18-07-2026, 03:13 PM
शेर के क्वार्टर से निकलकर जब मीरा और सरताज सिंह वापस मुख्य बंगले की तरफ बढ़ रहे थे, तो मीरा के कदमों में एक अजीब सी भारीपन थी।
शेर का मालकिन की सेवा को साफ मना कर देना ऊपर से तो एक वफादार नौकर की निशानी लग रहा था, जिसने सरताज का दिल जीत लिया था; लेकिन मीरा के भीतर एक अलग ही उथल-पुथल मची हुई थी। वह इस अप्रत्याशित बदलाव से पूरी तरह उलझ गई थी।
आसपास पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए सरताज ने गहरी सांस ली और मीरा की तरफ देखा।
सरताज: "चलो, शेर को देखकर अब थोड़ा सुकून मिला। पट्टी बंधने के बाद शेर अब पहले से काफी ठीक लग रहा था, है ना?"
मीरा (खोई-खोई सी): "हूँ..."
सरताज (आगे बढ़ते हुए): "राम सिंह को बोल देना कि शेर की अच्छे से देखभाल करे। आखिर उसने हमारी बच्ची की जान बचाई है, उसके खाने-पीने और दवाइयों में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।"
मीरा (धीमी आवाज़ में): "जी, मैं सुबह ही राम सिंह को समझा दूँगी।"
मुख्य बंगले के भीतर कदम रखते ही मीरा सीधे अपने कमरे की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई, जहाँ से शेर का क्वार्टर साफ नजर आता था।
मीरा (मन ही मन, तेज़ धड़कनों के साथ, गहरी उलझन में): "शेर ने मुझे सेवा करने से इतनी साफगोई से मना कर दिया? वो भी सीधे सरताज के सामने? यह कैसे मुमकिन है... आज सुबह जो इंसान एक भूखे भेड़िये की तरह मुझ पर झपट रहा था, जिसने मेरी छाती को बेरहमी से मसला, मेरे जिस्म का रस पीने के लिए अपनी गंदी राल टपका रहा था... वह अचानक इतना बड़ा शरीफ और इज़्ज़तदार कैसे बन गया? उसकी आँखें पूरी तरह फर्श पर झुकी थीं, मानो उसने मुझे कभी इस तरह नग्न और बेबस देखा तक न हो..."
मीरा ( एक ठंडी सिहरन के साथ): "लेकिन भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उसने खुद ही मना कर दिया। वाहेगुरु... अगर उसने सरताज की बात मान ली होती और मुझे उसकी देखरेख के लिए अकेले उसके क्वार्टर में जाना पड़ता, तो मेरा क्या होता? मैं तो यह सोचकर ही अंदर से काँप रही थी कि अगर मुझे उसके ज़ख्मों पर पट्टी लगानी पड़ती, उसके बिस्तर के पास बैठना पड़ता, तो वह बंद कमरे में मेरे साथ क्या सुलूक करता! वह तो अपनी वासना की आग में अंधा हो चुका है... वह ज़रूर मेरी लाडली ज्योति की कसम का वास्ता देकर मुझे वहीं दबोच लेता और मैं चीख भी नहीं पाती।"
मीरा (अपने हाथों को आपस में भींचते हुए, एक गहरे खौफ के साथ): "पर... क्या यह सचमुच उसका सुधरना है? नहीं, शेर इतना सीधा नहीं है। उसकी उस शातिर खामोशी और झुकी हुई नज़रों के पीछे कोई बहुत गहरी चाल छिपी है। यह खामोशी किसी बहुत बड़े और भयानक तूफ़ान से पहले की है... हे सच्चे पाशाह, मुझे उस शैतान के अगले वार से बचाना..."
अगले दो दिन कोठी में एक अजीब सी, भारी खामोशी के साथ गुज़रे।
शेर चुपचाप अपने क्वार्टर में लेटा अपनी चोटों से उबर रहा था। राम सिंह दिन में तीन से चार बार आकर उसकी दवा-गोली और खाने-पीने का पूरा ख्याल रख रहा था। सरताज सिंह और मीरा भी दिन में कम से कम एक बार आकर उसकी सेहत का हालचाल ले जाते थे।
सरताज की नज़रों में शेर के लिए इज़्ज़त और भरोसा हर बीतते घंटे के साथ मज़बूत हो रहा था, क्योंकि शेर का व्यवहार किसी तपस्वी की तरह शांत था। वह कोठी के काम-काज से दूर सिर्फ अपने क्वार्टर तक सीमित था।
कोठी का वह धुंधला कमरा मीरा को अपने भीतर खींच रही थी। इन दो दिनों में शेर ने जो संयम और अनुशासन दिखाया था, वह सरताज सिंह के लिए भले ही वफादारी की मिसाल हो, लेकिन मीरा के लिए यह एक मानसिक तनाव बन चुका था।
वह शेर के इस नए, रहस्यमयी रूप के पीछे छिपे सच को भांपने के लिए मजबूर हो गई थी।
जब वह दबे पाँव शेर के क्वार्टर की चौखट पर आकर खड़ी हुई, तो उसका दिल अपनी ही पसलियों से टकरा रहा था। कमरे के भीतर का सन्नाटा भारी था, जिसमें शेर खाट पर चित लेटा हुआ था।
मीरा ने सूखते हुए गले से थूक निगला और अपनी घबराहट को 'मालकिन' वाले लहजे के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा—
मीरा (दरवाजे के पास सहमी हुई खड़ी होकर, बेहद धीमी और कांपती आवाज़ में): "शेर... कैसे हो अब तुम? चोट का दर्द कुछ कम हुआ?"
