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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
अध्याय -19
 
सुबह जब आयशा अपने लहंगे और कुर्ती को आईने में ठीक कर रही थीं, तभी उनके फोन पर विशाल का नाम चमक उठा।
 
उस नाम को देखते ही उनका पूरा वजूद एक बार फिर कल रात के उसी कामुक बवंडर में डूब गया। उन्होंने कांपते हाथों से फोन उठाया और कान से लगा लिया।
 
विशाल (फोन पर, बेहद कामुक और दबी हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "गुड मॉर्निंग आयशा जी, कैसी हैं आप इस खिली हुई सुबह में?"
 
आयशा (चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल होते हुए, सिर झुकाकर दबी आवाज़ में बोलीं): "हूँ..."
 
विशाल (मन में कमीनी मुस्कान के साथ, उसके इस 'हूँ' का मज़ा लेते हुए): "रात को नींद तो ठीक से आई ना आपको?"
 
आयशा (कल रात की अपनी नग्नता और पैन्टी के गीलेपन को याद करते हुए, और भी ज़्यादा शर्माते हुए): "हूँ..."
 
विशाल (अपने लंड के उभार को पैंट के ऊपर से सहलाते हुए, बेहद सरसराती आवाज़ में): "कल रात की उस सर्द हवा के बाद... सोते वक्त किसी के गरम सपने तो नहीं आए आपको?"
 
आयशा (चेहरे पर भयंकर लाली छा जाने और छाती पर भारी मम्मों के कसमसाने के बीच, अपनी उखड़ी सांसों को छुपाते हुए): "प्लीज विशाल ..."
 
विशाल (फोन पर, अपनी आवाज़ में हवस की कशिश घोलते हुए): "कसम से आयशा जी, रात भर मेरे को नींद ही नहीं आई।"
 
आयशा (कांपते होठों से, अपनी धड़कनों को संभालते हुए फुसफुसाई): "प्लीज विशाल जी, ऐसी बात मत बोलो..."
 
विशाल (कमीनी मुस्कान के साथ अपने लंड को जींस के ऊपर से भींचते हुए): "बिस्तर पर लेटते ही आपके वो दोनों भारी मम्मे, आपके ऊपर वाले रसीले होठ और आपकी वह नीचे वाली मखमली चूत, बार-बार मेरी आँखों के सामने आ रहे थे।"
 
आयशा (चेहरे पर भयंकर लाली और शर्म के बवंडर के बीच, मखमली कुर्ती के नीचे अपने कसमसाते स्तनों को भींचते हुए): "प्लीज विशाल जी..."
 
विशाल (हवस से हाँफते हुए, बेबाकी से): "आपके उस मुकम्मल नंगे बदन की याद में मेरा लंड तो बैठने का नाम ही नहीं ले रहा था।"
 
आयशा (मन में भयंकर कशमकश के साथ सोचते हुए: 'या खुदा! यह मर्द कितना बेशर्म है, कितनी गंदी बातें बोल रहा है... लेकिन मेरा अंग-अंग इसकी इस हवस के आगे पिघलता जा रहा है'): "प्लीज विशाल जी, ऐसी बात मत बोलो..."
 
विशाल (अपनी आवाज़ को और धीमा और सरसराता हुआ रखते हुए): "रात को कसम से, दो बार मैंने आपका नाम लेकर आपके हुस्न को याद किया और अपना पानी निकाला, पर यह औज़ार अभी भी आपके लिए पूरा खड़ा है।"
आयशा (मजबूरी, डर और चरम उत्तेजना के मारे अपनी आँखें कसकर भींचते हुए): "विशाल ..."
 
विशाल (फोन पर, एक कमीनी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान के साथ): "आयशा जी, एक बात पूछूँ आपसे?"
 
आयशा (अपनी धड़कनों को संभालते हुए, बेहद धीमी आवाज़ में): "क्या... क्या पूछना है?"
 
विशाल (बेहद सरसराती और हवस से भरी आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "क्या रात को सोते वक्त मेरा यह १० इंच का लंड आपके ख्वाबों में आया था? सच-सच बताइए... क्या इसका यह भीमकाय आकार आपके शौहर के अंग से भी ज़्यादा बड़ा महसूस हुआ?"
 
