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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
अपनी सगी अम्मी को इस तरह दो गैर मर्दों के सामने घुटने टेकते और अपने हुस्न की नुमाइश करते देख मेरा दिल दहल गया था। मैं लाचारी और गुस्से की आग में अंदर ही अंदर जल रहा था।

 
जब अम्मी ने नीचे गिरे हुए रुपये उठाए और उन्हें अकरम के सिर के ऊपर से घुमाकर सदका उतारा। मैं सोच में पड़ गया कि क्या यह सब वाकई सिर्फ एक हादसा था?
 
मेरा तड़पता हुआ मन अपनी अम्मी की पाकीज़ाह छवि को बचाने के लिए इस बहाने को सच मान लेना चाहता था। मुझे लगा कि शायद थाली से रुपये सचमुच अचानक गिर गए थे, और अम्मी ने बस एक रस्म निभाने के लिए अकरम का सदका उतार दिया।

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आयशा (दुपट्टे को सीने पर अच्छी तरह दुरुस्त करते हुए, एक लंबी और कांपती हुई सांस लेकर मन में): "या खुदा, तेरा लाख-लाख शुक्र है कि इज़्ज़त बच गई... इस भरे हुजूम में से किसी तीसरे की नज़र उस पीली ब्रा और मेरे इन तने हुए निपल्स पर नहीं पड़ी।"
 
आयशा (विशाल और अकरम से नज़रें चुराकर पीछे हटते हुए): "शुक्र है मेरा वो दिमाग काम कर गया... थाली से रुपये गिराकर मैंने उस बेशरम नुमाइश को महज़ एक हादसा बना दिया, वरना आज मेरा वजूद यही मिट्टी में मिल जाता।"
 
आयशा (अकरम की तरफ दबी नज़र से देखते हुए, एक गहरी चिंता के साथ): "लेकिन अब इस अकरम के सामने जाना कितना दूभर हो जाएगा... आज के बाद जब भी यह दामाद बनकर मेरे सामने आएगा, मेरी रूह कांप उठेगी।"
 
आयशा (अपने दिल को झूठी तसल्ली देते हुए, एक गहरी सांस लेकर): "पर कोई बात नहीं... वो इसे सिर्फ एक इत्तेफ़ाक़ ही समझ रहा है, निकाह के बाद सायमा के रंग में रंगकर वो कुछ ही दिनों में इस हादसे को भूल जाएगा... हाँ, वो ज़रूर भूल जाएगा।"
 
आयशा खुद को ढाढस बंधा रही थीं, अपने इस झूठ के सहारे उस भयंकर आत्मग्लानि और ज़िल्लत के अहसास को दबाने की कोशिश कर रही थीं। उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अकरम के दिल में उस "हादसे" ने हवस की जो आग लगाई है, वह इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं थी।

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बारात अंदर आ चुकी थी। दूल्हा अकरम और उसके अब्बू पूरे वक़ार के साथ स्टेज की तरफ बढ़ गए। बाकी सब बाराती, विशाल समेत, लॉन में मंडप के नीचे सजी मखमली कुर्सियों पर बैठ गए। चारों तरफ शहनाई की धुन और मेहमानों की चहल-पहल थी।
 
"शरबत! शरबत लाओ!" नजमा आंटी ने पुकारा।
 
अम्मी समेत, सब औरतें अब शरबत के गिलासों की ट्रे उठाने लगीं। उन्होंने ट्रे उठायी और उनकी निगाहों ने भीड़ में सीधा विशाल को ढूँढ लिया।
 
वो उसी तरफ चली गयीं। मैं उनके पीछे-पीछे, थोड़ी दूरी पर... चलने लगा।
 
 
अम्मी ने ट्रे आगे बढ़ायी। एक बाराती को गिलास दिया, फिर दूसरे को दिया। उनके चेहरे पर इस वक्त एक मुकम्मल और संस्कारी मेहमान-नवाज़ की मीठी मुस्कान थी, जैसे कुछ देर पहले गेट पर हुई उस घिनौनी ज़िल्लत का कोई साया भी उन पर न हो।
 
और फिर... वो विशाल के ठीक सामने जाकर खड़ी हो गईं।
 
विशाल आराम से कुर्सी पर पैर पर पैर रखे, पूरी ठसक के साथ बैठा था। उसने अम्मी को देखा—सर से लेकर पाँव तक, उसकी भूखी निगाहें अम्मी के उस चमकीले डिज़ाइनर जोड़े, कानों में झूलते भारी मोतियों के झुमकों और होठों पर सजी 'म्यूटेड बेरी' लिपस्टिक पर आकर टिक गईं। उसकी आँखें साफ़ कह रही थीं कि उसे उस ब्रा के अंदर कसमसाते मम्मों का वो नज़ारा अभी भी याद है।
 
