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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
खौफ और साजिश—2

 
गार्ड (फोन पर, घबराई और हाँपती हुई आवाज़ में): "हल्लो... हल्लो, मालिक! बहुत बड़ा गजब हो गया मालिक! अपनी ज्योति बिटिया का... वो... कार से एक्सीडेंट होते-होते बचा है मालिक!"
 
सरताज सिंह (घबराकर, कुर्सी से उठते हुए): "क्या?! ज्योति का एक्सीडेंट?! ये तू क्या बक रहा है राम सिंह? मेरी बच्ची ठीक तो है न? कहाँ है वो?!"
 
गार्ड: "मालिक, आप शांत हो जाइए, अब बिटिया बिल्कुल ठीक है। ज्योति बिटिया तो वहाँ कॉलेज बस का इंतजार कर रही थीं और मीरा मैडम भी उनपे पूरी नजर रखी हुई थीं, पर बिटिया खेलते-खेलते न जाने कब सड़क के बिल्कुल पास चली गईं। "
 
गार्ड: " वो तो कहिए, ऐन मौके पर शेर वहाँ पहुँच गया। जैसे ही उसने देखा कि एक तेज रफ़्तार गाड़ी बिटिया की तरफ बढ़ रही है, उसने अपनी जान की परवाह किए बिना सीधे गाड़ी के आगे छलांग लगा दी और बिटिया को खींचकर एक तरफ कर लिया।"
 
सरताज सिंह (गहरी साँस लेते हुए): "वाहेगुरु! शुक्रिया तेरा... शेर ने बचा लिया मेरी बच्ची को? लेकिन शेर... वो ठीक है?"
 
गार्ड: "मालिक, बिटिया को तो छोटी-मोटी खरोंच आई है, लेकिन ऐन मौके पर कूदने की वजह से शेर को काफी चोटें लगी हैं। वो लहूलुहान हो गया था। इस समय बंगले पर मीरा मैडम खुद शेर और ज्योति बिटिया दोनों की देखभाल कर रही हैं। अब दोनों खतरे से बाहर हैं और ठीक हैं, मालिक।"
 
सरताज सिंह (आँखों में आँसू और आवाज़ में भारीपन के साथ): "शेर ने आज जो किया है, उसके बाद मैं ज़िंदगी भर उसका कर्जदार हो चुका हूँ। मैं ज़िंदगी भर उसका यह अहसान नहीं भूलूँगा। मैं अभी निकल रहा हूँ, तुम लोग वहीं रहो और ध्यान रखो!"
 
सरताज सिंह ने तुरंत अपनी जेब से मोबाइल निकाला और कांपती हुई उंगलियों से मीरा का नंबर डायल किया। उसने फोन को कान के पास रखा और गहरी, बेचैन साँसें लेते हुए इंतज़ार करने लगा। दूसरी तरफ़ से मीरा के फोन की घंटी बजने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी—ट्रिंग... ट्रिंग...
 
कमरे के सन्नाटे में वह हर एक घंटी के साथ और ज़्यादा अधीर हो रहा था, बस इसी उम्मीद में कि मीरा जल्द से जल्द फोन उठाए और वह खुद अपनी पत्नी की ज़ुबानी अपनी लाडली ज्योति और शेर की सलामती की खबर सुन सके।
 
 
उधर कमरे के भीतर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
 
मीरा के दोनों सुडौल स्तन अब पूरी तरह शेर के अधिकार में आ चुके थे। शेर की उंगलियाँ और हथेलियाँ कभी उन गोरे उभारों को इतनी नर्मी से छूतीं मानो उनके मखमली अहसास को अपनी रूह में उतार रही हों, तो कभी उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगतीं।
 
कभी उसकी उँगलियों की चुटकी मीरा के संवेदनशील निप्पलों को बेरहमी से छेड़कर उन्हें और सख्त कर देती, जिससे मीरा के बदन में सिहरन दौड़ जाती।
 
मीरा इस अप्रत्याशित और तीव्र अहसास से इस कदर सुध-बुध खो चुकी थी कि चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रही थी, और उसके हलक से अनजाने में ही सिसकियाँ फूट रही थीं।
 
मीरा (आँखें मूँदे, दर्द और एक अनजाने सुख के मिले-जुले अहसास में सिसकते हुए): "अह्ह्... श-शेर... ये... ये तुम क्या कर रहे हो... उफ्फ... रुको..."
 