आयशा (खौफ और चरम शर्म के मारे पूरी तरह कांपते हुए, फोन को कान से और कसकर चिपकाकर बोलीं): "प्लीज़ विशाल जी... ऐसी गंदी बातें मत करिए, नहीं तो मैं अभी के अभी फोन काट दूँगी!"
 
आयशा (लेकिन मन में वासना और आत्म-ग्लानि के भयंकर दलदल में डूबते हुए): "अब इसे क्या जवाब दूँ? कैसे कहूँ कि इस ज़ालिम के उसी अंग की छवि ने पूरी रात मेरी रातों की नींद हराम कर रखी थी... मैं तो अपनी बच्ची सायमा की आबरू को इसके चंगुल से बचाने निकली थी, पर खुद  इस गैर मर्द की हवस के दलदल में दिन-ब-दिन और गहरी गिरती जा रही हूँ..."
 
विशाल (फोन पर, एक गहरी और रहस्यमयी सांस लेते हुए): "अच्छा छोड़िए इन बातों को, आज तो बहुत बड़ा दिन है, आखिरकार सायमा का निकाह होने जा रहा है।"
 
आयशा (हल्की सी राहत की सांस लेते हुए): "हूँ..."
 
विशाल (कमीनी मुस्कान के साथ): "यह सब आपकी उस रात की मेहनत और कुर्बानी का ही फल है आयशा जी।"
 
आयशा (भौहें सिकोड़ते हुए, उत्सुकता और डर के मिले-जुली आवाज़ में): "वह कैसे?"
 
विशाल (हँसते हुए, सीधे मुद्दे पर आते हुए): "अगर आप उस रात छत पर मेरी बात मानकर अपने कपड़े न उतारतीं, तो मैं तो आज अकरम की जगह सायमा के साथ होता।"
 
आयशा (शर्म और कल रात की नग्नता को याद कर कांपते हुए): "उफ़्फ़..."
 
विशाल (अपनी आवाज़ में थोड़ी कड़वाहट और ज़िद लाते हुए): "लेकिन इस सब के चक्कर में मेरा बहुत बड़ा नुकसान हो गया है, सायमा जैसी कवारी कली मेरे हाथ से निकल गई।"
 
आयशा (दिल की बढ़ती धड़कनों को दबाते हुए, डरकर): "ओह खुदा..."
 
विशाल (लंड पर हाथ फेरते हुए, अपनी असली औकात दिखाते हुए): "तो इतना सब्र करने का और अपना इतना बड़ा नुकसान करवाने का, कुछ तो इनाम बनता है न मेरा?"
 
आयशा (मन में भयंकर खौफ और चिंता के बवंडर में डूबते हुए): "या खुदा, इस दरिंदे की नीयत फिर से डोल रही है... अब यह आज इस निकाह के दिन मुझसे कौन सी नई और बेशरम मांग करने वाला है?"
 
आयशा (कांपती हुई आवाज़ में, बात को टालने की नाकाम कोशिश करते हुए): "हूँ... प्लीज अभी नीचे सब इंतज़ार कर रहे हैं..."
 
विशाल (फोन पर, अपनी आवाज़ में वही पुराना क्रूर लहजा लाते हुए): "आयशा जी, प्लीज यह मत भूलिएगा कि सायमा की वो नग्न तस्वीरें अभी भी मेरे इस फोन में महफ़ूज हैं।"
 
आयशा (खौफ के मारे पूरी तरह टूटते हुए, लाचारी से बोलीं): "ठीक है... बोलो, अब और क्या चाहते हो तुम मुझसे?"
 
विशाल (कमीनी मुस्कान के साथ, अपनी हवस की नई शर्त रखते हुए): "आज आप जोड़े के नीचे पीले रंग की ब्रा और पैन्टी पहनेंगी, क्योंकि लाल वाली तो कल रात ही पूरी तरह भीगकर खराब हो चुकी होगी।"
 
आयशा (शर्म से अपनी आँखें बंद करते हुए, बेहद बेबसी से): "हूँ..."
 
विशाल (उत्तेजना से हांफते हुए, अपनी बात की पुष्टि करने के लिए): "वैसे, आपके पास पीले रंग का वह सेट है तो सही ना?"
 
आयशा (कांपते होठों से, अपनी इज्ज़त की नीलामी को स्वीकार करते हुए): "हूँ..."
 
