05-07-2026, 02:59 PM
अध्याय -17
अम्मी विशाल की कमर पर अपनी टांगें फंसाए हवा में झूल रही हैं और दोनों पागलों की तरह एक-दूसरे के होठों को चूस रहे हैं। तभी विशाल का जो हाथ अम्मी की नंगी, चिकनी पीठ पर घूम रहा था, वह तेज़ी से ऊपर की तरफ सरकता है और सीधे उनकी सुर्ख लाल ब्रा की हुक पर जाकर टिक जाता है।
"यह…" उसने धीमी, गुस्से वाली आवाज़ में कहा। "यह अब बर्दाश्त नहीं हो रहा है।"
अम्मी के चेहरे से वह नशा... एकदम... गायब हो गया। उन्हें होश आ गया। "विशाल… नहीं… प्लीज…" उन्होंने कांपते हुए कहा। "हम छत पर हैं…"
"शशश," उसने कहा।
उसने उंगलियों से... उस कपड़े के नीचे... उस छोटी सी, मेटल की... हुक को... ढूँढ लिया।
"नहीं!" अम्मी ने अब साफ़ आवाज़ में इनकार किया।
लेकिन विशाल ने उनकी एक नहीं सुनी। उसने हुक को... एक झटके से... खींचकर निकाल दिया।
'टिक्क' की हल्की सी आवाज़ के साथ।
"विशाल!"
इससे पहले कि अम्मी और कुछ कह पातीं, विशाल अपनी उँगलियों के ब्रा की हुक को खोल देता है और उस सुर्ख लाल ब्रा को अम्मी के बदन से पूरी तरह खींचकर छत के एक कोने में फेंक देता है।
विशाल (ब्रा की हुक खोलते हुए, मन में): "उफ़्फ़... आखिरकार यह लाल पर्दा भी हट गया। अब इसके इन चूचे को सीधे अपने सीने पर महसूस करूँगा।"
ब्रा के हटते ही अम्मी के दोनों भारी, सुडौल और कसमसाते हुए चूचे पूरी तरह से नंगे हो जाते हैं।
आयशा (जैसे ही ब्रा बदन से अलग होती है, उनके मुँह से एक तीखी और मदहोश कर देने वाली कराह निकलती है): "अह्ह्ह्ह... उफ़्फ़... विशाल..."
दीवार की ओट में छुपा मैं, आँखें फाड़े अम्मी के उस नग्न रूप को देखने के लिए तड़प उठा, लेकिन इस वक्त मैं उनके उन नंगे स्तनों को नहीं देख पा रहा था। क्योंकि विशाल ने अम्मी को इतनी कसकर अपनी बांहों में भींच रखा था कि अम्मी के दोनों नंगे चूचे विशाल के उस चौड़े, साँवले और नंगे सीने पर पूरी तरह से पिसे और कुचले हुए थे।
मेरा आंतरिक विचार (पैंट के अंदर अपने कड़े लंड को पागलों की तरह सहलाते हुए): "या खुदा! अम्मी की ब्रा भी उतर गई... उनके वो गोरे और नंगे मम्मे इस वक्त विशाल के नंगे सीने की गर्मी झेल रहे हैं। मैं चाहकर भी उन्हें देख नहीं पा रहा हूँ, लेकिन इस कल्पना ने ही मेरे हाथ की रफ़्तार को मेरे लंड पर और तेज़ कर दिया है। मेरा अंग इस वक्त कामुकता के मारे फटने को तैयार है।"
विशाल अम्मी के होठों को छोड़ता है और हाँफते हुए सीधे उनके कान के पास अपने होठों को रख देता है। उसकी गर्म और हवस से भरी साँसें अम्मी के कानों को पिघला रही थीं।
विशाल (अम्मी के कान में फुसफुसाते हुए): "आह्ह्ह आयशा... ब्रा उतर चुकी है... तुम्हारे ये गरम और रसीले चूचे इस वक्त सीधे मेरे नंगे सीने को छू रहे हैं। अब ज़रा अपनी पीठ को थोड़ा सा हिलाओ… इन दोनों को मेरे सीने पर अच्छी तरह से रगड़ो … मैं तुम्हारे इन नंगे मम्मों के एक-एक उभार और इनके इन तीखे गुलाबी निपल्स को अपने सीने पर पूरी तरह फील करना चाहता हूँ... रगड़ो इन्हें मेरे ऊपर!"
