02-08-2026, 09:27 PM
खौफ और साजिश—7
शेर (कमरे की धुंधली छत को घूरते हुए, मन ही मन एक शैतानी हँसी हँसते हुए): कितनी भोली है तू मीरा मैडम... । कैसे मेरी इस धीमी और सुलगती हुई कामुकता और इन शातिर शर्तों के जाल में फँसकर खुद-ब-खुद मेरे इस सांवले जिस्म पर टूट पड़ी।
उसने अपनी छाती के उन घने बालों को छुआ, जहाँ मीरा के तने हुए निप्पलों के रगड़ के निशान अभी भी महसूस हो रहे थे।
शेर (अपनी आँखों को मूँदते हुए, उस अहसास को दोबारा जीने की कोशिश में): अपनी मर्ज़ी से... अपनी खुद की मर्ज़ी से अपने उन रसीले और सुर्ख मुम्मों को मेरी इस तपती हुई छाती पर रगड़ रही थी। अब तू चाहे लाख खुद को दिलासा दे ले कि तू पाक-साफ है, पर तेरे भीतर का जिस्मानी सच अब बाहर आ चुका है। तेरे बदन में जो आग मैंने आज लगा दी है, वो अब तुझे चैन से जीने नहीं देगी। दिन-रात, सोते-जागते, तुझे अपने उन कोमल मुम्मों पर इस नौकर के सीने के सख्त बालों की रगड़ और अपनी जाँघों के बीच मेरा यह कड़ा प्रहार महसूस होता रहेगा। तू इस तड़प में खुद-ब-खुद वापस मेरे पास आएगी...
यह सोचकर शेर का हाथ अपनी लुंगी के ऊपर और कस गया।
वह जानता था कि जंग का सबसे बड़ा हिस्सा वह आज जीत चुका है।
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उधर अपने कमरे में पहुँचते ही मीरा ने सबसे पहले बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और सीधे शॉवर के नीचे जाकर खड़ी हो गई।
उसका पूरा वजूद अभी भी शेर की छुअन और अपने खुद के जिस्म के उस पागलपन से बुरी तरह काँप रहा था।
काँपते हाथों से उसने अपनी साड़ी और पेटीकोट को ढीला किया और उन्हें बदन से अलग कर दिया। जैसे ही वह अपने बदन के आखिरी कपड़े, यानी अपनी पैन्टी को उतारने के लिए नीचे झुकी और उसे अपनी जाँघों से नीचे सरकाया, उसकी नज़र उस महीन कपड़े के बीचों-बीच बने उस गहरे, गीले निशान पर थमी की थमी रह गई।
उस गहरे गीले निशान को देखते ही मीरा के पूरे बदन में करंट दौड़ गया।
शेर का वह चुभता हुआ जुमला उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूँज उठा: "शायद आपको भी बाथरूम में जाकर अपनी गीली पैन्टी उतारते वक्त खुद को रोकना पड़ेगा..."
मीरा (शर्म, आत्मग्लानि के एक गहरे सैलाब में डूबते हुए, दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर फुसफुसा उठी): "नहीं... नहीं... मैं ऐसी नहीं हूँ... मैं उस के सामने नहीं बहकी..."
