12-07-2026, 01:41 PM
पूजा की चूत और गांड दोनों एक साथ चुद रहे थे। वह अपने चरम पर पहुँचने के लिए बाबाजी के लंड पर अपनी गांड और कमर हिला रही थी। ठीक उसी पल उसके मुँह से एक गहरी, लंबी और अनियंत्रित सिसकारी निकली –
“आआआह्ह्ह्ह्ह……!” मैत्री की प्रस्तुति।
तभी उसकी माँ शिल्पा अपने कमरे से बाहर निकली थी। पानी पीने और मूत्र त्यागने के लिए। रात के सन्नाटे में पूजा की वो सिसकारी उसके कानों में पड़ते ही वह रुक गई।
शिल्पा एक पल के लिए जड़ हो गई।
वह समझ गई थी कि ये किस तरह की सिसकारी है। स्त्री होने के नाते, एक माँ होने के नाते, और खुद के पति होने के बावजूद अपनी भूख को सालों से दबाकर रखने वाले जिस्म के साथ- उसे ये आवाज़ पहचानने में देर नहीं लगी।
वह धीरे-धीरे पूजा के कमरे की तरफ़ बढ़ी। दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन अंदर से आने वाली कराहें, मांस की टकराहट की हल्की-हल्की आवाज़ें और गहरी साँसें साफ़ सुनाई दे रही थीं। हलाकि उसे कोई पुरुष की आवाज नहीं सुनाई दी तो थोड़ी शाति और राहत हुई।
शिल्पा का चेहरा पहले तो गुस्से से लाल हो गया।
‘ये क्या बेहूदगी है…! पूजा… मेरी बेटी… अपने घर में… रात के इस वक्त…क्या कर रही है!’
उसका मन हुआ कि तुरंत अपने पति को जगाए और सब बता दे। लेकिन कुछ कदम चलते-चलते ही उसकी चाल रुक गई।
वह दीवार से टेक लगाकर खड़ी हो गई।
उसके मन में विचारों का तूफान उठने लगा:
‘गुस्सा क्यों कर रही हूँ मैं? मैत्री रचित कहानी।
पूजा विधवा है।
जवान है।
सुंदर है।
उसका जिस्म भी भूखा है… ठीक एक औरत की तरह।
तो फिर पूजा क्यों न करे?
क्या हम औरतें सिर्फ़ दूसरों के नाम पर अपनी भूख दबाकर जीना सीख लें?’
शिल्पा की आँखें नम हो गईं।
उसने अपने स्तनों पर हाथ रखा। वे भारी और संवेदनशील थे। निप्पल पहले से ही सख्त हो चुके थे। उसकी चूत में हल्की-हल्की गर्मी फैल रही थी। पूजा की सिसकारियाँ अब उसे गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब-सी सहानुभूति और उत्तेजना दे रही थीं।
‘कितनी बेचारी होगी वो… कितने दिनों से तरस रही होगी… मैं तो समझ सकती हूँ। मैं नही समजुंगी तो और कौन समजेगा? एक औरत दूसरी औरत की पीड़ा और भूख को बेहतर समझती है। समाज हमें चुदने नहीं देता, लेकिन भूख तो मिटती नहीं ना…’
शिल्पा ने दीवार पर सिर टिका दिया। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो गई थीं।
‘मैं गुस्सा कर रही थी… लेकिन सच तो ये है कि मुझे भी जलन हो रही है। जलन इसलिए कि पूजा आज वो सब पा रही है जो मैं नहीकर सकती क्यों की बाजू में पति होता है। कोई गर्म, मोटा, जोरदार लंड… जो अंदर तक भर दे… जो मुझे रुला-रुलाकर चोदे…’
उसने अपनी जाँघें कसकर भींच लीं।
‘शायद… पूजा सही कर रही है। हम औरतें भी इंसान हैं। हमारी भी इच्छाएँ हैं। अगर कोई हमें वो सुख दे रहा है, तो हम क्यों रोकें? बस… समाज की नजर से बचकर…’
शिल्पा ने एक लंबी साँस ली। उसका गुस्सा अब धीरे-धीरे एक उदास, लेकिन समझ भरी मुस्कान में बदल गया।
वह धीरे से अपने कमरे की तरफ लौट गई। लेकिन अब उसके कदमों में एक नई उथल-पुथल थी। पूजा की सिसकारियाँ अब उसके कानों में गूँज रही थीं, गुस्से की जगह, एक स्त्री की सहानुभूति और छुपी हुई इच्छा के साथ।
शिल्पा दीवार से सटकर खड़ी रही। पूजा की गहरी, अनियंत्रित सिसकारी उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी। हर “आह्ह्ह……” उसके शरीर में एक कंपकंपी पैदा कर रही थी।
वह विधवा है। फनलवर द्वारा एडिटेड।
‘क्या गलत कर रही है पूजा?’ यह सवाल उसके मन में बार-बार घूम रहा था।
‘वो भी तो इंसान है। जवान है। उसका जिस्म भी भूखा है। मैं कितनी बार रात को अकेले में तकिए को काटती हूँ… अपनी जाँघें भींचती हूँ… लेकिन राहत नहीं मिलती। पूजा ने तो कम से कम हिम्मत कर ली।’
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जुड़े रहिये दोस्तों।
Maitri.