विशाल (हवस से अपनी आँखें मूंदते हुए, अपना घिनौना प्लान समझाते हुए): "ठीक है, तो जब आज बारात गेट पर आएगी, तब मैं किसी के कंधे पर हाथ रखूँगा और वही आपका इशारा होगा।"
 
आयशा (दिल की बढ़ती धड़कनों के बीच, डरते हुए): "हूँ..."
 
विशाल (चिल्लाते हुए लंड को सहलाते हुए): "जैसे ही मेरा हाथ उसके कंधे पर पड़े, आप हमारे सामने आगे की तरफ झुककर हमें अपने वो सुडौल मम्मे दिखाएंगी, जो उस पीली ब्रा के अंदर कसमसा रहे होंगे... कुर्ती के गहरे गले से आपके वो तीखे निपल्स तक दिखने चाहिए।"
 
आयशा (दहशत से कांपते हुए, गिड़गिड़ाने वाले लहजे में): "नहीं... प्लीज ऐसा मत करो... सबके सामने इस तरह मुझे ज़लील मत करो..."
 
विशाल (क्रूरता से हंसते हुए, सीधे धमकी पर उतर आते हुए): "आयशा जी, आप शायद भूल रही हैं कि अभी सायमा का निकाह होना बाकी है।"
 
आयशा (मन में डूबते हुए वजूद के साथ, सुबकते हुए): "उफ़्फ़... विशाल, तुम बड़े कमीने हो।"
 
विशाल (अपनी उसी चिर-परिचित बेशरम और कमीनी मुस्कान के साथ, फोन पर फुसफुसाते हुए): "कमीना तो मैं हूँ ही आयशा... पर साला मेरा यह लंड मेरे से भी बड़ा कमीना है। यह जिस किसी की भी चूत में जाता है ना, उसे फाड़ के रख देता है।"
 
विशाल के मुँह से निकले इन बेहद गंदे  शब्दों को सुनते ही आयशा के दिमाग में एक भयंकर विस्फोट हुआ।

दिमाग चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाया और एक झटके में उनकी बंद आँखों के सामने विशाल का वो कालिया, नस-नस उभरा हुआ 10 इंच का मोटा लंड तैर गया। उन्होंने अपनी कल्पना में साफ़ देखा कि वह खौफनाक अंग उनकी अपनी नाज़ुक, गोरी और गुलाबी चूत के अंदर ज़बरदस्ती धंसता चला जा रहा है।
 
आयशा (मन में, उस 10 इंच के खौफनाक उभार की कल्पना से बुरी तरह कांपते हुए): "या अल्लाह... 10 इंच का वो काला ज़ल्लाद! अगर वो सचमुच मेरी इस तंग और गुलाबी चूत के अंदर गया, तो मेरा क्या हाल होगा? मैं इतने बड़े और खौफनाक लंड को अपने वजूद के अंदर कैसे बर्दाश्त कर पाऊँगी? वो तो मुझे अंदर तक चीर कर रख देगा... उफ़्फ़, पर यह सोचकर भी मेरी चूत पानी क्यों छोड़ रही है?"
 
उनकी सांसें बुरी तरह उखड़ चुकी थीं और जिस्म हवस की आग में तड़प रहा था, लेकिन अपनी संस्कारी मर्यादा को बचाने के लिए उन्होंने अपनी कांपती आवाज़ को बमुश्किल संभाला।
 
आयशा (फोन पर अपनी उखड़ी सांसों को छुपाते हुए, गुस्से और घबराहट के नाटक के साथ): "विशाल... प्लीज! अगर आगे से ऐसी गंदी और बेहूदा बातें करोगे, तो मैं अभी इसी वक़्त फोन काट रही हूँ!"
 
विशाल (फोन पर एक हल्की,कमीनी हँसी हँसते हुए): "आयशा... आप तो नाराज़ हो रही हैं! अच्छा, मैं आपकी बात मान रहा हूँ... आगे से ऐसा कुछ नहीं बोलूँगा। पर मेरी एक बात आप भी कान खोलकर सुन लीजिए—अगर आपने वहाँ मंडप के पास एक भी कदम पीछे हटाया, तो सायमा की वो नग्न तस्वीरें और कल रात की आपकी यह नंगी वीडियो, दोनों इसी वक़्त पूरे खानदान के फोन पर तैर रही होंगी!"