शेर (बिस्तर पर सीधा लेटे हुए, आवाज़ में गजब की नरमी समेटे हुए): "जी मेमसाब... वाहेगुरु की बड़ी मेहर है और मालिक की दुआएं हैं। यह शरीर तो बस हुजूर की सेवा के लिए है, ज़ख्म अब धीरे-धीरे भर रहा है।"
कमरे में फिर से वही भारी सन्नाटा पसर गया।
शेर ने अब बहुत धीरे से करवट बदली और बेहद आज़ीज़ी, लगभग एक लाचार याचक की तरह मीरा की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी कशिश थी जो सामने वाले को कटघरे में खड़ा कर दे।
शेर (अत्यंत धीमी, संभली हुई और आदरयुक्त आवाज़ में): "मेमसाब... अगर इस नौकर की एक गुस्ताखी माफ़ हो... तो क्या मैं आपसे कुछ अर्ज कर सकता हूँ?"
मीरा का दिल इस अचानक आए सवाल से जोर से धड़का। उसके मन में डर की एक लहर दौड़ गई कि कहीं वह फिर से अपनी औकात पर न आ जाए, लेकिन खुद को मजबूत करते हुए वह आगे बढ़ी।
मीरा (अपने कांपते हाथों को साड़ी के पल्लू में छिपाते हुए): "हाँ... कहो शेर। जो कहना है साफ़-साफ़ कहो।"
शेर ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके चेहरे पर आत्मग्लानी और पछतावे का एक ऐसा ढोंग था, जिसे देखकर कोई भी अदालत उसे बेगुनाह मान ले। उसने एक गहरी, लाचार सांस ली।
शेर (नज़रें नीची किए हुए, आवाज़ में दर्द और शर्मिंदगी का पुट लाकर): "मेमसाब, मैं उस दिन की अपनी नापाक हरकत के लिए खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा। मुझे आपके के साथ ऐसा सुलूक नहीं करना चाहिए था। मैं अपनी औकात भूल गया था।"
मीरा ने राहत की एक लंबी सांस लेने की कोशिश की। उसे लगा नौकर अपनी हदों को पहचान गया है। लेकिन ठीक इसी पल, शेर ने अपनी गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई। उसके चेहरे की दीनता अचानक एक बेहद बारीक, शातिर मुस्कान में बदल गई।
शेर (धीमे से फुसफुसाते हुए, आँखों में एक अजीब सी चमक लाकर): "पर क्या करूँ मालकिन... जब आप नीचे झुककर अपने इन कोमल हाथों से इस अभागे के ज़ख्मों को सहला रही थीं... तो आपकी कमीज के उस ढीले गले से आपके वे गोरे-गोरे, भारी मुम्मे पूरी तरह से बाहर झांक रहे थे। मेरी औकात तो मिट्टी की थी मेमसाब, पर वह हुस्न देखकर यह गँवार खुद पर काबू खो बैठा।"
'मुम्मे' शब्द सुनते ही मीरा के कान गरम हो गए। उसे अपने जिस्म पर एक अजीब सी रेंगन महसूस हुई। शेर जानबूझकर इस गंदे, देहाती शब्द का इस्तेमाल कर रहा था ताकि मीरा के भीतर के संकोच और मर्यादा को तार-तार कर सके।
मीरा (घबराकर, झिझक और गुस्से के मिले-जुले स्वर में): "प्लीज शेर... ऐसी बेहूदा बातें मत करो। जो हो गया, उसे भूल जाओ।"
मीरा की आवाज़ की यह थरथराहट शेर के लिए हरी झंडी की तरह थी। उसे समझ आ गया कि मालकिन के भीतर का डर अब उसके वश में है।
वह बिस्तर पर थोड़ा उठकर बैठ गया। उसने अपनी आँखें पूरी तरह से मीरा की छाती पर टिका दीं—बिना किसी संकोच के, एक मालिक की तरह हक से।
शेर (चेहरे पर एक बनावटी लाचारी और मासूमियत बनाए रखते हुए, आँखों से मीरा के जिस्म को नापते हुए): "अरे मालकिन, मैं तो ठहरा अदना सा गँवार... ज़्यादा पढ़ा-लिखा तो हूँ नहीं कि सलीके की भाषा बोलूँ। जो आँखों ने देखा और जो इस जाहिल दिमाग में आया, वही मुँह से निकल गया।"
मीरा (घबराकर): "प्लीज शेर और नहीं।"
शेर : “सच कहूँ मेमसाब, आपके उन रसीले और भरे हुए मुम्मों का वह नज़ारा... वह तो किसी जन्नत से कम नहीं था। वैसी कयामत जवानी इस नौकर ने ज़िन्दगी में कभी नहीं देखी थी। अब आप ही बताइए, इसमें इस गरीब का क्या कसूर?”
मीरा का दम घुटने लगा। शेर का हर एक लफ्ज़ उसकी छाती पर तीर की तरह चुभ रहा था। वह इस बात से बेहद असहज और अपमानित महसूस कर रही थी कि शेर बार-बार उसके स्तनों को इतने घटिया और फूहड़ शब्द 'मुम्मे' से पुकार रहा था, और यही शेर का असली मकसद था—उसे मानसिक रूप से घुटने टेकने पर मजबूर करना।
मीरा (अपनी साड़ी के पल्लू को छाती पर और कसते हुए, कांपती आवाज़ में): "शेर... बस! अब एक लफ्ज़ भी मत बोलना।"
मीरा का दिल शेर के उस आख़िरी शब्द 'मुम्मे' के प्रहार से अभी काँप ही रहा था कि अचानक कमरे का माहौल बदल गया।
शेर के चेहरे के तेवर पल भर में बदल गए, और उसकी आँखों में वासना की जगह पछतावे के झूठे आँसू तैरने लगे।
शेर (बेहद लाचार और रोनी आवाज़ में): "देखा मालकिन... मैं तो अपने इस दिल का बोझ हल्का करने के लिए आपसे माफ़ी माँगना चाहता था, पर अपनी इस गँवार ज़बान की वजह से मैंने आपको फिर से नाराज़ कर दिया; मैं इंसान ही ऐसा नीच हूँ, मेरा तो पैदा होना ही बेकार था..."
