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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#83
भाग ~ २२



अनीता घर के बरामदे में खाट पर लेटी हुई थी। दोपहर में खाने के बाद अपने मां बापू की तरह वो भी आराम कर रही थी। यूं तो गर्मी थी लेकिन मंद मंद चलती हवा बरामदे में भी आ रही थी इस लिए थोड़ी राहत थी। वो बार बार आँखें बंद कर के सोने की कोशिश करती मगर हर बार बंद पलकों में उसे अपने भाई राजू का चेहरा उभर आता था। वो चाह कर भी उसके बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पा रही थी। 

जब राजू का चेहरा उभरता तो वो सोचने लगती कि पिछले कुछ दिनों से उसके और राजू के बीच कितना लगाव हो गया था। इतना ही नहीं दोनों के बीच इतना गहरा प्यार भी हो गया था कि दोनों ही एक दूसरे की खुशी के बारे में सोचते रहते थे। माना कि उस प्यार की यथार्थ सच्चाई उसे बाद में पता चली थी या ये कहा जाए कि उसे एहसास हुआ था लेकिन एक सच तो यही था कि जब से दोनों के बीच ये प्यार का एहसास जागृत हुआ था तब से दोनों ही बेहद खुश रहने लगे थे। दोनों ही एक दूसरे का खयाल रखने लगे थे। इसके पहले बचपन से ही दोनों के बीच हर रोज़ झगड़ा ही होता आया था।

अनीता जब ये सब सोचती तो उसे याद आता कि कैसे उसका भाई उसकी एक मुस्कान के लिए कुछ भी कर जाता था। पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी राजू ने उसकी खुशी के लिए किया था वो सब उसे याद आता और फिर अनायास ही उसका कोमल दिल जोर जोर से धड़क उठता। 

तभी उसने बेचैनी से करवट ली और एकाएक ही उसके मन में खयाल उभरा कि क्या उसने राजू से दूरी बना कर सही किया है? मतलब कि जो कुछ हुआ है उसमें अकेले सिर्फ राजू की तो गलती नहीं थी, उसकी भी तो गलती थी। जैसे उसे देर से एहसास हुआ था कि ये प्यार भाई बहन वाला नहीं है उसी तरह राजू को भी तो देर से ही एहसास हुआ था। बल्कि ये कहना चाहिए कि उसके बताने पर ही उसे पता चला था। यानि अगर वो न बताती तो राजू यही समझता रहता कि ये प्यार भाई बहन वाला ही है। तो फिर कहां राजू की इसमें गलती हुई? सच तो ये है कि गलती किसी की भी नहीं है क्योंकि दोनों ही इस प्यार के असल सच से वाकिफ नहीं थे।

ये सब सोचते ही अनीता ने एक गहरी सांस ली। उसे थोड़ी राहत भी महसूस हुई। अगले ही पल उसके मन में सवाल उभरा कि भले ही गलती किसी की नहीं है लेकिन सच का पता चल जाने के बाद क्या फिर से दोनों का वैसे ही एक दूसरे के साथ रहना सही होगा?

अनीता को याद आया कि राजू ने उससे कहा था कि कोई चीज गलत तब होती है जब उसमें मर्यादाएं पार की जाएं। कुछ ऐसा किया जाए जिसे गांव समाज के लोग सही नहीं मानते। 

अनीता अंजाने में एक बार फिर इस सबके बारे में गहराई से सोचने में गुम हो गई। बार बार उसके मन में यही खयाल उभरता कि जब वो दोनों आपस में कुछ गलत करेंगे ही नहीं तो भला कैसे कोई इसे गलत कहेगा? भाई बहन के रिश्ते में भी तो गहरा प्यार ही होता है और दोनों भाई बहन एक दूसरे की हर खुशी का खयाल रखते हैं। यानि प्रेमी प्रेमिका वाला प्यार तब कहलाएगा जब वो दोनों प्रेमी प्रेमिका की तरह एक दूसरे के उन अंगों का स्पर्श करेंगे जिन अंगों को वो भाई बहन के रूप में स्पर्श नहीं कर सकते।

अचानक अनीता को याद आया कि उसने कई बार राजू के सामने अपना कुर्ता उतारा था। उसने सोचा ये भी तो गलत ही था। भला कोई बहन अपने भाई के सामने कुर्ता उतार कर अपना वो अंग कैसे उजागर कर सकती है जिसे गलत माना जाता है? 

