12-07-2026, 01:36 PM
पूजा की रात - यादों का तूफान हो उठा था। वह मचल रही थी। उसके शरीर बहोत कुछ मांग रहा था। मैत्री द्वारा रचित।
रात के सन्नाटे में पूजा अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी। कमरे में सिर्फ एक छोटी-सी लालटेन जल रही थी। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था- बाबा के साथ हुए शुरूआती दौर.... शृंगार, उनके गर्म हाथ, उनकी उँगलियाँ, उनकी जीभ, उनका मोटा और गठीला लंड… उनके लंड का वह बड़ा सुपारा और वो सब कुछ जो उसने आज पहली बार महसूस किया था। एक फिल्म की तरह उसके आँखों के आमने उभर रहा था।
पूजा ने आह भरी और मन ही मन बुदबुदाई, रात को सोते वक्त पूजा फिर से बाबा को याद कर रही थी। उसने मन ही मन कहा,
“बाबाजी… आप बड़े… वो हैं… कब मेरे साथ क्या-क्या करते चले गए… पता ही नहीं चला… मुझे एक अच्छी और संस्कृत नारी से आपनी रखैल बना दिया। मुझे सब याद आ रहा है लेकिन अब मुझे इसका पछतावा नहीं है। जो कुछ भी लिया गया उसमे मेरी मादकता और वासना भी शामिल थी। बाबाजी… आपका बदन कितना अच्छा है… आपकी तारीफ़ मेरे बदन से सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा… आप यहाँ क्यों नहीं हैं… मुझे आपके पसीने की खुशबू अच्छी लगती है… आपका वो खतरनाक लंड… उससे जो लंड के चमड़ी की सुगंध आती है… वो बहुत प्यारी लग रही है…” रचयिता मैत्री है।
उसे यह पता नहीं चला की यही सब सोच ने उसके हाथो को निचे की ओर जाने के लिए मजबूर कर दिया, पूजा ने फिर अपना हाथ नीचे सरकाया… और बाबा को याद करते हुए खुद को छूने लगी।
पूजा की साँसें तेज हो गईं। उसने धीरे से अपना सलवार का नाड़ा खोला और हाथ नीचे सरका दिया। उसकी उँगलियाँ अपनी गीली और सूजी हुई चूत पर पहुँच गईं।
“बाबाजी… यह आपने क्या कर दिया है मेरी चूत के फांके को इतना सुजा दिया की रात होने को है अभी भी सुजन कम नहीं हुई। मुझे क्या हो रहा है…मुझे यह सुजन क्यों अच्छी लग रही है? मुझे ऐसा क्यों लगा रहा है की मेरी चूत को आप ज्यादा से ज्यादा अपने लंड से मार-मार के सुजाते रहे।”
वह मन ही मन सोचती हुई अपनी चूत को धीरे-धीरे रगड़ने लगी। उँगलियाँ सूजी हुई चूत की फाँक पर घूम रही थीं। वह उसकी फांको को फैला रही थी। वह अपनी आँखें बंद करके बाबा के चेहरे की कल्पना कर रही थी। उनकी हर हरकतों को याद करके मादक बन रही थी। उसके चूत के सूजे हुए होंठ एक मादक दर्द भी दे रहा था लेकिन पूजा को अब कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था बल्कि वह इस दर्द को आनंद देख रही थी।
थोड़ी देर बाद उसकी उँगली चूत से हटकर अपनी गांड के छेद पर चली गई। वहाँ भी हल्का-हल्का रगड़ने लगी।
“यह मुझे कैसा रोग लग गया है… टाँगों के बीच में चुभन… कुलहो के बीच में भी चुभन… ओह… मेरी गांड रानी…”
पूजा की उँगली गांड के छेद में हल्का-हल्का घुसाने लगी। वह कल्पना कर रही थी कि बाबा उसके पीछे खड़े हैं और अपना मोटा लंड उसकी गांड में घुसा रहे हैं। और वह एक मीठा दर्द के मारे कराह रही है लेकिन बाबाजी उसकी गांड मार ने से बाज़ नहीं आये और वह लगातार मेरी गांड मारने पर उतावले हो रहे थे। हर तेज धक्का मेरी गांड को ठोक रहे थे। उनका लंड काफी तेज़ और तलवार की तरह मेरी गांड को चिर रहे है। उसकी साँसें तेज हो गईं। वह दोनों हाथों से एक साथ चूत और गांड रगड़ने लगी। उसकी दो उंगलिया उसकी गांड में सरक गई और पूजा अपनी गांड को अपनी ऊँगली से मरवाने लग गई। उसे यह तक नही पता चला की उसकी गांड अब वह खुद ही मार रही है।