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अम्मी बिल्कुल सामने थीं, नजमा आंटी के पास। वो बहुत खूबसूरत लग रही थीं। उनका वह भारी डिज़ाइनर जोड़ा सुबह की उस साफ़ धूप में जगमगा रहा था। उनके कानों में सजे सोने और मोतियों के भारी झुमके, उनका चमकता हुआ चेहरा, और होठों पर सजी वही 'म्यूटेड बेरी' लिपस्टिक... वो बहुत प्यारी लग रही थीं।
 
ढोल और पटाखों की आवाज़ अब बहुत करीब आ गयी थी। धुम! धुम! धुम!
 
और फिर, बारात ने गेट में कदम रखा। सबसे आगे दूल्हा- अकरम था।
 
उसने एक खूबसूरत, सफेद रंग की शेरवानी पहनी थी, जिसपर नफीस सुनहरा काम था। उसके चेहरे पर एक मोतियों का सेहरा था, जिसके पीछे से उसकी मुस्कुराहट झलक रही थी।
 
"खुश आमदीद! खुश आमदीद!"
 
सब औरतों ने, अम्मी समेत, उनपर फूल फेंकने शुरू कर दिए। गुलाब की पत्तियाँ अकरम के सफेद जोड़े पर, उसके सेहरे पर, गिरने लगीं।
 
उसके ठीक पीछे उसके दोस्त थे। सब नौजवान लड़के, महंगे कुर्ता और सूट्स में। नाच रहे थे, शोर मचा रहे थे।
 
मैं यह सब एक कोने से देख रहा था। दीवार से टिक कर।
 
मैं अम्मी को देख रहा था, जो खुशी से अकरम के दोस्तों पर भी फूल बरसा रही थीं। उनकी हंसी सबसे ऊँची थी।
 
दोस्तों के उस झुंड में विशाल भी था। उसने व्हाइट रंग का कुर्ता पायजामा और ब्राउन चमकती हुई कोटी पहनी हुई थी।
 
उसे देखकर मेरा खून मेरी रगों में जम गया। ढोल की आवाज़, फूलों की महक, सब एक पल में गायब हो गया।
 
मेरी निगाहें एक तीर की तरह अम्मी पर चली गयीं। अम्मी, जो अभी तक अकरम को देख कर मुस्कुरा रही थीं, उनकी नज़र अब दोस्तों के उस झुंड पर पड़ी जहाँ विशाल था, उस व्हाइट कुर्ते और ब्राउन कोटी में, नाचते हुए, शोर मचाते हुए। उनका चेहरा एक पल के लिए चमक उठा।
 
अम्मी की मुस्कुराहट अब और गहरी हो गयी, जैसे कोई राज़ की हंसी हो। उनकी आँखें थोड़ी सी चमकीं, सिर्फ एक लम्हे के लिए, लेकिन मैंने देख लिया। उनके हाथ, जो फूल फेंक रहे थे, अब सीधे विशाल की तरफ मुड़ गए।
 
उन्होंने एक मुस्कुराहट के साथ, जैसे मज़ाक में, एक मोटा सा गुच्छा गुलाब की पत्तियों का उस पर फेंक दिया। पत्तियाँ उसके कुर्ते पर गिरीं, उसके चेहरे पर, और वो हंस पड़ीं।
 
ढोल की आवाज़, फूलों की महक, और लोगों का शोर... सब एक पिघले हुए शोर में बदल गया। मैं सिर्फ उन दो को देख रहा था। विशाल की नज़र, नाचते हुए, उस झुंड में से अम्मी पर पड़ी। उसके चेहरे पर वही... शरारती मुस्कुराहट फैल गयी।
 
वो नाचते हुए... ... भीड़ से थोड़ा सा अलग हुआ और थोड़ा सा आगे बढ़ा। उस तरफ, जहाँ अम्मी खड़ी थीं। फिर उसने अपने हाथ को... एक 'आदाब' या 'सलाम' के अंदाज़ में उठाया... लेकिन यह सलाम नहीं था। उसकी उंगलियाँ... हल्के से... उसके अपने लिप्स को एक पल के लिए छू कर गुज़र गयीं। एक जेस्चर जो सिर्फ एक सेकंड के लिए था, लेकिन इशारा साफ़ था।
 
मैंने अम्मी को देखा। उनकी सांसें एक पल के लिए रुक सी गयीं। उनके 'म्यूटेड बेरी'  लिपस्टिक वाले होंठ थोड़े से खुल गए।
 
