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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
खौफ और साजिश—5

 शेर ने मीरा के हाथ पर अपनी पकड़ को मजबूत किया। उसकी उंगलियाँ मीरा की हथेलियों को धीरे-धीरे सहला रही थीं।
 
फिर, एक लंबा वाला पॉज़ आया। शेर का मुँह मीरा की उंगलियों के पोरों से महज़ एक मिलीमीटर दूर रुक गया। मीरा की कांपती हुई दो उंगलियाँ शेर के गर्म होंठों को छू रही थीं। शेर ने अपनी आँखें मीरा के चेहरे पर गड़ाईं और बेहद धीमी गति से अपने होंठ खोले, और मीरा की उंगलियों को धीरे-धीरे अपने मुँह के भीतर खींच लिया।
 
उसकी गर्म, गीली जीभ ने मीरा की उंगलियों के पोरों को एक-एक करके सहलाना और चाटना शुरू किया। हर एक स्पर्श इतना धीमा था कि मीरा को शेर के मुँह के भीतर की हर एक लकीर का अहसास हो रहा था।
 
शेर की सांसों की गर्म भाप और उसके मुँह की नमी मीरा की उंगलियों के जरिए सीधे उसकी रगों में उतरने लगी।
 
मीरा (अपनी आँखें ज़ोर से भींचते हुए, अपनी देह में उठती एक अजीब सी सनसनी से बेहाल होकर): "शेर... मत... मत करो ऐसा... प्लीज छोड़ो मुझे..."
 
इस नए और बेहद कामुक स्पर्श से मीरा का पूरा बदन एकदम तन गया। उसके पूरे जिस्म में सिहरन की एक तीखी लहर दौड़ी।
 
इस खिंचाव के कारण उसकी सुडौल और गोल छाती ब्लाउज़ के भीतर और भी तंग होकर ऊपर की ओर उभर आई।। घबराहट और शरीर में उठते एक अनजाने रोमांच के कारण उसकी सांसें इतनी तेज़ चल रही थीं कि उसके स्तनों का वह उभार शेर की आँखों के सामने पागलों की तरह धड़क रहा था।
 
शेर: "मेमसाहिब, आप ही ने तो कहा था, मैं आपको छू सकता हूँ। प्लीज छूने दीजिए।"
शेर ने मीरा के बदन में आए इस बदलाव को फौरन ताड़ लिया।
 
उसने मीरा के उंगलियों को अपने मुँह में दबाए रखते हुए ही धीरे से अपना दूसरा चौड़ा हाथ आगे बढ़ाया। उसकी गर्म हथेलियां मीरा की साड़ी और ब्लाउज के बीच से साफ झलकते उसके गोरे, बेहद नाजुक और नंगे पेट पर जाकर टिक गईं।
 
मीरा (पसीने से भीगी अपनी मखमली त्वचा पर शेर के हाथ का गर्म स्पर्श महसूस करते ही): "आह्ह्..हे भगवान... शेर, ऐसा मत करो।"
 
मीरा के मुँह से एक बेहद दबी हुई, कंपकंपी और मदहोशी से भरी सिसकी निकल गई।
 
शेर के हाथ की वह उंगलियां जैसे ही उसकी नाभि के पास रेंगने लगीं, मीरा के भीतर की बची-कुची ताकत जवाब देने लगी।
 
शेर की इस बेहद धीमी, शातिर और जिस्मानी सम्मोहन की चाल अब धीरे-धीरे मीरा के दिमाग पर हावी होने लगी थी, और वह चाहकर भी अपनी देह में उठती इस प्यास और खौफ के मिले-जुले बवंडर से खुद को आज़ाद नहीं कर पा रही थी।
 
मीरा (अपनी धड़कनों के बेकाबू शोर के बीच, शेर के मुँह से अपनी उंगलियों को छुड़ाने की आखिरी बेबस कोशिश करते हुए, हांफती हुई आवाज़ में): "शेर... बस करो! तुम... तुम फिर से उस दिन की तरह वही गंदी हरकत कर रहे हो। मैंने तुम्हें अभी-अभी माफ़ किया है और तुम..."
 
