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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
अध्याय -20

और तभी, विशाल, जो अपने दोस्तों के साथ था,  रास्ता काटता हुआ, अम्मी और नानी के ठीक सामने आ गया।

"नानी! मुबारक हो!" उसने झुक कर, एक दिलकश मुस्कुराहट के साथ कहा।

"खैर मुबारक, बेटा!" नानी ने खुशी से उसके सर पर हाथ रखा।

फिर वो अम्मी की ओर मुड़ा और उसने अम्मी को... ऊपर से नीचे तक... देखा। यह एक सेकंड से भी कम वक्त के लिए हुआ।

"मुबारक हो... आयशा जी," उसने 'जी' लफ़्ज़ पर इतना ज़ोर दिया, जैसे मज़ाक उड़ा रहा हो।

"खैर मुबारक," अम्मी ने फौरन नज़रें चुराते हुए कहा।


"फाइनली अकरम और सायमा का निकाह हो गया," विशाल ने कहा। नानी यह सुन कर मुस्कुरा दीं।


लेकिन फिर वो थोड़ा आगे झुका और भीड़ के शोर में धीमी आवाज़ में अम्मी से कहा-
"एकदम माल लग रही हो इस जोड़े में।"

उसने एक पल का पॉज़ लिया, उसकी नज़रें अम्मी के होठों पर थीं।
"खास कर इस लिपस्टिक के साथ। इसका टेस्ट अभी तक याद है मुझे…।"

अम्मी की आँखें दहशत से फैल गयीं। उनका हाथ फौरन उनके होठों पर गया।

"क्या... क्या कह रहे हो?" नानी ने शोर में ठीक से सुना नहीं।

"मैं कह रहा था, नानी," विशाल ने फौरन नानी की तरफ मुड़ते हुए कहा, "अकरम एकदम कमाल लगा रहा है इस जोड़े में।"

और फिर उसने अम्मी की नज़रों में आँखें डालते हुए, अपनी निगाहें सीधे उनके सीने के उभार पर टिका दीं और कहा—

"खासकर यह जो... एम्ब्रॉयडरी का काम है... इसका उभार बहुत बढ़िया दिख रहा है... बिल्कुल परफेक्ट।"

नानी, जो विशाल की बातों को अकरम की शेरवानी के बारे में समझ रही थीं, अकरम की तरफ देखते हुए बोल पड़ीं, "हाँ-हाँ बेटा, बहुत नफ़ीस काम है।"

अम्मी का चेहरा शर्म, झिझक और एक अजीब सी शोख़ी की वजह से लाल हो गया था। उन्होंने विशाल की इस बेशरम चतुराई और दोहरे अर्थ वाले जुमले पर हवा में हाथ उठाया... जैसे वो  उसे थप्पड़ मारना चाहती हों।

तभी विशाल ने अपनी बात का रुख नानी की तरफ मोड़ते हुए कहा, "वैसे नानी... मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।"
नानी ने मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा, "क्या बात है बेटा?"

"नानी, आपकी इस बेटी ने बारातियों का वेलकम बहुत ही शानदार और अनोखे तरीके से किया है," विशाल ने अम्मी की तरफ एक कमीनी नज़र डालते हुए कहा, "जब यह हाथ में थाली लेकर अकरम का वेलकम करने के लिए आगे झुकी थीं ना... कसम से नानी, क्या कमाल का नज़ारा था!"

नानी के कुछ समझने से पहले ही विशाल ने अम्मी के करीब झुककर उनके कान में बेहद धीमी, हवस भरी आवाज़ में फुसफुसाया—

"कुर्ती के गहरे गले से झांकते आपकी उस पीली ब्रा के ऊपर दोनों नंगे मम्मे... और वो अंगूर की तरह तने हुए गुलाबी टिप्स... उफ़्फ़ आयशा! इतना कातिलाना नज़ारा था कि आपका होने वाला दामाद अकरम भी ऐसा वेलकम अपनी पूरी उम्र नहीं भूल पाएगा!"

