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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
खौफ और साजिश—3
 
जैसे ही फोन कटा, मीरा ने एक गहरी राहत की साँस ली, लेकिन उसकी यह राहत पल भर की भी नहीं थी। अपने जिस्म पर छाए शर्म के बोझ से तड़पते हुए उसने खुद को ऊपर उठाने की कोशिश की।
 
मीरा (हाँफते हुए, अपनी बची-कुची ताकत समेटकर पीछे हटने का प्रयास करते हुए): "फोन... फोन कट गया ना शेर? अब... अब प्लीज छोड़ो मुझे... हट जाओ मेरे ऊपर से..."
 
पर शेर के इरादे कुछ और ही थे। जैसे ही उसने देखा कि मीरा दूर हटने की कोशिश कर रही है, उसने अपने मजबूत और भारी हाथों से उसकी पतली कमर को जकड़ा और एक ही झटके में उसे खींचकर सीधे अपनी गोद में बिठा लिया।
 
अब मीरा पूरी तरह से शेर की जांघों पर बैठी हुई थी। उसकी रेशमी नाइटी कमर और पेट तक नीचे खिसकी हुई थी, जिससे उसका पूरा ऊपरी बदन पूरी तरह से अनावृत था।
 
शेर के दोनों बड़े हाथ अभी भी उसके उन दोनों नंगे और सुडौल मुम्मों पर जमे हुए थे। लेकिन इस बार वह बहुत धीरे-धीरे, मखमली उँगलियों से उन गोरे उभारों को सहलाने लगा। उसकी उँगलियों का यह धीमा स्पर्श मीरा के संवेदनशील अंगों पर एक मादक और तीखी कामुक सिहरन पैदा करने लगा।
 
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'हे भगवान... यह क्या अनर्थ हो रहा है! मैं इसकी गोद में इस हाल में बैठी हूँ... और इसके हाथों का यह धीमा स्पर्श... मेरा बदन काँप क्यों रहा है? सरताज किसी भी वक्त आते होंगे और मैं... मैं यहाँ इसके चंगुल में पिघल रही हूँ। मुझे दूर हटना होगा, पर इस शरीर में जैसे अब जान ही नहीं बची...'
 
शेर ने मीरा के बदन में आती उस मखमली नरमी और सिहरन को भाँप लिया। उसने अपनी जीभ से अपने होंठों को चाटा और मीरा के कान के पास अपना मुँह ले जाकर बेहद कामुक आवाज़ में फुसफुसाया।
 
शेर (मीरा के स्तनों को अपनी हथेलियों में आहिस्ता-आहिस्ता भींचते हुए, मदहोश आवाज़ में): "मीरा मैडम... अभी मेरे पास पूरे दस मिनट हैं। मालिक को आने में समय है... प्लीज, थोड़ी देर और खेलने दो न इनसे। कसम से, इनको छूकर मेरा दिल ही नहीं भरता..."
 
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'दस मिनट बहुत होते हैं मेमसाब! अब जब तुम खुद मेरी गोद में आकर बैठ गई हो, तो इन गोरे और रसीले मुम्मों को ऐसे आहिस्ता-आहिस्ता मसलूँगा कि तुम खुद सब भूल जाओगी। मालिक के आने से पहले तुम्हारी इस जवानी का पूरा मज़ा निचोड़ लूँगा।'
 
उसने अपनी गीली और खुरदरी जीभ सीधे मीरा के नाज़ुक गले पर टिका दी और ऊपर से नीचे तक चाटने लगा।
 
मीरा (शेर की जांघों पर छटपटाते हुए, उसके हाथों को अपने सीने से हटाने की नाकाम कोशिश करने लगी): "शेर... पागल मत बनो! तुम होश में तो हो? सरताज बस दस मिनट में यहाँ पहुँच जाएंगे। अगर उन्होंने हमें इस हाल में देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा... अभी मुझे छोड़ो और दूर हटो!"
 