शेर (मीरा की उंगलियों को अपने मुँह से बाहर निकालते हुएअपनी आँखों में मुस्कान लेकर): "क्या करूँ मीरा मैडम... मेरे बस में कुछ नहीं है। जब भी आप इस तरह मेरे पास होती हो, तो इस गरीब नौकर का अपने ऊपर काबू ही नहीं रहता। और आप ही ने तो उस दिन रोते हुए अपनी बेटी की कसम खाकर कहा था कि अपनी लाडली ज्योति की जान के बदले मैं आपके इस सुंदर जिस्म को कभी भी छू सकता हूँ... फिर आज अपनी बात से क्यों मुकर रही हो?"
 
यह कहते ही शेर ने अपना दूसरा चौड़ा हाथ मीरा के नंगे, गोरे पेट पर पूरी तरह फैला दिया।
 
शेर: "आपकी इस कांपती हुई नंगे, गोरे पेट पर अपनी हथेली रखना ही मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हसरत थी।"
 
उसकी गर्म, पसीने से तर उंगलियाँ मीरा की नाभि के आस-पास की बेहद संवेदनशील त्वचा को सहलाती हुई ऊपर की ओर बढ़ने लगीं। शेर के हाथ की उस नंगे स्पर्श ने मीरा के बदन में बिजली का एक ऐसा ज़ोरदार करंट दौड़ाया कि वह खुद पर काबू नहीं रख सकी।
 
मीरा (खौफ, शर्म और अपनी देह में उठी एक बेहद तीखी सिहरन के मिले-जुले बवंडर से तड़पकर, चीखते हुए): "आह्ह्...! ओ गॉड... शेर...!"
 
मीरा के मुँह से निकली वह सिसकती हुई चीख कमरे के शांत माहौल में गूँज गई, और वह लाज व डर के मारे अपना चेहरा छिपाने की कोशिश करने लगी।
 
मीरा (अपनी आँखें बंद किए हुए, अपनी नाभि पर शेर की उंगली का तीखा दबाव महसूस करते हुए बेबसी से सिसककर): "शेर... प्लीज, क्या तुम मुझे उस खौफनाक कसम से मुक्त नहीं कर सकते? मेरी ममता का इस तरह इम्तिहान मत लो..."
 
शेर (अपनी उंगली को उसकी नाभि के गहरे उतार-चढ़ाव में और गहराई से घुमाते हुए, एक नीच मुस्कान के साथ): "मैं तो आपको तुरंत आज़ाद करना चाहता हूँ मीरा मैडम... लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि जैसे ही मैंने आपको उस कसम के जाल से छोड़ा, आप इस नौकर को अपने इस बदन पर हाथ भी नहीं रखने दोगी।"
 
मीरा (अत्यधिक लाचारी और आँखों में आँसू भरकर): "प्लीज शेर... ऐसा मत कहो, मुझ पर तरस खाओ..."
 
शेर (अपनी आँखों में मीरा की छाती के तेज़ उभार को घूरते हुए): "इस मामले में मैं मजबूर हूँ, आपको देख के कंट्रोल ही नहीं होता, आप हो ही इतनी सुंदर... और फिर, अभी जो आपके मुँह से मीठी सिसकी निकली है, उससे मुझे साफ़ पता चल रहा है कि इस नौकर का यह स्पर्श आपके इस प्यासे जिस्म को भी बहुत अच्छा लग रहा है..."
 
यह कहते ही शेर ने अपना हाथ उसके नंगे पेट से हटाया और सीधे ऊपर की ओर सरकाते हुए मीरा के ब्लाउज के भीतर और ब्रा के नीचे डाल दिया।
 
उसकी बड़ी, गर्म हथेली ने मीरा के एक बेहद सुडौल, भारी और तंग  मुम्मे को अपनी मजबूत गिरफ्त में पूरी तरह दबोच लिया।
 
जैसे ही शेर की उंगलियों का नंगा स्पर्श उसके स्तन के कोमल हिस्से पर हुआ, मीरा का पूरा बदन झटके से अकड़ गया और उत्तेजना व खौफ की एक ऐसी तीव्र लहर उठी कि वह खुद को संभाल नहीं पाई।
 
मीरा (इस सीधे और वहशी स्पर्श के दबाव से बेहाल होकर, अपना सिर पीछे की ओर गिराते हुए मदहोशी में कराह उठी): "ओह्ह् गॉड... आह्ह्... शेर...!"
 
