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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
शेर (उसकी थरथराती नाभि पर हाथ फेरते हुए): "मुँह से तो बड़ा मना कर रही थीं, पर आपका यह गरम बदन तो कुछ और ही गवाही दे रहा है! बदन की यह आग छुपाए नहीं छुपती मेमसाब..."

 
मीरा (घबराहट और शर्मिंदगी से अपनी आँखें भींचते हुए, हांफते स्वर में): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा मत बोलो... मुझे छोड़ दो... बस करो..."
 
मीरा (मन ही मन आत्मा के गिल्ट और नफरत में जलते हुए सोचती है): "हे ईश्वर, यह हैवान क्या कह रहा है? क्या सच में मेरा बदन इस ज़िल्लत में पिघल रहा है? नहीं... मैं ऐसी औरत नहीं हूँ! मैं एक इज़्ज़तदार माँ हूँ, सरताज की वफादार पत्नी हूँ... मुझे इस घिनौने अहसास से बचा लो!"
 
शेर (उंगली से मीरा की नाभि के पास लगी अपनी लार को फैलाते हुए, हुक्म देती आवाज़ में): "मेमसाब! खेल तो अभी शुरू हुआ है। जैसे पहले बोला था, वैसे ही अब बोलती रहो।"
 
शेर (उसकी कमर में अपनी उंगलियां गड़ाते हुए मुस्कान के साथ बोला): "अपनी इस मदहोश आवाज़ में मुझसे खुद कहो... मुझसे पूछो कि मैं तुम्हारे इस गोरे, नंगे पेट का और क्या हाल करूँ? बोलो मेमसाब, जब तक तुम खुद अपनी ज़ुबान से नहीं कहोगी, यह शेर आगे नहीं बढ़ेगा। बोलो कि मैं इस पेट का क्या हाल करूँ?!"
 
मीरा पूरी तरह मौन हो चुकी थी। अपमान की इतनी गहरी खाई में वह गिर चुकी थी कि उसकी जुबान ने उसका साथ देना बंद कर दिया था।
 
लेकिन शेर को उसका यह मौन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था। वह मीरा के भीतर की मालकिन को पूरी तरह कुचलकर उसे अपने इशारों पर नाचने वाली एक बेबस मूरत बना देना चाहता था।
 
जब मीरा ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, तो शेर के चेहरे पर गुस्सा उभर आया। उसने अपना मुँह आगे बढ़ाया और मीरा की नाभि के ठीक पास की कोमल त्वचा को अपने दाँतों के बीच भींचकर एक ज़ोरदार तीखा कट मार दिया।
 
मीरा (दर्द से तड़प उठती है, उसकी चीख रसोई की दीवारों से टकराती है): "आह्ह्ह! शेर... मर गई... छोड़ो... प्लीज छोड़ो!"
 
दर्द की एक तेज़ लहर मीरा के पूरे बदन में दौड़ गई। शेर ने दाँत तब तक नहीं हटाए जब तक मीरा के जिस्म पर उसके तीखे दाँतों के गहरे लाल निशान नहीं उभरा आए। दर्द और अपनी बेटी की सलामती का खौफ इस कदर हावी हुआ कि मीरा का बचा-कुचा हौसला भी पूरी तरह टूट गया।
 
वह पूरी तरह टूट चुकी थी। उसने रोते और सिसकते हुए आखिरकार अपनी ज़ुबान खोली और वही शब्द कहे जो वह शैतान सुनना चाहता था।
 
मीरा (अत्यधिक दर्द, सिसकियों और बेबसी के चरम पर थरथराते हुए): "हा... हाँ शेर... और... और चूसो... मेरे... मेरे इस पूरे पेट को... अपनी लार से गीला कर दो..."
 
इन शब्दों के निकलते ही शेर ने अपनी जीभ बाहर निकाली और जहाँ उसने काटा था, उस ज़ख्म और लाल निशान पर अपनी गर्म, गीली जीभ फेरना शुरू कर दिया।
 
जैसे ही शेर की जीभ ने उस कटे हुए ज़ख्म को चाटा, मीरा का पूरा वजूद कांप उठा। कटे हुए स्थान पर जलन और जीभ की सहलाती गर्माहट के संगम ने मीरा की योनि में एक भयानक, बिजली जैसा करंट दौड़ा दिया।
 
मीरा (अचानक आए उस तीखे झटके से आँखें फटी की फटी रह गईं, उसके मुँह से बेकाबू आह निकल गई): "आअाह्हह... उफ़्फ़... श्श्श्... यह... यह क्या है..."
 
