18-07-2026, 03:11 PM
खौफ और साजिश—4
गाड़ी जैसे ही कोठी के आलीशान पोर्च में आकर रुकी, सरताज सिंह ने एक लंबी और गहरी साँस ली। उसने अपने चेहरे पर हाथ फेरा और अपने भीतर के उस परेशान पति और पिता को पीछे धकेल दिया।
अब उसके भीतर का पुराना, मंझा हुआ सिक्युरिटीिया दिमाग पूरी तरह जाग चुका था।
उसने तय कर लिया था कि वह अपनी इस नई थ्योरी या शक की भनक घर के किसी भी सदस्य को, यहाँ तक कि मीरा को भी, नहीं लगने देगा।
उसने अपने चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए गाड़ी का दरवाज़ा खोला और रोबीले कदमों से कोठी के भीतर दाखिल हुआ।
सरताज सिंह (मन ही मन, खुद को शांत करते हुए): "अगर शेर वाकई कोई खेल खेल रहा है, तो मेरी ज़रा सी भी बदली हुई चाल उसे सतर्क कर देगी। मैं उसकी वफ़ादारी का तमाशा भी देखूँगा और उसके हर एक कदम पर अपनी नज़र भी रखूँगा। दूध का दूध और पानी का पानी यहीं इसी कोठी में होगा।"
सरताज तेज़ कदमों से उस कमरे की तरफ बढ़ा, जहाँ अभी कुछ ही देर पहले फर्श से काँच साफ़ किया गया था।
कमरे का दरवाज़ा खोलते ही उसकी नज़र सीधे ज्योति और उसके पास ही बाबा जी की उस बिना कांच वाली तस्वीर को सीने से लगाए बैठी मीरा पर पड़ी।
मीरा की आँखें अभी भी सूजी हुई थीं और उसका हुलिया बिखरा हुआ था। सरताज को देखते ही ज्योति के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आ गई।
ज्योति (कमज़ोर आवाज़ में, हाथ उठाते हुए): "पापा! आप आ गए..."
ज्योति की आवाज़ सुनते ही मीरा जैसे सुध-बुध खो बैठी और भागकर सीधे सरताज के सीने से जाकर लिपट गई। उसके सब्र का पैमाना पूरी तरह टूट चुका था और वह फूट-फूटकर रोने लगी।
मीरा (सरताज की छाती में अपना मुँह छुपाकर, बुरी तरह सिसकते हुए): "सरताज... आप आ गए... मुझे बहुत डर लग रहा था सरताज!"
सरताज (मीरा को अपनी बाहों में कसते हुए, उसके सिर को धीरे-धीरे सहलाने लगा): "शशश... शांत हो जाओ मीरा, मैं आ गया हूँ न। अब रोना बंद करो।"
मीरा (हिचकियाँ लेते हुए, उसकी वर्दी की शर्ट को उंगलियों में भींचकर): "मैं... मैं बहुत कमज़ोर पड़ गई थी, मुझे लगा मैं सब खो दूँगी..."
सरताज (उसके आंसू पोंछते हुए, बेहद शांत और दिलासा देती आवाज़ में): "मैं यहाँ हूँ मीरा, तुम्हारे और ज्योति के पास। अब कोई आफत हमें छू भी नहीं सकती।"
सरताज (मीरा के चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए, प्यार से मुस्कुराया): "पगली, अपनी बच्ची की ऐसी हालत देखकर तुम्हारा ऐसा हाल हो रहा है? अभी तो वाहेगुरु की मेहर से वह बिल्कुल ठीक है।"
सरताज (उसके माथे को चूमते हुए, हौसला बढ़ाते हुए): "तुम तो मेरी सरदारनी हो मीरा, और सरदारनियाँ ऐसे छोटी-छोटी बातों पर डरा नहीं करतीं।"
मीरा (सच्चाई छुपाते हुए, सरताज के सीने पर सिर रखकर सिसकी): "सरताज... बस मेरा दिल बहुत छोटा हो रहा था, मैं खुद को संभाल ही नहीं पा रही थी।"
मीरा (मन ही मन, घोर ग्लानी और खौफ से काँपते हुए): "मैं सरताज को कैसे बताऊँ कि मैं ज्योति के लिए नहीं, बल्कि अपनी लूटी हुई अस्मत के लिए रो रही हूँ? आज उस कमीने शेर ने मेरे साथ क्या-क्या घिनौना काम किया, यह बात मैं अपनी ज़ुबान पर कैसे लाऊँ?"