कमरे के भीतर की हवा जैसे भारी हो चुकी थी, जहाँ हर एक सांस के साथ दोनों जिस्मों की महक और उत्तेजना आपस में घुल रही थी।
 
शेर का हर एक इशारा, उसकी हर एक हरकत इतनी धीमी थी कि मीरा के लिए वह सज़ा और मज़ा दोनों बन चुकी थी।
 
शेर की चौड़ी उँगलियाँ मीरा के सुडौल स्तन पर जमी हुई थीं। उसकी बाईं हथेली का भारी दबाव मीरा के स्तन को धीरे-धीरे सहला रहा था। उसका अँगूठा बेहद धीमी गति से, उस मखमली नंगी त्वचा पर रेंगते हुए आगे बढ़ा।
 
शेर ने अपनी हथेली खोली और उसके उभार को पूरी तरह अपने हाथों में भर लिया। फिर उसके अंगूठे का सिरा धीरे से उसके सख्त हो चुके निप्पल की ओर बढ़ा। उस ज़रा-से स्पर्श से मीरा का पूरा जिस्म बिजली की कौंध-सा काँप उठा। शेर की निगाहें मीरा के गुलाबी होते चेहरे पर टिकी थीं, जहाँ कामुकता की एक दीवानी लहर दौड़ रही थी।
 
शेर (अपनी आवाज़ को और भी धीमा करते हुए, सीधे मीरा के कांपते होंठों के पास फुसफुसाया):
"देख रही हैं मेमसाहब... यह जो आपकी सिसकी और आपकी यह चढ़ती साँसें हैं, यह साफ़ बता रही हैं कि इस नौकर का स्पर्श आपके भीतर तक कैसा जादू कर रहा है... कैसे आपका यह कोमल जिस्म मचल रहा है इस हाथ के लिए..."
 
यह कहते ही शेर ने अपनी उँगलियों की हरकत को एकदम से थाम दिया।
 
तभी, शेर ने अपनी बड़ी उँगलियों का घेरा सिकोड़ा और सीधे उस सख्त हो चुके निप्पल को अपनी चुटकी में ले लिया। उसने बेहद धीरे से, एक हल्का सा मरोड़ देते हुए चुटकी काटी। वह दर्द और लज्जत का ऐसा तीखा घालमेल था कि मीरा का पूरा बदन खाट पर कमान की तरह तन गया।
 
उसकी आँखें बंद थीं, पर पलकों के भीतर उसकी पुतलियाँ पागलों की तरह घूम रही थीं।
 
इससे पहले कि मीरा अपनी इस उत्तेजना को संभाल पाती, शेर ने अपना दूसरा हाथ उठाया। उसकी उँगलियाँ मीरा के कंधे पर टिके साड़ी के पल्लू के किनारे को छूने लगीं।
 
उसकी उँगलियों के पोरों ने पहले उस बनारसी कपड़े के धागों को महसूस किया, फिर धीरे-धीरे पल्लू को कंधे से नीचे सरकाना शुरू किया। हर एक सेकंड में पल्लू सिर्फ एक इंच नीचे खिसक रहा था, जिससे मीरा के कंधे की गोरी, चिकनी त्वचा धीरे-धीरे उजागर हो रही थी। अंततः, एक हल्की सरसराहट के साथ पल्लू पूरी तरह नीचे गिर गया।
 
पल्लू के गिरते ही मीरा का आधा धड़ पूरी तरह बेपर्दा हो चुका था। शेर की भूखी निगाहें उस नज़ारे पर थम गईं।
 
बाईं ओर का स्तन ब्लाउज और ब्रा के भीतर शेर की मजबूत हथेली में कैद था, जो उसकी पकड़ के दबाव में बाहर की तरफ छलक रहा था। दाहिनी ओर का स्तन काले ब्लाउज की तंग कतरन के भीतर इस कदर कैद था कि उसका उभार ऊपर से साफ दिखाई दे रहा था, जो मीरा की तेज धड़कनों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था।
 
मीरा ने अपनी आँखों से बहते आँसू और भारी सिसकियों के बीच अपनी गरिमा को बचाने की एक आखिरी, कमज़ोर कोशिश की।
 
मीरा (अपनी छाती पर शेर की उँगलियों के उस निरंतर, मीठे दर्द से छटपटाते हुए, रुंधे गले से):
 
"ऐसा... ऐसा बिल्कुल नहीं है शेर... तुम गलत समझ रहे हो। कोई भी  मर्द ... अगर किसी औरत के जिस्म को इस तरह छुएगा और मसलेगा .. तो उसकी सिसकी अपने आप निकल ही जाएगी। इसका मतलब यह नहीं कि मुझे यह अच्छा लग रहा है... सच तो यह है कि मैं सिर्फ अपनी बच्ची की उस खौफनाक कसम के आगे लाचार हूँ... वरना मैं इसी वक्त तुम्हारे इस हाथ को अपने जिस्म से नोच कर फेंक देती..."
 
