03-07-2026, 10:16 PM
मीरा इस कदर सदमे में थी कि उसके हलक से एक लफ्ज़ भी नहीं फूट रहा था। उसकी इसी बेबसी का फायदा उठाते हुए शेर ने एक कुटिल मुस्कान के साथ उसके काँपते हुए हाथ से फोन छीन लिया। उसने फोन को अपने कान पर लगाया और अपनी आवाज़ को बेहद सामान्य बनाते हुए सीधे सरताज से बात करने लगा।
शेर (फोन पर, अपनी आवाज़ में बनावटी अदब लाते हुए): "हेलो... हाँ, मालिक! प्रणाम। मैं शेर बोल रहा हूँ जी..."
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'लो मेमसाब, तुम्हारी बोलती तो बंद हो गई, अब इस शेर को ही बाज़ी संभालनी पड़ेगी। मालिक को ज़रा भी शक नहीं होना चाहिए कि उनकी खूबसूरत बीवी इस वक्त मेरे सामने अपने दोनों मुम्मे खोले खड़ी है। अब देखो मैं कैसे मालिक को अपनी उँगलियों पर नचाता हूँ।'
सरताज सिंह (फोन पर, शेर की आवाज़ सुनते ही राहत की साँस लेते हुए, बेहद भावुक होकर): "अरे शेर! तुम कैसे हो भाई? गार्ड मुझे बता रहा था कि तुम्हें बहुत गहरी चोटें आई हैं। मैं... मैं तुम्हारा यह अहसान ज़िंदगी भर नहीं भूल सकता। तुमने मेरी बच्ची के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी, तुमने मेरे पूरे परिवार को बिखरने से बचा लिया!"
सरताज फोन पर अपनी कृतज्ञता और अहसानमंदी जता रहा था।
उसने फोन कान से सटाए रखा और अपना दूसरा हाथ सीधे मीरा के नंगे, सुडौल मुम्मे पर जमा दिया। उसने अपनी उँगलियों को उस गोरे उभार पर इस तरह जकड़ लिया, मानो वह कोई चीज़ नहीं, बल्कि उसकी अपनी जागीर हो, जिस पर अब सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार था।
शेर (मीरा के सीने को अपनी उँगलियों से भींचते हुए, फोन पर बेहद विनम्र और वफादार आवाज़ में): "अरे नहीं, नहीं मालिक... ऐसा मत कहिए। मैं तो आपका छोटा सा सेवादार हूँ, आपका नमक खाया है मैंने। मेरी तो जान भी चली जाए आपकी फैमिली की रक्षा करते हुए, तो भी मुझे कोई मलाल नहीं होगा। बिटिया रानी सलामत हैं, मेरे लिए इससे बढ़कर और कुछ नहीं है।"
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'हाँ मालिक, हाँ! रोओ और भावुक होओ... अपने इस वफादार कुत्ते पर जितना चाहे भरोसा करना है कर लो। तुम्हें क्या पता कि तुम्हारा यह वफादार नौकर इस वक्त तुम्हारी बीवी के मखमली बदन को अपनी मुट्ठी में भींच रहा है। यह गोरा मुम्मा अब मेरा गुलाम है, और तुम्हारी बीवी भी!'
शेर की उँगलियों का तीखा दबाव जैसे ही मीरा के संवेदनशील अंग पर और बढ़ा, मीरा के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया। वह दर्द और लज्जा के मारे तड़प उठी, लेकिन उसे अपने मुँह पर हाथ रखना पड़ा ताकि उसकी कोई सिसकी फोन के ज़रिए सरताज तक न पहुँच जाए।
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'हे भगवान, यह कैसा राक्षस है! एक तरफ सरताज को अपनी वफादारी का नाटक दिखा रहा है और दूसरी तरफ मुझे नोच रहा है। इसके हाथ का दबाव मेरे सीने को चीर रहा है... और सरताज इसे देवता समझ रहे हैं! मैं इस जीते-जी नरक को कैसे बर्दाश्त करूँ...।'
सरताज सिंह (फोन पर, थोड़ा हैरान होते हुए): "अच्छा शेर, मीरा कहाँ है? वो अचानक फोन पर चुप क्यों हो गई थी? उसे फोन दो, ज़रा मैं उससे भी बात करूँ।"
सरताज की बात सुनकर शेर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान तैर गई। उसने मीरा के सुडौल मुम्मे को अपनी मजबूत उँगलियों में और भी कसकर दबोच लिया, जैसे वह अपनी मालकिन को याद दिला रहा हो कि इस वक्त उसकी असली हैसियत क्या है।
शेर (फोन पर, अपनी आवाज़ में एक अजीब सी चालाकी और भारीपन लाते हुए): "अरे मालिक... वो मेमसाब तो ज़रा बाहर गई हैं। असल में क्या है ना मालिक, मुझे बहुत ज़ोर से दूध पीने की तलब हो रही थी... तो मैंने मालकिन को कहा है कि मेरे लिए गरम-गरम दूध लाने के लिए। बस वही लेने गई हैं वो..."