सरताज (मीरा की पीठ को सहलाते हुए, ज्योति की तरफ देखकर): "चलो, अब रोना बंद करो और अपनी बहादुर बेटी का चेहरा देखो।"
सरताज सिंह (झुककर ज्योति को गले लगाते हुए, बेहद प्यार और तसल्ली से): "हाँ मेरी बच्ची, मेरी लाडली! वाहेगुरु का लाख-लाख शुक्र है कि तू बिल्कुल सलामत है। चोट ज़्यादा तो नहीं लगी बेटा? दर्द कैसा है अब?"
ज्योति (धीरे से मुस्कुराते हुए): "मैं ठीक हूँ पापा, बस पैर में थोड़ी सी मोच है। मम्मी ने पट्टी बांध दी है और दवा भी दी है। वो तो शेर भैया अगर ऐन वक्त पर गाड़ी के आगे न कूदते, तो आज मैं..."
सरताज सिंह (ज्योति के सिर को सहलाते हुए, अपनी आँखें मीरा के चेहरे पर गड़ाकर): "मैं जानता हूँ बेटा, गार्ड ने मुझे सब बताया। शेर ने बहुत बड़ा काम किया है।"
सरताज ने ज्योति से बात करते हुए अपनी पैनी नज़रों से मीरा को ऊपर से नीचे तक जाँचा। वह सरताज की आँखों में आँखें डालने से कतरा रही थी।
सरताज सिंह (मीरा के काँपते होठों को ताड़ते हुए, मन ही मन): "मीरा का यह हुलिया सिर्फ ज्योति के डर का नहीं है। इसकी आँखों में चोर है, और यह मुझसे कुछ ऐसा छुपा रही है जो इसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है।"
मीरा (सरताज की तीखी निगाहों से बचने के लिए अपनी आँखें नीचे झुकाते हुए, काँपती आवाज़ में): "सर... सरताज, आप बैठिए न। मैं आपके लिए रसोई से पानी लेकर आती हूँ।"
सरताज सिंह (उसके हाथ को हल्के से पकड़कर रोकते हुए, चेहरे पर एक सहजता लाकर): "रुक जाओ मीरा, पानी तो बाद में भी आ जाएगा।"
सरताज ने मीरा के करीब जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। मीरा उसकी छुअन से पल भर के लिए सिहर उठी, जिसे सरताज के खोजी दिमाग ने तुरंत नोट कर लिया।
सरताज सिंह (मीरा का हाथ थामकर): "कोई बात नहीं भाग्यवान, अपशकुन टल गया। वाहेगुरु ने हमारी बच्ची को बचा लिया। अच्छा, यह बताओ कि शेर कहाँ है? गार्ड कह रहा था कि उसे बहुत गहरी चोटें आई हैं और तुम खुद यहाँ उसकी मरहम-पट्टी कर रही थीं? वह कहाँ है इस वक्त? मैं खुद मिलकर उसका धन्यवाद करना चाहता हूँ।"
मीरा (शेर का नाम सुनते ही घबराकर, थूक निगलते हुए): "वो... वो अभी-अभी अपने क्वार्टर की तरफ गया है। उसे आराम की ज़रूरत थी..."
सरताज सिंह : "चलो, अच्छा किया। उसे आराम करने दो।"
सरताज सिंह (मीरा की आँखों में देखते हुए): "शाम होते ही मैं खुद उसके क्वार्टर जाकर उससे मिलूँगा और उसकी इस बहादुरी का इनाम दूँगा।"
सरताज सिंह (मीरा की आँखों में देखते हुए, धीमी और गंभीर आवाज़ में): "मीरा... यह बाबा जी की तस्वीर... इसका कांच कैसे टूट गया? कमरे का माहौल कुछ बदला-बदला सा क्यों लग रहा है? तुम ठीक तो हो ना?"