अनीता ये सोचते ही एकदम से बेचैन हो उठी। उसके मन में यही बात उभरी कि हां ये पूरी तरह गलत था। उसे अपने भाई के सामने ऐसा नहीं करना चाहिए था। भला कौन बहन ऐसा करती है? 

अनीता को इस बात का पता ही न चला कि वो ये सब बातें सोचते सोचते किस भँवर में फंसती चली जा रही थी। थोड़ी देर बाद उसी भंवर में फंसी वो सो गई।

************

जब मैं मंजू काकी के घर के अंदर पहुंचा तो देखा काकी एक तरफ बरामदे में बिछी खाट पर लेटी हुईं थी। उनकी दोनों बेटियां मुझे वहां पर नजर न आईं। किसी के आने की आहट से उन्होंने करवट बदल कर बाहर की तरफ देखा।

मुझ पर नजर पड़ते ही उनके चेहरे के भाव बड़ी तेजी से बदले और फिर उनके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"मैं ऊपर वाले से प्रार्थना ही कर रही थी कि काश इस वक्त वो तुम्हें यहां भेज दे।" काकी ने उठते हुए कहा─"और देख लो उसने तुम्हें सच में भेज दिया। आओ मेरे पास बैठो।"

मैं जा कर चुपचाप उनकी खाट पर बैठ गया। एकाएक ही मेरी धडकनें बढ़ गईं थी। चेहरे पर पसीना झिलमिला आया था। मैंने चारों तरफ ये देखने के लिए निगाहें दौड़ाईं कि उनकी दोनों बेटियां कहां हैं?

"तुम्हारी दोनों बहनें अभी थोड़ी ही देर पहले अपनी काकी के घर गईं हैं।" काकी ने जैसे मेरे मन की बात पढ़ लिया था─"और तुम्हारे काका तो अभी अभी बाहर गए हैं।"

"तो इस वक्त तुम अकेली ही हो घर में?" मैं धड़कते दिल से पूछ बैठा।

"हां अकेली ही हूं।" काकी के होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान उभर आई─"और अब जब तुम भी आ गए हो तो यही चाहती हूं कि तुम मेरी मुराद पूरी कर दो।"

काकी के कहने का मतलब मैं फौरन समझ गया। मैं जल्दी कुछ बोल न सका लेकिन मेरे अंदर पलक झपकते ही हलचल मच गई। 

"तुमने सोचने का समय मांगा था राजू।" उधर काकी ने कहा─"तो बोलो क्या तुमने सोच लिया है? बताओ न राजू...क्या सोचा है तुमने?"

सच तो ये था कि मेरे अंदर से यही आवाज आ रही थी कि फौरन हाँ बोल दे। जिस चीज के लिए गांव के लोग जाने कहां कहां जुगाड़ लगाते फिरते हैं वो चीज तो तुम्हें खुद ही आसानी से मिल रही है। फिर क्यों काकी को हां नहीं कहता? 

मैं वाकई चाहता था कि झपट कर काकी को दबोच लूँ और फिर उनको जम के चोदना शुरू कर दूं लेकिन जाने क्यों मैं थोड़ा झिझक रहा था। एक घबराहट भी थी कि कहीं इस चक्कर में मैं किसी बड़ी मुसीबत में न फंस जाऊं।

तभी मंजू काकी खाट से उठीं। फिर बाहर चली गईं। मुझे समझ न आया कि अचानक वो बाहर क्यों चली गईं? 