यह दोहरे अर्थ वाली गंदी बात कहते ही शेर ने फोन को थोड़ा परे हटाया और अपना मुँह आगे बढ़ाकर मीरा के दूसरे नंगे स्तन को सीधे अपने होंठों के बीच भींच लिया। उसने मीरा के संवेदनशील लाल निप्पल को अपनी जीभ से लपेटते हुए किसी भूखे बच्चे की तरह पूरी ताकत से चूसना शुरू कर दिया।
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'अहा... क्या ज़ायका है मेमसाब! मालिक को क्या पता कि मैं किस दूध की बात कर रहा हूँ। तुम्हारा यह गरम और मीठा बदन ही तो मेरी असली खुराक है। अब तड़पो मालिक के सामने... वो वहाँ तड़प रहे हैं बात करने को, और यहाँ तुम मेरे मुँह में अपनी जवानी का रस उड़ेल रही हो।'
जैसे ही शेर के होंठों का वह ज़ोरदार खिंचाव मीरा के सीने पर पड़ा, उसके पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
सरताज फोन पर "हेलो, हेलो..." किए जा रहे थे, और यहाँ मीरा दर्द, शर्म और एक अजीब सी मादक उत्तेजना के सैलाब में डूब रही थी। उसने खौफ के मारे अपनी आँखें मीच लीं और अपने मुँह को अपने ही गाउन के कपड़े से दबा लिया ताकि उसकी मदहोश कर देने वाली आह फोन में रिकॉर्ड न हो जाए।
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'नहीं... आह! यह जंगली तो सच में मुझे चूस डालेगा। सरताज फोन पर हैं और यह हैवान सरेआम मेरे मुँह पर ऐसी बातें बोलकर मेरा दूध पी रहा है... उफ्फ, इसके होंठों की यह गर्मी... यह खिंचाव... मैं कैसे खुद को संभालूँ? अगर सरताज ने मेरी इस घबराहट को भाँप लिया, तो सब बर्बाद हो जाएगा... आह!'
ठीक उसी पल, फोन के दूसरे छोर से सरताज सिंह की भारी और तसल्ली भरी आवाज़ गूँजी।
सरताज सिंह (फोन पर, गाड़ी चलाने की आवाज़ के बीच): "चलो, वाहेगुरु का शुक्र है। मीरा वहाँ सब संभाल रही है। शेर, मीरा को कहना कि मैं बस रास्ते में ही हूँ... गाड़ी में बैठ चुका हूँ। अगले 10 मिनट में मैं घर पहुँच जाऊँगा।"
‘10 मिनट में घर आ रहा हूँ'—सरताज के इन शब्दों को सुनते ही शेर के चेहरे पर गुस्से और झुंझलाहट की एक लकीर दौड़ गई। उसे अपनी इस कामुक दावत में खलल पड़ता हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था। उसने मन ही मन अपने मालिक सरताज को एक बेहद गंदी और भद्दी गाली दी—
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'साला कुत्ता कहीं का, इसकी माँ की... ऐन मौके पर रंग में भंग डालने आ रहा है! अभी तो मालकिन के इस गोरे बदन का स्वाद जीभ पर चढ़ा ही था कि इस को अभी टपकना था। साले को 10 मिनट में ही यहाँ आना है!'
अपनी इस भयंकर झुंझलाहट और गुस्से को दबाते हुए, शेर ने तुरंत अपनी आवाज़ को एकदम सामान्य और वफादार नौकर जैसा बनाया।
शेर (फोन पर, बेहद सामान्य और अदब से भरी टोन में): "जी साहिब, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मीरा मैडम मेरा बहुत अच्छे तरीके से ख्याल रख रही हैं, कोई कमी नहीं होने दे रही हैं। मैं आपकी बात उन तक पहुँचा दूँगा, आप आराम से आइए मालिक।"
सरताज ने बिना कुछ और कहे फोन काट दिया। लाइन कटने की 'बीप-बीप' आवाज़ कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। अब कमरे में सिर्फ 10 मिनट की टिक-टिक बची थी।
शेर (फोन पर, अपनी आवाज़ में बनावटी अदब लाते हुए): "हेलो... हाँ, मालिक! प्रणाम। मैं शेर बोल रहा हूँ जी..."