आयशा (मन में वासना के चरम पर पहुँचते हुए): "मेरा बदन अब मेरा नहीं रहा... यह गैर मर्द मुझे हुक्म दे रहा है और मेरा अंग-अंग इसकी हवस को पूरा करने के लिए तड़प रहा है। मुझे ऐसा मज़ा अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं मिला..."
विशाल की इस बात को सुनते ही आयशा ने अपनी आँखें और भी कसकर बंद कर लीं। उन्होंने विशाल की गर्दन में अपनी बांहों का घेरा और कड़ा किया और हवा में झूलते हुए ही धीरे-धीरे अपने जिस्म के ऊपरी हिस्से को हिलाना शुरू कर दिया।
वह अपने दोनों नंगे, भारी और कड़े हो चुके स्तनों को विशाल के साँवले और गठीले सीने के बालों पर पूरी दीवानगी के साथ रगड़ने लगीं। रात के सन्नाटे में उनके जिस्मों के आपस में रगड़े जाने की और आयशा के मुँह से निकलने वाली 'उफ़्फ़... आह्ह... विशाल जी...' की मदहोश कर देने वाली कराहें और तेज़ हो गईं।
आयशा हवा में झूलते हुए अपने दोनों नंगे और भारी मम्मों को विशाल के नंगे सीने पर पूरी दीवानगी से रगड़ रही हैं। दोनों इस वासना के खेल में अपनी सुध-बुध खो चुके हैं। इसी बीच, विशाल अपने कूल्हों को और आगे बढ़ाता है।
विशाल (हवस से आँखें बंद किए हुए, मन में): "आह्ह्ह आयशा... अब और बर्दाश्त नहीं होता। तुम्हारी जांघें मेरे चारों तरफ हैं...।"
विशाल अपनी जींस के अंदर लोहे की तरह तने हुए अपने उस भीमकाय १० इंच के कड़े लंड को सीधे आयशा की उस छोटी लाल पैन्टी पर पूरे दबाव के साथ दबा देता है ।
आयशा की पैन्टी पहले से ही कामुक रस से पूरी तरह गीली हो चुकी थी। जैसे ही वह विशाल का कड़ा और मोटा अंग अपनी चूत पर साफ़ महसूस करती हैं, उनका पूरा वजूद कांप उठता है।
आयशा (मन में): "ओह्ह खुदा... यह कितना बड़ा है! इसका यह १० इंच का कड़ा अंग मेरी पैन्टी को फाड़कर सीधे अंदर जाने को तड़प रहा है। यह अहसास मुझे अंदर तक पिघला रहा है… मैं पूरी तरह इसकी गिरफ्त में आ चुकी हूँ..."
दोनों पूरी तरह इस वासना और जुनून के खेल में डूबे हुए थे कि तभी अचानक रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई अम्मी के फोन की रिंगटोन बज उठती है।
अम्मी ने आते ही अपना फोन टेरेस की छोटी दीवार पर रख दिया था। उस तेज़ आवाज़ ने छत के उस कामुक माहौल को एक झटके में हिलाकर रख दिया।
विशाल और आयशा रिंगटोन की तेज़ आवाज़ सुनकर भयंकर घबराहट में आ जाते हैं। अम्मी का चुंबन एक झटके में टूट जाता है और उसकी आँखें खौफ से खुल जाती हैं।
आयशा (घबराते हुए, विशाल के सीने पर अपने हाथ टिकाकर उसे पीछे ढकेलने की कोशिश करते हुए): "उफ़्फ़... विशाल! छोड़ो... प्लीज छोड़ो मुझे... देखो किसका फोन है... "
विशाल (अभी भी अम्मी की भारी गांड को भींचे हुए, चिढ़कर फुसफुसाता है): "आयशा... बजने दो ... इस वक्त बीच में मत रोको..."
