12-07-2026, 02:18 PM
अध्याय -18
नीचे लॉबी की चकाचौंध रोशनी जैसे ही आयशा की आँखों पर पड़ी, उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके चेहरे पर एक तीखा तमाचा मार दिया हो।
छत का वह मदहोश कर देने वाला अंधेरा, वह ठंडी हवा और विशाल के उस गठीले जिस्म की गर्मी... सब कुछ एक झटके में पीछे छूट गया था। लेकिन उनके बदन के भीतर जो तूफ़ान मच रहा था, वह थमने का नाम नहीं ले रहा था।
आयशा ने अपने सीने पर उस काले दुपट्टे को और कसकर फैलाया। ब्रा न होने के कारण उसके भारी स्तनों का उभार सीधे मखमली कुर्ते के कपड़े से टकरा रहा था, और सीढ़ियों से नीचे उतरने की हलचल के कारण उसके निपल्स में एक अजीब सी कसमसाहट और तीखा दर्द हो रहा था, जो विशाल के हाथों की बेरहमी और छुअन के कारण पहले से ही पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे।
सबसे बुरा हाल तो उनकी जांघों के बीच था। पैन्टी को जल्दबाज़ी में ऊपर खींचने की वजह से, वह गीला और चिपचिपा लाल कपड़ा उनकी चूत के पाटों के बीच बुरी तरह चुभ रहा था। उनका अपना कामुक रस अब उनकी गोरी जांघों से रिसकर नीचे की तरफ सरक रहा था।
"आयशा! यहाँ आओ बेटी, कहाँ रह गई थी तुम?"
मामा की कड़क और भारी आवाज़ सीधे उसके कानों में पड़ी। आयशा का पूरा वजूद खौफ के मारे अंदर तक कांप गया। आयशा ने अपनी थमी हुई सांसों को काबू में करने के लिए अंदर ही अंदर एक गहरी सांस ली, अपने कांपते हुए हाथों को आपस में भींचा और चेहरे पर एक मुस्कान लाने की कोशिश की।
वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई उस तरफ बढ़ीं जहाँ उनकी अम्मी (नानी) और मामा कुछ और रिश्तेदारों के साथ खड़े थे।
हर एक कदम के साथ ऐसा लग रहा था जैसे उनकी जांघों के बीच जमा वह कामुक पानी उसकी लाचारी की गवाही दे रहा हो। उसके होंठ, जो विशाल के पागलों जैसे चूमने की वजह से पूरी तरह सूज चुके थे और सुर्ख लाल हो गए थे, इस वक्त मारे डर के सूख रहे थे।
"अ-अस्सलामु अलैकुम मामा ... जी, बस वह फहद का फोन आ गया था, तो ऊपर नेटवर्क थोड़ा ठीक था... इसलिए बात करने लगी थी," आयशा ने अपनी उखड़ी हुई आवाज़ को जितना हो सके सामान्य रखने की कोशिश की।
नानी ने आयशा के चेहरे की तरफ देखा और उनकी भौहें सिकोड़ लीं।
"आयशा? तुम्हारा चेहरा इतना लाल क्यों पड़ रहा है? और तुम्हारी सांसें इतनी क्यों फूल रही हैं? सीढ़ियां उतरने में ही हांफने लगीं क्या?"