उसने तुरंत घबराकर उस पैन्टी को एक कोने में फेंक दिया, जैसे वह कोई सुलगता हुआ अंगारा हो। उसने काँपते हाथों से शॉवर के नॉब को घुमा दिया।
अगले ही पल, ऊपर से ठंडे पानी की तेज़ और तीखी धार उसके इस बेहद गर्म, तपते हुए बदन पर आकर गिरने लगी।
पानी की बूंदें जैसे ही उसकी छाती, उसके अभी भी सुर्ख और तने हुए मुम्मों और उसकी जाँघों के बीच की उस संवेदनशील गर्मी से टकराईं, उसके मुँह से एक ठंडी सिसकारी निकल गई।
पानी की तेज़, सर्द बौछारें मीरा के तपे हुए बदन से टकराकर बिखर रही थीं, लेकिन उसके भीतर सुलगती आग को शांत करने में नाकाम थीं।
उसने गुस्से और गहरे आत्म-उत्पीड़न के भाव से साबुन की बट्टी को उठाया और पागलों की तरह अपनी त्वचा पर रगड़ने लगी।
वह चाहती थी कि शेर के बदन की वह तीखी, गँवारू महक, उसकी चौड़ी हथेलियों का वह स्पर्श, और उसके सीने के कड़े बालों की एक-एक चुभन का अहसास इस झाग के साथ बहकर नाले में चला जाए।
साबुन रगड़ते-रगड़ते उसके कोमल स्तन और गोरी जाँघें सुर्ख लाल पड़ने लगी थीं, पर उसे जैसे कोई दर्द ही महसूस नहीं हो रहा था।
शॉवर के बहते ठंडे पानी और आँखों से बहते खारे आंसुओं के बीच उसका रोना अब बेकाबू सिसकियों का रूप ले चुका था।
वह दीवाल का सहारा लेकर खड़ी थी, उसका सिर टाइल्स से टिका हुआ था। अपनी ही देह के इस अप्रत्याशित विश्वासघात और शेर की शातिर चालों के आगे घुटने टेक देने की लाचारी उसे भीतर से खोखला कर रही थी।
मीरा ( काँपती और रुआंसी आवाज़ में खुद से बड़बड़ाते हुए): "मैं कितनी बड़ी बेवकूफ हूँ... कितनी लाचार और अक्ल की अंधी हूँ! जब तक वह कसम का वास्ता देकर मुझे छूता रहा, तब तक मैं खुद को इस दिलासे के झूठ में लपेटकर सोती रही कि यह सब मैं सिर्फ ज्योति की सुरक्षा के लिए सह रही हूँ... कि इसमें मेरी कोई रज़ामंदी नहीं है, मेरा कोई गुनाह नहीं है..."
उसने ज़ोर से अपनी आँखें बंद कीं, लेकिन पलकों के पीछे अंधेरा छाने के बजाय वही मंज़र और साफ़ हो गया।
उसे अपने ही जिस्म का वह उठना-गिरना, शेर के सीने के बालों से टकराते अपने संवेदनशील निप्पल और जाँघों के बीच का वह गीला, डरावना सुख साफ़-साफ़ महसूस होने लगा।
मीरा (दीवार पर अपनी मुट्ठी टिकाते हुए, सिसकियों के बीच दर्द से घुटकर): "पर आज? आज तो मैंने खुद अपने हाथों से अपनी गरिमा का गला घोंट दिया। सिर्फ़ उस नीच नौकर के सामने अपने झूठे अभिमान को सच साबित करने की बचकानी ज़िद में... मैं उसकी इस कदर ग़ुलाम बन गई? मैं सीधे उसके बिछाए जाल में फँस गई! उसने जैसे उँगली हिलायी, मैं नाचती रही... अपने इन मम्मों को खुद अपने ही हाथों से बेपर्दा करके, अपनी पूरी मर्ज़ी से... हाँ, अपनी खुद की रज़ामंदी से उसके काले, तपते सीने पर रगड़ती रही!"
यह सोचते ही उसकी जाँघों के बीच छिपी वह बेहद संवेदनशील नस दोबारा एक भीनी और गर्म सिहरन से फड़क उठी, जिसने उसकी आत्मग्लानि को और बढ़ा दिया।
उसने गुस्से में अपने भीगे बालों को पीछे की तरफ झटका।
मीरा (बेबसी और हताशा से भरे स्वर में): "और इस सब के बदले मुझे मिला क्या... सिर्फ़ एक दिन की कसम से झूठी मोहलत! कल सवेरा होते ही वह फिर कोई नया खेल रचेगा, पर मैं इस खौफ़नाक चक्रव्यूह से खुद को आज़ाद कैसे करूँगी?"
शॉवर की बूंदें लगातार उसकी पीठ और छाती को भिगोती रहीं, पर वह जानती थी कि शरीर तो साफ हो जाएगा, लेकिन उसकी रूह पर लगा वह निशान अब कभी नहीं मिटने वाला था।
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सरताज (दफ्तर की थकावट मिटाने के लिए अपनी सिक्युरिटी वर्दी के बटन खोलते हुए): "आज दिन भर मीटिंग्स का चक्कर रहा मीरा, खैर यह बताओ कि शेर का ज़ख्म कैसा है? कुछ इम्प्रूवमेंट हुई?"