"मारूँगी!" उनके होंठ  यह लफ़्ज़, बिना आवाज़ के, बोले।

"क्या हुआ?" नानी ने पलट कर उन्हें देखा।

अम्मी ने फौरन... अपने उस उठे हुए हाथ से... अपने सुनहरे दुपट्टे को ठीक किया... और खिलखिला कर हंस पड़ीं। "कुछ नहीं, माँ!!"

--------------

विशाल थोड़ा और आयशा के करीब सरक आया। उसकी सांसे आयशा के कान के पास थीं, जब उसने बेहद धीमी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा—
"आयशा जी, ज़रा मुड़कर देखिए तो सही... हमारा दूल्हा अकरम अभी भी स्टेज पर बैठा-बैठा आप ही को ताक रहा है।"

आयशा का दिल डर के मारे धक से रह गया। उन्होंने घबराकर अपनी गर्दन घुमाई और स्टेज की तरफ देखा। विशाल की बात सच थी—अकरम वाकई उन्हीं की तरफ टकटकी लगाए देख रहा था।

लेकिन उसकी नज़रें आयशा के चेहरे पर नहीं थीं। अकरम की नज़रों का एंगल सीधे आयशा के सीने पर, उस उभार और कुर्ती के गले पर टिका हुआ था, जहाँ कुछ देर पहले ही उसने वह बेपर्दा नज़ारा देखा था। अकरम मानो अभी भी उसी हादसे की यादों में खोया हुआ था।

आयशा ने खौफ और शर्म के मारे कांपते हुए अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। उनका चेहरा तपने लगा था। उन्होंने विशाल की तरफ बेहद दबी, फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, जिसमें नफ़रत और लाचारी साफ झलक रही थी—

आयशा (दांत भींचकर, धीमी फुसफुसाहट में): "हद दर्जे के कमीने हो तुम, विशाल... तुमने आज मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। अब मैं सारी ज़िंदगी अकरम के सामने अपना मुँह कैसे दिखा पाऊँगी?"

विशाल के चेहरे पर वही शातिर मुस्कान तैर गई। उसने बड़े इत्मीनान से आयशा की आँखों में देखा और बिल्कुल धीमे से उनके कान के पास झुककर कहा—

विशाल (कमीनी हँसी के साथ): "वह तो मैं हूँ ही आयशा जी... पर वैसे, मुझे नहीं लगता कि अब अकरम की निगाहें कभी आपके मुँह की तरफ जाएँगी। उनका निशाना तो हमेशा कहीं और ही रहेगा!"
विशाल के मुँह से यह बेशरम बात सुनते ही आयशा का गोरा चेहरा शर्म, झिझक और बदन में दौड़ती वासना की सिहरन से एकदम लाल हो गया। उनका वजूद अंदर तक कांप उठा और वह एक शब्द भी आगे नहीं बोल सकीं।

--------------


मैं उन दोनों के इतने करीब खड़े होने की वजह से पूरी बात तो ठीक से नहीं सुन पाया, पर दूर से ही विशाल की उस नीच मुस्कान और अम्मी के चेहरे पर छाती लाली को देखकर मेरा पूरा बदन गुस्से और जलन से खौल रहा था।

उन दोनों की इस नज़दीकी ने मेरे जिस्म में आग लगा दी थी, और मेरा दिल चाह रहा था कि अभी जाकर उस कमीने का गिरेबान पकड़ लूँ।

"ह-हमें... अब स्टेज पर जाना चाहिए," अम्मी ने किसी तरह अपनी आवाज़ को संभाला और नानी का हाथ पकड़कर तेज़ी से आगे बढ़ गईं।