“बाबाजी… आह्ह… आपकी उँगलियाँ… आपका लंड… मुझे फाड़ दो… आह्ह… मुझे अपनी रंडी बना लो… बाबाजी…यह गांड अब मेरे कहे में नहीं है बाबाजी, उसे अब आपके लंड के कठोर मार ही चाहिए, मेरी उंगलिया कुछ काम की नहीं है।” उसकी उंगलिया उसकी गांड को तेज मार रही थी। उसके चूत का रस बड़े आराम से उसकी गांड में समा जाते थे और ज्यादा चिकनाहट पैदा करते थे। प्रस्तुतकर्ता मैत्री पटेल।
“आह बाबाजी....मुझे आपके लंड की तलप लग गई है....जल्दी से आके मेरी गांड मार दो प्लीज़.....और वह आपका माल..... अरे वाह क्या स्वाद है उसका मुझे अब आपके लंड का माल दिया करो बाबाजी। अब आपके लंड का माल मेरा जीवन सहारा बन चूका है।“ पता नहीं वह अपने चरमसीमा में क्या-क्या अनाप-सनाप बोले जा रही थी।
पूजा का शरीर काँप उठा। वह जोर से झड़ गई। उसके मुँह से दबी हुई चीख निकली। चूत से पानी बह निकला। वह कुछ देर तक हाँफती रही, फिर थककर सो गई। लेकिन नींद में भी बार-बार बाबा के हाथ और लंड की याद आ रही थी।
लेकिन यह उसकी चींख किसी के अनुभवी कानो में दस्तक दे गई थी।
काफी देर समय यही सोचते सोचते और खुद की गांड मारते-मारते वह कब नींद की आगोश में चली गई उसे नहीं पता।
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जुड़े रहिये दोस्तों।
Maitri Patel.
रात के सन्नाटे में पूजा अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी। कमरे में सिर्फ एक छोटी-सी लालटेन जल रही थी। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था- बाबा के साथ हुए शुरूआती दौर.... शृंगार, उनके गर्म हाथ, उनकी उँगलियाँ, उनकी जीभ, उनका मोटा और गठीला लंड… उनके लंड का वह बड़ा सुपारा और वो सब कुछ जो उसने आज पहली बार महसूस किया था। एक फिल्म की तरह उसके आँखों के आमने उभर रहा था।
पूजा ने आह भरी और मन ही मन बुदबुदाई, रात को सोते वक्त पूजा फिर से बाबा को याद कर रही थी। उसने मन ही मन कहा,
“बाबाजी… आप बड़े… वो हैं… कब मेरे साथ क्या-क्या करते चले गए… पता ही नहीं चला… मुझे एक अच्छी और संस्कृत नारी से आपनी रखैल बना दिया। मुझे सब याद आ रहा है लेकिन अब मुझे इसका पछतावा नहीं है। जो कुछ भी लिया गया उसमे मेरी मादकता और वासना भी शामिल थी। बाबाजी… आपका बदन कितना अच्छा है… आपकी तारीफ़ मेरे बदन से सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा… आप यहाँ क्यों नहीं हैं… मुझे आपके पसीने की खुशबू अच्छी लगती है… आपका वो खतरनाक लंड… उससे जो लंड के चमड़ी की सुगंध आती है… वो बहुत प्यारी लग रही है…” रचयिता मैत्री है।
उसे यह पता नहीं चला की यही सब सोच ने उसके हाथो को निचे की ओर जाने के लिए मजबूर कर दिया, पूजा ने फिर अपना हाथ नीचे सरकाया… और बाबा को याद करते हुए खुद को छूने लगी।
पूजा की साँसें तेज हो गईं। उसने धीरे से अपना सलवार का नाड़ा खोला और हाथ नीचे सरका दिया। उसकी उँगलियाँ अपनी गीली और सूजी हुई चूत पर पहुँच गईं।