मीरा (प्लेट में गर्म रोटियाँ परोसते हुए अपनी घबराहट छुपाने की कोशिश करती है): "हाँ, दोपहर को गई थी हाल-चाल पूछने, ज़ख्म भर रहे हैं उसके।"
मीरा (मन ही मन में): "आपकी बीवी बेवकूफ बन के आई है उसके हाथों... क्या बताऊँ कि मेरे साथ क्या-क्या हुआ।"
सरताज (सब्ज़ी का एक निवाला मुँह में डालते हुए स्वाद लेकर कहते हैं): "हाँ, थोड़ा समय तो लगेगा ही, बस उस पर थोड़ा ध्यान रखना कि कोई लापरवाही न हो।"
मीरा (नज़रें चुराकर मेज की सफाई करने का नाटक करते हुए धीरे से कहती है): "जी, मैं पूरी नज़र रखती हूँ, आप खाने पर ध्यान दीजिए और बताइए सब्ज़ी में नमक ठीक है या नहीं?"
सरताज (मीरा का हाथ अपने हाथ में लेकर प्यार से मुस्कुराते हैं): "नमक बिल्कुल सही है, पर तुम आज थोड़ी थकी और परेशान सी क्यों लग रही हो?"
मीरा (एक हलकी सी बनावटी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए): "नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।"
मीरा (मन ही मन में): "किस मुँह से बताऊँ आपको कि मेरे साथ क्या हो रहा है।"
सरताज (पानी का गिलास हाथ में लेते हुए सहज भाव से पूछते हैं): "ज्योति किधर है, नज़र नहीं आ रही?"
मीरा (पलकें झुकाकर आवाज़ में): "वह आज जल्दी सो गई थी।"
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सरताज (बिस्तर पर लेटे हुए, छत को घूरते हुए सोचता है): "कुछ तो है जो मीरा को अंदर ही अंदर परेशान कर रहा है।"
सरताज (करवट बदलते हुए): "कभी हंसती-खिलखिलाती दिखती है, तो अचानक ही किसी गहरे खौफ में सिमट जाती है।"
सरताज (एक ठंडी सांस भरते हुए): "मेरी यह सिक्युरिटी की ड्यूटी... मैं खुद अपनी पत्नी को पूरा वक्त नहीं दे पा रहा हूँ।"
सरताज (परेशानी में अपना माथा सहलाते हुए): "कोठी के मामलों में अब किस पर भरोसा करूँ?काश! चंदन बाबा आज ठीक होते..."
चंदन पिछले दस से भी ज़्यादा सालों से इस घर का सबसे वफ़ादार ड्राइवर और गृह-सेवक रहा है। अट्ठावन वर्ष की ढलती उम्र और लंबे समय की निस्वार्थ सेवा के कारण, घर के हर छोटे-बड़े सदस्य के दिल में उसके लिए एक ख़ास जगह है।
उसकी सादगी, तजुर्बे और घर के प्रति अपार समर्पण का ही नतीजा है कि सरताज और मीरा दोनों ही उसे महज़ एक नौकर नहीं मानते। वे बड़े आदर और अपनेपन के साथ उसे 'चंदन बाबा' कहकर पुकारते हैं।
सरताज (अतीत की उस घटना को याद करते हुए): "बेचारे चंदन बाबा का अचानक इतना बड़ा एक्सीडेंट हो गया, तभी तो रिप्लेसमेंट के तौर पर शेर को रखना पड़ा।"
सरताज (सोचते हुए): "कल ही चंदन बाबा का हाल-चाल पूछता हूँ।"
सरताज (उम्मीद के साथ): "अगर उनकी हालत थोड़ी भी ठीक हुई होगी, तो उन्हें वापस घर ले आता हूँ।"
सरताज (निर्णय लेते हुए): "अगर वह पूरी तरह ठीक न भी हुए हों, तो भी उनसे वापस आने की गुज़ारिश करूँगा।"
आखिर वह मीरा को अपनी बिटिया की तरह मानते हैं। वह ज़रूर मीरा की तकलीफ और उसकी परेशानी को समझ पाएंगे।
सरताज (खुद से बड़बड़ाते हुए): "इतने सालों में उनके रहते मीरा कभी इस तरह नहीं घबराई थी।"
मीरा बाथरोब पहनकर बाथरूम से बाहर आई और उसने सरताज को छत की तरफ घूरते हुए देखा।
मीरा यह बात अच्छी तरह जानती थी कि उसके पति उसके चेहरे की उदासी और खिंचाव को लेकर बेहद चिंतित हैं।
सरताज बहुत ही परवाह करने वाले पति थे, लेकिन मीरा आज ऐसे हालात में फँसी थी कि वह चाहकर भी उनसे दिल का हाल साझा नहीं कर सकती थी।
मीरा (उनके करीब आकर प्यार से पूछती है): "क्या सोच रहे हैं?"