"बाहर वाला द्वार बंद करने गई थी।" थोड़ी देर में आते ही काकी ने खुद ही बताया─"मैं नहीं चाहती कि गलती से भी कोई भूल हो जाए जिससे किसी को पता चल जाए।"

मैं कुछ न बोला। ये अलग बात है कि द्वार बंद करने की बात सुन कर मेरी धड़कनें और भी तेज चलने लगीं। तभी काकी मेरे एकदम करीब आ कर खड़ी हो गईं।

"क्या हुआ राजू? अब क्या सोच रहे हो?"

"कु..कुछ नहीं।"

"देखो राजू, तुम्हें बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है।" काकी ने जैसे मुझे समझाया─"और तुम्हें किसी बात से डरने की भी जरूरत नहीं है। हमारे बीच जो भी होगा उसके बारे में सिर्फ हमें ही पता रहेगा। हम कभी किसी को कुछ नहीं बताएंगे।"

"अ..और अगर किसी को पता चल गया तो??"

"नहीं पता चलेगा।" काकी ने कहा─"वैसे भी हमें कौन सा ये काम रोजाना करना है। हम सिर्फ दो या तीन बार करेंगे। मुझे पूरा भरोसा है कि इतने में ही मेरी कोख में तुम्हारा बीज ठहर जाएगा।"

मैं काकी को अजीब भाव से देखने लगा। असल में उनकी इस बात से मैं थोड़ा मायूस सा हो गया कि वो सिर्फ दो या तीन बार ही मेरे साथ चुदाई करेंगी। जबकि मेरा दिल तो अब ये चाहने लगा था कि काकी के साथ मैं हमेशा मजा करूं।

"क्या हुआ, ऐसे क्यों देख रहे हो राजू?"

"क्या सच में हम सिर्फ इतनी ही बार करेंगे?"

"हां इतने में मैं तुम्हारे बच्चे की मां बन सकती हूं।" काकी ने कहा फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ महसूस हुआ तो बोलीं─"हाय! दय्या राजू तुम्हारे कहने का मतलब क्या था? कहीं तुम ये तो नहीं कहना चाहते कि तुम मेरे साथ आगे भी ये काम करना चाहते हो?"

काकी की इस बात पर मैं अंदर ही अंदर हड़बड़ा गया और अनायास ही मेरा सिर झुक गया। उधर काकी समझ गईं कि उनकी शंका सच थी।

"अगर तुम सच में मुझे एक बेटे की मां बना दोगे।" काकी ने अचानक मेरा चेहरा ऊपर करके कहा─"तो मैं तुमसे वादा करती हूं कि तुम जब भी मेरे साथ ऐसा करने को कहोगे तो मैं तुम्हें इंकार नहीं करूंगी।"

मैंने काकी की आंखों में सच्चाई और दृढ़ता देखी। वो बड़े प्यार से मुझे देख रहीं थी। मेरा दिल अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगा था।

"चलो अब देर मत करो।" फिर उन्होंने कहा─"अभी हमारे पास अच्छा मौका है। कहीं ऐसा न हो कि मेरी बेटियां आ जाएं।"

कहने के साथ ही काकी फटाफट अपनी साड़ी खोलने लगीं। ये देख मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मेरे अंदर ये सोच कर जबरदस्त हलचल मच गई कि अब वो होने वाला है जिसके बारे में मैंने सिर्फ सुना था।

कुछ ही देर में काकी ने साड़ी खोल कर एक तरफ रख दी और फिर ब्लाउज खोलने लगीं। मैं बिना पलकें झपकाए उनके गदराए हुए बदन को देखे जा रहा था। जैसे ही उन्होंने सारे बटन खोल कर ब्लाउज को उतारा तो उनकी चूचियों के दोनों बड़े बड़े उभार उजागर हो गए। भूरे रंग के चूचक मटर के दाने से भी बड़े थे। उन्हें देख मेरा गला सूखने लगा। उधर काकी ने जैसे ही मुझे अपनी तरफ अपलक घूरता देखा तो उन्हें एकदम से शर्म आ गई। होठों पर शर्म मिश्रित मुस्कान भी उभर आई।

