Yesterday, 03:02 PM
पूजा अपनी पूजा करके चली आई, लेकिन उसका बाबा को छोड़ने का दिल नहीं कर रहा था। खैर… वह 12:45 बजे का इंतज़ार करने लगी।
घर में कोई नहीं था। काम भी कुछ नहीं था। उसका मन बार-बार बाबाजी के पास चला जाता था। उसके शरीर में एक खालीपन और अधूरापन महसूस हो रहा था। वह बार-बार उस रात को याद करती रहती थी, बाबा के गर्म हाथ, उनकी उँगलियाँ, उनकी जीभ, उनका मोटा लंड… सब कुछ।
वह अपनी रूम में गई और बिस्तर पर अपने शरीर को एक गेंद की तरह फेंक दिया। मैत्री द्वारा रचित कहानी।
उसके हाथ अब अपने शरीर से खेलने को आतुर थे। पूजा ने आँखें बंद कीं और मन ही मन बुदबुदाई,
“बाबाजी… आप बड़े… वो हैं… कब मेरे साथ क्या-क्या करते चले गए… पता ही नहीं चला… बाबाजी… आपका बदन कितना मजबूत और आकर्षक है… आपकी इतनी तारीफ़ मैंने पहली बार महसूस की है… आप यहाँ क्यों नहीं हैं… मुझे आपके पसीने की खुशबू चाहिए… आपका वो गठीला बदन… उससे जो सुगंध आती है… वो बहुत प्यारी लग रही है… उफ्फ… आपका लंड… उफ्फ… वह मुलायम चमड़ी में छुपा आपका सुपारा… उसमें छिपी आपके मूत और वीर्य की सुगंध मुझे आपके प्रति आकर्षित कर रही है…”
पूजा ने अपना सलवार का नाड़ा खोला और अपनी चूत को रगड़ने लगी।
“बाबाजी… मुझे क्या हो रहा है…”
उसकी उँगलियाँ अपनी गीली चूत पर तेजी से घूम रही थीं। फिर उसने उँगली चूत से हटाकर अपनी गांड के छेद पर ले जाई और वहाँ भी रगड़ने लगी।
“यह मुझे कैसा रोग लग गया है… टाँगों के बीच में चुभन… हिप्स के बीच में भी चुभन… ओह… मेरी गांड रानी…”
पूजा की उँगलियाँ अब दोनों जगहों पर काम कर रही थीं। वह बाबा की कल्पना कर रही थी, उनके मोटे लंड की, उनकी जीभ की, उनके हाथों की। उसका शरीर काँप रहा था। वह जोर से झड़ गई। उसके मुँह से दबी हुई चीख निकली। चूत से पानी बह निकला।
वह कुछ देर तक हाँफती रही, फिर थककर सो गई। लेकिन नींद में भी बार-बार बाबा के हाथ और लंड की याद आ रही थी।
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12:45 बजे
पूजा बाबा के घर पहुँची। दरवाजा खुलते ही वह बाबा से लिपट गई।
बाबा ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और पूजा को लेकर जमीन पर बिछी चादर पर ले आए।
पूजा ने बाबा को कस के बाहों में ले लिया। बाबा के चेहरे पर किस पर किस किए जा रही थी। अब दोनों लेट गए थे और बाबा पूजा के ऊपर था।
दोनों एक-दूसरे के होंठों को कस-कस के चूमने लगे। संपादिका फनलवर है।
बाबा ने पूजा के होंठों पर अपनी जीभ चलानी शुरू कर दी। पूजा ने भी मुँह खोल दिया और अपनी जीभ निकालकर बाबा की जीभ को चाटने लगी। बाबा ने अपनी पूरी जीभ पूजा के मुँह में डाल दी। पूजा बाबा के दाँतों पर जीभ चलाने लगी।
बाबा: “ओह… पूजा… मेरी रानी… तेरी जीभ… तेरा मुँह तो मिल्क-केक जैसा मीठा है…”
पूजा: “बाबाजी… एएए… आपके होंठ बड़े रसीले हैं… आपकी जीभ शरबत है… आआह्ह…मेरे रस को आप जी भर के पीजिये, मेरे रसीले होठ आपके लिए दूसरा रस बना लेंगे। आपको मैं रस की कमी कभी महसूस नही होने दूंगी। बस आप चूसते रहिये और मैं रस बनाती रहू।”
बाबा: “ओह्ह्ह… पूजा…”
बाबा पूजा के गले को चूमने लगा।
आज पूजा सफेद साड़ी-ब्लाउज में आई थी। बाबा ने पूजा का पल्लू हटाकर उसके स्तनों को दबाना शुरू कर दिया। पूजा ने खुद ही ब्लाउज और ब्रा निकाल दिया। बाबा उसके बोब्लो पर टूट पड़ा। उसके निप्पल्स को कस-कस के चूसने लगा।
पूजा: “हाँ… बाबाजी… आराम से… मेरे बोबले आपको इतने अच्छे लगे हैं…? आऐईई… चूसिये आराम से चूसिये.....आ...ह....आराम से बाबाजी....”