शेर (उसके पेट पर जीभ रगड़ते हुए): "वाह मेमसाब... यही आवाज़ तो सुननी थी मुझे!"
 
सरताज ने आज तक मीरा को कभी रत्ती भर भी दर्द नहीं दिया था। उनका प्यार हमेशा धीमा, नाज़ुक और सम्मान से भरा होता था।
 
मीरा ने अपनी पूरी ज़िंदगी में दर्द और उत्तेजना के इस खौफनाक मेल का अहसास कभी नहीं किया था—जहाँ ऊपर तीखा दर्द जल रहा था, वहीं नीचे उसकी योनि कामुक रस से गीली होकर प्यास से थिरकने लगी थी।
 
मीरा (मन ही मन गहराते गिल्ट में तड़पते हुए खुद को कोसने लगी): "हे भगवान! यह कैसा पाप हो रहा है मुझसे? सरताज ने तो मुझे हमेशा फूलों की तरह रखा... और यह नीच हैवान मुझे दर्द दे रहा है, मुझे नोच रहा है... फिर भी मेरी योनि में यह कैसा ज़हरीला आनंद फूट रहा है? मेरा बदन इतना नीच कैसे हो सकता है?"
 
मीरा (शेर के बालों में अनजाने में उंगलियां फंसाते हुए, दर्द और बेकाबू मजे की दोहरी आग में सिसकने लगी): "आह्ह्... शेर... उफ़्फ़... मत चाटो वहाँ... आह्ह्... मर जाऊँगी... श्श्श्..."
 
शेर (उसके पेट पर जीभ रगड़ते हुए, उसकी थरथराती जाँघों को भांपकर ठहाका लगाता है): "वाह मेमसाब! आपके पेट का यह ज़ख्म तो आपकी जवानी की सबसे मीठी आवाज़ें बाहर निकाल रहा है!"
 
उसका एक हाथ मीरा की नाज़ुक कमर को जकड़े हुए था, तो दूसरा हाथ उसकी जाँघों के पास हरकत करने लगा।
 
शेर ने नीचे झुककर मीरा की नीली साड़ी के घेरे को सीधे उसकी जाँघों तक ऊपर की तरफ खींच दिया। साड़ी के सरकते ही मीरा की गोरी, मखमली टाँगें पूरी तरह नंगी हो गईं।
 
शेर की आँखें फटी की फटी रह गईं। इतनी सुंदर, इतनी बेदाग और चिकनी टाँगें देखकर उसके मुँह में पानी आ गया। शेर ने तुरंत अपने दोनों पैरों को आगे बढ़ाया और मीरा की उन काँपती हुई नंगी टाँगों को अपनी जाँघों के बीच फँसा लिया कि अब उसका एक इंच भी हिल पाना नामुमकिन हो गया।
 
इस नए और गहरे शारीरिक हमले से मीरा पूरी तरह शेर के शिकंजे में कैद हो चुकी थी। ऊपर से पल्लू हटा हुआ था और नीचे से साड़ी पूरी तरह खिंची हुई थी। शेर ने एक बार फिर उसकी डरी हुई आँखों में देखा और अपनी अगली माँग उसके सामने रख दी।
 
शेर (कामुक उन्माद में हाँफते हुए, मीरा की नंगी टाँगों को दबाकर): "वाह मेमसाब, वाह! इतनी चिकनी टाँगें आज तक तो सिर्फ फिल्मों में ही देखी थीं। अब आ रहा है असली मज़ा!"
 
शेर (उसकी कमर में उंगलियाँ गड़ाते हुए, मुस्कान के साथ हुक्म देता है): "अब ज़रा अपने इन गोरे हाथों से मेरे दोनों हाथों को पकड़िए... और धीरे-धीरे उन्हें ऊपर ले जाकर सीधे अपने इन सुडौल मम्मों पर रख दीजिए। और हाँ, अपनी इसी रसीली ज़ुबान से मुझसे कहिए भी!"
 