सरताज ने नज़रें उठाकर मीरा की तरफ देखा और उनका दिल हुआ कि वह अपनी पूरी योजना उसे बता दें।
फिर उन्होंने मन ही मन सोचा कि पहले चंदन बाबा से मिल लें, उसके बाद ही मीरा को यह सरप्राइज देंगे।
सरताज (एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहते हैं): "कुछ खास नहीं मीरा, बस दफ्तर के ही कुछ मामलों के बारे में सोच रहा था।"
इतना कहते ही सरताज ने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे खींचकर अपनी बाँहों में भर लिया।
सरताज ने मीरा को प्यार से अपनी गोद में बिठाया और उसके मासूम चेहरे को निहारते हुए उसे चूमा।
सरताज (मीरा के गालों को थपथपाते हुए धीरे से बोले): "मुझे माफ कर दो मीरा..."
मीरा (हैरानी से उनकी आँखों में देखते हुए पूछती है): "आप अचानक किस बात के लिए माफी माँग रहे हैं?"
सरताज (उसके चेहरे और बंद होती आँखों को पागलों की तरह चूमते हुए कहते हैं): "मैं तुम्हें अपनी नौकरी की वजह से पूरा वक्त ही नहीं दे पाता हूँ।"
सरताज (एक लंबी सांस खींचकर उसकी जुल्फों को सहलाते हुए बोले): "तुम्हें तो पता ही है कि एक IPS ऑफिसर की ड्यूटी कैसी और कितनी सख्त होती है..."
मीरा (सरताज के चेहरे को प्यार से चूमते हुए बोली): "मैं आपकी मजबूरी अच्छे से समझती हूँ, आपको मुझसे माफी माँगने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
मीरा (मन ही मन गहरी ग्लानि से भर उठती है): "असल में गुनेहगार तो मैं हूँ, जिसने जाने-अनजाने आपका इतना बड़ा विश्वास तोड़ा है।"
मीरा (अंदर ही अंदर घुटते हुए सोचती है): "मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि मैं शेर की उन गंदी करतूतों और ब्लैकमेल के बारे में आपसे कैसे कुछ कहूँ।"
सरताज ने धीरे-धीरे मीरा के होंठों को चूमना शुरू कर दिया, और फिर उसकी जीभ मीरा के मुँह के अंदर सरक गई।
मीरा सरताज के मुँह के भीतर ही हल्की सी कराह भरी आवाज़ निकालती है और उसका साथ देते हुए उसे दीवानगी से वापस चूमने लगती है।
मीरा (मन ही मन राहत की सांस लेते हुए सोचती है): "कम से कम मैंने उस हैवान शेर की गंदी और नीच जीभ को अपने मुँह के अंदर तक नहीं पहुँचने दिया।"
फिर उन दोनों ने एक-दूसरे के जिस्म में खोकर बहुत देर तक जम के प्यार किया।
सरताज ने बड़ी ही नज़ाकत से मीरा के गले को चूमा और चाटा, फिर उसके सुडौल स्तनों को प्यार से सहलाते हुए अपने मुँह में लेकर धीरे-धीरे चूसा।
सरताज के प्यार करने का तरीका उस इंसान जैसा था, जो अपनी दुनिया की सबसे बेशकीमती और नाज़ुक चीज़ को बड़ी हिफ़ाज़त से सहलाता है।