शेर (गहरी और भारी साँसें लेते हुए, अपनी उंगलियों का दबाव और बढ़ाते हुए): "मैडम जी... बस थोड़ी देर... आपका यह रूप देखकर मुझसे अब ज़ब्त नहीं होता... आपके मुम्मे क्या नरम हैं मालिकिन... दिल ही नहीं करता छोड़ने का।"
शेर की ऐसी गंदी और बेबाक बातें सुनकर मीरा शर्म से पानी-पानी हो गई, उसका पूरा चेहरा और बदन लज्जा की लाली से तमतमा उठा।
 
मीरा (कमज़ोरी से उसके मजबूत कंधों पर हाथ टिकाते हुए, मुँह से निकलती आहों के बीच): "नहीं... उइइ... माँ... ज़ोर से मत दबाओ... अह्ह्..."
 
उसने अपने दोनों हाथों से मीरा के उभरे हुए अंगों को जकड़े रखा और अपने होंठों को तेज़ी से ऊपर उठाकर सीधे मीरा के बाएं स्तन पर टिका दिया।
 
मीरा (जैसे ही शेर के होंठों का गर्म स्पर्श महसूस हुआ, अपनी आँखें भींचते हुए): "आह्ह... उम्म्म्..."
 
उसके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल गई और उस तीखे, मादक स्पर्श के अहसास से उसका पूरा बदन एक झटके में अकड़ गया।
 
उसका दूसरा हाथ अभी भी मीरा के दूसरे स्तन को पूरी तरह अपनी मुट्ठी में मसल रहा था। पूरे दो मिनट तक शेर मीरा के उस नाज़ुक अंग को अपने मुँह में चूसता रहा
 
उसकी जीभ और होंठों की उस गीली छुअन से मीरा का पूरा बदन काठ की तरह कांप रहा था। डर और इस असहनीय कामुक हमले के बीच मीरा के हलक से सिर्फ दबी-कुचली सिसकियाँ निकल पा रही थीं।
 
दो मिनट के उस क्रूर उन्माद के बाद, शेर ने आखिरकार उसके स्तन को अपने मुँह से आज़ाद किया। मीरा का वह गोरा उभार अब शेर की थूक और लार से पूरी तरह लथपथ होकर चमक रहा था, और उस पर शेर के दाँतों के गहरे लाल निशान छप चुके थे। शेर ने हाँफते हुए अपनी लाल आँखें मीरा के आंसुओं से भीगे चेहरे पर टिकाईं।
 
शेर (होंठों पर जमी लार को जीभ से चाटते हुए, भारी आवाज़ में): "आह्ह... मेमसाब! जिस दिन मैं इस बंगले के अंदर दाखिल हुआ था और पहली बार तुम्हारी इस जवानी को देखा था... उसी दिन से मेरे दिल में यह आग लगी थी। मैं हर रात जागकर सिर्फ यही सोचता था कि कब मुझे मौका मिले और कब मैं तुम्हारे इन मखमली मुम्मों को अपने मुँह में लेकर इनका सारा रस चूसूँ। आज मेरी वो मुराद पूरी हो गई..."
 
मीरा (खौफ और बेबसी से रोते हुए, कांपती आवाज़ में): "शेर... प्लीज... छोड़ दो मुझे... मत करो ऐसा... तुम तो मुझे अपनी देवी कह रहे थे ना? फिर क्यों मेरी आबरू के पीछे पड़े हो... आह्ह... मत दबाओ इतनी ज़ोर से..."
 
शेर (मीरा के गीले गाल को थपथपाते हुए): "देवी तो तुम हो ही मेमसाब। और तुम मना क्यों कर रही हो? भूल गईं क्या, अभी कुछ देर पहले ही क्या हुआ था? अगर आज मैं अपनी जान दांव पर न लगाता, तो तुम्हारी लाडली ज्योति उस गाड़ी के नीचे कुचल कर मर चुकी होती!"
 
मीरा (सिसकते हुए, अपनी आँखें बंद किए): "मैं... मैं जानती हूँ शेर... तुमने मेरी बच्ची की जान बचाई है... हम तुम्हारे इस अहसान को कभी नहीं भूलेंगे... पर इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम..."
 
शेर (मीरा के दूसरे स्तन को अपनी मुट्ठी में सहलाते हुए, फुसफुसाकर): "मतलब कैसे नहीं है मेमसाब? मैंने आपकी बेटी के लिए आज जान की बाज़ी लगाई है। अगर आज तुम्हारी कोख उजड़ जाती तो आप रोने लायक भी नहीं बचतीं। उसके बदले में माँग ही क्या रहा हूँ, बस कुछ मिनट आपको छू लूँ। आप ही ने तो कहा था, मैं तुम्हारी कर्ज़दार हो गई हूँ।"
 
मीरा (अंदर ही अंदर छटपटाते हुए, समझ नहीं पा रही थी कि इस जाल से कैसे निकले): "हे भगवान, मैं क्या करूँ... कहाँ फँस गई मैं? मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे इस आदमी के चंगुल से खुद को आज़ाद करूँ..."
 