"ऐसे क्यों देख रहे हो राजू?" फिर वो बोलीं─"पहली बार तो ऐसे नहीं देख रहे हो मुझे।"

मैं एकदम से सकपका गया और इधर उधर देखने लगा। 

"चलो अब तुम भी अपने कपड़े उतार लो।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"हमें सब कुछ जल्दी करना होगा। तुम्हारी बहनें आ गईं तो कुछ नहीं हो पाएगा।"

मैं शर्मा तो रहा था लेकिन अंदर से यही चाहता था कि काकी को जल्दी से चोदना शुरू कर दूं। आख़िर घर से इसी लिए तो आया था यहां। मैंने उठ कर फटाफट अपने नीचे के कपड़े उतार दिए। मेरा लंड तो काकी को ऊपर से नंगा देखते ही खड़ा होने लग गया था। जैसे ही मैंने कच्छा उतारा तो वो लहरा उठा।

"हाय! दय्या, तुम तो सच में जवान हो गए हो राजू।" काकी ने आश्चर्य से मुंह पर हाथ रख कर कहा─"तुम्हें देख के कोई नहीं कह सकता कि तुमने अपने कच्छे में इतना बड़ा औजार छुपा रखा होगा।"

काकी के मुख से तारीफ सुन कर मुझे अच्छा भी लगा और थोड़ी शर्म भी आई। इसी लिए मैंने अपने लंड को हाथ से छुपाने की कोशिश की। मगर काकी ने फौरन आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया।

"अब इसको मत छुपाओ मेरे राजा।" काकी ने मेरा हाथ हटा कर लंड को पकड़ लिया─"इसी के द्वारा तो मुझे एक बेटे की मां बनना है। तुम्हारे बेटे की मां बनना है। हां राजू, जब ऐसा हो जाएगा तो एक तरह से तुम मेरे बेटे के बापू बन जाओगे। उफ्फ! देखो क्या क्या बोले जा रही हूं मैं।"

काकी हौले हौले मेरा लंड सहलाने लगीं थी जिससे वो अगले कुछ ही पलों में पूरी तरह अकड़ गया। उनके हाथों के स्पर्श से मेरे पूरे बदन में मजे की चिंगारियां फूटने लगीं थी। सहसा मेरी नजर उनकी चूचियों पर पड़ी तो मैंने बेधड़क हाथों को बढ़ा कर उन्हें पकड़ लिया और धीरे धीरे दबाने लगा।

"हां दबा लो राजू।" काकी ने कहा─"जितना मन करे दबा लो। अब से ये तुम्हारी ही हैं। जोर जोर से दबाओ और चाहो तो मुंह में ले कर चूसो भी।"

मैं एकदम से उतावला हो चुका था। काकी की चूचियों को जोर जोर से दबाने लगा। उनकी मुलायम चूचियों का मर्दन करने में मुझे बड़ा मजा आ रहा था। दूसरी तरफ काकी मेरे लंड को अब हिलाने लगीं थी। मेरा लंड बुरी तरह अकड़ चुका था।

"आह्ह्ह्ह्ह् राजू सिर्फ दबाते ही रहोगे क्या?" काकी बोल पड़ीं─"इनको मुंह में ले कर भी चूसो न।"

कहने के साथ ही काकी मेरे चेहरे को पकड़ कर अपनी एक चूची का निप्पल मेरे होठों पर रगड़ने लगी। मुझे अजीब सी झुरझुरी हुई और अगले ही पल मैंने मुंह खोल कर उनके चूचक को भर लिया।

"शश्श्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् ऐसे ही राजू।" काकी मस्ती में सिसक उठीं─"जोर जोर से चूसो। ये समझो कि इसमें से दूध निकल रहा है।"

काकी मेरे सिर के बालों में उगलियाँ घुमाने लगीं और मैं सच में किसी बच्चे की तरह उनकी चूची को चूसने लगा। चूची से दूध तो नहीं निकल रहा था लेकिन फिर भी मुझे मजा आ रहा था। 