यह कहते हुए शेर अपनी खाट पर सिर झुकाकर ज़ोर-ज़ोर से सिसकियाँ लेने लगा, मानो वह सचमुच ग्लानि की आग में जल रहा हो।
उसकी इस हालत को देखकर मीरा का कोमल और ममता से भरा दिल पिघलने लगा; उसका डर थोड़ा कम हुआ और उसकी जगह एक औरत की हमदर्दी ने ले ली। वह अनजाने में ही उसकी चाल में फँसकर दबे पाँव उसकी खाट के बिल्कुल नज़दीक चली गई।
मीरा (शेर के करीब बैठकर, धीमे से अपना नरम हाथ उसके काँपते हुए हाथ पर रखते हुए): "शेर... प्लीज, रोओ मत। तुम तो बहुत बहादुर हो, इस तरह बच्चों की तरह आँसू मत बहाओ।"
जैसे ही मीरा का मखमली गोरा हाथ शेर के हाथ पर टिका, शेर के भीतर छुपे भेड़िये ने एक छिपी हुई करवट ली, लेकिन ऊपर से उसने खुद को और ज़्यादा लाचार दिखाया। उसने धीरे से अपना मुँह उठाया, उसकी आँखें आंसुओं से गीली थीं।
शेर (बड़ी उम्मीद से मीरा के चेहरे की तरफ देखते हुए, सुबकते हुए): "तो... तो इसका मतलब आपने मुझे माफ़ कर दिया मालकिन? आप अब मुझसे नफ़रत तो नहीं करेंगी?"
मीरा ने एक गहरी सांस ली। शेर का यह बदला हुआ रूप देखकर वह अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी, लेकिन वह माहौल को और तनावपूर्ण नहीं बनाना चाहती थी।
मीरा (अपना हाथ पीछे खींचने की हल्की सी कोशिश करते हुए, संभलकर): "देखो शेर, जो कुछ भी उस दिन हुआ... उसे इतनी जल्दी भूल जाना मेरे लिए आसान नहीं है। मैं तुम्हें माफ़ करने की कोशिश ज़रूर करूँगी, लेकिन इस सब में अभी थोड़ा वक्त लगेगा।"
मीरा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि शेर ने मीरा के दोनों नाज़ुक हाथों को अपनी बड़ी, सख्त और ताकतवर हथेलियों के बीच पकड़ लिया।
शेर की उँगलियों की मजबूत और गर्म पकड़ मीरा की कलाई पर कस गई, जिससे मीरा का बदन एक बार फिर डर से सिहर उठा।
शेर (उसकी आँखों में गड़ाकर): "प्लीज मालकिन... अपने इस गरीब नौकर को माफ़ कर दो, वरना मैं जियूँगा कैसे? मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आपका यह साफ़ दिल भी... आपके इन मखमली और बेहद सॉफ्ट हाथों की तरह ही बहुत नरम है, आप मुझ पर इतनी बेरहम नहीं हो सकतीं।"
शेर की उँगलियों का वह जाना-पहचाना दबाव और उसके जिस्म की गर्मी एक बार फिर मीरा की देह में खौफ के साथ-साथ एक अजीब सी बेचैनी पैदा करने लगी थी।
क्वार्टर की उस तन्हाई में शेर की इस बढ़ती हिमाकत से मीरा का दिल बुरी तरह बैठने लगा। इस खौफनाक शिकंजे से पीछा छुड़ाने के लिए उसने तुरंत हार मानने में ही भलाई समझी।
मीरा (अपने हाथों को छुड़ाने की नाकाम कोशिश करते हुए, हांफती हुई आवाज़ में): "ठीक है, ठीक है शेर... मैंने तुम्हें दिल से माफ़ किया, पर मेरी एक शर्त है कि आज के बाद ऐसी घटिया और वहशी हरकत दोबारा कभी नहीं होनी चाहिए।"
मीरा के मुँह से माफ़ी की बात सुनते ही शेर के चेहरे पर एक गहरी, कमीनी मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से अपनी पकड़ को ढीला किया, लेकिन मीरा के दोनों हाथों को पूरी तरह छोड़ने के बजाय अपनी उंगलियों से उसकी हथेलियों को सहलाने लगा।
शेर (एक गहरी, साज़िश भरी सांस लेते हुए): "बहुत-बहुत धन्यवाद मेमसाहिब... आपका यह अहसान यह गरीब जिंदगी भर नहीं भूलेगा, लेकिन आगे क्या होगा... यह तो पूरी तरह आप पर ही डिपेंड करता है।"
मीरा (अपनी भौहें सिकोड़ते हुए, गहरी उलझन और थरथराहट को छिपाने की नाकाम कोशिश में): "मैं... मैं कुछ समझी नहीं शेर... भला यह सब मेरे ऊपर कैसे डिपेंड करता है? मैंने तो तुम्हें साफ़ लफ्ज़ों में माफ़ कर ही दिया है न?"