वहीं दूसरी तरफ शेर ने तो उसके बदन को एक जंगली दरिंदे की तरह नोचा था—उस आदमी की तरह, जो उसे बस इस्तेमाल करना चाहता हो।
संतुष्ट कर देने वाले प्यार के बाद, दफ्तर की थकावट से बेहाल सरताज को फौरन ही गहरी नींद आ गई।
मीरा वहीं करवट लिए लेटी रही और बिना पलक झपकाए अपने पति के शांत चेहरे को निहारती रही।
वह मन ही मन सरताज और शेर के बीच के उस ज़मीन-आसमान के अंतर के बारे में सोचने लगी।
एक सरताज हैं—जो उसकी हर एक छोटी-सी खुशी के लिए पूरी दुनिया से अकेले लड़ सकते हैं।
और दूसरी तरफ वह हैवान शेर है—जो सिर्फ वासना में अंधा होकर उसकी हर लाचारी और मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तड़प रहा है।
एक को उससे रूह से मोहब्बत थी, तो दूसरे को सिर्फ और सिर्फ उसका गोरा बदन चाहिए था।
अगली सुबह जब सरताज बिस्तर से उठे, तो उन्होंने देखा कि मीरा थकावट के कारण गहरी नींद में सो रही है।
सरताज ने बिना कोई आहट किए चुपचाप अपनी सिक्युरिटी की वर्दी पहनी और दफ्तर के लिए तैयार हो गए।
घर से निकलते वक्त उन्होंने अपनी सोई हुई पत्नी के माथे को बड़े प्यार से चूमा और गाड़ी की तरफ बढ़ गए।
गाड़ी में बैठते ही सरताज ने अपने ड्राइवर को दफ्तर जाने से पहले सीधे चंदन के घर की तरफ चलने का हुक्म दिया।
चंदन बाबा के घर पहुँचकर सरताज ने देखा कि हादसे के बाद अब वह लगभग 90% तक ठीक हो चुके हैं और बिना किसी सहारे के चल पा रहे हैं।
सरताज (चंदन का हाथ पकड़कर आदर से बोले): "बाबा, आपकी सेहत अब काफी बेहतर लग रही है, मुझे कोठी में आपके सहारे की फिर से सख्त ज़रूरत है।"
चंदन (अपने मालिक को देखकर मुस्कुराते हुए बोले): "साहब, मैं तो खुद इतने लंबे आराम से ऊब चुका हूँ, पर यह बताइए कि मेरी जगह जो नया लड़का शेर आया था, वह कैसा काम कर रहा है?"
सरताज (सहज अंदाज़ में जवाब देते हुए बोले): "काम-काज तो वह ठीक ही कर रहा है बाबा, उसमें कोई कमी नहीं है।"
सरताज (मन ही मन खटकते हुए सोचते हैं): "पता नहीं क्यों, पर उस इंसान पर मेरा दिल कभी पूरा भरोसा नहीं कर पाता... उसकी नीयत मुझे ठीक नहीं लगती।"
सरताज ने अपने इस शक और तजुर्बे को फिलहाल अपने तक ही सीमित रखा और चंदन बाबा से ज़ाहिर नहीं होने दिया।
सरताज (चंदन बाबा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद गंभीरता से बोले): "बाबा, असल में मुझे आपकी मदद इसलिए चाहिए ताकि हम समझ सकें कि मीरा को अंदर ही अंदर क्या चीज़ परेशान कर रही है।"
चंदन (चिंता से चौंकते हुए बोले): "बिटिया रानी परेशानी में हैं? क्या हुआ है उन्हें साहब?"