मन्जू काकी ऊपर से पूरी नंगी थी इस लिए मैं चूची को चूसने के साथ साथ कभी दूसरी चूची को जोर से मसल दे रहा था तो कभी उनके जिस्म पर हाथ फिराने लगता था। इधर काकी पूरी तरह मस्ती में सिसकियां भरे जा रहीं थी।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् अब इस वाली को भी चूसो मेरे राजा।" काकी ने थोड़ा जोर दे कर अपनी दूसरी चूची पर मेरा मुंह सरकाया।

मेरे थूक से उनकी चूची गीली हो चुकी थी लेकिन न उन्हें इसकी परवाह थी और ना ही मुझे। मैं दूसरी चूची को भी जोर जोर से चूसने लगा। काकी मस्ती में आँखें बंद किए सिसकियां भर रहीं थी।

थोड़ी देर बाद जब मेरी सांसें उखड़ने लगीं तो मैंने चूची से मुंह हटा लिया। काकी की सासें अब तक भारी हो चलीं थी। चेहरे पर सुर्खी छा गई थी।

"आओ अब खाट पर चलते हैं।" काकी ने मुझे खींचते हुए कहा।

उन्होंने मुझे खाट पर बैठाया और खुद नीचे एड़ियों पर बैठ गईं। मैं खाट के किनारे ही बाट पर बैठा था इस लिए मेरा अकड़ा हुआ लंड उन्हें साफ दिख रहा था। काकी ने झट उसे पकड़ लिया।

"उफ्फ! कितना तगड़ा दिख रहा है ये।" काकी ने लंड की चमड़ी को पीछे करते हुए कहा─"और इसके अंदर का ये सुपाड़ा तो एकदम गुलाबी है।"

मैं मज़े में था बोला कुछ नहीं। तभी काकी ने झट से सिर झुका कर उसे हौले से चूम लिया। मेरे पूरे बदन में मजे की तरंग दौड़ गई। पूरा बदन कांप गया। 

"शश्श्श्श्श् काकी क्या आज फिर से तुम इसे मुंह में ले कर चूसोगी?" मैंने मजे की तरंग में पूछा।

"क्या तुम चाहते हो कि मैं चूसूं?"

"ह..हां काकी।"

"ठीक है।"

काकी ने सुपाड़े को निकाला और उसे मुंह में भर लिया। गर्म और लिसलिसे स्पर्श का एहसास होते ही मैं बुरी तरह कांप उठा। उधर काकी ने मुंह में लिए लिए ही अंदर से अपनी जीभ मेरे लिंग के छेद पर कुरेदने सी लगीं। 

"शश्श्श्श्श् काकी।"

मुझे आँखें बंद कर सिसकी लेते देख काकी ने अपना एक हाथ मेरी जांघ पर रखा और दूसरे हाथ से लंड को पकड़े सुपाड़े को चूसने लगीं। अगले ही पल मजे की ऐसी तरंग उठने लगी कि मेरा बुरा हाल होने लगा। पूरे जिस्म का लहू लंड की तरफ दौड़ते हुए आता महसूस होने लगा।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् काकी मुझे कुछ हो रहा है।" मैं मजे के अथाह सागर में डूबा बोल पड़ा─"लगता है अंदर से कुछ बाहर आ रहा है।"

मेरे द्वारा ऐसा सुनने पर काकी ने झट से मेरा लंड मुँह से निकाल दिया। शायद वो समझ गईं थी कि अगर कुछ देर और उन्होंने ऐसे ही चूसा तो मेरा वीर्य निकल जाएगा।

"अरे! क्या हुआ काकी?" जैसे ही उन्होंने लंड मुँह से निकाला तो मैंने आँखें खोल कर हैरानी से पूछा─"फिर से चूसो न। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।"

"हां मुझे पता है।" काकी ने मुस्कुराते हुए कहा─"लेकिन अगर मैंने थोड़ी देर और इसे चूसा तो तुम्हारा वीर्य निकल जाएगा। जबकि मैं चाहती हूं कि तुम्हारा वीर्य मेरी चूत में जाए।"