शेर के चेहरे पर मीरा की इस सफाई से कोई फर्क नहीं पड़ा।
 
उसकी आँखों की चमक और गहरी हो गई। उसकी उँगलियों ने मीरा के संवेदनशील स्तन को थोड़ा और गहराई से भींचा, जिससे मीरा के होंठों से एक और असहाय आह निकल गई।
 
शेर (एक कमीनी और गहरी मुस्कान के साथ, अपनी उंगलियों की पकड़ को और सख्त करते हुए, बेहद ठंडी आवाज़ में बोला):
"अपने मन को बहलाने का यह तरीका बहुत अच्छा है मीरा मैडम... लेकिन असली सच्चाई क्या है, यह आप भी अच्छी तरह जानती हैं। आपकी यह काँपती हुई देह और यह गर्म साँसें झूठ नहीं बोल रहीं। यह तो मुझे पुकार रही हैं..."
 
अब शेर के भीतर का सब्र पूरी तरह टूट रहा था।
 
उसने अपनी दाहिनी तर्जनी उँगली को मीरा के काले ब्लाउज के सबसे ऊपर वाले हुक पर टिकाया। धातु का वह छोटा सा हुक जब उँगली के दबाव से खुला, तो एक हल्की सी 'टिक' की आवाज़ हुई।
 
शेर रुका...
 
उसने मीरा के चेहरे के उतार-चढ़ाव को देखा। फिर, उसने दूसरे हुक को खोला... और फिर तीसरे को। हर एक हुक के खुलने के साथ ब्लाउज के दोनों हिस्से एक-दूसरे से दूर होते गए, जिससे मीरा की मखमली छाती के बीच का गहरा गैप और चौड़ा होता गया।
 
ब्लाउज के कपाट खुलते ही शेर ने अपनी उँगलियों से उसकी ब्रा के कप को भी बेहद नज़ाकत से एक तरफ खिसका दिया। अब कोई पर्दा नहीं बचा था।
 
मीरा की दोनों गोरी और सुडौल छातियाँ उस धुंधले कमरे की पीली रोशनी में पूरी तरह नग्न थीं। शेर की आँखों में हवस का समंदर उमड़ आया।
 
उसने अपनी बाईं हथेली में पहले से दबे स्तन को और ज़ोर से भींचा, और फिर अपने दाहिने हाथ को हवा में उठाया। उसका दाहिना हाथ मीरा के दूसरे अनावृत, कांपते हुए स्तन के ठीक ऊपर हवा में कुछ सेकंड के लिए ठहरा... जैसे वह उस कोमल मांस पर कब्ज़ा करने से पहले मीरा की धड़कनों की बेताबी को नाप रहा हो।
 
मीरा ने अपनी साँसें रोक लीं, उसका पूरा वजूद शेर के उस दूसरे हाथ के स्पर्श के लिए चीख रहा था। और फिर, शेर की भारी हथेली ने उस दूसरे स्तन को भी अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
 
"अच्छा लगता है ना, मेमसाहिब?" उसने फुसफुसाया, उसके हाथों ने उसके स्तनों को और कसकर निचोड़ा, उसके काँपते होठों से और अधिक असहाय आवाज़ें निकाल रहा था।
 
मीरा (सिसकते हुए, आवाज़ में एक रसातल): "आह्ह्ह... उह्ह... शेर... प्लीज़... यह... यह गलत है... रुक जाओ... म्म्म्म..."
 