शेर (अपनी आँखों में एक नीच, भूखी मुस्कान लाते हुए, सीधे अपनी असली औकात पर उतर आता है): "वो ऐसे मेमसाब... कि आगे से मेरे भीतर का यह जानवर तभी सोए रहेगा, जब आप फिर कभी मेरे सामने उस मदहोश करने वाली हालत में नजर नहीं आएँगी।"
यह कहते ही शेर ने जानबूझकर अपनी नजरें मीरा के चेहरे से हटाईं और सीधे नीचे की ओर ले गया।
उसकी गंदी आँखें मीरा के ब्लाउज के भीतर कसकर कैद उसकी भारी और उभरती हुई छाती पर आकर टिक गईं। दोपहर की गर्मी में मीरा का ब्लाउज पसीने की हल्की नमी से उसकी त्वचा पर चिपका हुआ था, जिससे उसके स्तनों का उभार और भी तीखा और साफ़ नजर आ रहा था। शेर की नजरों में वही पुरानी भूख और हवस लौट आई थी, मानो वह अपनी आँखों से ही उसके कपड़ों को चीर रहा हो।
मीरा का पूरा बदन इस अचानक हुए हमले से अकड़ गया। डर के मारे उसकी सांसें तेज़ चलने लगीं, जिससे उसकी छाती और भी ज़्यादा ऊपर-नीचे होने लगी। उसे महसूस हो रहा था कि शेर की नज़रें उसके जिस्म को कितनी गहराई से टटोल रही हैं।
मीरा (डर और हड़बड़ाहट में): "शेर...!"
शेर (अपनी आँखों को वापस मीरा के चेहरे पर टिकाते हुए): "अरे... वैसे... हमारी ज्योति बेटी कैसी है अब? भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उस दिन सच्चे पाशाह ने मुझे इतनी हिम्मत दी कि मैं समय रहते अपनी जान पर खेलकर उस बच्ची को बचा पाया।"
शेर के मुँह से अपनी बेटी ज्योति का नाम सुनते ही मीरा के भीतर जैसे एक ठंडा करंट दौड़ गया। वह अच्छी तरह जानती थी कि यह शेर का कोई लाड-प्यार नहीं, बल्कि सीधे-सीधे उस खौफनाक कसम की याद दिलाना था, जिसके जाल में उसने मीरा को बांध रखा था।
बेटी का ज़िक्र आते ही मीरा के विरोध की सारी ताकत जैसे पल भर में हवा हो गई।
मीरा ( बेहद धीमी आवाज़ में): "वह... वह ठीक है।"
शेर (एक गहरी और संतोषजनक सांस लेते हुए, जबकि उसकी सख्त उंगलियाँ अभी भी मीरा के दोनों नाजुक हाथों को अपनी गिरफ्त में दबाए हुए थीं): "चलो, बहुत अच्छा है मेमसाहिब। भगवान करे मेरी गुड़िया हमेशा ऐसी ही हँसती-खेलती और सुखी रहे... हमारी ज्योति बेटी को कभी किसी की बुरी नज़र न लगे।"
'बुरी नज़र न लगे' कहते हुए शेर ने जानबूझकर मीरा के हाथों पर अपनी पकड़ को थोड़ा और भींच दिया।
उसकी आँखों में एक बेहद शातिर चमक थी, जो साफ़ कह रही थी कि ज्योति की सलामती अब पूरी तरह इस बात पर टिकी है कि मीरा इस क्वार्टर के भीतर शेर की हर जायज़-नाजायज़ बात के आगे कितनी जल्दी घुटने टेकती है।
शेर ने मीरा के गोरे हाथों को अपनी दोनों सख्त हथेलियों के बीच दबाया। वह अपनी हरकतों में कोई जल्दबाजी नहीं कर रहा था। उसका भारी अंगूठा बहुत ही आहिस्ता से, रेंगते हुए मीरा की कलाई की नाज़ुक त्वचा के ऊपर से गुज़रा।
शेर ( एक मदहोश कर देने वाली धीमी फुसफुसाहट में): "कितने कोमल हैं आपके हाथ मेमसाहिब... और कितने गोरे! जैसे मखमली रुई हो... कोई भी इनके स्पर्श का दीवाना हो जाए।"
उसकी नज़रें धीरे-धीरे मीरा की भारी छाती पर आकर ठहर गईं।
मीरा की सांसें इस धीमे टॉर्चर की वजह से बुरी तरह उखड़ रही थीं, जिससे ब्लाउज के भीतर कैद उसकी भरी-पूरी छाती का हर एक उतार-चढ़ाव शेर की आँखों के ठीक सामने एक असहनीय गति से ऊपर-नीचे हो रहा था। तंग ब्लाउज के कपड़े में आते खिंचाव से स्तनों का वह उभार और भी साफ़, और भी कड़ा नज़र आने लगा।
अपनी नज़र को थोड़ा और नीचे ले जाते हुए, शेर ने मीरा की नाभि और साड़ी के पल्लू के बीच से झलकते उसके गोरे, चिकने और नंगे पेट को देखा। दोपहर की उमस में उस गोरे बदन पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। शेर की जीभ ने सूखे होंठों पर फेरते हुए उस भीगे बदन को अपनी आँखों से ही पी लेना चाहा।
मीरा का दम घुटने लगा था। वह शेर के इस बेहद करीबी और सीधे हमले से इतनी सहम गई थी कि उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं।
शेर (अपनी आँखें आधी मूंदकर, मीरा के गोरे हाथ को उठाकर अपने चेहरे के करीब लाते हुए): "डरिए मत मालकिन... आपका यह सेवक तो बस अपनी माफ़ी का सुबूत मांग रहा है।"
शेर का मालकिन की सेवा को साफ मना कर देना ऊपर से तो एक वफादार नौकर की निशानी लग रहा था, जिसने सरताज का दिल जीत लिया था; लेकिन मीरा के भीतर एक अलग ही उथल-पुथल मची हुई थी। वह इस अप्रत्याशित बदलाव से पूरी तरह उलझ गई थी।
आसपास पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए सरताज ने गहरी सांस ली और मीरा की तरफ देखा।
सरताज: "चलो, शेर को देखकर अब थोड़ा सुकून मिला। पट्टी बंधने के बाद शेर अब पहले से काफी ठीक लग रहा था, है ना?"