उनके मुख से चूत शब्द सुनते ही मैं भौचक्का सा रह गया। उधर वो झट से उठीं और खाट पर आ कर सीधा लेट गईं।

"अब बैठे मत रहो राजू।" फिर उन्होंने मुझसे कहा─"जल्दी से आओ और मुझे चोदना शुरू कर दो।"

"पर मैं कैसे करूं काकी?" मैंने खड़े हो कर कहा─"मैंने तो कभी किया ही नहीं है।"

"तुम ऊपर तो आओ मेरे राजा।" काकी ने प्यार से कहा─"मैं तुम्हें बताऊंगी कि कैसे करना है।"

"ठीक है।"

मैं जल्दी से खाट पर चढ़ गया। उधर काकी ने अपनी दोनों टांगों को फैला लिया था। मुझे अपनी टांगों के बीच घुटनों के बल आने को कहा तो मैंने वैसा ही किया। मेरा लंड बुरी तरह अकड़ा हुआ था और उसके छेद पर कुछ चिपचिपा सा झलक रहा था।

"अब अपने लंड को पकड़ो।" उन्होंने अपने हाथों से अपनी चूत की फांकों को फैलाते हुए बताया─"और यहां जो छेद दिख रहा है इसमें अपना लंड डालो।"

मैं थोड़ा और आगे खिसका और जैसा उन्होंने बताया था वैसा ही करने लगा। मैंने देखा काकी की बुर के चारों तरफ काले घने बाल थे। उनके द्वारा फांकों को फैलाए जाने से मुझे गुलाबी रंग का छेद दिखने लगा था। मैंने धाड़ धाड़ बजती अपनी धड़कनों के साथ लंड को उस छेद पर टिकाया।

"हां ऐसे ही।" तभी काकी ने कहा─"अब आहिस्ता आहिस्ता अंदर घुसाओ।"

मैंने ऐसा ही किया। काकी की बुर में जैसे ही सुपाड़ा घुसा तो मुझे अपने लंड पर अजीब सी गर्मी का एहसास हुआ। मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई और साथ ही मजे की भी अनुभूति हुई।

"शश्श्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" तभी काकी की सिसकी निकल गई─"हाय राजू, तुम्हारा औजार तुम्हारे काका के औजार से बड़ा है इस लिए मुझे थोड़ा खिंचाव महसूस हो रहा है जो थोड़ा पीड़ा दे रहा है।"

"क्या सच में काकी?" 

"हां, लेकिन तुम चिंता मत करो।" काकी ने कहा─"इस वक्त मुझे पीड़ा की परवाह नहीं है। मैं चाहती हूं कि तुम अपनी काकी को ऐसे चोदो कि मैं मस्त हो जाऊं। मुझे इतना चोदो कि मेरी प्यास बुझ जाए। मुझे ऐसा चोदो कि मैं तुम्हारे बेटे की मां बन जाऊं।"

मेरे लंड का सुपाड़ा उनकी बुर में जा चुका था। अब मैं उसे और अंदर घुसेड़ने में लगा हुआ था। मैंने महसूस किया कि काकी की बुर अंदर से गीली है।

"शश्श्श्श्श् राजू।" काकी मचलते हुए बोलीं─"थोड़ा जल्दी डालो न अपने औजार को।"

कहने के साथ ही उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी चूचियां भींचने लगीं। दूसरी तरफ से अपनी टांगों को मेरी कमर में लपेट लिया।

"अब एक ही बार में जोर का धक्का लगा कर अपना औजार मेरी बुर में डाल दो।" काकी ने मस्ती में कहा।

मैंने ऐसा ही किया। अपने दोनों हाथों को मैंने उनके अगल बगल खाट पर टिकाया और जोर से कमर को आगे की तरफ धकेल दिया। अगले ही पल उनकी गीली बुर में मेरा लन्ड आधे से ज्यादा घुस गया।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् राजू।"

काकी को हल्का दर्द हुआ मगर उन्होंने मुझे यही कहा कि एक बार और ऐसे ही जोर से धक्का लगाओ। मैंने महसूस किया कि उनकी बुर में मेरा लन्ड फंस सा गया है। उनके कहने पर मैंने फिर से धक्का मारा। इस बार मेरा पूरा लंड उनकी बुर में समा गया लेकिन इसके साथ ही मेरे मुख से भी दर्द भरी सिसकी निकल गई।

"क्या हुआ राजू?"