शेर (उसके कान के पास क्रूरता से हँसते हुए): "गलत? मेमसाहिब, जब बदन इतनी शिद्दत से भीख माँग रहा हो, तो कुछ भी गलत नहीं होता। देखो तो... मेरे हाथों की गर्मी पाकर कैसे सख्त हो गए हैं।"
 
शेर के सख्त हाथ अब मीरा के नरम स्तन को किसी गीली मिट्टी की तरह गूँथ रहे थे। हर निचोड़ के साथ मीरा का आत्मनियंत्रण रेत के महल की तरह ढह रहा था। उसकी जाँघें बेकाबू होकर काँप रही थीं और पैरों के बीच एक अजीब सी, गीली तड़प उसे पागल कर रही थी।
 
देखा, मेमसाहिब?” शेर ने उसके कान के पास गरजते हुए कहा। उसके अंगूठे से उसके सख्त, संवेदनशील निप्पल को बेशर्मी से घुमा रहे थे, चिढ़ा रहे थे, हर हल्की हलचल में उसे अपने अधीन कर रहे थे।
 
कितनी गर्व से खड़ी हो… कितना तरस रही हो मेरे हाथों के लिए…” उसकी आवाज़ शुद्ध गंदगी और वासना से भरी थी—धीमी, मोटी, और गहरे संतोष से टपकती हुई।
 
शेर ने भूखे, अधीनस्थ भाव से उसका चेहरा देखा—जिस तरह उसके गाल लाल हो गए थे, उसकी छोटी-छोटी धीमी सिसकियाँ निकल रही थीं, भले ही उसने उन्हें दबाने की कोशिश की हो। शर्म और कच्ची ज़रूरत उसके मदहोश, असहाय चेहरे पर उलझी हुई थी, और शेर यह सब अपनी ताक़त और अधिकार के खेल में महसूस कर रहा था।
 
मीरा की पलकें फड़फड़ाईं, आधी उठी, उसकी आँखें धुंधली और खोई हुई थीं, जैसे वह पूरी तरह डूब रही हो।
 
नहीं… शेर… प्लीज़… ऐसा मत करो,” उसने हिचकिचाते हुए फुसफुसाया, उसकी आवाज़ कांप रही थी, शब्द उसके होंठों पर फँस रहे थे।
 
शेर ने उसके स्तनों को और कसकर दबाया, निचोड़ते हुए, घुमाते हुए।
 
“अरे मेमसाहिब… तुम खुद देखो, तुम मेरे हाथों के लिए कितनी तरस रही हो…” उसकी आवाज़ में कड़वी मिठास और अधीनता का मज़ा था।
 
मीरा ने अपनी छोटी-छोटी हाँफों में कहा, “शेर… प्लीज़… रोक दो… यह गलत है…”
 
शेर ने उसे सुनते हुए मुसकुराया और दबाव और बढ़ा दिया।
 
“गलत? नहीं… यह तुम्हारे लिए ही सही है, मेमसाहिब। तुम चाहती हो, तुम्हारे शरीर की हर रेखा मुझसे खेलना चाहती है।”
 
मीरा की छाती उसके लालची हाथों के नीचे ऊपर-नीचे हो रही थी। हर निचोड़, हर दबाव उसे और अधिक पिघला रहा था। मीरा अनायास ही कराह पड़ी। “आह… शेर… रुको… मैं… मैं नहीं सह सकती…”
 
मीरा (अपनी दोनों छातियों पर शेर के उस नंगे और खुरदरे स्पर्श से काँपते हुए, आँखों से लगातार बहते आँसुओं के बीच सिसककर): "प्लीज शेर... आह्ह्... इन्हें छोड़ दो... बस करो..."
 
शेर (एक कमीनी मुस्कान के साथ, अपने दोनों हाथों को उसकी नग्न छातियों पर और कसते हुए): "किसे छोड़ दूँ मीरा मैडम? साफ़-साफ़ कहिए ना, मुझे समझ नहीं आ रहा।"
 
मीरा (शर्म और उत्तेजना के गहरे बवंडर में घुटती हुई, अपनी उखड़ती सांसों के बीच): "तुम... तुम अच्छी तरह समझ रहे हो शेर... प्लीज, इस तरह मत तड़पाओ..."
 
शेर (अपनी आँखों सीधे उसकी नग्न छाती पर गड़ाते हुए): "नहीं मीरा मेमसाहिब, अब शर्माने से काम नहीं चलेगा। जो भी कहना है, एकदम खुल के कहिए कि मुझे क्या छोड़ना है और क्या पकड़ना
है..."
 