मीरा ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसकी गोद से उठने की कोशिश की, लेकिन शेर की ताकत के आगे उसकी एक न चली।
 
शेर ने एक कुटिल मुस्कान के साथ उसकी पतली कमर में अपनी मजबूत बाँहें डालीं और उसे दोबारा अपनी तरफ खींचकर वापस पूरी ताकत से अपनी गोद में बिठा दिया। इस झटके से मीरा का नितंब सीधे उसकी जाँघों के बीच जा टिका।
 
जैसे ही वह दोबारा उसकी गोद में आकर जमी, मीरा का पूरा बदन खौफ और एक अनजानी सिहरन से सुन्न हो गया।
 
गाउन के पतले कपड़े के आर-पार उसे अपने नितंबों पर शेर का वो सख्त और विशाल 7 इंच का लंड साफ महसूस हो रहा था, जो वासना के मारे पूरी तरह लोहे की तरह अकड़ चुका था और उसकी पीठ के निचले हिस्से को बेध रहा था।
 
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'हे भगवान... यह तो पूरी तरह अंधा हो चुका है! इसके बदन की यह गर्मी... और नीचे यह क्या है... उफ्फ, यह तो पूरी तरह खड़ा है। यह सीधे मेरे कूल्हों पर दबाव बना रहा है। मुझे किसी भी तरह यहाँ से निकलना होगा!'
 
शेर ने मीरा की उस घबराहट और उसके जिस्म की सिहरन को अपने कड़े होते अंग पर महसूस किया, जिससे उसकी कामुकता और बढ़ गई। उसने मीरा के कानों के पास अपनी भारी और गर्म साँसें छोड़ते हुए फुसफुसाया।
 
शेर (मीरा की कमर को और कसते हुए, नीचे से अपने अंग का दबाव उसके कूल्हों पर बढ़ाते हुए): "मेमसाब जी, मैं कह रहा हूँ ना... मैं आपको ठीक 7 मिनट बाद छोड़ दूँगा। बस 7 मिनट... मुझे भी पता है कि मालिक आ रहे हैं, मैं कोई रिस्क नहीं लूँगा। पर अभी इन 7 मिनटों में मुझे अपने इस कड़ेपन को शांत करने दीजिए... देखिए न, आपके इस रूप ने मेरा क्या हाल कर दिया है..."
 
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'हाँ मालकिन, महसूस करो इसे! तुम्हारी यह मखमली गांड जब मेरे इस 7 इंच के लंड पर इस तरह रगड़ खा रही है, तो मेरा पूरा खून खौल उठा है। अब इन 7 मिनटों में मैं तुम्हें इस कदर अपनी गोद में मसलूँगा कि तुम चाहकर भी मुझे कभी भूल नहीं पाओगी।'
 
इस खींचतान के बीच मीरा अंदर ही अंदर पूरी तरह से टूट चुकी थी। वह जितनी छटपटा रही थी, शेर की पकड़ उसके जिस्म पर उतनी ही ज़्यादा वहशी होती जा रही थी।
 
अपनी कामुकता की आग में अंधा हो चुका शेर अब एक कदम और आगे बढ़ गया। उसने एक तगड़ा झटका देकर अपनी दोनों मजबूत जाँघों को चौड़ा करते हुए अपने पैर फैला दिए। इस अचानक हुए दबाव के कारण मीरा का संतुलन बिगड़ा और उसकी दोनों टाँगें भी अपने आप बाहर की तरफ फैलती चली गईं।
 
इस पूरी जद्दोजहद में, जो रेशमी गाउन पहले से ही सरक चुका था, वह अब मीरा की दोनों जाँघों से पूरी तरह से हट गया। देखते ही देखते, मीरा की गोरी, सुडौल और रेशमी नंगी जाँघें शेर की भूखी आँखों के सामने बिल्कुल नंगी हो गईं।
 
जब शेर की नज़र मीरा की उन मखमली, बेदाग और बेहद गोरी जाँघों पर पड़ी, तो उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन उतर आया। उसने अपनी बड़ी-बड़ी हथेलियों को मीरा के घुटनों के पास टिकाया और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकाने लगा।
 
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'ओह ... क्या मक्खन जैसी जाँघें हैं मालकिन की! कसम से, ऊपर वाले ने इन्हें तराशने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह रेशम जैसी त्वचा... अब तो इन जाँघों के बीच की गर्मी को छुए बिना मैं रह ही नहीं सकता।'
 
शेर (मीरा की नंगी जाँघों पर अपनी खुरदरी उँगलियाँ रेंगते हुए, भारी और मदहोश आवाज़ में): "मेमसाब जी... क्या कयामत बदन पाया है आपने। आपकी ये गोरी जाँघें देखकर तो कोई भी अपनी जान दांव पर लगा दे... बस... बस कुछ मिनट और..."
 