"थोड़ा दर्द हो रहा है।"

"हां तुम पहली बार ऐसा कर रहे हो न इसी लिए।" काकी ने जैसे समझाया─"लेकिन फिक्र मत करो। ऐसा पहली बार में किसी किसी के साथ होता है। अब तुम धीरे धीरे धक्के लगाना शुरू करो।"

काकी के कहने पर मैं धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। मुझे थोड़ा दर्द जरूर हुआ था लेकिन अब धक्के लगाने से मजा भी आने लगा था। जब मजा आने लगा तो मैं अनायास ही और जोर जोर से धक्के लगाने लगा। मेरे ऐसा करते ही काकी पलक झपकते ही मस्ती में डूबने लगीं। मेरा ये पहली बार था इस लिए बीच बीच में मेरा रिदम गड़बड़ा जाता था मगर मैं फिर भी लगा रहा। 

"हाय राजू, तुम्हारा औजार तो मेरी बच्चादानी में महसूस हो रहा है।" काकी सिसकी लेते हुए बोलीं─"और ये इतना मोटा है कि मुझे अपनी बुर में अजीब सा खिंचाव महसूस हो रहा है पर....पर मजा भी आ रहा है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् ऐसे ही जोर जोर से धक्के लगाओ मेरे राजा। आज अपनी काकी को जी भर के चोदो।"

एक तो वैसे ही गर्मी थी दूसरे गर्मी वाला काम हो रहा था। हम दोनों ही पसीने में बुरी तरह नहा चुके थे। सांसें भारी हो चलीं थी। मगर मजा ऐसा था कि किसी चीज की परवाह नहीं थी। अचानक मेरी नजर उनकी उछलती चूचियों पर पड़ी तो मैंने एक हाथ बढ़ा कर उनकी एक चूची को पकड़ लिया और बुरी तरह भींचने लगा। मेरे ऐसा करते ही काकी और भी मचलने लगीं।

उन्होंने एकदम से मेरे चेहरे को पकड़ा और अपनी तरफ झुकाया। जैसे ही मेरा चेहरा उनके चेहरे के करीब पहुंचा तो उन्होंने सिर उठा कर मुझे चूमना शुरू कर दिया। इस क्रिया में धक्के लगाने में मुझे कठिनाई होने लगी। एक हाथ पर जोर ही नहीं पड़ रहा था।

"हाय राजू, मेरे प्यारे राजू।" मेरे चेहरे के हर एक हिस्से पर चूमते हुए काकी भाव विभोर सी हो कर बोलीं─"मन करता है अब तुम्हें अपने से दूर न जाने दूं। काश! तुम ही मेरे मरद होते। काश तुम ही रोजाना मुझे चोदते तो आज मैं बेटियों के साथ साथ एक बेटे की मां भी बन गई होती। उफ्फ, मेरे राजा अपनी काकी को चोदो न....रुक क्यों गए?"

