा – गुलाबी-गोरा चेहरा, थके हुए लेकिन सेक्सी आँखें, लंबे बाल कंधों पर बिखरे, और होंठ अभी भी थोड़े सूजे हुए।
रसोई में जाकर चाय बनाई। रोटी, सब्जी, दही – सब परोसा। फिर सनी जी को जगाया।
“उठ जाओ… ऑफिस का टाइम हो गया।” मेरी आवाज़ में नाराज़गी साफ थी।
सनी जी उठे, मुस्कुराए, “रात भर थक गई हो क्या? आओ न, एक चुम्बन तो दो।”
मैंने मुँह फेर लिया। “बहुत देर हो रही है। जल्दी तैयार हो जाओ।”
मैंने थाली उनके सामने रखी। वो खा रहे थे और मैं खड़ी-खड़ी उनकी तरफ देख रही थी, लेकिन दिमाग में रामू जी के बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी वाली मुस्कान, और तंबाकू की गंध घूम रही थी। चिड़चिड़ापन और बढ़ गया।
सनी जी ऑफिस के लिए निकले। दरवाज़ा बंद होते ही मैं साँस छोड़ी।
थोड़ी देर बाद शांता बाई आई। साफ-सफाई करने। उसने मेरा चेहरा देखा और हँस पड़ी।
“अरे भावजी! आज तो बड़ा गुस्सा भरा चेहरा है। रात को सनी बाबू से बहुत लड़ाई हुई क्या?”
मैंने चाय का कप हाथ में लिया, आँखें झुकाईं। “कुछ नहीं शांता बाई… बस नींद नहीं पूरी हुई।”
शांता बाई पास आकर बैठ गई। आवाज़ धीमी की, “नींद नहीं पूरी हुई… या अपने यार को बहुत याद आ रही है? बताओ ना… रामू वाले ऑटो वाले की बात कर रही हूँ। तुम्हारा चेहरा देखकर लगता है कि आज तो दिल कहीं और है।”
मेरे गाल लाल हो गए। मैंने झट से जवाब दिया, “क्या बकवास करती हो! शांता बाई, चुप रहो।”
“अरे हाँ-हाँ, चुप रहूँगी। लेकिन आँखें तो झूठ नहीं बोलतीं भावजी। तुम्हारी आँखों में वो भूख है जो सिर्फ सनी बाबू से नहीं मिटती।”
इसी बीच दरवाज़े पर दस्तक हुई। बिना इंतज़ार किए दरवाज़ा खुला और रामू जी अंदर आ गए। छह फुट का लंबा शरीर, थोड़ी काली रंगत, घनी दाढ़ी, और हाथ… वो बड़े-बड़े हाथ। उन्होंने मुझे एक नज़र में देखा, फिर शांता बाई की तरफ।
शांता बाई मुस्कुराई और पीछे हट गई।
रामू जी सीधे मेरे पास आए। एक झटके में अपने मजबूत हाथों से मुझे गोद में उठा लिया। मेरा शरीर उनके सीने से सट गया। साड़ी का पल्लू खिसक गया।
“रामू जी…!” मैं शर्माते हुए बोली, लेकिन आवाज़ में विरोध कम और उत्तेजना ज्यादा थी। “छोड़ो… लेट हो रहा है। ऑफिस जाना है। छुट्टियाँ खत्म हो गईं… पता है ना तुम्हें।”
रामू जी ने मुझे और कसकर पकड़ा। उनकी साँस में तंबाकू और सिगरेट की हल्की गंध थी। उन्होंने मेरे माथे पर चुम्बन लिया, फिर गाल पर, फिर होंठों के कोने पर।
“चुप… एक मिनट भी नहीं छोड़ूँगा तुझे आज।” उनके बड़े हाथ मेरी कमर पर फिसले, फिर थोड़ा और नीचे। “शरीर तो अभी भी गर्म है रात वाले सनी का… लेकिन आँखें मेरी तलाश में हैं।”
मैंने शर्म से आँखें बंद कर लीं। शांता बाई दीवार के सहारे खड़ी देख रही थी, मुस्कुरा रही थी।
“रामू जी… काफी हो गया। अब छोड़ो। ऑफिस पहुँचना है।”
रामू जी ने मुझे नीचे उतारा, लेकिन हाथ कमर से नहीं हटाए। “चल… मैं छोड़ दूँगा। ऑटो खड़ी है।”
मैंने शांता बाई की तरफ देखा। “शांता बाई… तुम सफाई करके लॉक लगा देना और चली जाना। चाभी नीचे वाली जगह पर रख देना।”
शांता बाई ने सिर हिलाया, “ठीक है भावजी… आप जाइए। और… सावधान रहिए।”
रामू जी ने मेरा हाथ पकड़ा और नीचे ले गए। ऑटो में बिठाया। पीछे वाली सीट पर मैं बैठी, वो आगे। शीशे में से वो बार-बार मुझे देख रहे थे। मुस्कुरा रहे थे। दाढ़ी में हल्की सी मुस्कान तैर रही थी।
“क्या देख रहे हो?” मैंने शर्माते हुए पूछा।
“तुझे देख रहा हूँ। रात भर सनी के नीचे रही, फिर भी सुबह मेरे लिए लाल हो रही है। इतनी गोरी… इतनी गुलाबी… और ये होंठ।” उन्होंने तंबाकू का पान मुँह में दबाया और फिर बोले, “आज ऑफिस में भी मेरे बारे में सोचेगी ना?”