नानी का यह सवाल सुनते ही आयशा के पेट में एक उबाल उठा। उन्हें लगा जैसे नानी की आँखें उसके इस काले सूट के पार देख रही हों... जैसे उन्हें पता चल गया हो कि इस सूट के नीचे उसकी सुर्ख लाल ब्रा गायब है और उसकी पैन्टी एक गैर मर्द की हवस के पानी से पूरी तरह भीगी हुई है।
"नहीं... नहीं अम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है," आयशा ने ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए अपने आस्तीन से माथे पर आए पसीने को पोंछा, जिस आस्तीन पर अभी कुछ देर पहले उस ने विशाल के होठों के निशान और उसकी राल को बेरहमी से रगड़कर साफ़ किया था।
"वह... ऊपर ज़रा उमस थी और मैं जल्दी-जल्दी सीढ़ियों से नीचे उतरी, शायद इसलिए।"
मामा ने उसके इस बहाने को सच मानते हुए मुस्कुराकर कहा, "चलो, कोई बात नहीं बेटी। फहद भाई से बात हो गई, यह अच्छा हुआ। अब चलो, सब लोग खाने की मेज़ पर इंतज़ार कर रहे हैं। रस्मों का वक्त निकला जा रहा है, और इस घर की रौनक तो तुम्हारे बिना अधूरी है।"
मामा की इस इज़्ज़त और अपनेपन से भरी बात ने आयशा के दिल पर ग्लानि का एक भारी पहाड़ तोड़ दिया। 'रौनक... पाकीज़गी... इज़्ज़त...' ये शब्द आयशा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह लग रहे थे।
जिस औरत को पूरा खानदान इस घर की इज़्ज़त और हया की मिसाल मानता था, वह औरत अभी सिर्फ पांच मिनट पहले छत पर एक गैर मर्द के सामने बिल्कुल नग्न हालत में खड़ी थी और अपनी चूत का पानी बहा रही थी।
"जी... मामा जी, चलिए," आयशा ने सिर झुकाते हुए कहा।
वह नानी और मामा के पीछे खाने की मेज़ की तरफ बढ़ने लगीं।
उसका बदन शर्म से पानी-पानी था, लेकिन उसके पैरों के बीच से रिसती उत्तेजना की वह गरम बूंदें उन्हें अंदर ही अंदर पूरी तरह पिघला रही
पानी की टंकियों के पीछे से होता हुआ विशाल उस गुप्त रास्ते की तरफ भागा जहाँ से वह दीवार फाँदकर आया था। उसका पूरा बदन हवस की आग में बुरी तरह सुलग रहा था।
उसका वह १० इंच का भीमकाय लंड अभी भी जींस के अंदर लोहे की तरह सख्त और बेकाबू था, जो बिना स्खलन के सीधे आयशा की नंगी गांड और चूत की दरार पर रगड़ खाने की वजह से बुरी तरह कसमसा रहा था।
अधूरा छूटा यह चरम आनंद उसके दिमाग की नसों को पागलों की तरह भड़का रहा था।
"शिट! फक..." उसने दांत पीसते हुए बेहद दबी आवाज़ में गाली बकी।
"बहनचोद! बुड्ढा साला... ऐन वक्त पर आकर सारा खेल बिगाड़ दिया!" विशाल ने अंधेरे में दीवार कूदते हुए बेहद दबी और हिंसक आवाज़ में गाली बकी।
उसका चेहरा गुस्से और अधूरी हवस के मारे पूरी तरह तमतमा उठा था।
"साला सायमा का बाप... अगर दो मिनट और अपनी यह मनहूस ज़बान बंद रखता, तो आयशा इस वक्त चूत के बल फर्श पर लेटी होती और मेरा यह लंड उसकी गहराइयों को चीर रहा होता। शिट! 9० परसेंट काम हो चुका था... उस पाकबाज़ औरत को बिल्कुल दिगंबर कर दिया था मैंने...!"