मीरा (खोई-खोई सी): "हूँ..."
सरताज (आगे बढ़ते हुए): "राम सिंह को बोल देना कि शेर की अच्छे से देखभाल करे। आखिर उसने हमारी बच्ची की जान बचाई है, उसके खाने-पीने और दवाइयों में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।"
मीरा (धीमी आवाज़ में): "जी, मैं सुबह ही राम सिंह को समझा दूँगी।"
मुख्य बंगले के भीतर कदम रखते ही मीरा सीधे अपने कमरे की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई, जहाँ से शेर का क्वार्टर साफ नजर आता था।
मीरा (मन ही मन, तेज़ धड़कनों के साथ, गहरी उलझन में): "शेर ने मुझे सेवा करने से इतनी साफगोई से मना कर दिया? वो भी सीधे सरताज के सामने? यह कैसे मुमकिन है... आज सुबह जो इंसान एक भूखे भेड़िये की तरह मुझ पर झपट रहा था, जिसने मेरी छाती को बेरहमी से मसला, मेरे जिस्म का रस पीने के लिए अपनी गंदी राल टपका रहा था... वह अचानक इतना बड़ा शरीफ और इज़्ज़तदार कैसे बन गया? उसकी आँखें पूरी तरह फर्श पर झुकी थीं, मानो उसने मुझे कभी इस तरह नग्न और बेबस देखा तक न हो..."
मीरा ( एक ठंडी सिहरन के साथ): "लेकिन भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उसने खुद ही मना कर दिया। वाहेगुरु... अगर उसने सरताज की बात मान ली होती और मुझे उसकी देखरेख के लिए अकेले उसके क्वार्टर में जाना पड़ता, तो मेरा क्या होता? मैं तो यह सोचकर ही अंदर से काँप रही थी कि अगर मुझे उसके ज़ख्मों पर पट्टी लगानी पड़ती, उसके बिस्तर के पास बैठना पड़ता, तो वह बंद कमरे में मेरे साथ क्या सुलूक करता! वह तो अपनी वासना की आग में अंधा हो चुका है... वह ज़रूर मेरी लाडली ज्योति की कसम का वास्ता देकर मुझे वहीं दबोच लेता और मैं चीख भी नहीं पाती।"
मीरा (अपने हाथों को आपस में भींचते हुए, एक गहरे खौफ के साथ): "पर... क्या यह सचमुच उसका सुधरना है? नहीं, शेर इतना सीधा नहीं है। उसकी उस शातिर खामोशी और झुकी हुई नज़रों के पीछे कोई बहुत गहरी चाल छिपी है। यह खामोशी किसी बहुत बड़े और भयानक तूफ़ान से पहले की है... हे सच्चे पाशाह, मुझे उस शैतान के अगले वार से बचाना..."
अगले दो दिन कोठी में एक अजीब सी, भारी खामोशी के साथ गुज़रे।
शेर चुपचाप अपने क्वार्टर में लेटा अपनी चोटों से उबर रहा था। राम सिंह दिन में तीन से चार बार आकर उसकी दवा-गोली और खाने-पीने का पूरा ख्याल रख रहा था। सरताज सिंह और मीरा भी दिन में कम से कम एक बार आकर उसकी सेहत का हालचाल ले जाते थे।
सरताज की नज़रों में शेर के लिए इज़्ज़त और भरोसा हर बीतते घंटे के साथ मज़बूत हो रहा था, क्योंकि शेर का व्यवहार किसी तपस्वी की तरह शांत था। वह कोठी के काम-काज से दूर सिर्फ अपने क्वार्टर तक सीमित था।
कोठी का वह धुंधला कमरा मीरा को अपने भीतर खींच रही थी। इन दो दिनों में शेर ने जो संयम और अनुशासन दिखाया था, वह सरताज सिंह के लिए भले ही वफादारी की मिसाल हो, लेकिन मीरा के लिए यह एक मानसिक तनाव बन चुका था।
वह शेर के इस नए, रहस्यमयी रूप के पीछे छिपे सच को भांपने के लिए मजबूर हो गई थी।
जब वह दबे पाँव शेर के क्वार्टर की चौखट पर आकर खड़ी हुई, तो उसका दिल अपनी ही पसलियों से टकरा रहा था। कमरे के भीतर का सन्नाटा भारी था, जिसमें शेर खाट पर चित लेटा हुआ था।
मीरा ने सूखते हुए गले से थूक निगला और अपनी घबराहट को 'मालकिन' वाले लहजे के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा—
मीरा (दरवाजे के पास सहमी हुई खड़ी होकर, बेहद धीमी और कांपती आवाज़ में): "शेर... कैसे हो अब तुम? चोट का दर्द कुछ कम हुआ?"