आयशा (बेहद डर और हांफते हुए, हवा में पैर मारते हुए): "नहीं, पागल मत बनो! अगर घर में से किसी ने फोन किया होगा और मैंने नहीं उठाया, तो वे सीधे छत पर आ जाएंगे। हमें इस हाल में देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा… प्लीज मुझे नीचे उतारो, मुझे वह फोन उठाना ही होगा।"
विशाल हार मानकर, गुस्से और हवस में फुसफुसाते हुए अम्मी को धीरे से फर्श पर नीचे उतार देता है।
अम्मी के पैर ज़मीन पर टिकते ही वह बिना कपड़ों के, सिर्फ अपनी लाल पैन्टी में अपने नंगे मम्मों को अपनी बांहों से ढँकते हुए उस दीवार की तरफ भागती हैं जहाँ फोन बज रहा था।
फोन की उस अचानक घंटी ने मेरे भी होश उड़ा दिए। मेरा हाथ मेरे कड़े लंड पर ही थम गया। मैं घबरा गया कि कहीं घर का कोई और सदस्य तो फोन नहीं कर रहा है? अगर वे ऊपर आ गए तो क्या होगा? लेकिन मेरी आँखें अभी भी अम्मी के उस लगभग नंगे बदन पर टिकी हुई थीं, जो सिर्फ एक छोटी लाल पैन्टी में दीवार की तरफ भाग रही थीं।"
आयशा घबराती हुई दीवार के पास पहुँचती हैं और कांपते हाथों से अपना बजता हुआ फोन उठाती हैं। स्क्रीन पर 'अम्मी' यानी मेरी नानी का नाम चमक रहा था। फोन रिसीव करने के लिए उन्हें अपने दोनों हाथों को सीने से हटाना पड़ा।
आयशा (फोन कान से लगाते हुए, अपनी आवाज़ को सामान्य करने की नाकाम कोशिश करती हैं): "ह-हेलो... हाँ अम्मी... अस्सलाम वालेकुम..."
जैसे ही अम्मी ने अपने हाथों को अपने सीने से हटाया, दीवार की ओट में छुपे मेरे सामने सबसे मदहोश कर देने वाला नजारा था। जिंदगी में पहली बार मैं अपनी सगी अम्मी के दोनों बूब्स को उनके पूरे शबाब और मुकम्मल नग्नता में देख रहा था।
मेरा विचार (आँखें फाड़े, पागलों की तरह अपने कड़े लंड को भींचते हुए): "या खुदा... क्या लाजवाब चीज़ है! अम्मी के वो दोनों चूचे इतने सुडौल, इतने गोल और दूध जैसे बिल्कुल सफेद थे कि रात के मद्धम उजाले में संगमरमर की तरह चमक रहे थे। ब्रा के उतरने के बाद वे बिना किसी सहारे के पूरी तरह नंगे थे। उनके ठीक बीचों-बीच उनके वो तीखे गुलाबी टिप्स इस वक्त ठंडी हवा और उत्तेजना के मारे अंगूर के दानों की तरह पूरी तरह तन चुके थे। मेरा पूरा वजूद इस हुस्न को देखकर सुन्न पड़ गया था।"
फोन की दूसरी तरफ से नानी की आवाज़ आ रही थी।
नानी (फोन पर): "आयशा... कहाँ रह गई तुम? सब लोग तुम्हें नीचे ढूंढ रहे हैं।"
आयशा (हाँफती हुई, अपनी थमी साँसों को छुपाते हुए झूठ बोलती हैं): "वो... वो अम्मी... मैं ज़रा ऊपर छत पर आई थी... फहद से बात कर रही थी... बस... बस अभी ५ मिनट में नीचे आ रही हूँ..."