मैंने आँखें झुका लीं। बाल चेहरे पर गिर गए। “बात मत करो ऐसे… कोई देख लेगा।”
“देखे तो देखे। मेरी औरत है तू। सनी सिर्फ नाम का पति है।”
ऑटो सड़क पर दौड़ रही थी। बीच-बीच में रामू जी शीशे में से मुस्कुरा रहे थे, और मैं हर बार शर्म से लाल हो जाती थी। उनके बड़े हाथ स्टीयरिंग पर थे, लेकिन मेरी नज़र बार-बार उन्हीं हाथों पर चली जाती थी – जो रात को मेरे शरीर पर घूमते थे।
ऑफिस पहुँचे। रामू जी ने ऑटो रोकी। मैं उतरने लगी तो उन्होंने हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ लिया।
“शाम को आऊँगा। तैयार रहना।”
मैंने जल्दी से हाथ छुड़ाया और अंदर चली
सुबह की रोशनी खिड़की से छनकर आ रही थी। मैं बिस्तर पर करवट लेकर लेटी थी, आँखें आधी खुली। शरीर में सुन्नता थी, लेकिन मन में चिड़चिड़ापन। सनी जी अभी भी गहरी नींद में थे। मैं धीरे से उठी, साड़ी ठीक की, बालों को बिखरा छोड़ दिया। आईने में देखा – गुलाबी-गोरा चेहरा, थके हुए लेकिन सेक्सी आँखें, लंबे बाल कंधों पर बिखरे, और होंठ अभी भी थोड़े सूजे हुए।
रसोई में जाकर चाय बनाई। रोटी, सब्जी, दही – सब परोसा। फिर सनी जी को जगाया।
“उठ जाओ… ऑफिस का टाइम हो गया।” मेरी आवाज़ में नाराज़गी साफ थी।
सनी जी उठे, मुस्कुराए, “रात भर थक गई हो क्या? आओ न, एक चुम्बन तो दो।”
मैंने मुँह फेर लिया। “बहुत देर हो रही है। जल्दी तैयार हो जाओ।”
मैंने थाली उनके सामने रखी। वो खा रहे थे और मैं खड़ी-खड़ी उनकी तरफ देख रही थी, लेकिन दिमाग में रामू जी के बड़े हाथ, उनकी दाढ़ी वाली मुस्कान, और तंबाकू की गंध घूम रही थी। चिड़चिड़ापन और बढ़ गया।
सनी जी ऑफिस के लिए निकले। दरवाज़ा बंद होते ही मैं साँस छोड़ी।
थोड़ी देर बाद शांता बाई आई। साफ-सफाई करने। उसने मेरा चेहरा देखा और हँस पड़ी।
“अरे भावजी! आज तो बड़ा गुस्सा भरा चेहरा है। रात को सनी बाबू से बहुत लड़ाई हुई क्या?”