शेर (बिस्तर पर सीधा लेटे हुए, आवाज़ में गजब की नरमी समेटे हुए): "जी मेमसाब... वाहेगुरु की बड़ी मेहर है और मालिक की दुआएं हैं। यह शरीर तो बस हुजूर की सेवा के लिए है, ज़ख्म अब धीरे-धीरे भर रहा है।"
कमरे में फिर से वही भारी सन्नाटा पसर गया।
शेर ने अब बहुत धीरे से करवट बदली और बेहद आज़ीज़ी, लगभग एक लाचार याचक की तरह मीरा की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी कशिश थी जो सामने वाले को कटघरे में खड़ा कर दे।
शेर (अत्यंत धीमी, संभली हुई और आदरयुक्त आवाज़ में): "मेमसाब... अगर इस नौकर की एक गुस्ताखी माफ़ हो... तो क्या मैं आपसे कुछ अर्ज कर सकता हूँ?"
मीरा का दिल इस अचानक आए सवाल से जोर से धड़का। उसके मन में डर की एक लहर दौड़ गई कि कहीं वह फिर से अपनी औकात पर न आ जाए, लेकिन खुद को मजबूत करते हुए वह आगे बढ़ी।
मीरा (अपने कांपते हाथों को साड़ी के पल्लू में छिपाते हुए): "हाँ... कहो शेर। जो कहना है साफ़-साफ़ कहो।"
शेर ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके चेहरे पर आत्मग्लानी और पछतावे का एक ऐसा ढोंग था, जिसे देखकर कोई भी अदालत उसे बेगुनाह मान ले। उसने एक गहरी, लाचार सांस ली।
शेर (नज़रें नीची किए हुए, आवाज़ में दर्द और शर्मिंदगी का पुट लाकर): "मेमसाब, मैं उस दिन की अपनी नापाक हरकत के लिए खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा। मुझे आपके के साथ ऐसा सुलूक नहीं करना चाहिए था। मैं अपनी औकात भूल गया था।"
मीरा ने राहत की एक लंबी सांस लेने की कोशिश की। उसे लगा नौकर अपनी हदों को पहचान गया है। लेकिन ठीक इसी पल, शेर ने अपनी गर्दन थोड़ी ऊपर उठाई। उसके चेहरे की दीनता अचानक एक बेहद बारीक, शातिर मुस्कान में बदल गई।
शेर (धीमे से फुसफुसाते हुए, आँखों में एक अजीब सी चमक लाकर): "पर क्या करूँ मालकिन... जब आप नीचे झुककर अपने इन कोमल हाथों से इस अभागे के ज़ख्मों को सहला रही थीं... तो आपकी कमीज के उस ढीले गले से आपके वे गोरे-गोरे, भारी मुम्मे पूरी तरह से बाहर झांक रहे थे। मेरी औकात तो मिट्टी की थी मेमसाब, पर वह हुस्न देखकर यह गँवार खुद पर काबू खो बैठा।"
'मुम्मे' शब्द सुनते ही मीरा के कान गरम हो गए। उसे अपने जिस्म पर एक अजीब सी रेंगन महसूस हुई। शेर जानबूझकर इस गंदे, देहाती शब्द का इस्तेमाल कर रहा था ताकि मीरा के भीतर के संकोच और मर्यादा को तार-तार कर सके।
मीरा (घबराकर, झिझक और गुस्से के मिले-जुले स्वर में): "प्लीज शेर... ऐसी बेहूदा बातें मत करो। जो हो गया, उसे भूल जाओ।"
मीरा की आवाज़ की यह थरथराहट शेर के लिए हरी झंडी की तरह थी। उसे समझ आ गया कि मालकिन के भीतर का डर अब उसके वश में है।
वह बिस्तर पर थोड़ा उठकर बैठ गया। उसने अपनी आँखें पूरी तरह से मीरा की छाती पर टिका दीं—बिना किसी संकोच के, एक मालिक की तरह हक से।
शेर (चेहरे पर एक बनावटी लाचारी और मासूमियत बनाए रखते हुए, आँखों से मीरा के जिस्म को नापते हुए): "अरे मालकिन, मैं तो ठहरा अदना सा गँवार... ज़्यादा पढ़ा-लिखा तो हूँ नहीं कि सलीके की भाषा बोलूँ। जो आँखों ने देखा और जो इस जाहिल दिमाग में आया, वही मुँह से निकल गया।"
मीरा (घबराकर): "प्लीज शेर और नहीं।"
शेर : “सच कहूँ मेमसाब, आपके उन रसीले और भरे हुए मुम्मों का वह नज़ारा... वह तो किसी जन्नत से कम नहीं था। वैसी कयामत जवानी इस नौकर ने ज़िन्दगी में कभी नहीं देखी थी। अब आप ही बताइए, इसमें इस गरीब का क्या कसूर?”
मीरा का दम घुटने लगा। शेर का हर एक लफ्ज़ उसकी छाती पर तीर की तरह चुभ रहा था। वह इस बात से बेहद असहज और अपमानित महसूस कर रही थी कि शेर बार-बार उसके स्तनों को इतने घटिया और फूहड़ शब्द 'मुम्मे' से पुकार रहा था, और यही शेर का असली मकसद था—उसे मानसिक रूप से घुटने टेकने पर मजबूर करना।
मीरा (अपनी साड़ी के पल्लू को छाती पर और कसते हुए, कांपती आवाज़ में): "शेर... बस! अब एक लफ्ज़ भी मत बोलना।"
मीरा का दिल शेर के उस आख़िरी शब्द 'मुम्मे' के प्रहार से अभी काँप ही रहा था कि अचानक कमरे का माहौल बदल गया।
शेर के चेहरे के तेवर पल भर में बदल गए, और उसकी आँखों में वासना की जगह पछतावे के झूठे आँसू तैरने लगे।
शेर (बेहद लाचार और रोनी आवाज़ में): "देखा मालकिन... मैं तो अपने इस दिल का बोझ हल्का करने के लिए आपसे माफ़ी माँगना चाहता था, पर अपनी इस गँवार ज़बान की वजह से मैंने आपको फिर से नाराज़ कर दिया; मैं इंसान ही ऐसा नीच हूँ, मेरा तो पैदा होना ही बेकार था..."