मीरा ( नज़रें चुराकर): "हाँ... जी, मैं ठीक हूँ। वह बस... अचानक खिड़की से तेज़ हवा का झोंका आया और दीवार पर टंगी यह तस्वीर नीचे गिर गई।"
मीरा (घबराहट छुपाने के लिए अपनी उँगलियों को आपस में भींचते हुए): "आवाज़ बहुत तेज़ थी, इसलिए ज्योति भी जाग गई और मैं भी डर गई थी। बस... और कोई बात नहीं है। आज अपशगुन पे अपशगुन हो रहे हैं।"
सरताज सिंह (मन ही मन): "हवा का झोंका? कोठी के इस बंद कमरे में इतना तेज़ हवा का झोंका कि भारी फ्रेम गिर जाए?"
सरताज सिंह (तस्वीर के टूटे हुए फ्रेम को गौर से देखते हुए, अचानक पूछा): "यह फोटो दीवार से नीचे किस वक्त गिरी, मीरा?"
मीरा (घबराहट में अपने सूखे होठों पर जीभ फेरते हुए, घड़ी की तरफ बिना देखे बोली): "अहं... यही कोई दस-पंद्रह मिनट पहले। पर... पर आप इस तरह समय क्यों पूछ रहे हैं, सरताज?"
सरताज सिंह (अपने चेहरे एक झूठी मुस्कान लाते हुए): "नहीं, कुछ नहीं... बस वैसे ही पूछ लिया।"
सरताज सिंह (मन ही मन, समय का गणित बिठाते हुए): "दस-पंद्रह मिनट पहले? यह तो ठीक वही वक्त था जब मैं गुरुद्वारे में माथा टेक रहा था और मेरे मन में अजीब सी बेचैनी उठ रही थी।"
सरताज सिंह (अचानक मीरा के बिल्कुल करीब कदम बढ़ाते हुए): "जब यह फोटो गिरी... तो शेर कहाँ था, मीरा?"
मीरा (यह सवाल सुनते ही उसका चेहरा पूरी तरह पीला पड़ गया, पैर काँपने लगे): "व... वह... शेर तो उस वक्त इसी कमरे में... इस सामने वाले सोफे पर गहरी नींद में सो रहा था।"
मीरा (मन ही मन, उस घिनौने सच को याद करके अंदर तक काँप उठी): "सो नहीं रहा था सरताज! वह हैवान मेरे इस नंगे शरीर को नोच रहा था, अपनी गंदी जुबान से मेरे अंगों के साथ खेल रहा था।"
मीरा (अपनी आँखें बंद करके बाबा जी का शुक्रिया अदा करते हुए, मन ही मन): "वह तो शुक्र है सच्चे पाशाह का कि ऐन वक्त पर आपकी यह भारी फोटो नीचे गिर गई, जिसकी आवाज़ से वह दरिंदा डर गया और मेरी आबरू पूरी तरह लुटने से बच गई..."
सरताज सिंह (अपनी पैनी नज़रें मीरा की गर्दन पर जमी लालिमा पर टिकाते हुए, मन ही मन): "मीरा का यह डर... यह सिर्फ एक्सीडेंट का डर नहीं है, यह कुछ और छुपा रही है।"
सरताज सिंह (मन ही मन): "इसकी ज़ुबान झूठ बोल रही है, और इसका बदन खौफ से कांप रहा है। कमरे में कुछ ऐसा हुआ है जिससे मीरा डर रही है। आमतौर पर इस टाइप का डर औरत में तब देखा जाता है, जब उसके साथ कोई अनहोनी हुई हो, जैसे कोई अनवॉन्टेड टच... क्या शेर ने कुछ ऐसा किया?"