मैं भी अपने अंदर सुलगती आग को दबाए उनके पीछे-पीछे चलने लगा।

विशाल वहीं अपनी जगह पर खड़ा रहा।

जैसे ही अम्मी आगे बढ़ीं, उसकी नज़रें मुड़कर मुझसे टकराईं। हमारी नज़रें सिर्फ एक पल के लिए मिलीं, और उसने मुझे देखते हुए ... आँख मार दी।

और फिर... वो अकरम को पुकारता हुआ, स्टेज की तरफ बढ़ गया।

मेरा खून खौल उठा। मेरी मुट्ठियाँ कस गईं और बदन गुस्से से कांपने लगा।

मैंने भारी कदमों से चलते हुए विशाल को देखा। वो बड़ी शान से स्टेज पर चढ़ा, अकरम से हँस-हँसकर गले मिला जैसे कितना पुराना और वफादार दोस्त हो।

-----------

स्टेज पर पहुँचते ही विशाल की बेशरमी बढ़ गई। उसने बड़े हक से अकरम को अपने गले लगाया, उसे निकाह की मुबारकबाद दी और फिर अकरम की पीठ थपथपाते हुए थोड़ा करीब होकर फुसफुसाया।

"मुबारक हो अकरम भाई! पर सच बताना... आज का वेलकम देखा तुमने?" विशाल ने एक आँख मारते हुए चुटकी ली, "क्या कातिलाना नज़ारा था भाई! तुम्हारी सायमा की खाला आयशा तो सचमुच पूरी आग हैं..."

अकरम का चेहरा एक पल के लिए झेंप और हैरानी से भर गया। उसने इधर-उधर देखते हुए खुद को संभालने की कोशिश की, "क्या... क्या मतलब है तुम्हारा विशाल?"

"अरे अकरम भाई! अब तुम मुझसे भी छुपाओगे क्या?" विशाल ने कमीनी मुस्कान के साथ उसके कंधे पर हाथ रखा, "मैं अच्छी तरह देख रहा था कि मंडप के पास जब आयशा जी तुम्हारे सामने झुकी थीं, तो तुम्हारी आँखें कहाँ टिकी हुई थीं। उनकी उस कुर्ती के गहरे गले में झांकते ब्रा और मम्मों पर से तुम्हारी नज़र हट ही नहीं रही थी।"

अकरम की रंगत उड़ गई, पर विशाल की इस बेबाक बात ने उसके अंदर की हवस को भी हवा दे दी थी। उसने झेंपते हुए बेहद धीमी आवाज़ में अपने दिल का हाल उगल दिया—
"साला... सच कहूँ तो उस नज़ारे को देखकर मेरा भी लंड एकदम टाइट हो गया था। अब तो सायमा के बहाने आयशा जी से मुलाकात होती ही रहेगी, पर हर बार जब भी वो सामने आएँगी, मुझे तो उनके वही सुडौल मम्मे और वो गुलाबी टिप्स ही याद आएँगे।"

विशाल ने अकरम की बात सुनकर एक ज़ोरदार ठहाका दबाया और उसके कान के पास झुककर हँसते हुए कहा, "देखा! मैं तो पहले ही कह रहा था... वैसे भाई, खाला का यह जलवा देखने के बाद तो मुझे पूरा यकीन है कि आज रात तुम्हारी दुल्हन सायमा की खैर नहीं!"

--------------------

फिर उसने सायमा खाला की तरफ देखा और दूर से ही बड़ी शराफत का नाटक करते हुए उन्हें 'आदाब' अर्ज किया।

लेकिन फिर... वो स्टेज पर रुका नहीं।

उसने अकरम के कान में कुछ कहा, हंसा, और स्टेज की दूसरी तरफ से, जहाँ रोशनी कम थी, उतर गया और भीड़ में गायब हो गया।

हम लोग स्टेज पर चढ़े। स्टेज पर सायमा खाला को घेर कर बहुत सारी औरतें और रिश्तेदार खड़ी थीं। सब उनको बारी-बारी से गले लगा रही थीं और मुबारकबाद देने के साथ-साथ लिफाफा या गिफ्ट भी दे रही थीं।

उसको देख कर नानी भी पीछे मुड़ीं और जैसे अचानक कुछ याद आया हो ऐसे कहा-

“अरे आयशा… हमारा लिफाफा तो निकालो बेटा..”