अम्मी अपनी माँ से बात करने में मसरूफ थीं, लेकिन यहाँ दीवार के पीछे छुपा मैं अपनी सुध-बुध पूरी तरह खो चुका था। मेरी भूखी आँखें अम्मी के उस मखमली बदन के एक-एक हिस्से को स्कैन कर रही थीं।
अम्मी के उन रसीले और भारी स्तनों को जी भरकर निहारने के बाद, मेरी प्यासी नज़रें और नीचे की तरफ फिसलीं। उनके उस गोरे, चिकने पेट और गहरी नाभि से होते हुए मेरी निगाहें सीधे उनकी उस सुर्ख लाल रंग की पैन्टी पर जाकर टिक गईं। वह पैन्टी इतनी छोटी और तंग थी कि वह अम्मी की उभरी हुई चूत के दोनों पाटों के बीच बुरी तरह कसमसाकर फंसी हुई थी।
उस लाल कपड़े के ठीक बीचों-बीच बना वह गहरा गीला दाग अब और साफ़ दिख रहा था। अम्मी की चूत से रिसता हुआ वह कामुक पानी उस पैन्टी को पूरी तरह सोख चुका था। अपनी अम्मी की नंगी जांघें और उनकी चूत का वह मदहोश कर देने वाला उभार देखकर मेरा हाथ मेरे कड़े लंड पर बिजली की रफ़्तार से चलने लगा था।
विशाल, जो अपनी शर्ट उतारकर पहले ही नंगा हो चुका था, अम्मी को इस तरह फोन पर बात करते और पूरी तरह से बेबस देखकर अपनी हवस पर काबू नहीं रख पाता। अम्मी का वह मुकम्मल नंगा बदन, उनके वो भारी सफेद स्तन और वह कसमसाती हुई गीली लाल पैन्टी देखकर उसकी आँखें पूरी तरह जंगली हो चुकी थीं।
वह दबे पाँव, अम्मी के ठीक पीछे पहुँच जाता है। अम्मी अभी फोन पर नानी से कह ही रही थीं, "हाँ अम्मी, बस मैं आ ही रही हूँ..." कि तभी विशाल ने पीछे से अपने दोनों मजबूत साँवले हाथ अम्मी की उन गोरी, चिकनी और नंगी जांघों पर टिका दिए।
अम्मी का पूरा बदन उस अचानक हुई छुअन से कांप उठा, लेकिन वह फोन पर होने के कारण न तो चिल्ला सकती थीं और न ही ज़ोर से विरोध कर सकती थीं।
विशाल ने इसी लाचारी का पूरा फायदा उठाया। वह धीरे से नीचे झुका और अम्मी के कूल्हों पर दबाव बनाते हुए, उसने अपने दोनों हाथों से उनकी उस छोटी लाल पैन्टी के किनारों को पकड़ा।
आयशा (आँखें खौफ और चरम उत्तेजना से मीचते हुए, मन में): "नहीं... यह इस वक्त क्या कर रहा है... मैं फोन पर हूँ... अम्मी लाइन पर हैं... अगर मेरे मुँह से चीख निकल गई तो सब बर्बाद हो जाएगा... उफ़, यह मेरी पैन्टी नीचे सरका रहा है..."
विशाल ने जब अम्मी की उस सुर्ख लाल पैन्टी को धीरे-धीरे उनके गोल नितंबों और उनकी जांघों के रास्ते नीचे सरकाना शुरू कर दिया, तो अम्मी के भीतर का डर और मजबूरी एक नए स्तर पर पहुँच गई। फोन पर नानी से झूठ बोलने के तुरंत बाद, उन्होंने अपने एक खाली हाथ से पीछे की तरफ ज़ोर लगाते हुए विशाल को खुद से दूर ढकेलने की नाकाम कोशिश की । उनका वह नाजुक हाथ विशाल के मजबूत, नंगे और साँवले सीने पर टिक कर उसे पीछे हटाने का प्रयास कर रहा था।
इस शारीरिक कशमकश और अम्मी के हिलने-डुलने के कारण, उनके दोनों पूरी तरह से नंगे स्तन हवा में बुरी तरह कसमसाने लगे। उनकी सांसों के तेज़ उतार-चढ़ाव और इस ज़बरदस्ती के प्रतिरोध के चलते उनके स्तनों में एक तीव्र हलचल साफ़ दिखाई दे रही थी, जो उनके भीतर मचे मानसिक और शारीरिक बवंडर को पूरी तरह बयां कर रही थी । उनके दोनों गुलाबी निपल्स खौफ और छुअन की इस भयंकर आग में और ज़्यादा तनकर पत्थर जैसे कड़े हो चुके थे।
लेकिन विशाल पर इस प्रतिरोध का कोई असर नहीं हुआ। वह अम्मी की इस बेबस छटपटाहट से और ज़्यादा उत्तेजित हो रहा था। उसने अम्मी के हाथ के दबाव को पूरी तरह दरकिनार करते हुए, बेहद बेरहमी और ज़िद के साथ उस तंग लाल कपड़े को लगातार नीचे की तरफ ढकेलना जारी रखा।
जैसे-जैसे वह तंग कपड़ा नीचे जा रहा था, अम्मी की चूत का वह उभरा हुआ हिस्सा और उनकी पूरी गांड रात के उस अंधेरे में पूरी तरह से नंगी हो रही थी। उस पैन्टी का गीला हिस्सा, जो अम्मी के कामुक रस से पूरी तरह भीगा हुआ था, अब सरकते हुए अम्मी के घुटनों के पास पहुँच चुका था।
विशाल अम्मी के घुटनों के पास फंसी उस लाल पैन्टी को पूरी तरह से बाहर निकालने के लिए नीचे झुकता है। अम्मी का फोन अभी भी कान से लगा है, लेकिन उनका पूरा बदन इस चरम नग्नता के अहसास से थर-थर कांप रहा है।
विशाल (अम्मी के पैरों से पैन्टी पूरी तरह खींचकर अलग करते हुए, और सीधे उनकी चूत की तरफ देखते हुए, हवस से हाँफने लगता है): "ओहहह माय गॉड... आयशा... लाजवाब! बिल्कुल साफ और चिकनी..."