सरताज सिंह (मीरा के उतरे हुए चेहरे और उसकी झुकी हुई नज़रों को देखते हुए, मन ही मन): "मीरा तो कभी भी मेरे साथ झूठ नहीं बोलती। हमारी शादी को इतने साल हो गए, पर आज तक इसने मुझसे एक छोटी सी बात भी नहीं छुपाई।"
सरताज सिंह (मन ही मन): "आखिर ऐसा क्या हो गया है यहाँ... ऐसी कौन सी बात है जिसे बताने से यह इस कदर डर रही है?"
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अपने क्वार्टर के कमरे में शेर खाट पर पीठ के बल लेटा हुआ था।
उसके जिस्म पर लगी चोटों में हल्की टीस उठ रही थी, लेकिन उसका ध्यान उन जख्मों पर बिल्कुल नहीं था। कमरे की छत को घूरते हुए उसके दिमाग में बार-बार मीरा के उस गोरे बदन, उसकी बेबसी और उस अधूरी रह गई दोपहर की वासना के मंजर घूम रहे थे।
जैसे ही उसे याद आया कि वह जीत के कितने करीब था और ऐन मौके पर मालिक सरताज के एक फोन की घंटी ने लगभग सारा खेल किरकिरा कर दिया, उसका खून खौल उठा।
शेर (बिस्तर पर उठकर बैठते हुए, गुस्से में अपने होंठ चबाकर खुद से बड़बड़ाते हुए): "साला सरताज! ऐन मौके पर फोन करके उसने लगभग रंग में भंग डाल ही दिया था।"
शेर (एक कमीनी मुस्कान के साथ): "वो तो मैंने सही वक्त पर बात संभाल ली।
शेर (खाट पर पीछे की तरफ झुकते हुए, एक बेहद वहशी और नीच अट्टहास के साथ): "अरे कसम से... क्या नज़ारा था वो और क्या मज़ा आ रहा था! साला उधर फोन पर सरताज मुझसे पूछ रहा था कि 'शेर, मेमसाब कहाँ हैं?'"
शेर (अपनी छाती पर हाथ मारकर हवा में थूकते हुए, कामुक हँसी के साथ): "और इधर मैं भी शेर हूँ... साले को फोन पर कह रहा हूँ कि 'मालिक, मेमसाब तो बाहर दूध लेने गई हैं मेरे लिए'..."
शेर (मदहोशी में अपनी आँखें आधी बंद करते हुए, अपनी जीभ को होठों पर फेरकर): "और ठीक उसी टाइम... फोन कान पर लगा होने के बावजूद, मेरा मुँह सीधे मीरा के उन सुडौल स्तनों पर जमा हुआ था। मैं किसी भूखे बच्चे की तरह उसके उन बड़े-बड़े मम्मों को चूस रहा था, और वो बेबस होकर सिसकियाँ दबा रही थी।"
शेर (अपनी मुट्ठियाँ भींचते हुए, जीत के अहंकार में चूर होकर): "कसम से, मज़ा आ गया! मालिक और मालकिन... दोनों को एक साथ अपनी उँगलियों पर नचाने का!"
शेर (सोचते हुए, उसकी आँखें अचानक क्रूरता से चमक उठती हैं): "और सबसे बड़ा काम तो मैंने ये किया कि उस हादसे का फायदा उठाकर मीरा से उसकी लाडली ज्योति की कसम खिलवा ली।"
शेर (खाट से नीचे पैर लटकाते हुए, एक गहरी और डरावनी हँसी हँसते हुए): "अब वो चाहकर भी सरताज को कुछ नहीं बता सकती और न ही पीछे हट सकती है। अब तो जब भी मेरा मन करेगा, मैं उसके उस गोरे जिस्म को सहलाऊँगा, चूसूँगा... और वो चूँ तक नहीं करेगी!"