और फिर विशाल ने अपना डांस और ज़्यादा बढ़ा दिया। उसने अम्मी को दिखाते हुए एक पूरा स्पिन लिया और ढोल की बीट पर अपनी बाहें फैलायीं, जैसे वो पूरी परफॉरमेंस सिर्फ उनके लिए हो।
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विशाल की इस दीवानगी और मर्दाना अदा को देखकर आयशा अंदर ही अंदर बेहद प्रभावित हो उठीं। उस भरे हुजूम में विशाल का इस तरह सिर्फ उनकी तरफ देखकर नाचना उनके बदन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर गया।
 
आयशा (विशाल के उस गठीले जिस्म के लचीलेपन और उसकी मदहोश आँखों को देखते हुए, मन में): "या खुदा... इस मर्द का यह बेबाक अंदाज़ सीधे मेरे दिल को छू रहा है। काश... काश ऐसी दीवानगी, ऐसी दीवानों जैसी हरकत कभी मेरे शौहर ने मेरे लिए की होती।
 
आयशा (मन में): "उन्होंने तो मुझे हमेशा सिर्फ चार दीवारों के पीछे एक शरीफ बीवी की तरह देखा, कभी मेरे हुस्न की इस तरह सरेआम सबके सामने सराहना करने की कोशिश ही नहीं की...""
 
और आयशा हंस पड़ीं (ना चाहते हुए भी)। यह एक... खनकती हुई, शोख हंसी थी। उन्होंने अपनी चांदी की थाली से और फूल उठाए और एक झटके से सीधे विशाल की तरफ फेंके।
 
आयशा (फूल फेंकते हुए, अपने भीतर मचे मानसिक बवंडर और बेबसी के साथ मन में): "मैं यह क्या कर रही हूँ? मेरी रूह, मेरा दिमाग इस दरिंदे की नीचता और ब्लैकमेलिंग से भयंकर नफ़रत करता है... मुझे अच्छी तरह मालूम है कि कुछ ही देर में मुझे इसके सामने आगे झुककर अपनी उस पीली ब्रा में कसे भारी मम्मों और तीखे निपल्स की नुमाइश करनी होगी..."
 
आयशा (विशाल की कातिलाना मुस्कान को देखकर, बदन में उठती वासना की सिहरन के साथ मन में): "लेकिन मैं चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रही। इसकी इस मर्दाना दीवानगी ने मेरे भीतर कैसी आग सुलगा दी है? मेरी बंदिशें टूट रही हैं... नफ़रत के बावजूद मेरा यह कमज़ोर मन इसकी हरकतों को अंदर ही अंदर पसंद करने लगा है। यह मर्द मुझे इस गुनाह के दलदल में और गहरे ढकेलता जा रहा है, और मैं बेबस होकर डूबती जा रही हूँ..."
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और अम्मी हंस पड़ीं। यह एक... खनकती हुई, शोख हंसी थी। उन्होंने अपनी थाली से और फूल उठाए और एक झटके से सीधा विशाल की तरफ फेंके।
 
"खुश आमदीद!" वो कहकहा लगा कर बोलीं।
 
फूल विशाल के सफेद कुर्ते और चमकती कोटी पर गिरे।
 
यह एक खेल था। एक बेहाया, सबके सामने... आँखों ही आँखों में खेला जाने वाला... खेल।
 
फिर विशाल मुड़ा और अकरम का हाथ पकड़े हुए सीधे अम्मी की तरफ बढ़ा। अम्मी के ठीक आगे आकर उसने रुककर सीधे उनकी आँखों में देखा। अम्मी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं, उनका वो गोरा चेहरा खौफ और शर्म के मारे एकदम पीला पड़ गया।
 
दीवार के पास खड़ा मैं थोड़ा और आगे बढ़ा ताकि मैं साफ़-साफ़ देख सकूँ कि इस भरे हुजूम में उन दोनों के बीच अब क्या होने वाला है।
 
अम्मी की साँसें बुरी तरह उखड़ चुकी थीं और उनकी ब्रा के अंदर कसे उनके दोनों भारी मम्मे कुर्ती के नीचे तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगे थे।
 