"ओह! हाँ माँ!" अम्मी एकदम से घबरा गयीं।

उनके एक हाथ में उनका छोटा सा सुनहरा क्लच था। दूसरे हाथ में उनका फोन।

मैं उनके बिल्कुल पीछे खड़ा था। वो अपने क्लच में से दो लिफाफा निकालते हुए मेरी ओर मुड़ीं और कहा-

"साहिल! इसे पकड़ो ज़रा। हम सायमा को यह दे कर आते हैं,"

और उन्होंने, बिना सोचे, अपना क्लच और फोन... मेरे हाथ में थमा दिया।

"मैं बस दो मिनट में आयी!"

और वो, नानी के साथ, लिफाफा हाथ में लिए, खुशी से मुस्कुराती हुई... सायमा खाला की तरफ बढ़ गयीं।

और मैं स्टेज की तेज़ रोशनी में वहीं खड़ा रहा। मेरे इर्द-गिर्द लोगों का हुजूम था जो अकरम और सायमा खाला को मुबारकबाद देने के लिए अपने टर्न की राह देख रहे थे।

मैं अम्मी का क्लच और फोन ले कर स्टेज से उतर गया और मंडप में एक खाली चेयर पर बैठ गया।

अम्मी का फोन तो लॉक था लेकिन मैं उनका पासवर्ड जानता था। एक आसान सा 'L' शेप।

मेरा दिल मेरी छाती में एक हथौड़े  की तरह बजने लगा। मैंने स्टेज की तरफ देखा। अम्मी अभी भी सायमा खाला से मिलने के लिए औरतों के बीच खड़ी थीं। फोटोग्राफर उनकी तस्वीरें ले रहा था।

मेरे हाथ कांप रहे थे। मैंने... स्क्रीन पर... वो 'L' शेप... बना दिया और फोन अनलॉक हो गया।