 
 
 
हवेली के बंद कमरे में जहाँ वक़्त तेज़ी से फिसल रहा था, वहीं शहर की सड़कों पर सरताज सिंह का काफिला पूरी रफ़्तार से दौड़ रहा था। सरताज अपनी आलीशान ऑफिशियल गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा हुआ था।
 
सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम थे—एक सुरक्षा गाड़ी आगे-आगे रास्ता साफ़ करती चल रही थी और दूसरी गाड़ी ठीक पीछे से उन्हें कवर कर रही थी।
 
सुबह की धूप की पीली किरणें खिड़की से छनकर बारी-बारी से सरताज के गंभीर चेहरे पर पड़कर गुज़र रही थीं, लेकिन उसका ध्यान बाहर के रास्तों पर नहीं, बल्कि अपने अतीत और शेर के एहसानों पर टिका हुआ था।
 
वह गहरी सोच में डूबा हुआ था कि शेर उसके परिवार के लिए एक रक्षक बनकर कैसे उभरा है। आज का दिन तो ऐसा था जिसे वह कभी भूल ही नहीं सकता था—शेर ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर उसकी लाडली ज्योति को मौत के मुँह से खींच निकाला था। अगर आज शेर न होता, तो उसका पूरा हंसता-खेलता परिवार एक पल में तबाह हो जाता।
 
सरताज ने पीछे की तरफ टेक लगाई और पुरानी बातों को याद करने लगा।
 
यह पहली बार नहीं था जब शेर ने उनके परिवार पर इतना बड़ा उपकार किया था। सरताज को याद आया कि कुछ रात पहले जब घर में चोर घुसे थे, तब शेर ने ही अपनी जान की परवाह न करते हुए उस चोरनी को पकड़ने का प्रयास किया था और ऐन मौके पर अपनी बहादुरी से घर की लाज और धन-दौलत दोनों बचा ली थी।
 
उससे भी पहले की एक घटना सरताज के जेहन में ताज़ा हो गई, जब मीरा गाड़ी से उतरते वक्त अचानक असंतुलित हो गई थी और उसका पैर फिसल गया था; तब भी शेर ने ऐन मौके पर लपककर मीरा को गिरने से बचाया था और उसे चोट लगने से रोका था।
 
वह मन ही मन सोच रहा था कि शेर का उनके जीवन में आना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
 
शेर की एंट्री उनके घर में तब हुई थी, जब उनका पुराना और वफ़ादार ड्राइवर, चंदन, एक भयानक हादसे का शिकार हो गया था। चंदन के एक्सीडेंट के बाद जब घर के लिए किसी भरोसेमंद आदमी की ज़रूरत थी, तब चंदन ने ही अपने अस्पताल के बिस्तर से शेर के नाम की सिफ़ारिश की थी। चंदन की बात मानकर शेर को नौकरी पर रखना कितना सही और बेहतरीन फ़ैसला साबित हुआ था।
 
सरताज ने अपनी आँखें मूँद लीं और राहत की लंबी साँस ली।
 
उसे इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस वफ़ादार ड्राइवर को वह अपने परिवार का भगवान मान रहा था, वही शेर इस वक्त उसकी गैरमौजूदगी में, उसी की कोठी के बंद कमरे में उसकी पत्नी की मजबूरी का फायदा उठा रहा था।
 
सरताज सिंह की गाड़ियों का काफिला कोठी की तरफ बढ़ ही रहा था कि अचानक सड़क के किनारे स्थित गुरुद्वारा साहिब के ऊंचे निशान साहिब पर सरताज की नज़र पड़ी।
 
गुरुद्वारे से आती गुरबाणी की मधुर आवाज़ ने उसके बेचैन दिल को एक असीम शांति का अहसास कराया। उसने तुरंत आगे की सीट पर बैठे ड्राइवर को आदेश दिया।
 
सरताज सिंह (जल्दबाजी में): "गाड़ी रोको! ज़रा साइड में लगाओ गाड़ी..."
 