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'लो मेमसाब, तुम्हारी बोलती तो बंद हो गई, अब इस शेर को ही बाज़ी संभालनी पड़ेगी। मालिक को ज़रा भी शक नहीं होना चाहिए कि उनकी खूबसूरत बीवी इस वक्त मेरे सामने अपने दोनों मुम्मे खोले खड़ी है। अब देखो मैं कैसे मालिक को अपनी उँगलियों पर नचाता हूँ।'
सरताज सिंह (फोन पर, शेर की आवाज़ सुनते ही राहत की साँस लेते हुए, बेहद भावुक होकर): "अरे शेर! तुम कैसे हो भाई? गार्ड मुझे बता रहा था कि तुम्हें बहुत गहरी चोटें आई हैं। मैं... मैं तुम्हारा यह अहसान ज़िंदगी भर नहीं भूल सकता। तुमने मेरी बच्ची के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी, तुमने मेरे पूरे परिवार को बिखरने से बचा लिया!"
सरताज फोन पर अपनी कृतज्ञता और अहसानमंदी जता रहा था।
उसने फोन कान से सटाए रखा और अपना दूसरा हाथ सीधे मीरा के नंगे, सुडौल मुम्मे पर जमा दिया। उसने अपनी उँगलियों को उस गोरे उभार पर इस तरह जकड़ लिया, मानो वह कोई चीज़ नहीं, बल्कि उसकी अपनी जागीर हो, जिस पर अब सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार था।
शेर (मीरा के सीने को अपनी उँगलियों से भींचते हुए, फोन पर बेहद विनम्र और वफादार आवाज़ में): "अरे नहीं, नहीं मालिक... ऐसा मत कहिए। मैं तो आपका छोटा सा सेवादार हूँ, आपका नमक खाया है मैंने। मेरी तो जान भी चली जाए आपकी फैमिली की रक्षा करते हुए, तो भी मुझे कोई मलाल नहीं होगा। बिटिया रानी सलामत हैं, मेरे लिए इससे बढ़कर और कुछ नहीं है।"
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'हाँ मालिक, हाँ! रोओ और भावुक होओ... अपने इस वफादार कुत्ते पर जितना चाहे भरोसा करना है कर लो। तुम्हें क्या पता कि तुम्हारा यह वफादार नौकर इस वक्त तुम्हारी बीवी के मखमली बदन को अपनी मुट्ठी में भींच रहा है। यह गोरा मुम्मा अब मेरा गुलाम है, और तुम्हारी बीवी भी!'
शेर की उँगलियों का तीखा दबाव जैसे ही मीरा के संवेदनशील अंग पर और बढ़ा, मीरा के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया। वह दर्द और लज्जा के मारे तड़प उठी, लेकिन उसे अपने मुँह पर हाथ रखना पड़ा ताकि उसकी कोई सिसकी फोन के ज़रिए सरताज तक न पहुँच जाए।
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'हे भगवान, यह कैसा राक्षस है! एक तरफ सरताज को अपनी वफादारी का नाटक दिखा रहा है और दूसरी तरफ मुझे नोच रहा है। इसके हाथ का दबाव मेरे सीने को चीर रहा है... और सरताज इसे देवता समझ रहे हैं! मैं इस जीते-जी नरक को कैसे बर्दाश्त करूँ...।'
सरताज सिंह (फोन पर, थोड़ा हैरान होते हुए): "अच्छा शेर, मीरा कहाँ है? वो अचानक फोन पर चुप क्यों हो गई थी? उसे फोन दो, ज़रा मैं उससे भी बात करूँ।"
सरताज की बात सुनकर शेर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान तैर गई। उसने मीरा के सुडौल मुम्मे को अपनी मजबूत उँगलियों में और भी कसकर दबोच लिया, जैसे वह अपनी मालकिन को याद दिला रहा हो कि इस वक्त उसकी असली हैसियत क्या है।
शेर (फोन पर, अपनी आवाज़ में एक अजीब सी चालाकी और भारीपन लाते हुए): "अरे मालिक... वो मेमसाब तो ज़रा बाहर गई हैं। असल में क्या है ना मालिक, मुझे बहुत ज़ोर से दूध पीने की तलब हो रही थी... तो मैंने मालकिन को कहा है कि मेरे लिए गरम-गरम दूध लाने के लिए। बस वही लेने गई हैं वो..."