मैंने उनका व्हाट्स-ऐप खोला-
V: बड़ा बोरिंग लग रहा है यार।
अम्मी: हमारी शादियाँ तो ऐसी ही होती हैं।
V: But एक बात तो है..दुल्हन से ज़्यादा हॉट तो तुम लग रही हो…
अम्मी: बकवास नहीं..
V: "सच में… और गारंटी के साथ कह रहा हूँ, सब सालों का टाइट हो गया होगा। खासकर अकरम का! उस नज़ारे को देखकर लंड एकदम टाइट हो गया था… क्या कातिलाना नज़ारा था आपके उन सुडौल मम्मों और गुलाबी टिप्स का!"
अम्मी: "बस हाँ… बहुत हो रहा है… विशाल, अब बस करो!"
इतनी गंदी और बेबाक चैट पढ़ते ही मेरे तो जैसे होश ही उड़ गए, ऐसा लगा मानो मुझे साँप सूँघ गया हो।
V: "बहुत ही तो करना है तुम्हारे साथ.."
अम्मी: "चुप करो विशाल। लोग आसपास हैं। माँ देख लेगी।"
V: "देखने दो। मैं तो बस तुम्हारे सेक्सी होठों को देख रहा हूँ। यह कल रात वाली ही लिपस्टिक है ना?"
अम्मी: "हाँ… पर अब चुप।"
V: "शेड का नाम तो बताओ। कल रात टेस्ट किया था, आज नाम भी जान लूँ।"
अम्मी: "पागल हो? निकाह चल रहा है, तमीज़ से बात करो।"
V: "तमीज़ से ही तो कह रहा हूँ—आज तुम सबसे ज़्यादा चमक रही हो।"
अम्मी: "ड्रामा बंद करो, विशाल।"
V: "ठीक है, लेकिन एक बात… तुमने कान के पीछे हल्का सा परफ्यूम लगाया है ना? वही जो मुझे पागल कर देता है?"
अम्मी: "तुम ज़्यादा नोटिस करते हो।"
V: "इतनी हसीन जो हो। मेरी नज़र कहीं और जाती ही नहीं—खासकर तुम्हारे मम्मों की गोलाई। नेकलाइन से हल्का सा क्लीवेज दिख रहा है, कमीज़ के नीचे का भरा हुआ उभार बिल्कुल पागल कर रहा है।"
अम्मी: "बस, अब बस! माँ यहीं खड़ी है।"
V: "माँ को बोलो, उनकी बेटी को ज़रा हवा चाहिए। मैं हवा हूँ।"
अम्मी: "तुम बहुत बदमाश हो।"
V: "और तुम बहुत खूबसूरत।"
अम्मी: "विशाल, कंट्रोल।"
V: "कंट्रोल कैसे करूँ?"
अम्मी: "काज़ी साहब दुआ माँग रहे हैं... मैं फोन बंद करती हूँ..."
V: "नहीं... नहीं.... रुको...."
V: "कल रात से मैं सिर्फ तुम्हारे बारे में ही सोच रहा हूँ।"
अम्मी: "विशाल प्लीज... स्टॉप... कोई नोटिस कर लेगा..."
V: "ठीक है बाबा.... सुनो.... दो मिनट के लिए किचन के पीछे वाले कॉरिडोर में आ जाओ। भीड़ भी नहीं होती वहाँ।"
अम्मी: "अभी नामुमकिन।"
V: "तो फिर एक सेल्फी भेज दो। सिर्फ लिप्स… बस लिपस्टिक की...."
अम्मी: "बिल्कुल नहीं।"

मैं स्टेज से थोड़ा दूर, उस खाली कुर्सी पर बैठकर यह सब पढ़ रहा था। मेरा दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। अम्मी का फोन मेरे हाथों में था, और व्हाट्सएप की स्क्रीन पर उनके और विशाल के बीच हुई यह घिनौनी बातचीत खुली हुई थी।

यह सब पढ़कर मेरा सिर घूम रहा था। यह सिर्फ साधारण मैसेजेस नहीं थे—यह उनकी वो अश्लील बातें थीं, जो वो पवित्र निकाह के दौरान भी बेधड़क कर रहे थे, मानो उनके लिए पूरी दुनिया रुक गई हो।

मैंने कांपती उंगलियों से स्क्रीन को नीचे स्क्रॉल किया, तो चैट और आगे बढ़ी। यह सिलसिला अभी ख़त्म नहीं हुआ था; वे दोनों आगे की बातें कर रहे थे और किसी चीज़ का प्लान बना रहे थे। यह देखकर मेरा खून और तेज़ी से उबलने लगा।

V: "प्लीज यार, एक सेल्फी... बस लिप्स की। मैं यहाँ अकेले बोर हो रहा हूँ।"

अम्मी: "नहीं विशाल! लोग हर तरफ हैं। फोटोग्राफर भी चारों तरफ घूम-घूम कर तस्वीरें ले रहा है।"
V: "तो ठीक है, मत भेजो। लेकिन सुनो... अभी स्टेज पर जाकर अकरम और सायमा को मुबारकबाद दे दो। उसके बाद, थोड़ा टाइम निकाल लेना। हवेली के पीछे वाला स्टोर रूम याद है ना? जो खाली पड़ा रहता है..."