वह तो आयशा की उस हेयरलेस चूत को पूरी तरह चीरकर अपना सारा वीर्य उसकी कोख की गहराइयों में उतारने ही वाला था कि नीचे से आई उस बुड्ढे की आवाज़ ने सब गुड़-गोबर कर दिया।
उसने गहरी सांस ली और पानी की टंकियों के पीछे वाले रास्ते से, पाइपों के सहारे बेहद शातिरता और खामोशी से नीचे उतर गया।
वह हांपता हुआ अपनी कार की तरफ बढ़ा, जो उसने कोठी से थोड़ी दूर अंधेरे रास्ते पर पार्क की हुई थी। कार का दरवाज़ा खोलकर वह सीधे ड्राइविंग सीट पर धंस गया।
अंदर बैठते ही उसने अपनी जींस की ज़िप को झटके से नीचे गिराया। ज़िप के खुलते ही उसका भीमकाय, कड़क और नस-नस उभरा हुआ लंड बाहर की तरफ उछल पड़ा। उसकी टोपी पर कामुक रस की बूंदें चमक रही थीं।
विशाल ने एक हाथ से अपने कड़क अंग को पागलों की तरह भींचा और दूसरे हाथ से अपना फोन निकाला। उसने गैलरी खोली और उस वीडियो पर क्लिक किया जो उसने कुछ ही मिनट पहले छत पर रिकॉर्ड किया था।
स्क्रीन पर आयशा का वह मुकम्मल नंगा और मदहोश कर देने वाला रूप जीवंत हो उठा।
वीडियो में वह सिर्फ अपनी उस सुर्ख लाल पैन्टी में बेबस खड़ी थी, और ऊपर उसके उन भारी, सुडौल मम्मों पर वह सुर्ख लाल ब्रा अभी भी कसी हुई थी, जो उसके गोरे बदन पर किसी अंगारे की तरह सुलग रही थी।
वीडियो में आयशा का वह हेयरलेस, मखमली चूत का उभार, उस लाल पैन्टी के ठीक बीच में बना वह गहरा, गीला दाग और पीछे मुड़ने पर उसकी वह भारी, रसीली और नंगी गांड साफ़ दिखाई दे रही थी, जिसे देखकर विशाल की आँखों में क्रूरता उतर आई।
विशाल (वीडियो देखते हुए, अपने लंड को ऊपर-नीचे बिजली की रफ़्तार से रगड़ते हुए): "उफ़्फ़... आयशा... क्या माल है यार! यह सुर्ख लाल ब्रा में कसे मम्मे... यह हेयरलेस साफ चूत... और यह गोल, रसीली नंगी गांड... आह्ह्ह..."
वह स्क्रीन पर दिख रही आयशा की नंगी गांड और लाल ब्रा के उभार पर अपनी उंगली फेरने लगा और नीचे उसका हाथ उसके अंग पर इतनी बेरहमी से चलने लगा कि उसका पूरा बदन कार की सीट पर कसमसाने लगा।
उसका वीर्य अब किसी भी सेकंड फूटने ही वाला था कि तभी... अचानक उसके फोन की स्क्रीन पर वीडियो रुक गया और अकरम का नाम चमकने लगा।
विशाल ने चिढ़कर, हांफते हुए फोन उठाया और आवाज़ को थोड़ा स्थिर करने की कोशिश की।
अकरम (फोन पर, पीछे से लाउड म्यूज़िक और लोगों के हंसने का शोर आ रहा था): "अबे साले विशाल! कहाँ मर गया तू? पूरी महफ़िल जमी हुई है, सब लोग खाना खाने बैठ रहे हैं और दूल्हे का यार ही गायब है? कहाँ है तू भाई?"
विशाल (अपने बाएं हाथ से लंड को कसकर भींचे हुए, हांफती हुई आवाज़ को छुपाकर हंसते हुए): "अरे भाई... कहीं गया नहीं हूँ। बस ज़रा... एक बहुत बड़े बिज़नेस की डील में फंस गया था। एक बहुत बड़ा और कीमती माल हाथ लगते-लगते रह गया, उसी की कशमकश में था।"
अकरम (हंसते हुए): "अबे छोड़ साले बिज़नेस को आज! आज मेरी शादी का जश्न है। जल्दी आ"
विशाल (मन में कमीनी मुस्कान के साथ, अपने कड़े लंड के उभार को देखते हुए): "हाँ भाई...। तेरी होने वाली बीवी सायमा की खाला अंदर से इतनी रसीली और गरम है कि क्या बताऊँ! अभी तो तेरी बीवी का नाम लेके, आयशा को ब्लैकमेल कर पहले पेलूँगा, बाद में तेरी बीवी को भी पेलूँगा, मज़ा तो तब आएगा जब दोनों को एक साथ पेलूँगा।"
विशाल (फोन पर): "हाँ भाई, बस पहुंच रहा हूँ। गाड़ी स्टार्ट कर दी है, ठीक 10 मिनट में तेरे सामने होऊंगा।"
अकरम: "चल जल्दी आ, रख रहा हूँ।"
फोन कटते ही विशाल ने फोन को बगल की सीट पर फेंका और दोबारा वीडियो चालू कर दिया। वीडियो में आयशा का वह मजबूर, नग्न हुस्न और उसकी बंद आँखें देखकर उसने अपने लंड को आख़िरी बार पूरी ताक़त से भींचा।
विशाल (मन में हवस के चरम पर पहुंचते हुए): "कोई बात नहीं... 90 परसेंट तो फतेह कर ही लिया है। उसकी पाकीज़गी का ताला हमेशा के लिए टूट चुका है। अब अगली बार जब यह जिस्म मेरे सामने होगा, तो यह खुद ब खुद मेरे इस 10 इंच के लंड पर बैठने के लिए भीख मांगेगी... आह्ह्ह आयशा...!"
