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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
मैं (चरम आनंद और दर्द के भयंकर टकराव में): "आह्ह्ह... उफ़्फ़... अम्मी..."

हवस के उस पागलपन और वीर्य स्खलन के चरम झटके में मैंने अपनी मुट्ठी को इतनी बेरहमी और आक्रामकता से भींचा कि ब्रा के कप को सहारा देने वाली वह सख्त मेटल अंडरवायर अपनी जगह से खिसक गई। और अगले ही पल, उसका एक तेज़, नुकीला और कड़ा सिरा सीधे मेरी हथेली की नरम खाल में गहराई से चुभ गया।

मैं (दर्द से कराहते हुए, बेहद दबी आवाज़ में): "उफ़्फ़... आह्ह..."

हथेली से खून की एक पतली धार बहने लगती है, जो उस लाल ब्रा के कपड़े पर गिरकर उसे और गहरा लाल कर देती है। एक तरफ नीचे से रिसता हुआ मेरा गर्म वीर्य था और दूसरी तरफ हथेली में चुभा वह तीखा दर्द...

उस अचानक उठे दर्द की चुभन ने जैसे मुझ पर छाए हवस के उस घने कोहरे को पल भर में चीर दिया और मुझे वापस होश में ले आया।

मैं अब वहाँ और एक सेकंड भी नहीं रुक सकता था। मैं उस जगह पर खड़ा था जहाँ मेरी अम्मी...

मैं पलटकर तेज़ी से उस दरवाज़े की तरफ बढ़ा जिससे अम्मी भागी थीं। मैंने दरवाज़ा खोला।

सीढ़ियों में अब भी वही महक फंसी हुई थी। विशाल का कोलोन और अम्मी का परफ्यूम। वही घिनौनी महक।

मेरा पेट फिर से उबल पड़ा, लेकिन अब उगलने  के लिए कुछ बचा नहीं था। मैंने अपने मुँह पर हाथ रखा और नीचे उतरने लगा। मैं भाग रहा था।

हर कदम एक अज़ाब था।

जैसे-जैसे मैं नीचे उतर रहा था, पार्टी का शोर तेज़ होता जा रहा था। म्यूज़िक... लोगों की हंसी... चमचों की आवाज़...

मैं आखिरी सीढ़ी पर पहुँचा और घर की लॉबी में कदम रखा। रोशनी मेरी आँखों में चुभी। मैं भीड़ में वापस नहीं जा सकता था। नहीं। अभी नहीं।

मैं लॉन की तरफ नहीं देखा। मैंने अपनी नानी को नहीं ढूँढा। मैं लॉबी से होते हुए सीधे अपने कमरे की तरफ भागा। मुझे यहाँ से निकलना था।

मुझे इस झूठी, घिनौनी पार्टी से... इस औरत से... दूर जाना था। जो मेरी अम्मी बनकर मेरे वजूद की सबसे पाक इंसान थीं, आज उन्होंने एक गैर मर्द के सामने खुद को मुकम्मल तौर पर नीलाम कर दिया था।

मैं अपने कमरे में घुसा और एक झटके में दरवाज़ा बंद कर दिया। पूरा बदन अभी भी थर-थर कांप रहा था, साँसें उखड़ी हुई थीं। फिर बाथरूम में मैं घुसा।

बाथरूम में मैंने अपने आप को देखा। आईने के ठीक सामने खड़े होकर मैंने खुद को निहारा। अपने गंदे कपड़े को देखा, जहाँ अम्मी की लाल ब्रा को भींचने के बाद मेरी हथेली से निकला खून और अम्मी के उस नग्न रूप को देखकर निकला मेरा वीर्य... दोनों एक साथ मेरे बजूद की गवाही दे रहे थे।

मैंने अपने चेहरे को देखा, जहाँ से आँसू बह रहे थे, अम्मी की बेवफाई पे।

मैं (आईने में अपनी रोती हुई, सुर्ख आँखों को देखकर अंदर से चीखते हुए): "क्यों अम्मी... क्यों? अब्बू के साथ... हमारे पूरे खानदान के साथ इतनी बड़ी बेवफाई? आप तो मेरी नजरों में खुदा का रूप थीं... फिर एक मामूली से विशाल के सामने आपने अपने सारे कपड़े उतार दिए? अपनी वो हेयरलेस चूत, वो भारी सफेद मम्मे... सब कुछ उस दरिंदे के कैमरे के सामने सौंप दिया? आप इतनी बेशरम कैसे हो सकती हैं अम्मी..."

रोते-रोते अचानक मेरी नजरें आईने से नीचे की तरफ उतरीं... मेरी पैंट पर वो चिपचिपा, सफेद दाग साफ़ दिखाई दे रहा था, जो कामुकता के उस चरम पागलपन में मेरी ही मर्दानगी से फूट पड़ा था। उस दाग को देखते ही मेरी छाती पर ग्लानि और नफ़रत का एक पहाड़ टूट पड़ा।
Deepak Kapoor
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RE: अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - by Deepak.kapoor - 05-07-2026, 03:01 PM



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