अम्मी: "क्या?! अभी?! पागल हो गए हो क्या विशाल? सब लोग यहीं मौजूद हैं।"

V: "अरे वही तो! सब लोग यहाँ मंडप और शादी के ड्रामे में बिजी हैं। कोई नोटिस नहीं करेगा। बस 5 मिनट... मैं पहले पहुँचकर स्टोर रूम के अंदर तुम्हारा वेट करूँगा। डोर अंदर से लॉक कर लेंगे... बिल्कुल कल रात की तरह... बस एक क्विक किस।"

अम्मी: "विशाल... प्लीज! साहिल भी यहीं घूम रहा है और माँ भी। अगर किसी ने देख लिया तो?"

V: "साहिल अपने दोस्तों के साथ बिजी होगा और नानी तो अभी सायमा के पास खड़ी हैं। कम ऑन आयशा... तुम्हारे महक अभी तक मेरे दिमाग में चढ़ी हुई है। प्लीज यार, अब मना मत करो…"

अम्मी: "तुम बहुत ज़्यादा जिद कर रहे हो विशाल... लेकिन... ठीक है। मैं मुबारकबाद देकर आने की कोशिश करती हूँ। लेकिन याद रखना, सिर्फ 2 मिनट... और कुछ नहीं!"

V: "प्रॉमिस? मैं अभी निकल रहा हूँ और स्टोर रूम में तुम्हारा वेट करूँगा। जल्दी आ जाओ।"

अम्मी: "हाँ... बस थोड़ा संभल कर रहना।"
चैट यहीं ख़त्म हो गई थी। आख़िरी मैसेज अम्मी का ही था, जो कुछ ही मिनट पहले भेजा गया था। यह सब देखकर मेरा हाथ फोन पर ही जम गया।

यह... यह सब अभी, इसी वक्त हो रहा था? विशाल इस वक्त हवेली के उस सुनसान स्टोर रूम में अम्मी का इंतज़ार कर रहा होगा? और अम्मी... वो अभी स्टेज पर थीं, पर किसी भी पल वहाँ से निकलने वाली थीं?

मैंने कांपते हाथों से जल्दी से फोन बंद किया और उसे लॉक कर दिया। मेरा दिमाग बुरी तरह घूम रहा था।

मैंने तुरंत स्टेज की तरफ देखा। अम्मी अभी भी वहीं थीं, सायमा खाला से गले मिल रही थीं और नानी के साथ मुस्कुराकर बातें कर रही थीं।

मेरी नज़र अचानक अकरम पर पड़ी। अकरम की निगाहें अम्मी के ऊपर ही गड़ी हुई थीं—और खासकर उनके सीने के उभार की तरफ। मैं अंदर तक कांप गया... क्या अकरम भी विशाल की तरह ही नीच है? क्या उसकी शराफत का यह नकाब भी अब उतर रहा था?

तभी स्टेज अकरम ने पहले नानी को गले लगाया और उनसे दुआएं लीं। तुरंत बाद, वो अम्मी की तरफ बढ़ा।

अकरम ने अम्मी को जिस तरह से गले लगाया, वो किसी दामाद का अपनी दुल्हन की बड़ी बहन को गले लगाना बिल्कुल नहीं था। उसने अम्मी को बहुत ही ज़ोर से और कसकर अपने सीने से लगा लिया—एक ऐसा बेहद टाइट हग, जिसमें ऐसा लग रहा था मानो अम्मी के वो सुडौल, भारी मम्मे अकरम की चौड़ी छाती पर बुरी तरह पिस रहे हों।
अम्मी इस अचानक हुए शारीरिक स्पर्श से बुरी तरह हड़बड़ा गईं। उन्हें अपने नए दामाद से इस हद तक बेबाक हरकत की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।

उनके जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने घबराकर, थोड़ी मशक्कत के साथ खुद को अकरम के जिस्म से पीछे खींचकर दूर किया। अम्मी का चेहरा शर्म और अनजाने डर से लाल हो चुका था।

उनकी नज़रें बार-बार इधर-उधर भटक रही थीं, जैसे वो जाने के लिए सही वक्त और मौका तलाश रही हों।

मेरा खून खौल उठा। पहले विशाल और अब अकरम भी... अम्मी यह सब चुपचाप कैसे होने दे रही थीं?