गाड़ियाँ तुरंत रुक गईं।
 
सरताज अपनी लाडली बेटी की जान बचने की खुशी में वाहेगुरु के चरणों में शीश नवाने और शुकराने की अरदास करने के लिए व्याकुल था।
 
वह गाड़ी से उतरा और तेज़ कदमों से गुरुद्वारा साहिब के भीतर दाखिल हुआ। सबसे पहले उसने काउंटर पर जाकर ज्योति के नाम की शुकराने की अरदास के लिए 501 का कड़ा प्रसाद की पर्ची कटवाई।
 
जैसे ही सेवादार ने प्रसाद का थाल उसकी तरफ बढ़ाया, सरताज के दिल में एक और ख्याल आया। उसने सोचा कि आज अगर शेर सलामत है, तो सिर्फ वाहेगुरु की मेहरबानी से।
 
उसकी जान बचाने के लिए और उसकी सेहत की सलामती के लिए भी प्रसाद चढ़ाना तो बनता है। यही सोचकर उसने अपनी जेब से जैसे ही अपना चमड़े का पर्स निकाला, उसकी उंगलियों से फिसलकर पर्स सीधे नीचे फर्श पर गिर गया।
 
सरताज ने एक पल के लिए रुककर नीचे देखा, पर्स उठाया और उसमें से 501 और निकालकर शेर की सलामती के नाम का भी दूसरा प्रसाद ले लिया। दोनों थाल हाथों में थामे, नंगे पैर, वह दरबार साहिब के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ा।
 
दरबार साहिब के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही, मर्यादा के अनुसार सरताज ने ज्योति के नाम वाले प्रसाद का थाल वहाँ खड़े सेवादार के हाथों में सौंप दिया ताकि गुरु महाराज का भोग लग सके और कृपा बरस सके।
 
सेवादार ने उस थाल को लेकर कृपाण भेंट की और गुरु महाराज के सामने रखे मुख्य बड़े प्रसाद के बर्तन में सरताज के लाए हुए प्रसाद को मिला दिया। फिर उस सांझे प्रसाद में से एक छोटा सा पवित्र हिस्सा वापस सरताज के थाल में रख दिया।
 
इस पावन विधि को 'भोग लगाना' कहा जाता है, जिससे वह प्रसाद अब गुरु की आशीष का साक्षात् रूप बन चुका था।
 
थाली वापस हाथ में लेते ही सरताज की आँखें भर आईं। उसने मन ही मन वाहेगुरु से अपनी बेटी की लंबी उम्र और शेर की सलामती की दुआ मांगी।
 
वह इस बात से पूरी तरह बेखबर था कि यहाँ गुरुद्वारे में जहाँ वह पवित्र भोग लगवा रहा था, वहीं उसकी कोठी के बंद कमरे में समय की सुइयाँ तेज़ी से घूम रही थीं और शेर उस 10 मिनट की मोहलत के हर एक सेकंड का फायदा उठाकर मीरा की अस्मत पर अपनी वहशीियत का भोग लगा रहा था।
 
ज्योति के प्रसाद की भोग प्रक्रिया पूरी होने के बाद, सरताज सिंह ने गहरी आस्था के साथ शेर की सलामती वाला दूसरा थाल सेवादार की तरफ बढ़ाया।
 
लेकिन जैसे ही सेवादार ने उस थाल को थामने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए, एक अजीब और अप्रत्याशित घटना घटी। थाल सेवादार के हाथों से अचानक फिसल गया और पलटते हुए सीधे नीचे फर्श पर जा गिरा। सारा कड़ा प्रसाद गुरुद्वारे की चौखट के पास जमीन पर बिखर गया। वह मुख्य पावन प्रसाद के साथ मिक्स होने से पहले ही जमीन की धूल में मिल चुका था।
 
वहाँ खड़े सेवादार के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। वह शर्मिंदगी से हाथ जोड़कर तुरंत माफ़ी मांगने लगा।
 
सेवादार (घबराए और कांपते स्वर में): "सच्चे पाशाह! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई, मालिक! मुझे माफ़ कर दीजिए... मेरे इतने सालों के सेवाकाल में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी श्रद्धालु का प्रसाद मेरे हाथों से छूटकर नीचे गिर जाए। न जाने आज यह कैसे हो गया... वाहेगुरु मेहर करे!"
 