यह कहते हुए शेर अपनी खाट पर सिर झुकाकर ज़ोर-ज़ोर से सिसकियाँ लेने लगा, मानो वह सचमुच ग्लानि की आग में जल रहा हो।
उसकी इस हालत को देखकर मीरा का कोमल और ममता से भरा दिल पिघलने लगा; उसका डर थोड़ा कम हुआ और उसकी जगह एक औरत की हमदर्दी ने ले ली। वह अनजाने में ही उसकी चाल में फँसकर दबे पाँव उसकी खाट के बिल्कुल नज़दीक चली गई।
मीरा (शेर के करीब बैठकर, धीमे से अपना नरम हाथ उसके काँपते हुए हाथ पर रखते हुए): "शेर... प्लीज, रोओ मत। तुम तो बहुत बहादुर हो, इस तरह बच्चों की तरह आँसू मत बहाओ।"
जैसे ही मीरा का मखमली गोरा हाथ शेर के हाथ पर टिका, शेर के भीतर छुपे भेड़िये ने एक छिपी हुई करवट ली, लेकिन ऊपर से उसने खुद को और ज़्यादा लाचार दिखाया। उसने धीरे से अपना मुँह उठाया, उसकी आँखें आंसुओं से गीली थीं।
शेर (बड़ी उम्मीद से मीरा के चेहरे की तरफ देखते हुए, सुबकते हुए): "तो... तो इसका मतलब आपने मुझे माफ़ कर दिया मालकिन? आप अब मुझसे नफ़रत तो नहीं करेंगी?"
मीरा ने एक गहरी सांस ली। शेर का यह बदला हुआ रूप देखकर वह अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी, लेकिन वह माहौल को और तनावपूर्ण नहीं बनाना चाहती थी।
मीरा (अपना हाथ पीछे खींचने की हल्की सी कोशिश करते हुए, संभलकर): "देखो शेर, जो कुछ भी उस दिन हुआ... उसे इतनी जल्दी भूल जाना मेरे लिए आसान नहीं है। मैं तुम्हें माफ़ करने की कोशिश ज़रूर करूँगी, लेकिन इस सब में अभी थोड़ा वक्त लगेगा।"
मीरा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि शेर ने मीरा के दोनों नाज़ुक हाथों को अपनी बड़ी, सख्त और ताकतवर हथेलियों के बीच पकड़ लिया।
शेर की उँगलियों की मजबूत और गर्म पकड़ मीरा की कलाई पर कस गई, जिससे मीरा का बदन एक बार फिर डर से सिहर उठा।
शेर (उसकी आँखों में गड़ाकर): "प्लीज मालकिन... अपने इस गरीब नौकर को माफ़ कर दो, वरना मैं जियूँगा कैसे? मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आपका यह साफ़ दिल भी... आपके इन मखमली और बेहद सॉफ्ट हाथों की तरह ही बहुत नरम है, आप मुझ पर इतनी बेरहम नहीं हो सकतीं।"
शेर की उँगलियों का वह जाना-पहचाना दबाव और उसके जिस्म की गर्मी एक बार फिर मीरा की देह में खौफ के साथ-साथ एक अजीब सी बेचैनी पैदा करने लगी थी।
क्वार्टर की उस तन्हाई में शेर की इस बढ़ती हिमाकत से मीरा का दिल बुरी तरह बैठने लगा। इस खौफनाक शिकंजे से पीछा छुड़ाने के लिए उसने तुरंत हार मानने में ही भलाई समझी।
मीरा (अपने हाथों को छुड़ाने की नाकाम कोशिश करते हुए, हांफती हुई आवाज़ में): "ठीक है, ठीक है शेर... मैंने तुम्हें दिल से माफ़ किया, पर मेरी एक शर्त है कि आज के बाद ऐसी घटिया और वहशी हरकत दोबारा कभी नहीं होनी चाहिए।"
मीरा के मुँह से माफ़ी की बात सुनते ही शेर के चेहरे पर एक गहरी, कमीनी मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से अपनी पकड़ को ढीला किया, लेकिन मीरा के दोनों हाथों को पूरी तरह छोड़ने के बजाय अपनी उंगलियों से उसकी हथेलियों को सहलाने लगा।
शेर (एक गहरी, साज़िश भरी सांस लेते हुए): "बहुत-बहुत धन्यवाद मेमसाहिब... आपका यह अहसान यह गरीब जिंदगी भर नहीं भूलेगा, लेकिन आगे क्या होगा... यह तो पूरी तरह आप पर ही डिपेंड करता है।"
मीरा (अपनी भौहें सिकोड़ते हुए, गहरी उलझन और थरथराहट को छिपाने की नाकाम कोशिश में): "मैं... मैं कुछ समझी नहीं शेर... भला यह सब मेरे ऊपर कैसे डिपेंड करता है? मैंने तो तुम्हें साफ़ लफ्ज़ों में माफ़ कर ही दिया है न?"