शेर (दीवार पर टंगे कैलेंडर को घूरते हुए, थोड़ी झुंझलाहट में): "लेकिन वो बाबा जी की तस्वीर का ऐन वक्त पर गिरना... दिमाग खराब कर गया। साली ऐसी डरी कि सीधे मेरे चंगुल से छिटक गई।"
शेर (अचानक एक अज्ञात डर से सिहरते हुए, अपने माथे का पसीना पोंछकर): "कहीं यह मेरे लिए भी कोई इशारा तो नहीं? क्या मैं कुछ ज़्यादा ही बड़ा जुआ खेल रहा हूँ, या फिर मुझ पर कोई बुरा वक्त आने वाला है?"
शेर (बिस्तर पर लेटने के लिए वापस पीछे होते हुए, खुद को समझाते हुए): "लगता है कुछ दिन बिल्कुल शरीफ और सीधा बनकर रहना ही ठीक रहेगा। चलो देखते हैं कि आने वाले दिन क्या मोड़ लेते हैं।"
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कमरे में चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। बेड के एक तरफ सरताज सिंह सोने का नाटक कर रहा था, लेकिन हकीकत में वह जगा हुआ था और महसूस कर रहा था कि मीरा को कोई बात अंदर ही अंदर बुरी तरह परेशान कर रही है, जबकि दूसरी तरफ लेटी मीरा की आँखों से नींद कोसों दूर थी।
वह करवट बदलकर दीवार की तरफ मुँह किए खामोश आँसू बहा रही थी। कमरे के अंधेरे में उसे बार-बार अपनी देह पर शेर की उन उंगलियों का दबाव, उसके दाँतों के तीखे निशान और उसके मुँह की वहशी लार का अहसास हो रहा था।
वह जितनी बार उन यादों को झटकने की कोशिश करती, उसका दम उतना ही घुटने लगता।
मीरा (मन ही मन, शून्य में घूरती हुई, अत्यधिक खौफ और ग्लानी के साथ): "हे वाहेगुरु... आज मेरे साथ यह क्या हो गया? मैं... मैं सरताज की पत्नी, ज्योति की माँ... आज एक नौकर के सामने इस कदर बेबस हो गई? सच तो यह है कि अगर आज वह तस्वीर न गिरती, तो मैं... मैं पूरी तरह उसके सामने घुटने टेक चुकी थी।“
उस वहशी की ताकत और अपनी बेटी की जान के अहसान के बोझ तले मैं इस कदर दब गई थी कि मेरे भीतर का विरोध खत्म हो चुका था। मैं अपनी आबरू का सौदा करने की कगार पर पहुँच गई थी...
मीरा ( सिसककर): "पर अब... अब मैं एक ऐसे भयानक दलदल में फंस चुकी हूँ जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा। उस पापी ने मुझसे मेरी ही मासूम बच्ची की कसम खिलवा ली। ज्योति की कसम... मैं इस कसम को कैसे तोड़ूँ? अगर मैंने उसे अपने इस जिस्म को छूने से मना किया, और मेरी बच्ची को कुछ हो गया तो मैं जीते जी मर जाऊँगी। उसने मेरी ममता को ही मेरे खिलाफ हथियार बना लिया।"
मीरा (भय से अपनी आँखें बंद करते हुए, उसका पूरा बदन सिहर उठता है): "आज उसकी आँखों में जो भूख थी, जो वहशीपन था... उसे देखकर अब मुझे 100% यकीन हो चुका है कि शेर सिर्फ इतने पर नहीं रुकेगा। उसकी गंदी नज़रें सिर्फ और सिर्फ मेरी इस जवानी पर टिकी हैं। वह तब तक नहीं थमेगा जब तक वह मुझे पूरी तरह अपनी हवस का शिकार नहीं बना लेता..."