मैंने चाय का कप हाथ में लिया, आँखें झुकाईं। “कुछ नहीं शांता बाई… बस नींद नहीं पूरी हुई।”
शांता बाई पास आकर बैठ गई। आवाज़ धीमी की, “नींद नहीं पूरी हुई… या अपने यार को बहुत याद आ रही है? बताओ ना… रामू वाले ऑटो वाले की बात कर रही हूँ। तुम्हारा चेहरा देखकर लगता है कि आज तो दिल कहीं और है।”
मेरे गाल लाल हो गए। मैंने झट से जवाब दिया, “क्या बकवास करती हो! शांता बाई, चुप रहो।”
“अरे हाँ-हाँ, चुप रहूँगी। लेकिन आँखें तो झूठ नहीं बोलतीं भावजी। तुम्हारी आँखों में वो भूख है जो सिर्फ सनी बाबू से नहीं मिटती।”
इसी बीच दरवाज़े पर दस्तक हुई। बिना इंतज़ार किए दरवाज़ा खुला और रामू जी अंदर आ गए। छह फुट का लंबा शरीर, थोड़ी काली रंगत, घनी दाढ़ी, और हाथ… वो बड़े-बड़े हाथ। उन्होंने मुझे एक नज़र में देखा, फिर शांता बाई की तरफ।
शांता बाई मुस्कुराई और पीछे हट गई।
रामू जी सीधे मेरे पास आए। एक झटके में अपने मजबूत हाथों से मुझे गोद में उठा लिया। मेरा शरीर उनके सीने से सट गया। साड़ी का पल्लू खिसक गया।
“रामू जी…!” मैं शर्माते हुए बोली, लेकिन आवाज़ में विरोध कम और उत्तेजना ज्यादा थी। “छोड़ो… लेट हो रहा है। ऑफिस जाना है। छुट्टियाँ खत्म हो गईं… पता है ना तुम्हें।”
रामू जी ने मुझे और कसकर पकड़ा। उनकी साँस में तंबाकू और सिगरेट की हल्की गंध थी। उन्होंने मेरे माथे पर चुम्बन लिया, फिर गाल पर, फिर होंठों के कोने पर।
“चुप… एक मिनट भी नहीं छोड़ूँगा तुझे आज।” उनके बड़े हाथ मेरी कमर पर फिसले, फिर थोड़ा और नीचे। “शरीर तो अभी भी गर्म है रात वाले सनी का… लेकिन आँखें मेरी तलाश में हैं।”
मैंने शर्म से आँखें बंद कर लीं। शांता बाई दीवार के सहारे खड़ी देख रही थी, मुस्कुरा रही थी।
“रामू जी… काफी हो गया। अब छोड़ो। ऑफिस पहुँचना है।”
रामू जी ने मुझे नीचे उतारा, लेकिन हाथ कमर से नहीं हटाए। “चल… मैं छोड़ दूँगा। ऑटो खड़ी है।”
मैंने शांता बाई की तरफ देखा। “शांता बाई… तुम सफाई करके लॉक लगा देना और चली जाना। चाभी नीचे वाली जगह पर रख देना।”
शांता बाई ने सिर हिलाया, “ठीक है भावजी… आप जाइए। और… सावधान रहिए।”
रामू जी ने मेरा हाथ पकड़ा और नीचे ले गए। ऑटो में बिठाया। पीछे वाली सीट पर मैं बैठी, वो आगे। शीशे में से वो बार-बार मुझे देख रहे थे। मुस्कुरा रहे थे। दाढ़ी में हल्की सी मुस्कान तैर रही थी।
“क्या देख रहे हो?” मैंने शर्माते हुए पूछा।
“तुझे देख रहा हूँ। रात भर सनी के नीचे रही, फिर भी सुबह मेरे लिए लाल हो रही है। इतनी गोरी… इतनी गुलाबी… और ये होंठ।” उन्होंने तंबाकू का पान मुँह में दबाया और फिर बोले, “आज ऑफिस में भी मेरे बारे में सोचेगी ना?”
मैंने आँखें झुका लीं। बाल चेहरे पर गिर गए। “बात मत करो ऐसे… कोई देख लेगा।”
“देखे तो देखे। मेरी औरत है तू। सनी सिर्फ नाम का पति है।”
ऑटो सड़क पर दौड़ रही थी। बीच-बीच में रामू जी शीशे में से मुस्कुरा रहे थे, और मैं हर बार शर्म से लाल हो जाती थी। उनके बड़े हाथ स्टीयरिंग पर थे, लेकिन मेरी नज़र बार-बार उन्हीं हाथों पर चली जाती थी – जो रात को मेरे शरीर पर घूमते थे।
ऑफिस पहुँचे। रामू जी ने ऑटो रोकी। मैं उतरने लगी तो उन्होंने हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ लिया।
“शाम को आऊँगा। तैयार रहना।”
मैंने जल्दी से हाथ छुड़ाया और अंदर चली


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)