मैं नहीं जानता कि मैं कब सोया। शायद मैं सोया ही नहीं। शायद मैं बस उस तकिए में चेहरा छुपाए, उस घिनौनी महक को, उस मंज़र को... बार-बार... जीता रहा। मैं उस दर्द, ज़िल्लत और वासना के भंवर में बेहोश हो गया था।
अंधेरे कमरे के सन्नाटे में जब भी मैं अपनी आँखें मूंदता, अम्मी का वह मदहोश कर देने वाला मुकम्मल नंगा रूप किसी जलते हुए अंगारे की तरह मेरी बंद आँखों के पीछे तैर जाता।
बार-बार अम्मी के वो भारी, सुडौल और कसमसाते हुए नंगे मम्मे और उनकी वह बिल्कुल साफ़, हेयरलेस चूत का कामुक उभार मेरी आँखों के आगे आ जाता था।
दिमाग पर कामुकता का ऐसा खौफनाक कोहरा छाया था कि ना चाहते हुए भी, मेरा हाथ वापस पैंट के अंदर मेरे कड़े और तपते हुए लंड पर चला गया। मेरी उंगलियां पागलों की तरह उस सख्त अंग को सहलाने लगीं।
उस वक़्त मेरे भीतर एक भयानक मानसिक युद्ध छिड़ गया था।
मेरा एक विचार मुझे धिक्कारते हुए चीख रहा था कि कैसा बेटा हूँ मैं? डूब मरना चाहिए मुझे! मैं अपनी ही सगी अम्मी के पाक जिस्म को, उनके मखमली हुस्न को ऐसी हवस भरी निगाह से देख रहा हूँ, जिसके बारे में सोचना भी सबसे बड़ा गुनाह है।
लेकिन मेरा दूसरा विचार तो पूरी तरह से वासना के क्रूर कब्ज़े में था। वह हवस से अंधा होकर कह रहा था कि अम्मी का वह गोरा, संगमरमर जैसा बदन और उनकी चूत से रिसता हुआ वह गीला पानी सिर्फ एक गैर मर्द विशाल के लिए ही क्यों हो? गुनाह और चरम आनंद के इसी तीखे टकराव के बीच मेरे हाथ की रफ़्तार मेरे अंग पर और तेज़ होती जा रही थी।
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सुबह मेरी आँखें एक झटके से खुलीं। कोई मुझे ज़ोर-ज़ोर से हिला रहा था।
"साहिल! उठो! उठो बेटा!"
मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। अम्मी मेरे बिस्तर के पास खड़ी थीं और मुझे झिंझोड़ रही थीं। मुझे उठाकर अम्मी विंडो के पास गईं।
कमरा रोशन था। सुबह हो चुकी थी। एक पल के लिए, एक बहकी हुई उम्मीद जागी कि यह सब एक खौफनाक ख्वाब था।
फिर मेरी नज़र बिस्तर के पास कुर्सी पर रखी अपनी कल रात वाली पैंट पर पड़ी। मेरा हाथ खुद-बा-खुद उस पर गया। मैंने उसकी जेब को छुआ।
अंदर कपड़े के नीचे मुझे एक सख्त, नुकीली चीज़ महसूस हुई और मेरा दिल बैठ गया। यह वही सुर्ख लाल ब्रा थी जिसकी अंडरवायर मेरी हथेली में चुभी थी। यह ख्वाब नहीं था। हकीकत थी।
अम्मी मुझे घूरते हुए देख रही थीं।
सुबह की उस साफ़ रोशनी में उन्हें देखते ही मेरे दिमाग में कल रात का वह नज़ारा घूम गया—जब वह सिर्फ एक छोटी लाल पैन्टी में अपने नंगे मम्मों को छुपाती हुई भाग रही थीं और उनकी हेयरलेस चूत से कामुक रस रिस रहा था।
उन्हें इस तरह अपनी अम्मी के रूप में सामने देखकर मेरे हलक में फिर से वही तेज़ाबी ज़ायका भर गया, और पैंट के अंदर मेरा लंड इस खौफनाक कल्पना से एक बार फिर कड़ा होने लगा।
वह निकाह के लिए तैयार थीं।
उन्होंने एक भारी, डिज़ाइनर जोड़ा पहना था। एक 'आइवरी' रंग का लहंगा, जिस पर नफीस, सुनहरा काम था। ऊपर, एक लंबी, 'डीप गोल्डन' रंग की रेशमी कुर्ती थी। उसकी लंबाई उनके घुटनों तक थी।
यह कुर्ती उनके जिस्म पर... उनके सीने पर... बिल्कुल कस कर बैठी थी, उनके कर्व्स को... उनके हिप्स को... नुमायाँ कर रही थी।
यह वही सीना था, जो कल रात मैंने पहले सुर्ख लाल ब्रा के नीचे और फिर पूरी तरह नंगा देखा था।
वो हिप्स जो कल रात पहले लाल पैन्टी में कसमसा रहे थे, और फिर तो वह पैन्टी भी उनके पैरों से उतर गई थी और उनकी वह हेयरलेस चूत और पूरी गांड उस गैर मर्द के सामने बेपर्दा हो चुकी थी।
आज सुबह उस भारी कुर्ती के नीचे उनके जिस्म का वही उभार साफ़ ढलते हुए महसूस हो रहा था।
उनके गले में एक भारी, जड़ाऊ नेकलेस था, जो उनकी कुर्ती के गले के पास चमक रहा था। एक सुनहरा दुपट्टा उनके सिर पर सलीके से रखा था।
उनका चेहरा... फ्लॉलेस था। फाउंडेशन, हल्का ब्लश, और आँखों पर 'स्मोकी' काजल। और उनके होठों पर... वही 'muted berry' लिपस्टिक जो कल रात विशाल के होठों की हवस तले कुचलकर तबाह हो गई थी... अब बिल्कुल साफ़, नयी, और दावत देती हुई लगी हुई थी।
लेकिन मेरी नज़र उनके कानों पर जम गई। उन्होंने बहुत भारी, सोने और मोतियों वाले झुमके पहने हुए थे। वही झुमके जो अब्बू उनके लिए लाए थे। हर बार जब वह हिलती थीं, झुमके 'खन' की एक हल्की सी, पाकीज़ा आवाज़ करते थे।
वह बिल्कुल एक 'शरीफ़', 'इज़्ज़त-दार' औरत लग रही थीं।
"उठ गए फाइनली?" उन्होंने विंडो का पर्दा हटाते हुए कहा, और तेज़ रोशनी कमरे में भर गई। "मैं कब से उठा रही हूँ। चलो, चलो, उठो। 9 बज गए हैं! आज निकाह है!"