मैं वहीं बुत बना खड़ा रहा, मेरी छाती में दिल किसी हथौड़े की तरह धड़क रहा था। थोड़ी देर में अम्मी स्टेज से नीचे उतरीं और भीड़ को चीरती हुई तेज़ी से मेरी तरफ आने लगीं।

उनका चेहरा एकदम खिला हुआ था, जैसे कुछ हुआ ही न हो... लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और जल्दीबाज़ी साफ़ दिख रही थी।

वो मेरे पास पहुँचीं और मुझे देखकर एक बनावटी मुस्कान बिखेरी, "अरे साहिल... यह लो, मैं आ गई। मेरा क्लच और फोन दे दो बेटा।"

मेरा हाथ गुस्से और डर से कांप रहा था, लेकिन मैंने बिना कुछ कहे खामोशी से उनका क्लच और फोन उन्हें थमा दिया।

उन्होंने झटपट क्लच खोला, फोन को उसके अंदर डाला और मेरी तरफ देखा, "बेटा, मैं ज़रा वॉशरूम होकर आती हूँ... थोड़ा फ्रेश होना है। तुम यहीं रुको और जाकर नानी के पास बैठो, ठीक है?"

वॉशरूम? मैं जानता था यह झूठ था। स्टोर रूम वॉशरूम से बिल्कुल अलग तरफ था। लेकिन मैंने सिर्फ सर हिला दिया, कुछ नहीं कहा।

गुस्सा अंदर ही अंदर उबल रहा था, लेकिन मैं अभी कुछ नहीं कर सकता था। वो मुस्कुरा कर पलटी, और भीड़ में घुल-मिल गयी, हवेली के पीछे वाले हिस्से की तरफ बढ़ती हुई।

मैं वहीं खड़ा रहा, उस झूठ की कड़वाहट मेरे गले में उतर रही थी। "वॉशरूम"।

अम्मी का सुनहरा दुपट्टा भीड़ में एक लहर की तरह गायब हो रहा था। वो उस सुनसान, धूल-भरे कॉरिडोर की तरफ मुड़ गयी थीं जो हवेली के पिछले हिस्से और पुराने स्टोर रूम की तरफ जाता था।

दोपहर के 12:30 बज रहे थे। बाहर सूरज सर पर था, लेकिन हवेली के इस हिस्से में शैडोज़ लंबी हो रही थीं।

मैंने 10 तक गिनती गिनी।

1... 2... 3...

मैंने इधर-उधर देखा। नानी अभी भी स्टेज पर सायमा खाला के साथ बिजी थीं। अकरम दोस्तों से घिरा हुआ था। किसी का ध्यान मुझ पर नहीं था।

मैंने अपनी कुर्सी छोड़ी और भीड़ के किनारे-किनारे चलता हुआ, उसी दिशा में बढ़ गया जहाँ अम्मी गयी थीं।

जैसे-जैसे मैं मंडप से दूर होता गया, ढोल की आवाज़ धीमी होती गयी। यहाँ कॉरिडोर में सूरज की रोशनी सिर्फ ऊँची खिड़कियों से 'बीम्स' की शक्ल में आ रही थी, जिसमें धूल के कण नाच रहे थे। हवा में पुरानी लकड़ी और नमी की बू थी।

मैंने अपने कदम हल्का कर लिए। बिल्कुल दबे पाँव।

कॉरिडोर के आखिर में, मैंने अम्मी को देखा। वो स्टोर रूम के दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उनका सुनहरा जोड़ा इस धूप-छाँव में चमक रहा था। उन्होंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। उनका चेहरा डर और बेताबी से लाल था।

उन्होंने दरवाज़े पर हाथ रखा ही था कि दरवाज़ा अंदर से खुला। अंदर अंधेरा था, लेकिन सूरज की एक तीखी किरण सीधा अंदर जा रही थी।