शेर (उसकी आँखों में झाँककर चिढ़ाते हुए फुसफुसाता है): "कहिए कि 'शेर, मेरे इन सुडौल मम्मों को भी छुओ और उनसे भी उतना ही प्यार करो जितना मेरे पेट से किया है... वे तड़प रहे हैं शेर के हाथों में आने के लिए!'"
 
मीरा (घोर अपमान से बुरी तरह चीखने लगी, उसका सिर चकराने लगा था): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा मत करवाओ... मैं बर्बाद हो जाऊँगी... सरताज मुझे जान से मार देंगे... प्लीज... अपनी कसम का इतना बड़ा फायदा मत उठाओ..."
 
शेर (अपनी जाँघों के बीच उसकी नंगी टाँगों को और कसकर भींचते हुए): "अरे-अरे मेमसाब! साहब का नाम बीच में लाकर मूड मत खराब कीजिए। इस वक्त इस रसोई में आपके साहब नहीं, सिर्फ यह नौकर है और आप हैं!"
 
मीरा के काँपते हुए, दूध जैसे गोरे हाथ जब शेर की हथेलियों से छुए, तो उसके पूरे वजूद में घृणा का एक तेज़ करंट दौड़ा।
 
लेकिन शेर की जाँघों के बीच फँसी उसकी अपनी नंगी टाँगें और दिमाग पर मंडराता ज्योति की कसम का साया... इन दोनों ने मिलकर उसकी बची-कुची इच्छाशक्ति को पूरी तरह पंगु बना दिया था।
 
मीरा ने रोते हुए, अपनी उंगलियों से शेर की कलाई को पकड़ा। उसने धीरे-धीरे शेर के दोनों भारी हाथों को अपनी गीली नाभि और पेट के ऊपर से सरकाते हुए ऊपर की तरफ खींचना शुरू किया।
 
शेर ने अपने हाथों को पूरी तरह ढीला छोड़ दिया था; वह इस पल का पूरा आनंद लेना चाहता था जहाँ मालकिन खुद एक दासी की तरह उसके हाथों को अपनी छाती की तरफ ले जा रही थी।
 
जैसे ही मीरा ने शेर की हथेलियों को अपने गहरे नीले रंग के स्लीवलेस ब्लाउज के ठीक ऊपर रखा, शेर के मुँह से एक गहरी, संतुष्ट आह निकल गई।
 
शेर (अपनी हथेलियों को मीरा के वक्षस्थल पर जमाते हुए, आँखें मूँदकर हँसी हंसता है): "आह्ह् मेमसाब... क्या मखमली चीज़ है! पर अपनी ज़ुबान मत भूलिए... !"
 
मीरा (ग्लानि और घोर अपमान के चरम परथरथराते स्वर में बोली): "शेर... मे... मेरे इन मम्मों को... भी छुओ..."
 
शेर (अपनी आँखें खोलकर, मुस्कुराते हुए उसकी छाती पर थोड़ा दबाव बढ़ाता है): "अरे मेमसाब, आधी लाइन से इस नौकर का दिल नहीं भरता! पूरी बात बोलिए!"
 
मीरा (अपनी आँखें बंद , अपनी आत्मा का गला घोंटते हुए कहती है): "...और... और इनसे भी... उतना ही प्यार करो... जितना... जितना मेरे पेट से किया है...वे तड़प रहे हैं शेर के हाथों में आने के लिए"
 
इन शब्दों का मीरा के मुँह से निकलना था कि शेर के हाथों की उंगलियाँ हरकत में आ गईं। उसने मीरा के दोनों भरे-पूरे अंगों को अपनी हथेलियों में बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया।
 
शेर (उसकी छाती को दबोचते हुए): "यह हुई न बात मेमसाब! आपकी यह आवाज़ सुनकर तो इस शेर का सीना और चौड़ा हो गया!"
 
ब्लाउज की तंग कटिंग के भीतर मीरा का बदन इस तीखे हमले से तड़प उठा। शेर का मुँह अब दोबारा आगे बढ़ा और वह मीरा के पेट को अपनी लार से भिगोते हुए ऊपर की तरफ आने लगा, ताकि वह सीधे उसके वक्षस्थल पर अपने दाँत गड़ा सके।
Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल 



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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 04-08-2026, 11:23 PM



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