बाबा: “हाँ… तेरे बोब्लो का जवाब नहीं… तेरा दूध कितना क्रीम वाला है… और तेरे गुलाबी निप्पल्स… इन्हें तो मैं खा जाऊँगा…” मैत्री द्वारा निर्मित।
पूजा: “आअहह… हाँ… ई… तो खा जाओ ना… मना कौन करता है… और हो सके तो मेरी गोद भी भर दीजिये तो मेरे बोबले आपको सच में दूध पिलाते रहेंगे और आपको मजबूत करता रहेगा......चूसिये......चू...सी.....ए.....”
बाबा ने पूजा के निप्पल्स को दाँतों के बीच में लेकर दबाना शुरू कर दिया।
पूजा: “आऐईए… इतना मत काटो… आह्ह… वरना अपनी इस भैंस का दूध नहीं पी पाओगे…”
बाबा: “ऊओ… मेरी भैंस… मैं हमेशा तेरा दूध पीता रहूँगा…”
पूजा: “ई… त… आआ… तो… पी… आ… लो ना… निकालो ना मेरा दूध… खाली कर दो मेरे थनों को…”
बाबा कुछ देर तक पूजा के बोब्लो को चूसता, चबाता, दबाता और काटता रहा। फिर बाबा नीचे की तरफ आ गया। उसने पूजा की साड़ी और पेटिकोट उसके पेट तक चढ़ा दिए। उसकी टाँगें खोल दीं।
बाबा: “पूजा… आज कच्छि पहनने की क्या जरूरत थी…तुम भी ना बेकार की महेनत करवाती हो न चोदिनी।” निर्मात्री मैत्री है.
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मुझे पता है आपकी इतेजारी के लिए।
अपनी राय देते रहिये।
यही तक दोस्तों।
मैत्री का जय भारत।।
घर में कोई नहीं था। काम भी कुछ नहीं था। उसका मन बार-बार बाबाजी के पास चला जाता था। उसके शरीर में एक खालीपन और अधूरापन महसूस हो रहा था। वह बार-बार उस रात को याद करती रहती थी, बाबा के गर्म हाथ, उनकी उँगलियाँ, उनकी जीभ, उनका मोटा लंड… सब कुछ।
वह अपनी रूम में गई और बिस्तर पर अपने शरीर को एक गेंद की तरह फेंक दिया। मैत्री द्वारा रचित कहानी।
उसके हाथ अब अपने शरीर से खेलने को आतुर थे। पूजा ने आँखें बंद कीं और मन ही मन बुदबुदाई,
“बाबाजी… आप बड़े… वो हैं… कब मेरे साथ क्या-क्या करते चले गए… पता ही नहीं चला… बाबाजी… आपका बदन कितना मजबूत और आकर्षक है… आपकी इतनी तारीफ़ मैंने पहली बार महसूस की है… आप यहाँ क्यों नहीं हैं… मुझे आपके पसीने की खुशबू चाहिए… आपका वो गठीला बदन… उससे जो सुगंध आती है… वो बहुत प्यारी लग रही है… उफ्फ… आपका लंड… उफ्फ… वह मुलायम चमड़ी में छुपा आपका सुपारा… उसमें छिपी आपके मूत और वीर्य की सुगंध मुझे आपके प्रति आकर्षित कर रही है…”
पूजा ने अपना सलवार का नाड़ा खोला और अपनी चूत को रगड़ने लगी।
“बाबाजी… मुझे क्या हो रहा है…”
उसकी उँगलियाँ अपनी गीली चूत पर तेजी से घूम रही थीं। फिर उसने उँगली चूत से हटाकर अपनी गांड के छेद पर ले जाई और वहाँ भी रगड़ने लगी।
“यह मुझे कैसा रोग लग गया है… टाँगों के बीच में चुभन… हिप्स के बीच में भी चुभन… ओह… मेरी गांड रानी…”
पूजा की उँगलियाँ अब दोनों जगहों पर काम कर रही थीं। वह बाबा की कल्पना कर रही थी, उनके मोटे लंड की, उनकी जीभ की, उनके हाथों की। उसका शरीर काँप रहा था। वह जोर से झड़ गई। उसके मुँह से दबी हुई चीख निकली। चूत से पानी बह निकला।