सरताज (धीमी और सख्त आवाज़ में हिदायत देते हुए बोले): "यह बात सिर्फ आपके और मेरे बीच रहनी चाहिए बाबा, इसके बारे में किसी तीसरे को कानों-कान खबर नहीं होनी चाहिए।"
चंदन (अपनी छाती पर हाथ रखकर वफादारी से बोले): "आप बेफिक्र रहिए साहब, मेरी बिटिया की सलामती और आपकी बात की लाज मेरे लिए सबसे ऊपर है, मैं आज ही कोठी लौट रहा हूँ।"
सरताज (राहत की गहरी सांस लेते हुए बोले): "बस यही भरोसा मुझे आप पर था बाबा, आपके वहाँ रहने से मीरा को बहुत हिम्मत मिलेगी और मुझे भी तसल्ली रहेगी।"
सरताज (गाड़ी के दरवाज़े के पास खड़े होकर चंदन बाबा से बोले): "बाबा, अभी हाल ही में शेर ने अपनी जान पर खेलकर हमारी बिटिया ज्योति को एक बहुत बड़े हादसे से बचाया था, और उस चक्कर में वह खुद भी काफी ज़ख्मी हो गया था।"
सरताज (मन ही मन गहरी सोच में डूबते हुए): "कहने को तो उसने मेरी बच्ची की जान बचाई है, लेकिन मेरा सिक्युरिटीिया दिमाग यह मानने को तैयार नहीं है... मुझे शक है कि इस सबके पीछे उसका कोई बहुत बड़ा और गंदा मक़सद छिपा है।"
सरताज (अपने चेहरे के भावों को संभालते हुए): "इसलिए बाबा, आप शाम तक पूरी तरह तैयार रहिएगा, मैं शाम को दफ्तर से लौटते वक्त आपको गाड़ी में यहीं से पिक कर लूँगा।"
चंदन बाबा (इशारे में सिर हिलाते हुए बोले): "ठीक है साहब, मैं शाम को अपना सामान लेकर आपका इंतज़ार करूँगा।"
इतना कहकर सरताज अपनी गाड़ी में बैठे और सीधे अपने दफ्तर की तरफ रवाना हो गए।
सुबह उठते ही शेर के दिमाग में विचारों का जाल बुनना शुरू हो गया था। वह अपनी खटिया पर बैठा मूंछों पर ताव देते हुए आगे की चालें सोचने लगा।
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "कल तो सचमुच मज़ा ही आ गया... क्या रगड़ा था मीरा मैडम के जिस्म को! कितनी भोली हैं मीरा मेमसाहिब, बस ज्योति की कसम के डर से धीरे-धीरे सब कुछ सौंपती जा रही हैं।"
शेर (एक कामुक मुस्कान के साथ): "कितना मज़ा आता है उनको इस तरह टूटते हुए देखने में... क्या आहें निकल रही थीं उनके मुँह से, जब वह अपने रसीले मम्मों को मेरी छाती पर रगड़ रही थीं!"
शेर (आँखों में वहशी चमक लाते हुए सोचता है): "इतनी गोरी, एक IPS ऑफिसर की बीवी को ऐसे नंगा करके ज़लील करने का अपना अलग ही मज़ा है... शंकर भाई की आत्मा को भी अब जाकर शांति मिल रही होगी कि मैं उनकी मौत का बदला किस तरह ले रहा हूँ।"
शेर (अपनी दाढ़ी सहलाते हुए): "ज्योति की कसम का आईडिया तो बहुत ज़बरदस्त था, लेकिन... अगर किसी दिन मीरा मेमसाहिब ने कसम मानने से ही साफ इंकार कर दिया तो?"
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "अगर उस मेमसाहिब ने कसम तोड़ने का दिल बना ही लिया, तो फिर मैं क्या उखाड़ लूँगा?"
शेर (सोचने लगा): "खाली धमकियों के दम पर कब तक काम चलेगा... अगर उसने सीधे मुँह मना कर दिया और मुझे अपने जिस्म के करीब भटकने भी न दिया, तो मेरे हाथ क्या आएगा?"
शेर (चिंता में अपनी ठोढ़ी खुजाते हुए बोला): "सच तो यह है कि मैं सचमुच ज्योति बच्ची का बाल भी बाँका नहीं कर सकता... साहब सिक्युरिटी अफसर हैं, ज़रा सी भी ऊँच-नीच हुई तो मेरी खाल खींचकर भूसा भर देंगे।"
शेर (एक खौफनाक और कामुक मुस्कान के साथ बड़बड़ाया): "नहीं! मुझे उस रसीले बदन को हर हाल में हासिल करना ही होगा... सिर्फ कसम का खौफ काफी नहीं है।"
शेर (अपनी मुट्ठी कसते हुए ठान लेता है): "मुझे मीरा पर अपनी पकड़ और मज़बूत करनी होगी, कोई ऐसा ठोस सबूत या फंदा बनाना होगा जिससे वह चाहकर भी इस कसम से पीछे न हट सके।"
तभी शेर के दिमाग में उस तांत्रिक बाबा का ख्याल आया, जो काले जादू का खतरनाक खेल खेला करता था।
शेर (अपनी आँखों में चमक लाते हुए सोचने लगा): "हाँ! वह तांत्रिक बाबा... जो किसी भी इंसान को घर बैठे बीमार और लाचार कर दिया करता था!"