“बाबाजी… यह आपने क्या कर दिया है मेरी चूत के फांके को इतना सुजा दिया की रात होने को है अभी भी सुजन कम नहीं हुई। मुझे क्या हो रहा है…मुझे यह सुजन क्यों अच्छी लग रही है? मुझे ऐसा क्यों लगा रहा है की मेरी चूत को आप ज्यादा से ज्यादा अपने लंड से मार-मार के सुजाते रहे।”
वह मन ही मन सोचती हुई अपनी चूत को धीरे-धीरे रगड़ने लगी। उँगलियाँ सूजी हुई चूत की फाँक पर घूम रही थीं। वह उसकी फांको को फैला रही थी। वह अपनी आँखें बंद करके बाबा के चेहरे की कल्पना कर रही थी। उनकी हर हरकतों को याद करके मादक बन रही थी। उसके चूत के सूजे हुए होंठ एक मादक दर्द भी दे रहा था लेकिन पूजा को अब कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था बल्कि वह इस दर्द को आनंद देख रही थी।
थोड़ी देर बाद उसकी उँगली चूत से हटकर अपनी गांड के छेद पर चली गई। वहाँ भी हल्का-हल्का रगड़ने लगी।
“यह मुझे कैसा रोग लग गया है… टाँगों के बीच में चुभन… कुलहो के बीच में भी चुभन… ओह… मेरी गांड रानी…”
पूजा की उँगली गांड के छेद में हल्का-हल्का घुसाने लगी। वह कल्पना कर रही थी कि बाबा उसके पीछे खड़े हैं और अपना मोटा लंड उसकी गांड में घुसा रहे हैं। और वह एक मीठा दर्द के मारे कराह रही है लेकिन बाबाजी उसकी गांड मार ने से बाज़ नहीं आये और वह लगातार मेरी गांड मारने पर उतावले हो रहे थे। हर तेज धक्का मेरी गांड को ठोक रहे थे। उनका लंड काफी तेज़ और तलवार की तरह मेरी गांड को चिर रहे है। उसकी साँसें तेज हो गईं। वह दोनों हाथों से एक साथ चूत और गांड रगड़ने लगी। उसकी दो उंगलिया उसकी गांड में सरक गई और पूजा अपनी गांड को अपनी ऊँगली से मरवाने लग गई। उसे यह तक नही पता चला की उसकी गांड अब वह खुद ही मार रही है।
“बाबाजी… आह्ह… आपकी उँगलियाँ… आपका लंड… मुझे फाड़ दो… आह्ह… मुझे अपनी रंडी बना लो… बाबाजी…यह गांड अब मेरे कहे में नहीं है बाबाजी, उसे अब आपके लंड के कठोर मार ही चाहिए, मेरी उंगलिया कुछ काम की नहीं है।” उसकी उंगलिया उसकी गांड को तेज मार रही थी। उसके चूत का रस बड़े आराम से उसकी गांड में समा जाते थे और ज्यादा चिकनाहट पैदा करते थे। प्रस्तुतकर्ता मैत्री पटेल।
“आह बाबाजी....मुझे आपके लंड की तलप लग गई है....जल्दी से आके मेरी गांड मार दो प्लीज़.....और वह आपका माल..... अरे वाह क्या स्वाद है उसका मुझे अब आपके लंड का माल दिया करो बाबाजी। अब आपके लंड का माल मेरा जीवन सहारा बन चूका है।“ पता नहीं वह अपने चरमसीमा में क्या-क्या अनाप-सनाप बोले जा रही थी।
पूजा का शरीर काँप उठा। वह जोर से झड़ गई। उसके मुँह से दबी हुई चीख निकली। चूत से पानी बह निकला। वह कुछ देर तक हाँफती रही, फिर थककर सो गई। लेकिन नींद में भी बार-बार बाबा के हाथ और लंड की याद आ रही थी।
लेकिन यह उसकी चींख किसी के अनुभवी कानो में दस्तक दे गई थी।
काफी देर समय यही सोचते सोचते और खुद की गांड मारते-मारते वह कब नींद की आगोश में चली गई उसे नहीं पता।
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जुड़े रहिये दोस्तों।
Maitri Patel.



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