मैं बिस्तर पर वैसे ही बैठा रहा, चादर मेरे गिर्द लिपटी हुई थी। मैं बस उन्हें घूर रहा था।
सुबह की इस साफ़ धूप में उनका यह संस्कारी रूप मेरे गले नहीं उतर रहा था। आँखों के सामने रह-रहकर वही नज़ारा आ रहा था जब इसी पाकबाज़ दिखने वाली औरत के मम्मे और उनकी वह हेयरलेस चूत एक गैर मर्द के हाथों में कसमसा रही थी।
अम्मी ने मेरी तरफ कदम बढ़ाए और बिस्तर के पास रुक गईं। उनकी मुस्कुराहट मेरे चेहरे को देख कर थोड़ी कम हो गई। उनके भारी झुमके हिले और 'खन' से आवाज़ हुई।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ अब एहतियात-भरी थी। "तबीयत ठीक नहीं है? रात को भी पार्टी से जल्दी आ गए थे।"
मैंने उन्हें देखा। उन झूठी, 'फिक्र-मंद' आँखों में।
मैं उन्हें बताना चाहता था।
मैं अपनी पैंट की जेब से उस सुर्ख लाल ब्रा को निकालकर उनके इस सजे-धजे चेहरे पर फेंकना चाहता था। मैं चीखकर पूरी दुनिया को बताना चाहता था कि कल रात इसी लहंगे और कुर्ती के नीचे इनका बदन सिर्फ एक छोटी लाल पैन्टी में उस विशाल के १० इंच के कड़े लंड पर रगड़ खा रहा था।
मैं कहना चाहता था कि अब्बू के दिए ये झुमके उतने ही झूठे हैं जितनी वह खुद।
लेकिन मैं नहीं कर पाया। ग्लानि, खौफ और वासना के उस अजीब बवंडर ने मेरी ज़बान जैसे सी दी थी।
"नहीं," मैंने एक सपाट आवाज़ में कहा। "ठीक हूँ। बस नींद पूरी नहीं हुई।"
मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया।
अम्मी ने एक लंबी, गहरी सांस ली। इस गहरी सांस के साथ उनके भारी मम्मों का उभार कुर्ती के नीचे एक बार फिर ऊपर-नीचे हुआ, जिसने मेरे भीतर कल रात की उत्तेजना की आग को और भड़का दिया।
उनके कंधे, जो एक पल के लिए सख्त हो गए थे, अब ढीले पड़ गए। जैसे कि वह थोड़ी रिलैक्स हो गई हों कि उनका राज़ अभी भी महफूज़ है।
उन्होंने मेरी बात का यकीन कर लिया था। या शायद वह खुद को बचाने के लिए यकीन करना चाहती थीं।
"अच्छा," उन्होंने फौरन माहौल बदल दिया। उनके चेहरे पर वही 'बिजी' माँ वाली मुस्कुराहट वापस आ गई। "तो चलो, जल्दी से तैयार हो जाओ। आज बहुत लंबा दिन है।"
वह अपने झुमकों को हल्का सा छूते हुए, उन्हें ठीक करती हुईं बोलीं, "अभी नीचे लॉन में ब्रेकफास्ट लगा है। सब इंतज़ार कर रहे हैं।"
उन्होंने शेड्यूल बताना शुरू कर दिया, "याद है ना, 11 बजे तक बारात आ जाएगी। यहीं हवेली में। फिर फौरन निकाह है।"
वह रुकीं, आईने में एक आखिरी बार अपना मेकअप देखते हुए, अपनी 'muted berry' लिपस्टिक पर नाज़ करते हुए।
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आईने के सामने खड़े होकर जब वह अपने इस मुकम्मल हुस्न को निहार रही थीं, तभी आईने के अक्स में उनकी नज़र बिस्तर पर बैठे मुझ पर पड़ी। मैं जिस दीवानगी और बेबसी से उनके इस कसमसाते जिस्म को घूर रहा था, उसे देखकर आयशा के भीतर एक झुरझुरी सी दौड़ गई।
आयशा (आईने में साहिल की भूखी नज़रों को देखते हुए, मन में): "यह... यह साहिल मुझे इस तरह क्यों घूर रहा है? इसकी आँखें मेरे चेहरे से फिसलकर मेरी इस कसी हुई रेशमी कुर्ती और मेरे भारी मम्मों के उभार पर क्यों टिक गई हैं?”
“यह किसी बेटे की पाकीज़ा नज़र नहीं है... इसकी आँखों में एक अजीब सा जंगलीपन है, मर्दों जैसी हवस और वासना की वही आग है जो कल रात विशाल की आँखों में थी। क्या... क्या इसे कुछ शक हो गया है? "
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इस अचानक उठे खौफ ने उनके दिल की धड़कन को बढ़ा दिया, लेकिन वह खुद को संभालते हुए आईने से हटीं।
"निकाह के फौरन बाद लंच है। सायमा की तरफ से है, तो हमें भी मेहमानों का ध्यान रखना पड़ेगा। मैं और नानी तो काम में लगे रहेंगे।"
उन्होंने अपना क्लच उठाया, जिससे उनके झुमके फिर हिले। "और फिर लंच के बाद ही, शाम से पहले, रुखसती है।"
वह दरवाज़े की तरफ मुड़ीं, लेकिन उनकी पीठ के पीछे से मेरी प्यासी निगाहें उनके उन हिप्स पर जाकर टिक गईं, जो कल रात उस तंग लाल पैन्टी में दबे हुए थे।
"चलो, मैं जा रही हूँ। नानी को भी देखना है। तुम 10 मिनट में नीचे आओ। ठीक है?"