"शरबत?" अम्मी ने अपनी आवाज़ को बेहद मीठा और नर्म बनाते हुए कहा, पर उनकी उंगलियाँ ट्रे के किनारों पर कांप रही थीं।
 
विशाल मुस्कुराया। उसकी वही चिर-परिचित  कमीनी मुस्कान उभरी, जो मेरे अंदर गुस्से का सैलाब ला रही थी। उसने गिलास उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन उसने गिलास नहीं पकड़ा... बल्कि उसने जान-बूझकर, अपनी उंगलियों को अम्मी की उन मखमली, गोरी उंगलियों के ऊपर रख दिया।
 
यह एक गहरा, धीमा और बेशरम अहसास था। वह अम्मी की नाज़ुक उंगलियों को अपनी उंगलियों के बीच सहला रहा था, जैसे सरेआम भरी महफ़िल में उनका हाथ पकड़कर अपनी हवस का दावा ठोक रहा हो।
 
उन दोनों के हाथों की वो गर्मी मेरी नज़रों के सामने साफ़ फैल रही थी। वह हरकत इतनी डेलिब्रेट और सोची-समझी थी कि कोई शक की गुंजाइश ही नहीं बची थी; यह उन दोनों का एक नया सीक्रेट सिग्नल था।
 
मेरा दिल तेज़ी से धड़का, जैसे कोई हैमर मेरे सीने पर मार रहा हो। अम्मी की सांसें एक पल के लिए रुक गयीं - मैं देख सका उनके चेहरे पर वो हल्की सी बेचैनी, उनकी आँखें थोड़ी सी बड़ी हो गयीं, लेकिन उन्होंने अपना हाथ वापस नहीं खींचा।
 
बल्कि, उन्होंने उस टच को एक लम्हे के लिए होने दिया, जैसे वो उस गर्मी को एन्जॉय कर रही हों, उनकी उंगलियाँ हल्की सी हिल गयीं जैसे रिस्पॉन्स में। उनका चेहरा लाल हो गया था, धूप की वजह से या उस टच की वजह से।
 
मैं वहीं खड़ा रहा, मेरा खून उबल रहा था, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सका। यह उनका खेल था, और मैं सिर्फ एक देखने वाला था।
 
शेरवानी में, सिर झुकाए बैठा था। सायमा खाला को भी लाल जोड़े में, ज़ेवरों से लदी, स्टेज के एक तरफ बिठाया गया था। काज़ी साहब ने निकाह का खुतबा  शुरू किया। उनकी गंभीर आवाज़ माइक्रोफोन में गूँजी। पूरे हॉल में एकदम... खामोशी छा गयी।
 
सब लोग खामोशी से सुन रहे थे। बुज़ुर्ग आदमियों ने अपने सिर झुका लिए थे, उनकी निगाहें ज़मीन पर थीं, जैसे हर लफ़्ज़ को अपने अंदर उतार रहे हों। औरतें, जिन्होंने अभी तक अपने दुपट्टे शान से डाले हुए थे, उन्होंने... एहतरामन् ... अपने सर... थोड़े और ढक लिए थे।
 
मैं एक पिलर से टेक लगाए खड़ा था। मुझे वहाँ से पूरा रोशन स्टेज और पूरा मंडप साफ़ नज़र आ रहा था।
 
अम्मी तेज़ी से नजमा आंटी और दूसरी औरतों के बीच जा कर खड़ी हो गयीं। वो स्टेज के करीब, लेफ्ट साइड पर थीं। उन्होंने अपने सुनहरे दुपट्टे को 'एहतरामन्अपने सर पर हल्का सा खींच लिया था। उनकी निगाहें सीधी स्टेज पर जमी थीं। एक मुकम्मल, शरीफ, दीन-दार औरत के जैसे।
 
दूसरी तरफ, मर्दों के सेक्शन में, विशाल अपने दोस्तों के साथ खड़ा था। उसकी कमर स्टेज की तरफ थी। वो काज़ी को नहीं देख रहा था, जैसे वो इस सब से बेज़ार  हो।
 
हॉल में बैठे हर शख्स की तमाम तवज्जो काज़ी साहब पर थी। काज़ी साहब ने सायमा खाला के वकील  से पूछना शुरू किया। उनकी आवाज़ हॉल की भारी खामोशी में गूँजी। सब लोग सांसें रोके, उस सवाल-ओ-जवाब को सुन रहे थे।
 