तभी विशाल ने कमीनी मुस्कान बिखेरी। उसने अकरम के कान में कुछ गुफ़्तगू करते हुए, बड़े आराम से अपना हाथ अकरम के कंधे पर रख दिया।
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अकरम के कंधे पर विशाल का हाथ टिकते ही जैसे आयशा के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उनका पूरा वजूद खौफ और चरम उत्तेजना की एक मिली-जुली आग में झुलस उठा। उनके दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो चुकी थी कि उन्हें डर था कि कहीं पास खड़ी नज़मा आंटी को उसकी आवाज़ न सुनाई दे जाए।
 
आयशा (अकरम की तरफ देखकर, खौफ और चरम शर्म से अंदर तक काँपते हुए मन में): "ओह मेरे खुदा... तो अब मुझे अपने जिस्म की यह मुकम्मल नुमाइश विशाल के साथ-साथ इस अकरम के सामने भी करनी होगी? यह लड़का... जो कुछ ही घंटों में सायमा का शौहर और मेरा दामाद बनने जा रहा है, आज वह अपनी इस खाला का यह बेशरम रूप देखेगा!"
 
इस अहसास ने आयशा में डर का एक ऐसा करंट दौड़ाया कि उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। बात सिर्फ विशाल और अकरम की नहीं थी, सामने मेहमानों और रिश्तेदारों का पूरा हुजूम खड़ा था।
 
आयशा (सामने खड़े हुजूम को देख, भीतर मचे मानसिक बवंडर से तड़पते हुए मन में): "अगर मैं आगे झुकी, तो कुर्ती के इस गहरे गले से मेरी वह पीली ब्रा और उत्तेजना के मारे तने हुए वो तीखे गुलाबी निपल्स साफ़ दिखाई देंगे। इन दोनों के अलावा अगर किसी और की प्यासी नज़र इस उभार पर पड़ गई, तो क्या होगा?"
 
आयशा (कांपती हुई सांसों के साथ, अपनी बंद आँखों के पीछे छिपे डर के साथ मन में): "नहीं... अगर किसी और ने यह नज़ारा देख लिया, तो खानदान की इज़्ज़त एक सेकंड में मिट्टी में मिल जाएगी।मेरा वजूद हमेशा के लिए बदनाम हो जाएगा।"
 
अकरम के कंधे पर टिका विशाल का हाथ उन्हें याद दिला रहा था कि अगर उन्होंने अभी आगे झुककर अपने इन कसमसाते मम्मों का मुआयना नहीं कराया, तो सायमा की नग्न तस्वीरें और कल रात की उनकी खुद की नंगी वीडियो इस पूरी महफ़िल के फोन पर तैर रही होगी।
 
आयशा ने अपनी उखड़ती सांसों और कांपते वजूद को किसी तरह संभाला। इस ज़िल्लत के बीच भी उनके दिमाग से काम किया। उन्होंने सामने खड़े अकरम और विशाल की तरफ दो कदम बढ़ाए।
 
वह उनके इतने करीब आ गईं कि उन दोनों के चौड़े और गठीले जिस्म अब बाकी मेहमानों और रिश्तेदारों के लिए एक ढाल बन चुके थे। पीछे खड़े लोगों की नज़रों से खुद को महफूज़ पाकर, आयशा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
 
उन्होंने अपने सुनहरे दुपट्टे को थोड़ा ढीला होने दिया और चांदी की थाली से कुछ रुपये जानबूझकर नीचे ज़मीन पर गिरा दिए, फिर उन रुपयों को उठाने के बहाने, पूरे अधिकार से आगे की तरफ झुक गईं।
 
जैसे ही वह झुकीं, उनकी उस कसी हुई 'डीप गोल्डन' रेशमी कुर्ती का गहरा गला आगे की तरफ लटक गया। विशाल और अकरम के ठीक सामने उनके जिस्म का वह सबसे गुप्त और रसीला नज़ारा पूरी तरह बेपर्दा हो गया।
 
उस आइवरी लहंगे और कुर्ती के नीचे, अम्मी के वो भारी, सुडौल और दूध जैसे सफेद मम्मे उस तंग, सुर्ख पीले रंग की ब्रा के कपों से बाहर उबलने को तड़प रहे थे। पीली ब्रा का वह बेशरम कपड़ा उनके उन भारी गोलों को पूरी तरह संभाल नहीं पा रहा था।
 
सुबह की ठंडी हवा और फोन पर हुई विशाल की उन गंदी बातों की उत्तेजना के मारे, आयशा के वो तीखे गुलाबी निपल्स उस कुर्ती के गहरे गले से साफ़ बाहर झांक रहे थे, जो किसी अंगूर के दाने की तरह पूरी तरह तनकर कड़े हो चुके थे।
 