मीरा (अंधेरे में अपने कांपते हाथों से अपनी छाती को ढंकते हुए, खौफ और सिहरन से भरी सिसकी के साथ): "कितना कमीना और शातिर है वह शेर, एक तरफ फोन पर सरताज से झूठ बोल रहा था कि मेमसाहिब दूध लेने गई हैं, और ठीक उसी वक्त वह किसी भूखे बच्चे की तरह मेरे स्तनों को नोच-नोच कर पी रहा था; उसके दाँतों और होंठों की उस वहशी रगड़ ने तो जैसे मेरी जान ही निकाल दी थी, और मेरी लाचारी ऐसी थी कि सरताज की आवाज़ फोन पर सुनते हुए भी मैं न चीख सकती थी और न ही अपनी देह को उसके इस तीखे प्रहार से रोक पा रही थी।"
मीरा (सोते हुए सरताज की तरफ मुड़कर देखते हुए, गहरी हीनभावना और डर के साथ): "आप पास सो रहे हैं और मैं चाहकर भी आपको कुछ बता नहीं सकती। आपका यह सिक्युरिटीिया रुतबा, यह कोठी, यह दौलत... सब धरी की धरी रह गई। आपका ही नौकर आपकी नाक के नीचे आपकी पत्नी की आबरू से खेल रहा है और मैं अपनी ही बेटी की कसम के जाल में ऐसी बंधी हूँ कि चीख भी नहीं सकती। वाहेगुरु... मुझे इस नरक से निकालो... मैं उस का सामना कैसे करूँगी..."
सरताज (करवट बदलने का नाटक करते हुए, मन ही मन गहरी चिंता और शक के साथ): "मीरा की यह तड़पन और उसके ये खामोश आँसू साफ बता रहे हैं कि कोई बहुत भयानक बात उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही है जिसे वह मुझसे छिपाने की कोशिश कर रही है।"
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शाम को कोठी के पिछले हिस्से में बने शेर के क्वार्टर का माहौल बिल्कुल शांत था। शेर अपनी खाट पर बैठा हुआ था और दोपहर को ठंडे दिमाग से सोचने के बाद उसने एक शातिर चाल चली थी—उसने तय किया था कि वह कुछ दिनों तक मीरा को बिल्कुल परेशान नहीं करेगा और न ही उसकी तरफ देखेगा।
उसे भी कहीं न कहीं बाबा जी की तस्वीर के अचानक गिरने से दिल में एक अनजाना सा डर लग रहा था।
वह जानता था कि अचानक पीछे हट जाने से मीरा का डर थोड़ा कम होगा और सरताज का उस पर भरोसा और गहरा हो जाएगा।
तभी कमरे के दरवाजे पर साए उभरे। सरताज सिंह और उनके ठीक पीछे सहमी हुई मीरा कमरे के भीतर दाखिल हुए। शेर ने जैसे ही उन्हें देखा, वह दर्द का बहाना करते हुए तुरंत खाट से उठने की कोशिश करने लगा।
शेर (चेहरे पर दर्द का मुखौटा ओढ़कर, लड़खड़ाते हुए उठने का नाटक करते हुए): "अरे... मालिक! आप... आप यहाँ क्वार्टर में क्यों आए? मुझे बुला लिया होता। और मेमसाब आप भी..."
सरताज सिंह (आगे बढ़कर शेर के कंधे पर हाथ रखते हुए, बेहद सामान्य और दोस्ताना आवाज़ में): "अरे बैठो, बैठो शेर! हिलने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। तुम्हारी चोटें बहुत गहरी हैं।"
शेर (हाथ जोड़कर, अपनी नज़रें पूरी तरह नीचे झुकाए हुए): "मालिक, आप बड़े लोग हैं, आपका इस गरीब के क्वार्टर में आना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। चोट का क्या है, दो दिन में ठीक हो जाएगी।"
सरताज सिंह (गंभीरता और गहरी आवाज़ में): "शेर... आज मैं यहाँ एक मालिक की हैसियत से नहीं, बल्कि एक पिता की हैसियत से आया हूँ। आज सुबह अगर तुम ऐन मौके पर अपनी जान दांव पर लगाकर गाड़ी के आगे न कूदते... तो आज मेरी ज्योति इस दुनिया में नहीं होती। तुमने जो इस परिवार पर उपकार किया है, उसका मोल मैं जिंदगी भर नहीं चुका सकता। बहुत-बहुत शुक्रिया तुम्हारा।