“आआआह्ह्ह्ह्ह……!” मैत्री की प्रस्तुति।
तभी उसकी माँ शिल्पा अपने कमरे से बाहर निकली थी। पानी पीने और मूत्र त्यागने के लिए। रात के सन्नाटे में पूजा की वो सिसकारी उसके कानों में पड़ते ही वह रुक गई।
शिल्पा एक पल के लिए जड़ हो गई।
वह समझ गई थी कि ये किस तरह की सिसकारी है। स्त्री होने के नाते, एक माँ होने के नाते, और खुद के पति होने के बावजूद अपनी भूख को सालों से दबाकर रखने वाले जिस्म के साथ- उसे ये आवाज़ पहचानने में देर नहीं लगी।
वह धीरे-धीरे पूजा के कमरे की तरफ़ बढ़ी। दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन अंदर से आने वाली कराहें, मांस की टकराहट की हल्की-हल्की आवाज़ें और गहरी साँसें साफ़ सुनाई दे रही थीं। हलाकि उसे कोई पुरुष की आवाज नहीं सुनाई दी तो थोड़ी शाति और राहत हुई।
शिल्पा का चेहरा पहले तो गुस्से से लाल हो गया।
‘ये क्या बेहूदगी है…! पूजा… मेरी बेटी… अपने घर में… रात के इस वक्त…क्या कर रही है!’
उसका मन हुआ कि तुरंत अपने पति को जगाए और सब बता दे। लेकिन कुछ कदम चलते-चलते ही उसकी चाल रुक गई।
वह दीवार से टेक लगाकर खड़ी हो गई।
उसके मन में विचारों का तूफान उठने लगा:
‘गुस्सा क्यों कर रही हूँ मैं? मैत्री रचित कहानी।
पूजा विधवा है।
जवान है।
सुंदर है।
उसका जिस्म भी भूखा है… ठीक एक औरत की तरह।
तो फिर पूजा क्यों न करे?
क्या हम औरतें सिर्फ़ दूसरों के नाम पर अपनी भूख दबाकर जीना सीख लें?’
शिल्पा की आँखें नम हो गईं।
उसने अपने स्तनों पर हाथ रखा। वे भारी और संवेदनशील थे। निप्पल पहले से ही सख्त हो चुके थे। उसकी चूत में हल्की-हल्की गर्मी फैल रही थी। पूजा की सिसकारियाँ अब उसे गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब-सी सहानुभूति और उत्तेजना दे रही थीं।
‘कितनी बेचारी होगी वो… कितने दिनों से तरस रही होगी… मैं तो समझ सकती हूँ। मैं नही समजुंगी तो और कौन समजेगा? एक औरत दूसरी औरत की पीड़ा और भूख को बेहतर समझती है। समाज हमें चुदने नहीं देता, लेकिन भूख तो मिटती नहीं ना…’
शिल्पा ने दीवार पर सिर टिका दिया। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो गई थीं।
‘मैं गुस्सा कर रही थी… लेकिन सच तो ये है कि मुझे भी जलन हो रही है। जलन इसलिए कि पूजा आज वो सब पा रही है जो मैं नहीकर सकती क्यों की बाजू में पति होता है। कोई गर्म, मोटा, जोरदार लंड… जो अंदर तक भर दे… जो मुझे रुला-रुलाकर चोदे…’
उसने अपनी जाँघें कसकर भींच लीं।
‘शायद… पूजा सही कर रही है। हम औरतें भी इंसान हैं। हमारी भी इच्छाएँ हैं। अगर कोई हमें वो सुख दे रहा है, तो हम क्यों रोकें? बस… समाज की नजर से बचकर…’
शिल्पा ने एक लंबी साँस ली। उसका गुस्सा अब धीरे-धीरे एक उदास, लेकिन समझ भरी मुस्कान में बदल गया।
वह धीरे से अपने कमरे की तरफ लौट गई। लेकिन अब उसके कदमों में एक नई उथल-पुथल थी। पूजा की सिसकारियाँ अब उसके कानों में गूँज रही थीं, गुस्से की जगह, एक स्त्री की सहानुभूति और छुपी हुई इच्छा के साथ।
शिल्पा दीवार से सटकर खड़ी रही। पूजा की गहरी, अनियंत्रित सिसकारी उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी। हर “आह्ह्ह……” उसके शरीर में एक कंपकंपी पैदा कर रही थी।
वह विधवा है। फनलवर द्वारा एडिटेड।
‘क्या गलत कर रही है पूजा?’ यह सवाल उसके मन में बार-बार घूम रहा था।
‘वो भी तो इंसान है। जवान है। उसका जिस्म भी भूखा है। मैं कितनी बार रात को अकेले में तकिए को काटती हूँ… अपनी जाँघें भींचती हूँ… लेकिन राहत नहीं मिलती। पूजा ने तो कम से कम हिम्मत कर ली।’
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