विशाल की भूखी नजरें अम्मी के उस सबसे गुप्त हिस्से पर जमी हुई थीं, जो पूरी तरह से बाल-रहित और मखमली था। रात के मद्धम उजाले में अम्मी का वह कामुक उभार पूरी तरह से बेपर्दा हो चुका था, जहाँ से उत्तेजना का रस अभी भी धीरे-धीरे रिस रहा था।
आयशा (कान से फोन चिपकाए हुए, मन में भयंकर शर्म और वासना के बवंडर में डूबते हुए): "या खुदा... इसने मेरी पैन्टी भी निकाल दी... अब मैं इसके सामने बिल्कुल वैसी ही नंगी खड़ी हूँ जैसी पैदा हुई थी। इसकी नज़रें सीधे मेरी चूत पर टिकी हैं... कितनी बेशरमी से यह मुझे देख रहा है..."
अम्मी की आँखें कसकर बंद थीं । वह इस शर्मनाक और मदहोश कर देने वाले नजारे को अपनी आँखों से नहीं देखना चाहती थीं, लेकिन उनकी बंद आँखों के पीछे सिर्फ विशाल के उस १० इंच के कड़े अंग की छवि नाच रही थी। उनके कान में अभी भी उनकी अपनी अम्मी की आवाज़ गूँज रही थी, जो फोन पर कुछ कह रही थीं।
नानी (फोन पर): "अच्छा आयशा, फहद से बात हो गई हो तो जल्दी नीचे आ जाओ... सब लोग खाना खाने के लिए तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे हैं।"
आयशा (अपनी बंद आँखों के साथ, कांपते होठों से किसी तरह अपनी आवाज़ को काबू में करते हुए): "ह-हाँ अम्मी... बस... अभी आ रही हूँ... आप लोग... आप लोग शुरू कीजिए..."
अम्मी अपनी माँ की आवाज़ सुन तो रही थीं, लेकिन उनका पूरा ध्यान इस वक्त अपने पैरों के बीच महसूस होने वाली रात की ठंडी हवा और सामने खड़े उस नंगे गैर-मर्दानगी के उभार पर था।
मेरा आंतरिक विचार (दीवार के पीछे, अपने कड़े लंड को पागलों की तरह सहलाते हुए): "अम्मी की वह हेयरलेस चूत... उनका वह बिल्कुल गोरा, बेदाग और मुकम्मल नग्न रूप... इस नज़ारे ने मेरे दिमाग को पूरी तरह अपाहिज कर दिया था। मेरी सगी अम्मी इस वक्त एक गैर मर्द के सामने बिल्कुल दिगंबर खड़ी थीं, हाथ में फोन था, आँखें बंद थीं और उनके वो दोनों भारी सफेद चूचे हवा में स्वतंत्र होकर कसमसा रहे थे। मेरे हाथ की रफ़्तार मेरे लंड पर इतनी खौफनाक हो चुकी थी कि मेरा वीर्य अब किसी भी सेकंड बाहर आने के लिए कसमसा रहा था।"
विशाल पीछे से उनके बिल्कुल करीब सट गया, और उसका वह १० इंच का लंबा, कड़ा और गर्म लंड सीधे अम्मी की नंगी, रसीली और गीली गांड के बीच के हिस्से से जाकर टकराया।
विशाल (अम्मी के कान के बिल्कुल पास अपने होठ सटाकर, भयंकर कामुकता से फुसफुसाते हुए): "बात करो आयशा जी... अपनी अम्मी से बात चालू रखो... उन्हें बिल्कुल शक नहीं होना चाहिए कि इस वक्त पीछे से मेरा यह कड़ा औज़ार तुम्हारी नग्न जवानी को चीरने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है..."