"हूँ," मैंने बस इतना कहा।
वह मुस्कुरायीं। वही झूठी, प्यारी मुस्कुराहट जिसके पीछे वह अपने कल रात के सारे गुनाह और जिस्मानी पानी के दागों को छुपाए हुए थीं।
और वह कमरे से निकल गईं। उनके झुमकों की 'खन-खन' की आवाज़ उनके जाने के बाद भी मेरे कानों में एक पल के लिए गूँजती रही।
मैं अकेला रह गया।
मैंने बिस्तर से उतर कर अपनी कल रात वाली पैंट उठाई। अपना हाथ कांपते हुए जेब में डाला और उस सुर्ख लाल ब्रा को बाहर निकाला।
उसकी लाल ब्रा की अंडरवायर की नुकीली नोक पर अब कल रात का मेरा सूखा हुआ खून लगा था।
उस गहरे सुर्ख रंग के कपड़े को देखते ही कल रात का वह पूरा मंज़र मेरी आँखों के सामने सजीव हो उठा—अम्मी की वह हेयरलेस, मखमली चूत, उनकी नंगी रसीली जांघें और विशाल के नंगे सीने पर पिसाते उनके वे भारी सफेद मम्मे। उस कल्पना मात्र से पैंट के अंदर मेरा अंग एक बार फिर पूरी ताक़त से कड़ा होने लगा था।
मेरा दिल गुस्से, बेबसी और एक अजीब सी वासना की आग से फटने लगा था।
मैं बिस्तर पर नहीं बैठ सकता था। मैं छुप नहीं सकता था। मैं भाग नहीं सकता था।
मैं उठा पर मेरे पैर अब भी कल रात की उस मानसिक और शारीरिक कशमकश से थके हुए थे, लेकिन मेरे जिस्म में एक ज़िद्दी, सर्द उत्तेजना दौड़ गई थी।
अलमारी में मेरी रेशमी शेरवानी लटक रही थी। एक हल्का, क्रीम रंग का खूबसूरत लिबास...
जिसपर नफीस सुनहरा काम था। बिल्कुल वैसा ही काम, जैसा अम्मी के उस आइवरी लहंगे पर था।
मैं एक रोबोट की तरह बाथरूम गया। शॉवर के नीचे खड़ा रहा।
ठंडा पानी मेरे जिस्म पर बहता रहा, लेकिन मेरे दिमाग के अंदर लगी उस हवस और नफ़रत की आग को बुझा नहीं सका। पानी की हर बूंद के साथ मुझे अम्मी की चूत से रिसता हुआ वह कामुक रस याद आ रहा था।
मैंने बाहर आ कर उस शेरवानी को पहना।
जब मैंने उसे पहना, तो उसका वह मखमली रेशम... रेशम नहीं... कांच के रेशों की तरह मेरी खाल पर चुभ रहा था। उसका हर धागा मुझे ताना मार रहा था।
मैंने अपनी पैंट की जेब से उस सुर्ख लाल ब्रा को निकाला। और उसे अपने बेड के गद्दे के नीचे रख दिया। जहाँ मैं सोता था, ठीक वहीं... मेरे दिल के करीब।
एक हमेशा चुभने वाली याद-दिहानी की तरह कि इस घर की पाकीज़गी और इज़्ज़त अब हमेशा के लिए तार-तार हो चुकी है।
उस रेशमी कपड़े को गद्दे के नीचे दबाते हुए मेरे हाथ काँप रहे थे, और दिमाग में अम्मी के उन नंगे मम्मों का अक्स किसी ज़हरीले साये की तरह मंडरा रहा था।
मैंने लॉन में कदम रखा। मेहमान, रिश्तेदार, सब वहाँ थे। नाश्ता कर रहे थे, कहकहे लगा रहे थे।
नानी एक टेबल पर कुछ रिश्तेदार औरतों के साथ बैठी थीं, खुश-गप्पियों में पूरी तरह मसरूफ थीं। और अम्मी एक 'परफेक्ट होस्ट' यानी एक आदर्श मेज़बान की तरह इधर से उधर फिर रही थीं, मेहमानों का ख्याल रख रही थीं।
उनकी वह 'डीप गोल्डन' रेशमी कुर्ती और 'आइवरी' रंग का लहंगा सुबह की उस साफ़ धूप में जगमगा रहा था। उनके कानों में वो भारी, अब्बू के लाए हुए सोने और मोतियों के झुमके, उनकी हर एक मुस्कुराहट के साथ 'खन-खन' करके हिल रहे थे।
वह एक मुकम्मल तस्वीर थीं। एक शरीफ़, इज़्ज़त-दार, सलीकेदार और बेहद खूबसूरत औरत की मिसाल। और एक झूठ भी।
"अरे, साहिल!"