शेर (अतीत का नज़ारा याद करते हुए): "मैंने अपनी आँखों से देखा था कि कैसे वह उस इंसान के नाम की कपड़े की गुड़िया बनाता था, और जैसे ही उस गुड़िया पर सुइयां चुभोता या वार करता, वहाँ दूर बैठा इंसान तड़पने और बीमार पड़ने लगता था।"
शेर (अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता है): "ज्योति बच्ची के लिए मुझे भी बिल्कुल वैसा ही कुछ इंतज़ाम करना होगा!"
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "अगर मीरा मेमसाहिब ने मेरी बात मानने से इंकार किया या कसम तोड़ी, तो मैं तांत्रिक के उस काले जादू से ज्योति को बीमार कर दूँगा..."
शेर (अपनी मुट्ठी भींचते हुए): "जब बच्ची बिना किसी वजह के बिस्तर पर तड़पेगी और डॉक्टर भी कुछ समझ नहीं पाएंगे, तब मीरा को यकीन हो जाएगा कि यह सब उसकी कसम तोड़ने का ही नतीजा है!"
शेर (कामुक मुस्कान के साथ बड़बड़ाया): "फिर तो मेमसाहिब अपनी बच्ची की जान बचाने के लिए रोती-बिलखती हुई खुद मेरे कदमों में गिरेगी... और अपने इस रसीले जिस्म को हमेशा के लिए मेरे हवाले कर देगी!"
शेर बिना वक्त गंवाए तुरंत उस तांत्रिक बाबा को फोन मिलाता है।
शेर (आवाज़ में उतावली और लालच लाते हुए बोला): "प्रणाम बाबा, मुझे एक बहुत ज़रूरी काम के लिए आपकी मदद चाहिए।"
तांत्रिक बाबा (गंभीर और भारी आवाज़ में): "हाँ बोल शेर, क्या बात है?"
शेर तांत्रिक बाबा को विस्तार से बताता है कि कैसे वह अपना बदला लेने के लिए एक इंसान को अपने इशारों पर नचाना चाहता है, और इसीलिए उसे उस पर काला जादू करवाने के लिए तांत्रिक बाबा की मदद चाहिए।
तांत्रिक बाबा (गंभीरता से): "यह कोई बड़ी बात नहीं है, मैं यह काम कर दूँगा... लेकिन यह विद्या तभी काम करेगी, जब तू मुझे उस इंसान के शरीर का थोड़ा सा बाल लाकर देगा।"
तांत्रिक बाबा (तरीका समझाते हुए बोले): "चाहे तू उसकी कंघी से गिरे हुए बाल उठा ले या फिर उसके शरीर से चुपचाप थोड़े से बाल काट ले, पर बाल होना बहुत ज़रूरी है! और हाँ... इस तंत्र-साधना का ख़र्च पूरे एक लाख रुपये लगेगा।"
शेर बिना किसी हिचकिचाहट के तांत्रिक बाबा की शर्त और एक लाख रुपये की फीस पर तुरंत राज़ी हो गया।
तांत्रिक बाबा (समय का हिसाब देते हुए बोले): "जैसे ही तू मुझे बाल लाकर देगा, उसके ठीक दो दिन बाद मैं उस गुड़िया को सिद्ध करके तैयार कर दूँगा।"
शेर (एक शातिर मुस्कान के साथ बड़बड़ाया): "बस दो दिन... ठीक है बाबा, मैं आज ही उस बच्ची के बाल का इंतज़ाम करके आपके पास पहुँचता हूँ।"
Deepak Kapoor
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