यह कहते ही शेर ने अपनी दोनों हथेलियों की पूरी ताकत समेटकर मीरा के दोनों सुडौल मुम्मों को एक साथ बेरहमी से पकड़कर और मोड़ दिया। उसकी उंगलियों ने उन मुम्मों को इतनी बुरी तरह दबाया कि मीरा के बर्दाश्त की हद पूरी तरह टूट गई।
 
मीरा (दर्द, खौफ और अपनी रगों में अचानक फूटी तीव्र वासना के मिले-जुले चरम अहसास से तड़पकर, अपना सिर पीछे पटकते हुए चीख उठी): "आह्ह्...! ओ गॉड... शेर...!"
 
उसकी वह दर्द और हवस से भरी तीखी चीख कमरे की दीवारों से टकराकर दम तोड़ने लगी। शेर की उस उग्र छुअन और अपनी भारी छाती के बेरहम मर्दन के कारण मीरा का पूरा बदन भीतर तक थरथरा उठा, और उत्तेजना की उस चरम सीमा पर पहुँचते ही उसे अपनी साड़ी के भीतर, अपनी जाँघों के बीच एक बेहद गीला और गर्म रस नीचे की ओर तेज़ी से रिसता हुआ महसूस होने लगा, जिसने उसकी बची-कुची मर्यादा को पूरी तरह पानी-पानी कर दिया।
 
मीरा (गहरी हवस, शर्म और बेबसी की आग में पूरी तरह जलते हुए, अपनी आँखें मूँदकर सिसकते हुए): "मेरे... मेरे ब्रेस्ट को छोड़ दो शेर... प्लीज..."
 
शेर (अपनी उँगलियों को उसकी संवेदनशील छाती पर और बेरहमी से भींचते हुए, अपनी शातिर आवाज़ में): "क्या कहा मेमसाहिब? किसके बारे में बात कर रही हो? जरा साफ़-साफ़ बताओ, आखिर ये 'ब्रेस्ट' क्या होता है? हमारे जैसे गँवारों की भाषा में बोलो ना!"
 
मीरा तड़प उठी। वह अच्छी तरह समझ गई कि यह नौकर उससे क्या सुनना चाहता है।
 
वह उसे पूरी तरह अपने घुटनों पर देखना चाहता था, उसकी बची-कुची संभ्रांत मर्यादा को अपनी देहाती हवस की ज़बान से कुचलना चाहता था। अपनी जाँघों के बीच की गीली नमी और स्तनों पर उसकी उँगलियों के बढ़ते तीखे दर्द से मजबूर होकर उसने आखिरकार पूरी तरह घुटने टेक दिए।
 
मीरा (शर्म से अपने लाल हो चुके चेहरे को मोड़कर, काँपते और टूटते हुए स्वर में फुसफुसाते हुए): "मेरे... मेरे मुम्मों को छोड़ दो शेर... प्लीज मेरे मुम्मों को मत दबाओ..."
 
शेर (चेहरे पर मुस्कान लाते हुए): "मीरा मेमसाहब, ज़रा तेज़ बोलिए ना... आपकी आवाज़ साफ़ सुनाई नहीं दी।"
 
इतना कहते ही शेर ने उसके सख्त निप्पल पर फिर से एक तीखी चुटकी काट ली।
 
मीरा (दर्द और झिझक की बंदिश तोड़ते हुए, ज़ोरदार और काँपती आवाज़ में चीख पड़ी): "मेरे... मेरे मुम्मों को छोड़ दो शेर!"
 
शेर (अपनी दोनों हथेलियों को मीरा की लाल हो चुकी छाती से धीरे-धीरे हटाते हुए, एक गहरी और संतोषजनक सांस के साथ): "यह हुई ना बात, मीरा मैडम... जब आवाज़ इतनी मीठी हो, तो यह गरीब नौकर भला आपकी बात कैसे टाल सकता है।"
 
शेर ने मीरा को इनाम देने का फैसला किया और उसके स्तनों को अपनी सीधी गिरफ्त से आज़ाद कर दिया। लेकिन उसकी चाल का अगला हिस्सा अभी बाकी था।
 