विशाल और अकरम, दोनों की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनकी भूखी नज़रें सीधे आयशा के उस पीले कपड़े में कसमसाते हुस्न की गहराइयों को और उन तीखे निपल्स को अंदर तक स्कैन कर रही थीं।
 
आयशा (वासना, शर्म और लाचारी के चरम बिंदु पर पहुँचकर, मन में): "ओह मेरे खुदा... मैंने आज खुद को पूरी तरह नीलाम कर दिया। मेरी पीली ब्रा और मेरे ये तने हुए निपल्स आज इस गैर मर्द और मेरी बच्ची के होने वाले शौहर के सामने पूरी तरह बेपर्दा हैं... यह अहसास मुझे अंदर तक पिघला रहा है... मेरी चूत का पानी मेरी जांघों से बहने को तैयार है..."
 
वह कुछ सेकंड तक उसी हाल में झुकी रहीं, जबकि उन दोनों की हवस भरी सांसें आयशा के उन नंगे होते मम्मों की गर्मी को सीधे महसूस कर रही थीं।
 
फिर कांपते हाथों से ज़मीन पर बिखरे रुपयों को समेटते हुए वह धीरे से ऊपर उठीं। आयशा  ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू में किया और उन रुपयों को अकरम के सिर के चारों तरफ से वारकर (सदका उतारकर), पास ही खड़े बैंड वालों की तरफ बढ़ा दिया।
 
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आयशा ने अपनी नज़रें नीची ही रखीं, लेकिन उनके चेहरे की वो भयंकर लाली और दुपट्टे को वापस सीने पर कसने की वो छटपटाहट साफ़ बयां कर रही थी कि उसके अंदर शर्म और वासना का क्या तूफ़ान गुज़रा है।
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अकरम की आँखें आयशा के उस कसमसाते हुस्न को देखकर फटी की फटी रह गईं। जो नज़ारा उसके ठीक सामने बेपर्दा हुआ था, उसकी उसने अपने ख्वाबों में भी उम्मीद नहीं की थी।
 
अपनी होने वाली बीवी सायमा की सगी खाला और इस घर की सबसे बाइज़्ज़त और खूबसूरत औरत को इस तरह अपने ठीक सामने झुका देखकर उसका दिमाग सुन्न हो गया।
 
अकरम (अम्मी के उन पीले कपड़े में उबलते भारी मम्मों और सीधे बाहर झांकते तीखे निपल्स पर अपनी नज़रें गड़ाए हुए, मन में): "या खुदा... यह मैं क्या देख रहा हूँ? यह तो सायमा की खाला हैं... इस हवेली की आन-बान और शान!  कुर्ती के इस गहरे गले से इनके वो दूध जैसे सफेद, भारी मम्मे और उस पीली ब्रा के अंदर निपल्स सीधे मेरी आँखों के सामने नाच रहे हैं..."
 
आयशा के जिस्म की वह कसमसाहट और उनके बदन से उठती हुई ताज़ा खुशबू ने अकरम के अंदर एक पल में वासना का भयंकर लावा फूंक दिया। शेरवानी के नीचे उसका अपना अंग लोहे की तरह सख्त होने लगा।
 
अकरम (हवस और हैरत के मिले-जुली दीवानगी में हांफते हुए): "विशाल ठीक ही कहता था कल रात डांस पार्टी में... यह औरत अंदर से सचमुच बारूद का ढेर है। सायमा तो अभी कली है, पर उसकी यह खाला तो पूरा खिला हुआ रसीला बाग़ हैं। निकाह के इस पाक दिन पर, अपनी होने वाली सास जैसी औरत के इस नग्न उभार को इतने करीब से देखना... उफ़! इनकी इस पीली ब्रा के अंदर छिपी हवस तो सीधे मुझे दावत दे रही है। ऐसा लग रहा है जैसे यह खुद चाहती हैं कि आज रात सायमा से पहले मैं इनके इस जिस्म की आग को शांत करूँ..."
 
अकरम  आयशा को वापस उठते और  सहजता से अपने सिर पर हाथ फेरकर सदका उतारते देख, एक पल के लिए सोच में पड़ गया। उसका नज़रिया थोड़ा बदला।
 
अकरम (अम्मी को पूरी शालीनता से वापस दुपट्टा संभालते देख, मन ही मन): "ओह... तो क्या यह वाकई महज़ एक इत्तेफ़ाक़ था? थाली से रुपये गिर गए थे और यह बस उन्हें उठाने के लिए नीचे झुकी थीं?"
 