"शेर (अपनी नज़रें फर्श पर ही टिकाए रखकर, बेहद सादगी और विनम्रता से): "ऐसा मत बोलिए मालिक! ये तो मेरा फ़र्ज़ था। आपने मुझे इस कोठी में पनाह दी, इतना मान-सम्मान दिया। अगर मैं अपनी जान देकर भी बिटिया की रक्षा न कर पाता, तो मेरा यह जीवन किस काम का? इसमें कोई अहसान नहीं है मालिक, यह तो मेरा कर्म था।"
शेर: "मालिक, जैसे आप शुक्रिया कह रहे थे, सुबह मालकिन भी ऐसा ही कह रही थीं। उल्टा मुझे मालकिन का शुक्रिया कहना चाहिए, उन्होंने मेरी इतनी सेवा की। मलम लगाई, पट्टी की।"
शेर: "सबसे अच्छी बात तो यह है कि ज्योति बिटिया की जान बच गई।"
शेर जब यह सब बोल रहा था, तब मीरा कमरे के एक कोने में दीवार से सटकर खड़ी थी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और वह डर के मारे काँप रही थी कि कहीं शेर अपनी आँखों से कोई गंदा इशारा न कर दे।
लेकिन वह हैरान रह गई—पूरे समय शेर की आँखें नीचे की तरफ थीं या वह सरताज की आँखों में देख कर बात कर रहा था। उसने एक बार भी अपनी गंदी या वासना भरी नज़रों से मीरा की तरफ़ नहीं ताका। उसका यह बदला हुआ रूप देखकर मीरा के भीतर उलझन और बढ़ गई।
उधर, सरताज सिंह शेर की इस बेमिसाल वफ़ादारी और सादगी भरे शब्दों को सुन रहा था, लेकिन उसके दिमाग के भीतर एक अलग ही जंग चल रही थी।
सरताज सिंह (आंतरिक संवाद, शेर के चेहरे को गौर से देखते हुए): "यह इंसान जिस सादगी से बात कर रहा है, उसे देखकर कोई पापी नहीं कह सकता। जब से यह आया है, इसने सिर्फ हमारी भलाई की है। चोरनी से मीरा को बचाया, मीरा को गाड़ी से गिरने से रोका और आज ज्योति के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की... इसके ये जख्म तो असली हैं।"
“कहीं... कहीं मैं वाहेगुरु के उस इशारे का गलत मतलब तो नहीं निकाल रहा? क्या मैं एक ऐसे वफ़ादार बंदे पर शक करके गुनाह कर रहा हूँ जिसने मेरे बच्चे के लिए खून बहाया है? क्या मैं वाकई इतना अहसानफ़रामोश हो चुका हूँ कि इसकी इस कुर्बानी के पीछे भी साज़िश ढूँढ रहा हूँ?"
सरताज का दिमाग असमंजस के भंवर में फंस चुका था। शेर के जिस्म के जख्म और उसकी यह नम्रता चीख-चीख कर कह रही थी कि वह निर्दोष है। लेकिन गुरुद्वारे का वो गिरा हुआ प्रसाद सरताज के दिल में एक खटके की तरह बैठा हुआ था।
सरताज सिंह (बाहर से अपनी जेब से एक लिफाफा निकालते हुए): "यह लो शेर, यह तुम्हारी बहादुरी के लिए एक छोटा सा इनाम है। और आज से तुम्हारी सैलरी दोगुनी की जाती है। जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, कोठी का कोई काम नहीं करोगे। मीरा... शेर की दवा और खाने का पूरा ध्यान रखना।"
मीरा (सहमकर, बिना शेर की तरफ देखे): "जी... जी, मैं रखूंगी।"
शेर (लिफाफा लेते हुए, सिर झुकाकर कुटिलता से मन ही मन मुस्कुराया): "बहुत शुक्रिया मालिक। वाहेगुरु आपका भला करे।"
सरताज सिंह ने जब अपनी बात खत्म करते हुए मीरा की तरफ देखा और शेर की देखभाल की जिम्मेदारी उसे सौंपी, तो शेर ने तुरंत पासा पलटा।