सरताज सिंह वहीं का वहीं काठ मारकर खड़ा रह गया। उसके पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गई हो। सेवादार की बातों से ज़्यादा, उसके अपने भीतर उठ रहे विचारों ने उसे हिलाकर रख दिया था।
 
एक गहरी और डरावनी आशंका उसके जेहन में बिजली की तरह कौंधी। उसे लगा कि यह कोई मामूली इत्तेफाक नहीं, बल्कि साक्षात् वाहेगुरु की तरफ से मिलने वाला कोई बड़ा और अमंगल संकेत है।
 
उसने कड़ियों को जोड़ना शुरू किया—पहले जब वह शेर के नाम की पर्ची काटने चला, तो उसका पूरा पर्स हाथ से छूटकर नीचे गिर गया।
 
और अब, जब शेर के नाम का प्रसाद गुरु महाराज के भोग के लिए आगे बढ़ा, तो वह प्रसाद ही अपवित्र होकर जमीन पर बिखर गया। इसका सीधा और साफ़ मतलब था कि वाहेगुरु शेर के नाम का शुकराना और प्रसाद स्वीकार ही नहीं करना चाहते थे। जिस इंसान को वह अपने घर का फरिश्ता समझ रहा था, उसके नाम पर गुरु घर में ऐसा अपशकुन होना सरताज के दिल को दहला गया।
 
भीतर से बुरी तरह अशांत और घबराया हुआ सरताज भारी कदमों से आगे बढ़ा और गुरु ग्रंथ साहिब के पावन स्वरूप के ठीक सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथ जोड़े, माथा टेका और आँखों से बहे आँसूओं के साथ सच्चे पाशाह के चरणों में गुहार लगाने लगा।
 
सरताज सिंह (मन ही मन, रूआंसी और थरथराती आवाज़ में): "हे सच्चे पाशाह... हे वाहेगुरु... मुझसे ऐसी क्या खता हुई है कि आज आपके दर पर ये संकेत मिल रहे हैं? मेरा दिल बहुत घबरा रहा है दाता। मेरी बच्ची की जान तो बच गई, पर मेरे घर-परिवार पर आने वाली किसी भी अदृश्य बला और साए से मेरे अपनों की रक्षा करना। मेरे परिवार की लाज और सलामती अब पूरी तरह आपके हाथों में है, सच्चे पाशाह... रक्षा करना..."
 
एक तरफ़ जहाँ गुरुद्वारा साहिब में सरताज सिंह अपनी आँखें मूँदे, हाथ जोड़े, भारी मन से अपने परिवार की रक्षा के लिए वाहेगुरु के चरणों में अरदास कर रहा था... ठीक उसी पल, उसकी अपनी कोठी के भीतर शेर की हैवानियत अपने चरम पर पहुँच रही थी।
 
समय तेज़ी से बीता जा रहा था और शेर की वहशी भूख बढ़ती ही जा रही थी। उसके दोनों हाथ मीरा के बदन पर लिपटे नाइटी को पूरी तरह खींचकर उतारने का प्रयास कर रहे थे ताकि वह उसकी देह को पूरी तरह अनावृत कर सके।
 
मीरा (रोते हुए, अपनी पूरी ताकत से शेर के हाथों को हटाते हुए): "नहीं... नहीं शेर! खुदा के लिए रुक जाओ... पूरा कपड़ा मत उतारो... मेरी कसम का नाजायज फायदा मत उठाओ... उफ्फ... सरताज आते ही होंगे... छोड़ दो मुझे..."
 
शेर (कामुक उन्माद में हांफते हुए, नाइटी के घेरे को नीचे की तरफ और ज़ोर से झटकते हुए): "अब कोई फायदा नहीं मेमसाब! जब कसम खा ही ली है, तो इस शेर को पूरा मजा लेने दो... मालिक के आने से पहले मुझे सब देखना है..."
 