नानी की नज़र मुझपर पड़ी। उनका चेहरा खिल उठा। "वाह… आ गए बेटा? इधर आओ!"
"बिल्कुल शहज़ादा लग रहा है मेरा बेटा। नज़र ना लगे।" नानी ने कहा। "चलो, नाश्ता कर लो।
प्लेट दूँ?"
"भूख नहीं है," मैंने कहा। आवाज़ सपाट थी।
नानी ने यह सुन कर कहा, "ऐसे कैसे भूख नहीं है?" "रात को भी कुछ नहीं खाया। सर-दर्द अभी तक है क्या?"
अम्मी हमारी ओर आयीं और मैंने अम्मी की आँखों में देखा। अम्मी मुझे देखकर थोड़ा सा मुस्कुराईं और फिर मैंने नानी की ओर मुड़कर कहा,
"हाँ, नानी," मैंने कहा। "बस... थोड़ा भारी लग रहा है।"
"अरे..." अम्मी ने फौरन वही 'फिक्र-मंद' माँ का रोल अपनाते हुए कहा। "तो दवाई लो ना। रुको... तुम बैठो... मैं एक कप चाय लाती हूँ। फिर दवाई ले लेना।"
उन्होंने ज़ोर दे कर कहा, "बारात आने से पहले ठीक हो जाओ।"
वो पलटीं और जैसे ही वो पलटीं, मामी ने उन्हें पुकार लिया।
"आयशा! ज़रा इधर आना!"
और अम्मी... फौरन... हंस पड़ीं।
"आई!"
और एक पल में वो 'फिक्र-मंद माँ' से 'खुश-मिज़ाज मेहमान' बन गयीं।
मैं वहीं खड़ा रहा और उन्हें जाते हुए देखता रहा।
मेरा हाथ खुद-बा-खुद मेरी रेशमी शेरवानी के ऊपर मेरे सीने पर चला गया।
मेरा सर अब वाकई दर्द से फटने लगा था। मैं उस जश्न को, उस झूठी औरत को देख रहा था, जो अब एक रिश्तेदार आंटी के साथ निकाह की तैयारियों पर हंस-हंस कर बातें कर रही थी।
उनके झुमके हर कहकहे के साथ झूम रहे थे, और हर बार उनकी 'खन-खन' मेरे कानों में कल रात की उस हवस भरी सिसकारी को ताज़ा कर देती थी।
जब वह आगे झुककर हंसतीं, तो कुर्ती के नीचे उनके भारी मम्मों का उभार और उनके जिस्म की वह कसमसाहट मेरी आँखों के सामने उनके उस नग्न हुस्न को जीवंत कर देती थी।
सुबह के 10:45 बजे। तभी, दूर से पटाखों की आवाज़ आने लगी। एक पतली, लेकिन साफ़ आवाज़ जो सुबह की खामोशी को चीरती हुई आ रही थी। धुम... धुम-धाक-धुम...
हवेली में एकदम से करंट दौड़ गया।
"अरे! बारात आ गयी! बारात आ गयी!"
नौकर इधर-उधर भागने लगे। सायमा खाला की माँ- नजमा आंटी फौरन उठ खड़ी हुईं।
"आयशा! सब लोग! चलो चलो!" आंटी ने पुकारा। "साहिल! बेटा तुम भी आओ! गेट पर!"
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