"वो..वो ऐसे में ठीक से बन नहीं रहा है।"

"अच्छा ठीक है जैसे बने वैसे करो।"

काकी ने मेरा चेहरा छोड़ दिया तो मैं फिर से पहले जैसी अवस्था में आ गया और झट से जोर जोर से धक्के लगाने लगा। मेरे हर धक्के पर काकी की चूचियां उछल पड़तीं थी। 

आज से पहले मैंने कभी ऐसा काम नहीं किया था लेकिन आज इस काम के साथ जैसे मेरे जीवन की एक नई शुरुआत हो गई थी। काकी को चोदने में मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैं अब और भी तेज तेज धक्के लगाने लगा था। हर धक्के के साथ मेरे अंदर मजे की लहर दौड़ती और ऐसा महसूस होता जैसे कोई चीज बड़ी तेजी से मेरे लंड की तरफ खिंचती चली आ रही है।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् राजू...मेरे राजा।" काकी मस्ती में सिसकियां भरते हुए बोलीं─"हाय कितना मजा आ रहा है। तुम तो अपने काका से भी बढ़िया चोदते हो। इतनी देर में तो तुम्हारे काका दो तीन भर ढेर हो गए होते पर तुम एक बार भी नहीं हुए। मतलब...तुम सच में असली मर्द हो। चोदो राजू....हाय अपनी काकी को जोर जोर से चोदो। आज मेरी चूत को फाड़ डालो। इस निगोड़ी की सारी प्यास मिटा दो मेरे राजा।"

काकी मस्ती में जाने क्या क्या बोले जा रहीं थी। इधर मैं उनकी बातें सुनते हुए धक्के लगाए जा रहा था। मेरी सासें अब उखड़ने लगीं थी। उधर काकी मस्ती में कभी अपनी टांगों का दबाव दे कर मुझे कस लेती तो कभी मेरी पीठ को सहलाने लगतीं। 

अचानक काकी का बर्ताव अजीब सा हो गया। वो नीचे से अपनी कमर उठा कर अजीब तरह से सिर इधर उधर करने लगीं।

"हाय राजू...और जोर जोर से धक्के लगाओ।" काकी मस्ती में चीख सी पड़ी─"फाड़ दो मेरी बुर को। उफ्फ कितना मजा आ रहा है रे।"

थोड़ी ही देर में काकी ऐंठने लगीं। उन्होंने मुझे इतनी ताकत से जकड़ लिया कि मैं चाह कर भी अपनी कमर न हिला सका। उनका जिस्म कांप रहा था, झटके खा रहा था। कुछ ही पलों में वो एकदम शांत और ढीली पड़ गईं। जैसे ही उनकी जकड़ से मैं आजाद हुआ तो मैंने फिर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। 

काकी खाट पर शांत पड़ीं थी और मुझे बड़े प्यार से देखे जा रहीं थी। मेरे हर धक्के पर वो ऊपर की तरफ उछल जातीं मगर वो मुझे रोक नहीं रहीं थी। थोड़ी ही देर में वो फिर से मस्ती में आ गईं और फिर से मेरा साथ देने लगीं। इधर अब मैं मजे के चरम पर था। मुझे इतना मजा आ रहा था कि मैं हवाओं में उड़ता महसूस कर रहा था। 

"शश्श्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्श् काकी लगता है मेरा पेशाब आने वाला है।" मैं मजे की इंतिहा में बोल पड़ा।

"वो पेशाब नहीं है मेरे राजा।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"वो तो तुम झड़ने वाले हो। तुम्हारा वीर्य निकलने वाला है। तुम अपना सारा वीर्य मेरी चूत में ही डालना।"

अगले कुछ ही पलों में मैं बुरी तरह झटके खाते हुए झड़ने लगा। मेरा सारा वीर्य काकी की बुर में समाता जा रहा था। एक के बाद एक जाने कितनी पिचकारियां मेरे लंड से निकलीं। काकी ने मुझे एक बार फिर से जकड़ लिया था। शायद वो नहीं चाहती थीं कि मेरे वीर्य की एक बूंद भी बाहर गिरे।

मजे के अनंत आसमान में पहुंचने के बाद मैं वापस धरातल पर आ गया था। मंजू काकी के ऊपर ही ढेर हो कर मैं गहरी गहरी सासें ले रहा था। उधर काकी बड़े ही प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेर रहीं थी। उनके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी और संतुष्टि दिख रही थी।


जारी है..........




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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 04-08-2026, 08:43 PM



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