अम्मी की साँसें पूरी तरह उखड़ चुकी थीं। वह फोन हाथ में पकड़े, थर-थर कांपते हुए अपनी माँ की बात का जवाब देने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन पीछे से विशाल का वह कड़क लंड का दबाव उन्हें वासना के एक ऐसे दलदल में ढकेल रहा था जहाँ से निकलना अब नामुमकिन था।
दीवार के पीछे छुपा मैं अपनी सगी अम्मी को इस तरह पूरी तरह दिगंबर, बिल्कुल नग्न हालत में उस गैर मर्द के लंड के आगे बेबस खड़े देख रहा था।
आयशा का दिमाग इस वक्त पूरी तरह से सुन्न हो चुका था। उनके बदन का एक-एक हिस्सा खौफ, शर्म और एक ऐसी चरम कामुक उत्तेजना की आग में जल रहा था जिसे उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी महसूस नहीं किया था।
फोन पर उनकी सगी माँ की आवाज़ गूँज रही थी।
आयशा (मन में भयंकर कशमकश और कांपते हुए): "हे खुदा... मैं किस गुनाह के दलदल में गिरती जा रही हूँ? फोन पर मेरी अम्मी मुझसे बात कर रही हैं, नीचे पूरा खानदान और रिश्तेदार जमा हैं... और मैं यहाँ ऊपर इस हाल में खड़ी हूँ! अगर अम्मी ने मेरी इस उखड़ी हुई साँस को भांप लिया, या मेरे मुँह से कोई सिसकारी निकल गई, तो मैं कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहूँगी। पूरी दुनिया के सामने मेरी और मेरी बच्ची की इज़्ज़त नीलाम हो जाएगी।"
लेकिन जैसे ही विशाल का वह 10 इंच का लंबा और लोहे की तरह सख्त लंड उनकी पूरी तरह से नंगी, गीली और कसमसाती हुई गांड के बीचों-बीच आकर लगा, आयशा के पूरे वजूद में वासना का एक ऐसा करंट दौड़ा कि उनकी रीढ़ की हड्डी तक कांप गई।
आयशा (अपनी आँखें कसकर बंद करते हुए, भीतर मचे तूफ़ान से जूझते हुए):
उफ़्फ़... यह अहसास कितना तड़पा देने वाला है। इसका यह विशाल का लंड सीधे मेरे बदन की गहराइयों को छू रहा है। जब यह बिना किसी कपड़े के सीधे मेरी नंगी त्वचा पर रगड़ खा रहा है, तो मेरे पैर जवाब दे रहे हैं। मेरे दोनों नंगे, भारी मम्मे इस कदर भारी और कड़े हो चुके हैं कि उनके गुलाबी निपल्स में एक अजीब सा दर्द होने लगा है।
मैं नीचे से इतनी ज़्यादा गीली हो चुकी हूँ कि मेरा अपना पानी मेरी नंगी जांघों से नीचे सरकने लगा है... मैं चाहकर भी इस मर्द को धक्का क्यों नहीं दे पा रही हूँ? क्या मैं अपनी बेटी को बचा रही हूँ, या खुद इस दरिंदे की गुलाम बनती जा रही हूँ?
विशाल ने जैसे ही उनके नितंबों को अपने बड़े-बड़े साँवले हाथों में कसकर भींचा और अपने कड़े अंग को उनकी चूत की दरार पर नीचे से ऊपर की तरफ रगड़ा, आयशा का दम घुटने लगा। उन्हें फोन पर अपनी माँ की बात का जवाब देना था, लेकिन उनके होंठ कांप रहे थे।
आयशा (खुद पर से नियंत्रण खोते हुए): "यह मुझे पूरी तरह नोच रहा है... और मुझे अपनी आवाज़ संभालनी होगी, वरना सब खत्म हो जाएगा। ओह विशाल... तुम क्या कर रहे हो…"
वह फोन को कान से और कसकर चिपका लेती हैं, अपने होठों को अपने ही दाँतों के नीचे दबाती हैं ताकि कोई भी कामुक आवाज़ बाहर न जा सके, और अंदर ही अंदर वासना और मजबूरी के उस चरम बिंदु पर पहुँच जाती हैं जहाँ बदन पूरी तरह पिघल कर आत्मसमर्पण करने को तैयार था।
तभी... सन्नाटे को चीरती हुई फोन में से एक तेज़, साफ़ आवाज़ आई।
"आययययशाआआआ!"