यह दोहरे अर्थ वाली गंदी बात कहते ही शेर ने फोन को थोड़ा परे हटाया और अपना मुँह आगे बढ़ाकर मीरा के दूसरे नंगे स्तन को सीधे अपने होंठों के बीच भींच लिया। उसने मीरा के संवेदनशील लाल निप्पल को अपनी जीभ से लपेटते हुए किसी भूखे बच्चे की तरह पूरी ताकत से चूसना शुरू कर दिया।
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'अहा... क्या ज़ायका है मेमसाब! मालिक को क्या पता कि मैं किस दूध की बात कर रहा हूँ। तुम्हारा यह गरम और मीठा बदन ही तो मेरी असली खुराक है। अब तड़पो मालिक के सामने... वो वहाँ तड़प रहे हैं बात करने को, और यहाँ तुम मेरे मुँह में अपनी जवानी का रस उड़ेल रही हो।'
जैसे ही शेर के होंठों का वह ज़ोरदार खिंचाव मीरा के सीने पर पड़ा, उसके पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
सरताज फोन पर "हेलो, हेलो..." किए जा रहे थे, और यहाँ मीरा दर्द, शर्म और एक अजीब सी मादक उत्तेजना के सैलाब में डूब रही थी। उसने खौफ के मारे अपनी आँखें मीच लीं और अपने मुँह को अपने ही गाउन के कपड़े से दबा लिया ताकि उसकी मदहोश कर देने वाली आह फोन में रिकॉर्ड न हो जाए।
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'नहीं... आह! यह जंगली तो सच में मुझे चूस डालेगा। सरताज फोन पर हैं और यह हैवान सरेआम मेरे मुँह पर ऐसी बातें बोलकर मेरा दूध पी रहा है... उफ्फ, इसके होंठों की यह गर्मी... यह खिंचाव... मैं कैसे खुद को संभालूँ? अगर सरताज ने मेरी इस घबराहट को भाँप लिया, तो सब बर्बाद हो जाएगा... आह!'
ठीक उसी पल, फोन के दूसरे छोर से सरताज सिंह की भारी और तसल्ली भरी आवाज़ गूँजी।
सरताज सिंह (फोन पर, गाड़ी चलाने की आवाज़ के बीच): "चलो, वाहेगुरु का शुक्र है। मीरा वहाँ सब संभाल रही है। शेर, मीरा को कहना कि मैं बस रास्ते में ही हूँ... गाड़ी में बैठ चुका हूँ। अगले 10 मिनट में मैं घर पहुँच जाऊँगा।"
‘10 मिनट में घर आ रहा हूँ'—सरताज के इन शब्दों को सुनते ही शेर के चेहरे पर गुस्से और झुंझलाहट की एक लकीर दौड़ गई। उसे अपनी इस कामुक दावत में खलल पड़ता हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था। उसने मन ही मन अपने मालिक सरताज को एक बेहद गंदी और भद्दी गाली दी—
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'साला कुत्ता कहीं का, इसकी माँ की... ऐन मौके पर रंग में भंग डालने आ रहा है! अभी तो मालकिन के इस गोरे बदन का स्वाद जीभ पर चढ़ा ही था कि इस को अभी टपकना था। साले को 10 मिनट में ही यहाँ आना है!'
अपनी इस भयंकर झुंझलाहट और गुस्से को दबाते हुए, शेर ने तुरंत अपनी आवाज़ को एकदम सामान्य और वफादार नौकर जैसा बनाया।
शेर (फोन पर, बेहद सामान्य और अदब से भरी टोन में): "जी साहिब, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मीरा मैडम मेरा बहुत अच्छे तरीके से ख्याल रख रही हैं, कोई कमी नहीं होने दे रही हैं। मैं आपकी बात उन तक पहुँचा दूँगा, आप आराम से आइए मालिक।"
सरताज ने बिना कुछ और कहे फोन काट दिया। लाइन कटने की 'बीप-बीप' आवाज़ कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। अब कमरे में सिर्फ 10 मिनट की टिक-टिक बची थी।
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