विशाल ने अंदर से हाथ निकाल कर अम्मी की नंगी कलाई पकड़ी और उन्हें एक झटके से अंदर खींच लिया।

"आह!" अम्मी की हल्की सी सिसकी निकली।

थक।

दरवाज़ा बंद हुआ। लेकिन कुंडी लगने की आवाज़ नहीं आयी। शायद पुराना लॉक खराब था, या उन्हें इतनी जल्दी थी कि ध्यान नहीं रहा।

मैं सांस रोके, दीवार से चिपक कर, आगे बढ़ा।

मैं दरवाज़े के बिल्कुल बाहर आ गया। लकड़ी का दरवाज़ा पुराना था, और पैनल्स के बीच में हल्की दरारें थीं।

मैंने अपनी आँख उस दरार के पास लगायी। अंदर का मंज़र देख कर मेरी सांसें अटक गयीं।

कमरे में धूल और पुराने सामान की बू थी, लेकिन अम्मी के परफ्यूम ने उसे डुबा दिया था। सूरज की एक मोटी किरण सीधा उन पर पड़ रही थी, जैसे किसी स्पॉटलाइट की तरह।

कमरा बहुत बड़ा था और हर तरफ पुराने संदूक और टूटा फर्नीचर पड़ा था जिन पर धूल की मोटी परत जमी थी। सूरज की एक मोटी किरण रोशनदान से सीधा कमरे के बीच में पड़ रही थी, जैसे किसी स्पॉटलाइट की तरह।

अम्मी और विशाल कमरे के बिल्कुल बीच में खड़े थे, किसी भी गंदी दीवार या फर्नीचर से दूर, ताकि अम्मी का महंगा जोड़ा खराब ना हो।

विशाल अम्मी के सामने खड़ा था। उसने अम्मी के बाज़ुओं को अपनी मज़बूत पकड़ में ले रखा था।

उसकी उंगलियाँ अम्मी के टाइट, सुनहरे स्लीव्स में धँस रही थीं। उसने उन्हें इस तरह जकड़ रखा था जैसे कोई मालिक अपनी सबसे कीमती चीज़ को पकड़ता है - सख्त, लेकिन जिस्म की गर्मी को महसूस करते हुए।

"पागल हो तुम..." अम्मी की आवाज़ आयी, जो घबराहट कम और नशा ज़्यादा लग रही थी। उनका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे उनकी नेकलाइन से उनका गोरा, भरा हुआ क्लीवेज साफ़ झलक रहा था।

"बाहर लोग हैं, विशाल! और यहाँ कितनी धूल भी है।"

"धूल को भूल जाओ," विशाल ने उनके बाज़ुओं को अपनी तरफ खींचा, जिससे अम्मी का भरा हुआ जिस्म सीधा उसके सीने से आ टकराया। "तुम्हारी खुशबू ने इस पूरे कमरे को महका दिया है।"

अम्मी ने अपने हाथ विशाल के सीने पर रख दिए, लेकिन उसे धक्का देने के बजाय, उनकी उंगलियाँ उसके कुर्ते के कपड़े को मसलने लगीं। "तुम्हें चैन नहीं है? वहाँ सब इंतज़ार कर रहे हैं।"

"चैन? तुमने सुबह से मेरा चैन छीन रखा है," विशाल फुसफुसाया। उसकी नज़रें अम्मी के चेहरे से फिसल कर नीचे गयीं, उनके उभरे हुए सीने पर, जो उस टाइट गोल्डन सूट में कैद थे।

"वहाँ स्टेज पर सब 'कबूल है' बोल रहे थे, और मैं बस यही सोच रहा था कि कब तुम्हें यहाँ ला कर, इन कपड़ों के अंदर छुपे पहाड़ को महसूस करूँगा।"
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
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RE: अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - by Deepak.kapoor - 01-08-2026, 10:04 PM



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