यह सायमा खाला के पापा की आवाज़ थी। एक पल के लिए, छत पर सब कुछ... जम गया।
अम्मी की आँखें... दहशत में फैल गईं। उन्होंने विशाल को पूरी ताक़त से... धक्का देते हुए कहा— ”हटो…।”
इस बार, विशाल, जो इस हमले के लिए तैयार नहीं था, वह... पीछे हट गया। "फक," उसने धीरे से कहा।
"शिट! शिट!" अम्मी की आवाज़ अब कांप रही थी।
"आयशा बेटी! फहद भाई का फोन खत्म हुआ कि नहीं? तुम कहाँ रह गई? अभी के अभी आओ, रस्मों में तुम्हारी ज़रूरत है!"
"मैं… मैं आ रही हूँ!" अम्मी ने काँपती हुई, घबराई आवाज़ में चिल्लाकर जवाब दिया।
उन्होंने बेहद जल्दबाज़ी और घबराहट में अपनी नीचे खिसकी हुई गीली पैन्टी को ऊपर की तरफ खींचा, लेकिन बदहवासी का आलम यह था कि उनके काँपते हुए हाथ सीधे काम ही नहीं कर रहे थे।
वह अपनी लाल ब्रा को ढूँढने लगीं, पर वह मद्धम अंधेरे में कहीं मिल ही नहीं रही थी। घबराहट और डर के मारे उनका दम फूला जा रहा था, और जिस्म का हर एक हिस्सा थर-थर कांप रहा था। जब ज़मीन पर उँगलियाँ मारने के बाद भी कुछ हाथ नहीं आया, तो वह झटके से विशाल की तरफ मुड़ीं।
आयशा (अपनी दोनों हथेलियों से अपने नंगे, भारी मम्मों को छुपाने की एक नाकाम कोशिश करते हुए, सुबकती और हाँफती आवाज़ में): "विशाल... मेरी ब्रा कहाँ रखी है? ... जल्दी दो, नीचे सब इंतज़ार कर रहे हैं!"
विशाल (गुस्से और झुंझलाहट में अपनी आवाज़ को बेहद धीमा और सरसराते हुए रखता है): "छोड़ो उस ब्रा को! अब उसका वक़्त नहीं है। बस अपना यह काला सूट पहनो और तुरंत यहाँ से नीचे जाओ!"
वह ज़मीन पर गिरा हुआ सूट झटके से उठाकर अम्मी के काँपते हाथों में थमा देता है। आयशा उस कपड़े को अपने सीने से लगाती हैं, लेकिन उनका चेहरा खौफ और शर्म के मारे और भी पीला पड़ जाता है। बिना किसी सहारे के उनके भारी मम्मे उस मखमली कपड़े के नीचे साफ़ ढलते हुए महसूस हो रहे थे।
आयशा (रोने जैसी सूरत बनाकर, बेहद बेबसी से फुसफुसाती हैं): "विशाल, ऐसे कैसे जाऊँ ब्रा के बिना? नीचे सब लोग हैं, ज़रा सा भी ध्यान गया तो अनर्थ हो जाएगा... मेरी लाज पूरी तरह से मिट्टी में मिल जाएगी!"