और तभी, उस खामोशी के बीच, मैंने देखा। विशाल ने, जो अब तक बोर हो रहा था, अपनी जेब से अपना फोन निकाला। उसकी स्क्रीन रोशन हुई। उसकी चमक ने एक पल के लिए उसके चेहरे को नीला कर दिया। वो अपने दोस्तों के झुंड में थोड़ा पीछे हो गया, ताकि उसकी यह हरकत कोई देख ना सके।
 
और ठीक। ठीक उसी पल। जैसे किसी ने कोई बटन दबाया हो, जैसे यह सब प्लान किया गया हो। हॉल के दूसरे कोने में, अम्मी के हाथ में, जो उन्होंने 'अदब' से सामने बाँध रखे थे, उनका फोन वाइब्रेट हुआ।
 
यह वाइब्रेशन इतनी हल्की थी कि उनके आस-पास खड़ी औरतों को, जो निकाह में मग्न थीं, कुछ भी पता नहीं चला। लेकिन मैंने देख लिया।
 
अम्मी ने फौरन एक पल के लिए इधर-उधर देखा। उनकी नज़र तेज़ी से भीड़ पर फिरी, मुझपर से बिना रुके गुज़र गयी, जैसे मैं वहाँ था ही नहीं। जब उन्हें तसल्ली हो गयी कि कोई उन्हें नहीं देख रहा, उन्होंने बहुत आहिस्ता से, अपने सुनहरे दुपट्टे की ओट  में, अपने फोन की स्क्रीन को देखा।
 
उनके चेहरे पर कोई तास्सुर  नहीं था। वही 'दीन-दार' चेहरा जो काज़ी साहब को सुन रहा था। मगर, उस बे-तास्सुर चेहरे के नीचे, उनके अंगूठे चलने लगे।
 
वो टाइप कर रही थीं। स्टेज पर काज़ी साहब की गंभीर आवाज़ गूँज रही थी, "...हक मेहर की रकम..."
 
और यहाँ नीचे मेरी अम्मी अपने आशिक को मैसेज कर रही थीं।
 
मैंने फौरन दूसरी तरफ विशाल को देखा। उसने अपना फोन देखा, और उसके होठों के कोने एक मुस्कुराहट में ऊपर उठ गए। यह वही गंदी, 'नोइंग' स्माइल थी। उसने फौरन तेज़ी से जवाब टाइप किया।
 
और इधर, अम्मी के चेहरे पर, वही 'muted berry' लिपस्टिक वाले होंठ दब गए। ऐसा लगा जैसे वो एक हंसी, एक खुशी, ज़बरदस्ती रोक रही हों।
 
"कबूल है।"
 
जैसे ही सायमा खाला की आवाज़ मंडप में गूँजी, निकाह पूरा हो गया।
 
काज़ी साहब ने दुआ के लिए हाथ उठाए। जैसे ही दुआ खत्म हुई, मंडप की खामोशी एकदम से टूटी।
 
"मुबारक हो! मुबारक हो!"
 
पूरी जगह एकदम से शोर, हंसी और आवाज़ों से ज़िंदा हो उठी। लोग अपनी जगहों से उठ खड़े हुए। हर कोई दूल्हा-दुल्हन को मुबारकबाद देने के लिए स्टेज की तरफ बढ़ने लगा। एक अराजकता  का माहौल था।
 
अम्मी, जिन्होंने अभी तक 'दीन-दार' चेहरा बना रखा था, उन्होंने फौरन अपना सुनहरा दुपट्टा सर से उतार कर वापस शान से कंधे पर डाल लिया।
 
"अरे, मुबारक हो, नजमा मामी!" वो ज़ोर से हंसती हुईं, नजमा आंटी और दूसरी औरतों के साथ, स्टेज की तरफ बढ़ने लगीं।
 
दूसरी तरफ, विशाल भी अपने दोस्तों के झुंड से निकला। वो भी, अकरम को मुबारकबाद देने, स्टेज की तरफ चल पड़ा।
मैं पिलर के पास से हटा। मैं भी भीड़ के साथ हो लिया। मैं अम्मी और नानी के ठीक पीछे चलने लगा। इतना करीब कि मैं उनकी हर खुस-फुस सुन सकता था। इतना करीब कि अम्मी के महंगे परफ्यूम की महक मुझे घुटन दे रही थी।
 
भीड़ में धक्का-मुक्की  हो रही थी। मर्दों और औरतों के झुंड आपस में मिल रहे थे, सब स्टेज की तरफ बढ़ रहे थे।
Deepak Kapoor
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RE: अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - by Deepak.kapoor - 20-07-2026, 04:39 AM



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