कमरे के भीतर वासना और बेबसी की यह जंग चल ही रही थी कि तभी अचानक... कमरे की सामने वाली दीवार पर टंगी गुरु नानक देव जी की एक भारी, कांच के फ्रेम वाली पावन तस्वीर बिना किसी छुअन के, एक जोरदार धमाके के साथ सीधे नीचे फर्श पर गिर गई।
 
कांच के टुकड़े-टुकड़े होकर पूरे कमरे में बिखर गए और उस सन्नाटे में वह आवाज़ किसी वज्रपात की तरह गूँज उठी।
 
ऐसा लगा मानो गुरु घर में सरताज की सच्ची अरदास रंग लाई हो और खुद वाहेगुरु ने उस पाप को रोकने के लिए अपनी लाठी चलाई हो। उस आवाज़ सुनते ही शेर और मीरा दोनों के होश उड़ गए। दोनों काठ मारकर एक-दूसरे से अलग हट गए, मानो उन पर बिजली गिर गई हो।
 
मीरा के भीतर का खौफ एक झटके में जाग उठा। उसने बिना एक पल गंवाए फुर्ती से अपनी नीचे सरकी हुई नाइटी और रोब को ऊपर खींचा, उसे पूरी तरह अपने बदन पर लपेटा और कसकर बांध लिया। उसका पूरा वजूद गुस्से और दैवीय डर से कांप रहा था।
 
मीरा (बिखरे हुए कांच और तस्वीर को देखकर खौफ से हांफते हुए, शेर को उंगली दिखाकर कड़क आवाज़ में): "बस शेर! बहुत हो गया! अब एक कदम भी आगे मत बढ़ाना! देख लिया न... ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती। पीछे हटो मुझसे... अभी के अभी!"
 
शेर भी उस अचानक हुए अपशकुन और धमाके से भीतर तक हिल गया था। उसकी आँखों का वहशी उन्माद पल भर के लिए गायब हो गया और वह डरकर पीछे हट गया।
 
ठीक उसी वक्त, फर्श पर कांच टूटने के उस भारी धमाके ने पास के बिस्तर पर सो रही ज्योति को पूरी तरह जगा दिया। दवा के नशे से उसकी आँखें खुलीं और वह हड़बड़ाकर बिस्तर पर उठ बैठी। उसने अपनी माँ के बिखरे हुए हुलिए और कमरे के माहौल को भांपते हुए घबराकर पूछा।
 
ज्योति (बिस्तर पर उठते हुए, डरी हुई आवाज़ में): "मम्मा... मम्मा क्या हुआ?! ये कैसा धमाका था? आप रो क्यों रही हो मम्मा? "
 
कमरे के भीतर का माहौल एक झटके में पूरी तरह बदल चुका था। फर्श पर बिखरे कांच के टुकड़े और दीवार से गिरी गुरु महाराज की पावन तस्वीर इस बात का गवाह थे कि कुदरत ने इस पाप को और आगे बढ़ने से रोक दिया था।
 
ज्योति की आवाज़ सुनते ही शेर को इस बात का अहसास हो गया कि बाज़ी अब उसके हाथ से निकल चुकी है। परिस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए उसने तुरंत पीछे हटने में ही भलाई समझी।
 
उसका जो भावनात्मक और मानसिक शिकंजा मीरा पर बना हुआ था, वह उस दैवीय अपशकुन के कारण एक पल में टूट चुका था। शेर ने चुपचाप अपने पैर पीछे खींचे और बिना कोई शब्द बोले दबे पांव कमरे के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गया।
 
ज्योति (बिस्तर से उठकर मीरा के पास आते हुए, उसका हाथ पकड़कर): "मम्मा! आप जवाब क्यों नहीं दे रही हो? आप इतना काँप क्यों रही हो मम्मा? और ये बाबा जी की तस्वीर कैसे गिर गई? "
 
मीरा (अपने आँसू पोंछने की नाकाम कोशिश करते हुए, ज्योति को गले से लगाकर अपनी आवाज़ को संभालने की कोशिश करती है): "कुछ... कुछ नहीं मेरी बच्ची। वो... शेर तो बस यह देखने आया था कि तुम ठीक से सो रही हो या नहीं। और ये... ये तस्वीर हवा के झोंके से अचानक नीचे गिर गई। तुम डरो मत, बेटा, तुम बिल्कुल ठीक हो ना? तुम्हारी तबीयत कैसी है अब?"
 