अकरम (आयशा के उस शांत और गरिमामयी चेहरे को दोबारा निहारते हुए, वासना की गहरी गिरफ्त में): "चाहे जो भी हो... यह एक ऐसा खूबसूरत हादसा था जिसे मैं अपनी आख़िरी सांस तक नहीं भूल पाऊंगा। अब जब भी, जितनी बार भी मैं अपनी खाला को देखूँगा, मेरी आँखों के आगे रेशमी कुर्ती के नीचे कसमसाते वो भारी मम्मे और पीली ब्रा से झांकते वो तीखे, तने हुए निपल्स ही तैरेंगे।"
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विशाल (आयशा के उस गहरे गले से झांकते हुए पीले हुस्न को देखकर मन में, हवस और जीत के चरम उन्माद में डूबते हुए): "उफ़... साला, मज़ा ही आ गया! इस औरत का यह नज़ारा देखने के लिए तो मैं अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा सकता हूँ। देखो ज़रा इस संस्कारी और शरीफ़ खानदान की इज़्ज़त को... कैसे इस भरे बाज़ार में, अपने होने वाले दामाद अकरम के ठीक सामने अपनी पीली ब्रा और ये तने हुए तीखे निपल्स परोस रही है!"
 
विशाल की आँखें आयशा के उन भारी मम्मों के गहरे उतार-चढ़ाव को स्कैन कर रही थीं, और उसकी पैंट के अंदर उसका कड़ा लंड फटने को तैयार हो रहा था।
 
विशाल (अपनी इस ज़बरदस्त कामयाबी पर मन ही मन कमीनी मुस्कान बिखेरते हुए): "कल रात जब इसकी नंगी गांड और हेयरलेस चूत को मैंने अपने नीचे रगड़ा था, तब भी इसके चेहरे पर यही बेबसी थी। पर आज... आज तो खेल ही अलग है। आज मैंने इसके वजूद की धज्जियाँ उड़ा दी हैं।
 
विशाल : “अकरम साला तो सायमा के ख्वाब देख रहा था, पर मैंने निकाह के मंडप पर चढ़ने से पहले ही इसे अपनी खाला का यह रसीला और बेशरम रूप दिखा दिया। बहुत जल्द तू हम दोनों के नीचे एक साथ लेटेगी और चीखेगी!
 
विशाल (आयशा को वापस उठते और अकरम का सदका उतारते देख मन ही मन उनकी इस चालाकी की दाद देते हुए): "मानना पड़ेगा बॉस... इस औरत का दिमाग तो चलता है! जिस शातिर तरीके से इस पूरे नज़ारे को सिर्फ हम दो लोगों के देखने लायक सीमित रखा, और जिस तरह चांदी की थाली से चालाकी से रुपये गिराकर नीचे झुकने को एक महज हादसा बना दिया... सचमुच काबिले-तारीफ़ है। भरे हुजूम के सामने अपनी इज़्ज़त भी नीलाम कर दी, मेरी शर्त भी पूरी कर दी और किसी को शक की भनक तक नहीं लगने दी।"
 -------- 
मुझे वहाँ से साफ़-साफ़ कुछ नज़र नहीं आ रहा था, क्योंकि विशाल और अकरम के चौड़े बदन ने अम्मी को पूरी तरह ढक रखा था। लेकिन जिस तरह से उन दोनों के मुँह खुले के खुले रह गए थे, उनकी आँखें फटी हुई थीं, और जिस तरह से अम्मी उनके ठीक सामने आगे झुकी हुई थीं... मैं बिना देखे भी बहुत अच्छी तरह समझ सकता था कि वो दोनों इस वक्त अम्मी के जिस्म का कौन सा नज़ारा देख रहे हैं।
 
मेरा मन अंदर से बुरी तरह चीख रहा था, "अम्मी... आप यह क्या कर रही हैं? आप तो ऐसी नहीं थीं!"
 
एक तरफ अम्मी की वह संस्कारी और पाकीज़ा छवि थी जिसे मैंने बचपन से देखा था, और दूसरी तरफ आँखों के सामने चलता यह घिनौना खेल।
Deepak Kapoor
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