फिर अचानक कुछ सोचते हुए, वह जल्दी-जल्दी सूट के बटन बंद करने लगती हैं और अपनी भीगी आँखों से विशाल की तरफ देखती हैं।
विशाल फर्श पर गिरे दुपट्टे को उठाता है और अम्मी की तरफ बढ़ाते हुए सुझाव देता है, "एक काम कीजिये आयशा जी... इस सूट का दुपट्टा आगे की तरफ अच्छी तरह से लपेट लीजिये। इसे पूरे सीने पर फैला लेंगी तो नीचे किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा।"
उन्होंने अपने होठों को... अपनी आस्तीन से... बे-दर्दी से जल्दी-जल्दी रगड़ा।
"मैं जा रहा हूँ," विशाल ने तेज़ी से कहा। "पीछे से।" वह पानी की टंकियों के पीछे, उस तरफ भागा जहाँ से वह आया था… और सायों में गायब हो गया।
वह तेज़ी से छत के दरवाज़े की तरफ लपकीं। उसी दरवाज़े की तरफ, जहाँ मैं छुपा हुआ था।
मेरे पास हिलने का वक्त नहीं था। दरवाज़ा एक झटके से पूरा खुला। मैं अंधेरे में, दीवार से बिल्कुल चिपक गया।
लकीली, अम्मी ने मुझे नहीं देखा। उनकी आँखें दहशत में फैली हुई थीं। वह हांफ रही थी। उनके होंठ... सूजे हुए और रंगीन थे। और उनके जिस्म से... विशाल के महंगे कोलोन... और उनके अपने परफ्यूम की... मिली-जुली... एक घिनौनी, जिस्मानी महक... आ रही थी।
वह मेरे सामने से... मेरे जिस्म से बस एक इंच के फासले से... गुज़रती हुई सीढ़ियों में उतर गईं।
मैं वहीं खड़ा रह गया। उस अनजान मर्द के जिस्म की महक... अब मेरी अम्मी की महक थी।
छत पर अब मैं बिल्कुल अकेला खड़ा था। रात का सन्नाटा और भी गहरा हो गया था, और मेरी तेज़ चलती साँसों की आवाज़ उस खामोशी में साफ़ सुनाई दे रही थी।
तभी मेरी नज़र ज़मीन के एक कोने पर पड़ी। उस अंधेरे फर्श पर, दूर स्ट्रीट लाइट की एक बेहद पतली और हल्की सी पीली रोशनी छनकर आ रही थी, और उसी मद्धम उजाले में... एक छोटी सी, सुर्ख लाल चीज़ किसी अंगारे की तरह चमक रही थी।
वह अम्मी की वही लाल ब्रा थी, जिसे वह बदहवासी में पूरे फर्श पर ढूँढ रही थीं।
मेरा हाथ कांप रहा था। झुक गया और उसे उठा लिया। मेरी उंगलियों को ऐसा लगा जैसे मैंने एक जलते हुए कोयले को छू लिया हो।
यह वही लाल ब्रा थी, जिसे सुबह उन्होंने अपने भारी और रसीले मम्मों के नीचे बदन पर कसा था। उनकी पाकीज़गी और इज़्ज़त के ऊपर लगे एक सख्त ताले की तरह... जो बरसों से किसी के लिए भी अभेद्य था।
आज की इस सर्द रात में, उस ताले को किसी गैर मर्द ने ऐसे खोल दिया था कि वह हमेशा के लिए बिखर गया।
सब झूठ था।
मेरा आंतरिक विचार (पागलों की तरह हाँफते हुए, बदन में उठती चरम उत्तेजना के साथ): "उफ़्फ़... यह लाल ब्रा... इसमें अभी भी अम्मी के उन भारी और गोरे मम्मों की गर्माहट और उनके बदन की रसीली खुशबू बसी हुई है। मैंने उस लाल ब्रा को कसकर अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया, जैसे मैं अब भी अम्मी के उस भारी और गर्म मम्मे को अपनी गिरफ्त में ही भींच रहा हूँ..."
तभी अचानक, मेरी आँखों के सामने अम्मी का वह बिल्कुल नंगा रूप, उनकी वह हेयरलेस चूत घूम जाता है। कामुकता की वह आग मेरी रीढ़ की हड्डी से होते हुए मेरे पूरे वजूद को हिला देती है।
वासना के उस आख़िरी शिखर पर पहुँचते ही मेरा पूरा जिस्म थर-थर कांपने लगता है, आँखें मुँद जाती हैं और मेरी पैंट के अंदर, उस लोहे जैसे कड़े अंग से वीर्य का एक गर्म और तेज़ फव्वारा छूट पड़ता है। नीचे लंड में से कुछ निकलना चालू हो गया... गर्म बूंदें कपड़ों को भिगोने लगती हैं।
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
Author on amazon
- An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)