उसने मीरा के दोनों कांपते हुए हाथों को कलाई से पकड़ा और उन्हें धीरे से ऊपर की ओर खींचकर उसके सिर के दोनों तरफ टिका दिया। इस तरह दोनों हाथ ऊपर खिंच जाने के कारण मीरा का पूरा जिस्म और भी ज़्यादा तन गया और उसकी छाती का पूरा हिस्सा शेर की नज़रों के सामने पूरी तरह नग्न और लाचार हो गया।
 
उस धुंधले कमरे में मीरा की वह अनमोल जवानी अब पूरी तरह खुली हुई थी:
 
 दोनों हाथ ऊपर की तरफ बंधे होने की वजह से मीरा की भारी और गोल छाती ऊपर की ओर तन गई थी। उसके दोनों स्तन अपनी पूरी गोलाई और भारीपन के साथ एक-दूसरे से थोड़े दूर, लेकिन बेहद सख्त और उभरे हुए नजर आ रहे थे।
 
शेर की उँगलियों के बेरहम मर्दन के कारण मीरा की गोरी और मखमली त्वचा पर लाल रंग के गहरे निशान छप चुके थे। उसके स्तनों की कोमल गोलाई अब पूरी तरह सुर्ख लाल हो रही थी, जो उसके गोरे बदन पर साफ चमक रही थी।
 
दोपहर की उमस, खौफ और भीतर से उठते कामोत्तेजना के गुबार के कारण उसके दोनों निप्पल सख्त और गहरे गुलाबी रंग के होकर बाहर की तरफ तन गए थे, जो उसकी तीव्र उत्तेजना को साफ़ बयां कर रहे थे।
 
घबराहट और तेज सांसों के चलने के कारण उसका पूरा सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे उसके भारी और सुर्ख स्तन हवा में किसी मदहोश कर देने वाले बवंडर की तरह धड़क रहे थे।
 
शेर अपनी खाट पर बैठा हुआ अपनी आँखें फाड़कर मीरा की इस बेबस और बेहद उत्तेजक हालत को निहार रहा था। उसका रोम-रोम मीरा की इस छटपटाती हुई जवानी को अपनी आँखों से ही पी जाने के लिए मचल उठा था।
 
शेर (अपनी आँखों में पूरी वहशियत और दीवानगी भरकर, मीरा के उस तने हुए सुर्ख बदन को एकटक घूरते हुए): "सच कहूँ मीरा मैडम... जितनी बार देखता हूँ, इस नौकर का दिल ही नहीं भरता। ऐसा लगता है कि बस इन्हें देखता ही रहूँ।"
 
मीरा अपनी आँखें बंद किए, उस खाट पर पूरी तरह जकड़ी हुई थी। वह कमरे की छत, दीवारों या किसी भी चीज़ को देख सकती थी, पर शेर की उन जलती हुई हवस भरी आँखों से अपनी नज़रें मिलाने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
 
उसके दोनों हाथ ऊपर खिंचे हुए थे और उसकी पूरी छाती नंगी हुई थी, जिससे वह अंदर तक पूरी तरह नग्न और बेबस महसूस कर रही थी।
 
मीरा (अपनी उखड़ती सांसों और शर्म की चरम सीमा पर पहुँचकर, बेहद लाचार आवाज़ में): "प्लीज... प्लीज शेर, ऐसे मत देखो... मुझे बहुत अजीब लग रहा है..."
 
शेर (उसी शातिर और नीच लहजे में, अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लाकर): "अरे मैडम, फिर से वही आधी-अधूरी बात? साफ़-साफ़ कहिए ना, किसे न देखूँ?"
 
मीरा अब अच्छी तरह समझ चुकी थी कि शेर उसकी बची-कुची गरिमा को पूरी तरह कुचलकर अपने मनमुताबिक शब्द सुनना चाहता है।
 
वह जानती थी कि जब तक वह शेर की मर्ज़ी के शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेगी, यह ज़ालिम उसे इस लाचार हालत से आज़ाद नहीं करेगा। उसने एक बार फिर अपना घूंट निगला और टूटते हुए स्वर में कहा।
 
मीरा (अत्यधिक शर्म से लाल होकर, अपनी आँखें मूँदे हुए फुसफुसाते हुए): "मेरे... मेरे मुम्मों को ऐसे मत देखो..."
 