ज्योति (मीरा के सीने से सिर टिकाकर): "मैं ठीक हूँ मम्मा, बस पैर में थोड़ा दर्द है।"
 
मीरा (ज्योति के सिर को चूमकर, कमरे के मुख्य दरवाजे की तरफ मुंह करके ज़ोर से आवाज़ लगाते हुए): "राम सिंह! ओ राम सिंह! अंदर आओ ज़रा... जल्दी आओ!"
 
मालकिन की आवाज़ सुनते ही बाहर तैनात दो गार्ड्स घबराए हुए कदम बढ़ाते हुए तुरंत कमरे के भीतर दाखिल हुए। फर्श पर बिखरे हुए कांच के ढेर और दीवार से उतरी तस्वीर को देखकर दोनों असमंजस में पड़ गए।
 
राम सिंह (गार्ड, हाथ जोड़कर): "जी मेमसाब! क्या हुआ मेमसाब? ये कैसा धमाका हुआ था अंदर?"
 
मीरा ( बेहद भारी और गंभीर आवाज़ में): "वो दीवार से बाबा जी का फ्रेम अचानक नीचे गिरकर टूट गया है। तुम दोनों मिलकर इस पूरे कांच को यहाँ से साफ करो। ध्यान रहे, एक भी टुकड़ा फर्श पर छूटना नहीं चाहिए, ज्योति बिटिया के पैर में लग सकता है। जल्दी करो।"
 
गार्ड्स: "जी मेमसाब, हम अभी साफ किए देते हैं।"
 
दोनों गार्ड्स कोने से झाड़ू और कपड़ा उठाकर फर्श को साफ़ करने में जुट गए। मीरा के पैर जैसे भारी हो चुके थे।
 
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और उस मलबे के बीच से गुरु नानक देव जी की उस पावन तस्वीर को, जिसका कांच पूरी तरह चकनाचूर हो चुका था, अपने दोनों हाथों में उठा लिया।
 
तस्वीर को सीने से लगाते ही मीरा के सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। वह घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
 
गार्ड्स को लगा कि वह इस अपशकुन से डरी हुई है, लेकिन मीरा के भीतर का सच कुछ और ही था। वह रोते हुए मन ही मन वाहेगुरु के उस साक्षात् चमत्कार के आगे अपना सिर झुका रही थी।
 
मीरा (मन ही मन, तस्वीर पर हाथ फेरते हुए और फूट-फूट कर रोते हुए): "वाहेगुरु... सच्चे पाशाह... आज आपने मुझे बचा लिया। आज अगर आप अपनी लाठी न चलाते, तो यह पापी शेर मेरी ममता की बेबसी का फायदा उठाकर मुझे कहीं का नहीं छोड़ता। मैं तो अपनी बच्ची की जान के बदले अपनी मर्यादा का सौदा करने जा रही थी… मुझसे इतना बड़ा पाप होने जा रहा था, दाता! शुक्रिया... कोटि-कोटि शुक्रिया आपका कि आपने ऐन वक्त पर इस तस्वीर को गिराकर उस हैवान के इरादों को मटियामेट कर दिया और मुझे इस महापाप के दलदल में गिरने से बचा लिया। मेरी रक्षा करना सच्चे पाशाह..."
 
मीरा तस्वीर को अपने आंसुओं से भिगोते हुए बार-बार चूम रही थी।
शेर की वहशीियत का साया अब उसके जिस्म से छट चुका था, और वह अपनी बेटी ज्योति को बाहों में भींचकर उस पवित्र अहसास में खुद को सुरक्षित महसूस करने लगी थी।
 
 
 
गुरुद्वारा साहिब के भीतर अरदास करने और माथा टेकने के बाद भी सरताज सिंह के मन की बेचैनी पूरी तरह शांत नहीं हुई थी।
 
वह भारी कदमों से दरबार साहिब से बाहर आया और प्रांगण में ऊंचे आसमान को छूते पावन निशान साहिब के सामने जाकर खड़ा हो गया। दोपहर की तपती हवा उसके चेहरे को झुलसा रही थी, और केसरिया बाने में लिपटा निशान साहिब पूरी शान से लहरा रहा था।
सरताज ने दोनों हाथ जोड़े, सिर ऊपर उठाया और गहरी, सोच में डूबी आँखों से उस पवित्र प्रतीक को निहारने लगा।
 