शेर (अपनी आँखों में एक नीच, भूखी मुस्कान लाते हुए, सीधे अपनी असली औकात पर उतर आता है): "वो ऐसे मेमसाब... कि आगे से मेरे भीतर का यह जानवर तभी सोए रहेगा, जब आप फिर कभी मेरे सामने उस मदहोश करने वाली हालत में नजर नहीं आएँगी।"
यह कहते ही शेर ने जानबूझकर अपनी नजरें मीरा के चेहरे से हटाईं और सीधे नीचे की ओर ले गया।
उसकी गंदी आँखें मीरा के ब्लाउज के भीतर कसकर कैद उसकी भारी और उभरती हुई छाती पर आकर टिक गईं। दोपहर की गर्मी में मीरा का ब्लाउज पसीने की हल्की नमी से उसकी त्वचा पर चिपका हुआ था, जिससे उसके स्तनों का उभार और भी तीखा और साफ़ नजर आ रहा था। शेर की नजरों में वही पुरानी भूख और हवस लौट आई थी, मानो वह अपनी आँखों से ही उसके कपड़ों को चीर रहा हो।
मीरा का पूरा बदन इस अचानक हुए हमले से अकड़ गया। डर के मारे उसकी सांसें तेज़ चलने लगीं, जिससे उसकी छाती और भी ज़्यादा ऊपर-नीचे होने लगी। उसे महसूस हो रहा था कि शेर की नज़रें उसके जिस्म को कितनी गहराई से टटोल रही हैं।
मीरा (डर और हड़बड़ाहट में): "शेर...!"
शेर (अपनी आँखों को वापस मीरा के चेहरे पर टिकाते हुए): "अरे... वैसे... हमारी ज्योति बेटी कैसी है अब? भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उस दिन सच्चे पाशाह ने मुझे इतनी हिम्मत दी कि मैं समय रहते अपनी जान पर खेलकर उस बच्ची को बचा पाया।"
शेर के मुँह से अपनी बेटी ज्योति का नाम सुनते ही मीरा के भीतर जैसे एक ठंडा करंट दौड़ गया। वह अच्छी तरह जानती थी कि यह शेर का कोई लाड-प्यार नहीं, बल्कि सीधे-सीधे उस खौफनाक कसम की याद दिलाना था, जिसके जाल में उसने मीरा को बांध रखा था।
बेटी का ज़िक्र आते ही मीरा के विरोध की सारी ताकत जैसे पल भर में हवा हो गई।
मीरा ( बेहद धीमी आवाज़ में): "वह... वह ठीक है।"
शेर (एक गहरी और संतोषजनक सांस लेते हुए, जबकि उसकी सख्त उंगलियाँ अभी भी मीरा के दोनों नाजुक हाथों को अपनी गिरफ्त में दबाए हुए थीं): "चलो, बहुत अच्छा है मेमसाहिब। भगवान करे मेरी गुड़िया हमेशा ऐसी ही हँसती-खेलती और सुखी रहे... हमारी ज्योति बेटी को कभी किसी की बुरी नज़र न लगे।"
'बुरी नज़र न लगे' कहते हुए शेर ने जानबूझकर मीरा के हाथों पर अपनी पकड़ को थोड़ा और भींच दिया।
उसकी आँखों में एक बेहद शातिर चमक थी, जो साफ़ कह रही थी कि ज्योति की सलामती अब पूरी तरह इस बात पर टिकी है कि मीरा इस क्वार्टर के भीतर शेर की हर जायज़-नाजायज़ बात के आगे कितनी जल्दी घुटने टेकती है।
शेर ने मीरा के गोरे हाथों को अपनी दोनों सख्त हथेलियों के बीच दबाया। वह अपनी हरकतों में कोई जल्दबाजी नहीं कर रहा था। उसका भारी अंगूठा बहुत ही आहिस्ता से, रेंगते हुए मीरा की कलाई की नाज़ुक त्वचा के ऊपर से गुज़रा।
शेर ( एक मदहोश कर देने वाली धीमी फुसफुसाहट में): "कितने कोमल हैं आपके हाथ मेमसाहिब... और कितने गोरे! जैसे मखमली रुई हो... कोई भी इनके स्पर्श का दीवाना हो जाए।"
उसकी नज़रें धीरे-धीरे मीरा की भारी छाती पर आकर ठहर गईं।
मीरा की सांसें इस धीमे टॉर्चर की वजह से बुरी तरह उखड़ रही थीं, जिससे ब्लाउज के भीतर कैद उसकी भरी-पूरी छाती का हर एक उतार-चढ़ाव शेर की आँखों के ठीक सामने एक असहनीय गति से ऊपर-नीचे हो रहा था। तंग ब्लाउज के कपड़े में आते खिंचाव से स्तनों का वह उभार और भी साफ़, और भी कड़ा नज़र आने लगा।
अपनी नज़र को थोड़ा और नीचे ले जाते हुए, शेर ने मीरा की नाभि और साड़ी के पल्लू के बीच से झलकते उसके गोरे, चिकने और नंगे पेट को देखा। दोपहर की उमस में उस गोरे बदन पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। शेर की जीभ ने सूखे होंठों पर फेरते हुए उस भीगे बदन को अपनी आँखों से ही पी लेना चाहा।
मीरा का दम घुटने लगा था। वह शेर के इस बेहद करीबी और सीधे हमले से इतनी सहम गई थी कि उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं।
शेर (अपनी आँखें आधी मूंदकर, मीरा के गोरे हाथ को उठाकर अपने चेहरे के करीब लाते हुए): "डरिए मत मालकिन... आपका यह सेवक तो बस अपनी माफ़ी का सुबूत मांग रहा है।"
Deepak Kapoor
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