शेर (अपनी जीभ को होठों पर फेरते हुए, एक गहरी सिसकारी के साथ): "बात तो ठीक है मेमसाहिब... पर मज़ा नहीं आया। जरा और साफ़-साफ़ बोलिए... बोलिए कि 'शेर, मेरे इन रसीले मुम्मों को ऐसे मत देखो, देखो तुम्हारे देखने से कैसे तन के खड़े हो गए हैं।'"
 
मीरा कुछ कह नहीं सकी, वह अपमान की एक गहरी और तीखी आग में जल रही थी। उसकी आँखें बंद थीं और चेहरा शर्म से लाल हो चुका था।
 
शेर (अपनी आवाज़ को और धीमा और ज़हरीला बनाते हुए): "बोलिए मेमसाहिब..."
 
यह कहते हुए वह उसकी छाती के और भी करीब आ गया, जैसे उनके बीच की बची-कुची दूरी को भी मिटा देना चाहता हो।
 
अब उसका मुँह मीरा के सुडौल और उभरे हुए मुम्मों से महज़ कुछ ही इंच की दूरी पर था। शेर की हर गर्म और भारी साँस सीधे मीरा की नंगी, संवेदनशील त्वचा पर पड़ रही थी, जिससे मीरा का पूरा बदन खौफ और बेकाबू होती उत्तेजना से सिहर-सिहर उठ रहा था।
 
उसके गले से एक दबी हुई, सिसकती हुई आवाज़ निकली। उसने अपनी सूखी हुई जीभ से कांपते होठों को छुआ और अंततः अत्यंत धीमी, टूटती हुई आवाज़ में वही शब्द कहे, जिनकी मांग उस जालिम ने की थी:
 
मीरा (रोते हुए, कांपती और बेहद धीमी आवाज़ में): "शेर... मे-मेरे इन... रसीले मुम्मों को... ऐसे मत देखो... देखो, तुम्हारे देखने से... कैसे तन के खड़े हो गए हैं..."
 
ये अश्लील और बेबस शब्द जैसे ही मीरा के मुँह से निकले, उसे लगा कि उसकी बची-कुची गरिमा भी पूरी तरह तार-तार हो गई है। उसकी आँखों के कोनों से आँसू की एक बूंद ढलककर सीधे उसके गाल से होती हुई उसकी छाती के बीच के गहरे उतार में जा गिरी।
 
यह सुनते ही शेर के चेहरे पर एक शैतानी जीत की मुस्कान फैल गई।
 
शेर (एक गहरी, संतुष्ट सिसकारी भरते हुए): "वाह मेमसाहिब, वाह! यह हुई न बात... आखिर आपकी इन मखमली जुबान से अपने इन रसीले पहाड़ों की तारीफ सुनकर इस नौकर के दिल को जो ठंडक मिली है, उसे मैं बयान नहीं कर सकता।"
 
शेर (एक संतुष्ट और विजयी मुस्कान के साथ, मीरा की कलाई पर से अपनी पकड़ ढीली करते हुए): "लीजिए मेमसाहिब । दिल तो बिल्कुल नहीं मान रहा था, पर आखिर मैं आपका हुक्म कैसे टाल सकता हूँ।"
 
जैसे ही शेर पकड़ ढीली हुई, मीरा ने तुरंत अपने दोनों हाथ नीचे किए और अपनी बाहों को अपनी छाती पर आड़ा रखते हुए अपने खुले, लाल पड़े स्तनों को ढँक लिया। उसका पूरा बदन अभी भी बुरी तरह काँप रहा था।
 
शेर खाट पर थोड़ा और आगे खिसका और सीधे मीरा की डरी हुई, गीली आँखों में झाँकते हुए बोला।
 
शेर (एक तीखी और चुभती हुई आवाज़ में): "वैसे मीरा मैडम... क्या अब भी आप यही कहना चाहती हैं कि आपकी उन मदहोश सिसकियों में आपकी कोई रज़ामंदी नहीं थी? क्या आप अब भी खुद को यही दिलासा देना चाहती हैं कि यह सब आप सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी की कसम के डर से करवा रही हैं?"
 
मीरा (अपनी बाहों को छाती पर और कसकर भींचते हुए, अपनी आँखों में नफरत और लाचारी के आँसू भरकर): "हाँ! अगर ज्योति की कसम न होती, तो मैं तुम्हें अपने इस जिस्म को छूना तो दूर... अपने साए के करीब भी नहीं फटकने देती शेर!" 
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 22-07-2026, 01:14 PM



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