वह कुछ देर तक हाँफती रही, फिर थककर सो गई। लेकिन नींद में भी बार-बार बाबा के हाथ और लंड की याद आ रही थी।
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12:45 बजे
पूजा बाबा के घर पहुँची। दरवाजा खुलते ही वह बाबा से लिपट गई।
बाबा ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और पूजा को लेकर जमीन पर बिछी चादर पर ले आए।
पूजा ने बाबा को कस के बाहों में ले लिया। बाबा के चेहरे पर किस पर किस किए जा रही थी। अब दोनों लेट गए थे और बाबा पूजा के ऊपर था।
दोनों एक-दूसरे के होंठों को कस-कस के चूमने लगे। संपादिका फनलवर है।
बाबा ने पूजा के होंठों पर अपनी जीभ चलानी शुरू कर दी। पूजा ने भी मुँह खोल दिया और अपनी जीभ निकालकर बाबा की जीभ को चाटने लगी। बाबा ने अपनी पूरी जीभ पूजा के मुँह में डाल दी। पूजा बाबा के दाँतों पर जीभ चलाने लगी।
बाबा: “ओह… पूजा… मेरी रानी… तेरी जीभ… तेरा मुँह तो मिल्क-केक जैसा मीठा है…”
पूजा: “बाबाजी… एएए… आपके होंठ बड़े रसीले हैं… आपकी जीभ शरबत है… आआह्ह…मेरे रस को आप जी भर के पीजिये, मेरे रसीले होठ आपके लिए दूसरा रस बना लेंगे। आपको मैं रस की कमी कभी महसूस नही होने दूंगी। बस आप चूसते रहिये और मैं रस बनाती रहू।”
बाबा: “ओह्ह्ह… पूजा…”
बाबा पूजा के गले को चूमने लगा।
आज पूजा सफेद साड़ी-ब्लाउज में आई थी। बाबा ने पूजा का पल्लू हटाकर उसके स्तनों को दबाना शुरू कर दिया। पूजा ने खुद ही ब्लाउज और ब्रा निकाल दिया। बाबा उसके बोब्लो पर टूट पड़ा। उसके निप्पल्स को कस-कस के चूसने लगा।
पूजा: “हाँ… बाबाजी… आराम से… मेरे बोबले आपको इतने अच्छे लगे हैं…? आऐईई… चूसिये आराम से चूसिये.....आ...ह....आराम से बाबाजी....”
बाबा: “हाँ… तेरे बोब्लो का जवाब नहीं… तेरा दूध कितना क्रीम वाला है… और तेरे गुलाबी निप्पल्स… इन्हें तो मैं खा जाऊँगा…” मैत्री द्वारा निर्मित।
पूजा: “आअहह… हाँ… ई… तो खा जाओ ना… मना कौन करता है… और हो सके तो मेरी गोद भी भर दीजिये तो मेरे बोबले आपको सच में दूध पिलाते रहेंगे और आपको मजबूत करता रहेगा......चूसिये......चू...सी.....ए.....”
बाबा ने पूजा के निप्पल्स को दाँतों के बीच में लेकर दबाना शुरू कर दिया।
पूजा: “आऐईए… इतना मत काटो… आह्ह… वरना अपनी इस भैंस का दूध नहीं पी पाओगे…”
बाबा: “ऊओ… मेरी भैंस… मैं हमेशा तेरा दूध पीता रहूँगा…”
पूजा: “ई… त… आआ… तो… पी… आ… लो ना… निकालो ना मेरा दूध… खाली कर दो मेरे थनों को…”
बाबा कुछ देर तक पूजा के बोब्लो को चूसता, चबाता, दबाता और काटता रहा। फिर बाबा नीचे की तरफ आ गया। उसने पूजा की साड़ी और पेटिकोट उसके पेट तक चढ़ा दिए। उसकी टाँगें खोल दीं।
बाबा: “पूजा… आज कच्छि पहनने की क्या जरूरत थी…तुम भी ना बेकार की महेनत करवाती हो न चोदिनी।” निर्मात्री मैत्री है.
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मुझे पता है आपकी इतेजारी के लिए।
अपनी राय देते रहिये।
यही तक दोस्तों।
मैत्री का जय भारत।।



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