सरताज सिंह (मन ही मन, निशान साहिब को देखते हुए): "गुरु जी... सच्चे पाशाह! मेरा दिल बहुत छोटा है और मेरी बुद्धि बहुत कम। मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि आज इस दर पर लाकर आप मुझे कोई बहुत बड़ा इशारा कर रहे हो? आप मुझे कुछ चेताना चाहते हैं, कुछ समझाना चाहते हैं, पर मैं अपनी इस अंधी आँखों से उस सच को समझ नहीं पा रहा हूँ। मुझे सद्बुद्धि दो सच्चे पाशाह... मुझे वो समझ और दृष्टि दो ताकि मैं आपके इस गहरे इशारे को पहचान सकूँ।"
 
इन्हीं गहरे और व्याकुल विचारों के साथ सरताज ने निशान साहिब को आखिरी बार प्रणाम किया और गुरुद्वारा साहिब के मुख्य द्वार से बाहर निकल आया। उसकी सुरक्षा गाड़ियाँ और ड्राइवर मुस्तैदी से उसका इंतज़ार कर रहे थे।
 
सरताज गाड़ी के पास पहुँचा, गार्ड ने अदब से दरवाज़ा खोला और वह चुपचाप अपनी आलीशान गाड़ी की पिछली सीट पर वापस बैठ गया। गाड़ी एक बार फिर कोठी की तरफ चल पड़ी, लेकिन इस बार सरताज की आँखें बाहर सड़क पर नहीं थीं; वह पूरी तरह अपने भीतर चल रहे विचारों के बवंडर में खो चुका था।
 
सीट पर पीछे की तरफ टेक लगाकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और गुरुद्वारे में घटित हर एक घटना का बारीकी से विश्लेषण करना शुरू किया। वह एक-एक कड़ी को जोड़ने लगा।
 
सरताज सिंह (आंतरिक संवाद, आँखें बंद किए गहरी सोच में): "वाहेगुरु ने ज्योति का प्रसाद स्वीकार किया, पर शेर का प्रसाद सीधे फर्श पर गिर गया... इसका साफ और सीधा मतलब यही है कि गुरु महाराज को शेर के नाम का शुकराना मंज़ूर नहीं है। लेकिन ऐसा क्यों? जो इंसान आज मेरी बेटी की जान बचाकर लहूलुहान पड़ा है, उसके नाम से भगवान क्यों रूठ गए? क्या वाहेगुरु मुझे यह बताना चाहते हैं कि शेर जो भी इस परिवार के लिए आज तक करता आया है... उसके पीछे उसका कोई नेक इरादा नहीं है? क्या उसका मकसद वो नहीं है जो सामने दिखाई दे रहा है?"
 
जैसे ही यह विचार सरताज के जेहन में आया, उसके पूरे बदन में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी आँखें झटके से खोल दीं। अंधेरे में उसकी आँखें अब किसी गहरी साज़िश की बू सूंघने लगी थीं।
 
सरताज सिंह (विचारों की गहराई में उतरते हुए): "अगर गुरु जी का इशारा यही है, तो इसका मतलब बहुत खौफनाक है। पहले कोठी में चोर का घुसना और शेर का मीरा को बचाना... फिर गाड़ी से उतरते वक्त मीरा का पैर फिसलना और शेर का उसे थामना... और आज ज्योति का वो एक्सीडेंट... क्या ये सब सिर्फ इत्तेफाक थे? या फिर... या फिर इन सारे हादसों के पीछे खुद शेर का ही हाथ था? क्या वह जानबूझकर ऐसे हालात पैदा करता है ताकि वह हमारे सामने फरिश्ता बन सके? और अगर वो ऐसा कर रहा है, तो उसका असली और छिपा हुआ लालच क्या है? पैसा... या फिर कुछ और?!"
 
गाड़ी की रफ़्तार के साथ-साथ सरताज सिंह के दिमाग की सुइयाँ भी तेज़ी से घूम रही थीं। उसकी बंद आँखों के पीछे विचारों का एक नया झंझावात उठ खड़ा हुआ था। वह कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर ही रहा था कि अचानक उसके जेहन में बिजली की तरह एक बात कौंधी।
 
Deepak Kapoor
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