वह जानता था कि सरताज एक चालाक सिक्युरिटीवाला है और ज़रूरत से ज़्यादा नज़दीकी शक पैदा कर सकती है।
साथ ही, वह मीरा को कुछ दिनों के लिए एक झूठी राहत देना चाहता था ताकि उसका डर कम हो और उसका शिकंजा और मज़बूत हो सके। उसने बड़ी ही मासूमियत और अदब से अपने हाथ जोड़ लिए।
शेर (घबराए हुए लहजे का नाटक करते हुए, तुरंत सिर हिलाकर): "नहीं, नहीं मालिक! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है मालिक। मेमसाब भला इस अदने से नौकर की देखभाल क्यों करेंगी? कहाँ आप लोग कोठी के राजा-रानी और कहाँ मैं एक मामूली नौकर । मेमसाब का मेरे क्वार्टर में आना-जाना अच्छा नहीं लगेगा मालिक, कोठी के बाकी नौकर-चाकर क्या सोचेंगे? समाज में आपकी इज़्ज़त है।"
सरताज सिंह (भौंहें सिकोड़कर, शेर की इस बात को तौलते हुए): "पर शेर, तुमने हमारे लिए अपना खून बहाया है। इस हाल में तुम्हारी तीमारदारी..."
शेर (बीच में ही बेहद विनम्रता से बात काटते हुए): "मालिक, आप बस राम सिंह या किसी और गार्ड को बीच-बीच में मेरा हालचाल लेने के लिए भेज दिया कीजिएगा। वो आकर मुझे दवा और खाना दे जाया करेंगे, उतना मेरे लिए बहुत है। वैसे भी वाहेगुरु की मेहरबानी है, चोटें उतनी गहरी नहीं हैं... मैं दो-तीन दिन में बिल्कुल ठीक हो जाऊँगा और फिर से आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊँगा। आप मेमसाब को तकलीफ मत दीजिए।"
शेर जब यह सब बोल रहा था, तो कोने में खड़ी मीरा ने राहत की एक बहुत लंबी साँस ली।
उसने मन ही मन सोचा कि शायद शेर वाकई अपनी हद और मर्यादा को समझ रहा है। शेर की आँखें अभी भी ज़मीन पर ही गड़ी थीं, उसने मीरा की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा।
उधर सरताज सिंह, जो शेर के छिपे हुए मकसद को ढूँढने की कोशिश कर रहा था, शेर की इस बात को सुनकर पूरी तरह सोच में पड़ गया।
मीरा की हालत देखकर उसके मन में ख्याल आया था, कि क्या शेर ने कोई ऐसी हरकत की है, जिससे वह डर गई थी। मीरा पे उसे पूरा भरोसा था। अमूमन औरत अपनी इज़्ज़त पे आई बात छुपाने की कोशिश करती है।
सरताज सिंह (आंतरिक संवाद): "जो इंसान बदनीयत होता है, वो तो मालकिन के करीब आने के बहाने ढूँढता है। यहाँ मैं खुद मीरा को इसकी सेवा के लिए कह रहा हूँ, और यह अपनी मर्यादा का हवाला देकर खुद ही मना कर रहा है। कोठी की इज़्ज़त की फिक्र मुझसे ज़्यादा इस नौकर को है। क्या वाकई मेरा शक बेबुनियाद है? कोई इतना शातिर कैसे हो सकता है कि अपनी जान भी दांव पर लगा दे और सामने मिल रहे फायदे को भी ठुकरा दे? शायद गुरुद्वारे में जो हुआ, वो महज़ एक इत्तेफाक ही था..."
सरताज सिंह : "ठीक है शेर, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। राम सिंह ही तुम्हारी देखभाल करेगा। चलो मीरा, इसे आराम करने दो।"
सरताज और मीरा कमरे से बाहर निकल गए। सरताज का शक अब धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रहा था, और शेर की चाल बिल्कुल सही निशाने पर बैठ चुकी थी।
Deepak Kapoor
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