मीरा (दर्द से कराहते हुए, उसकी छुअन से बदन में उठती सिहरन को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए): "उइइ... माँ... मत करो... शेर, दर्द हो रहा है... उफ्फ... सरताज आते ही होंगे..."
 
शेर (मीरा के गले पर अपनी गरम साँसें छोड़ते हुए): "मालिक को आने में अभी वक्त है मेमसाब। और जब वो आएंगे, तो अपनी बेटी की जान बचाने वाले इस शेर के पैरों में गिरकर रोएंगे। वो तो मुझे इस वक्त अपना भगवान मान रहे हैं।"
 
मीरा खौफ के मारे अपनी आँखें बंद किए सिर्फ रो रही थी। उसका पूरा वक्षस्थल शेर की लार से गीला हो चुका था और वह भीतर से पूरी तरह टूट चुकी थी।
 
एक तरफ अपनी बेटी की जान बचने का अहसान था, और दूसरी तरफ उसके अपने ही घर में, उसका एक नौकर उसकी आबरू को इस तरह तार-तार कर रहा था, जिससे वह चाहकर भी खुद को छुड़ा नहीं पा रही थी।
 
उसी पल कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई मीरा के मोबाइल की रिंगटोन गूंज उठी। स्क्रीन पर बड़े-बड़े अक्षरों में सरताज नाम चमक रहा था और फोन पास ही की मेज पर पड़ा लगातार थरथरा रहा था।
 
पति का नाम देखते ही मीरा के भीतर जैसे खौफ और उम्मीद की एक मिली-जुली लहर दौड़ गई। वह शेर के चंगुल से खुद को छुड़ाने और फोन उठाने के लिए पीछे हटने लगी।
 
मीरा (घबराकर, हाँफती हुई आवाज़ में): "शेर... हटो... स-सरताज का फोन है...  फोन उठाने दो... वरना वो शक करेंगे... प्लीज छोड़ो मुझे..."
 
शेर (एक हंसी हंसते हुए, मीरा की कमर में अपनी मजबूत बांहें डालकर उसे वापस अपनी तरफ खींचते हुए): "कहाँ जा रही हो मेमसाब? इतनी जल्दी क्या है मालिक से बात करने की? उन्हें थोड़ा और तड़पने दो..."
 
मीरा (कमजोरी से शेर के सीने पर हाथ मारकर पीछे धकेलने की कोशिश करते हुए): "नहीं शेर... समझने की कोशिश करो... उफ्फ... छोड़ो, वो बार-बार फोन करेंगे... बात बिगड़ जाएगी..."
 
शेर (मीरा के जिस्म को अपने करीब पूरी तरह भींचते हुए, उसकी गर्दन के पास फुसफुसाकर): "कुछ नहीं बिगड़ता मेमसाब। मालिक तो अपनी बेटी की सलामती की खबर लेने के लिए बेचैन होंगे। उन्हें क्या पता कि उनकी बेगम इस वक्त शेर की बांहों में कैद हैं। फोन को बजने दो…।"
 
मीरा ने जैसे ही दोबारा मेज की तरफ कदम बढ़ाने की कोशिश की, शेर ने बिना कोई मौका दिए उसे झटके से अपनी और खींचा। मीरा का पूरा वक्षस्थल एक बार फिर उसके चेहरे के ठीक सामने था।
 
शेर ने अपनी आँखें मूँद लीं और अपनी जीभ को बाहर निकालते हुए सीधे मीरा के दूसरे स्तन पर झपट्टा मार दिया। उसने उस नाज़ुक, गोरे उभार को पूरा का पूरा अपने मुँह के भीतर भींच लिया और जंगली तरीके से चूसने लगा।
 
मीरा (एक तीखी और बेबस आह भरते हुए, अपनी पीठ को पीछे की तरफ मोड़ते हुए): "अह्ह्... उइइ... माँ! शेर... मत करो... उफ्फ... मत चूसो इतनी ज़ोर से... सिसकी... फोन बज रहा है... "
 
शेर (मुँह में स्तन को दबाए हुए ही, दबी आवाज़ में गुर्राते हुए): "अह्ह्ह... कितना मीठा रस है मेमसाब... तुम्हारी ये जवानी आज इस शेर की हो चुकी है। बजने दो उस फोन को... आज ज्योति की जान के बदले मैं इस दूसरे तरबूज का भी पूरा पानी निकाल कर रहूँगा।"
 
कुछ देर लगातार बजने के बाद मेज पर रखा मोबाइल आखिरकार शांत हो गया। कमरे में एक बार फिर सिर्फ शेर की भारी साँसों और मीरा की दबी-कुचली सिसकियों की आवाज़ें गूँज रही थीं।
 
लेकिन उस लगातार बजती घंटी के शोर ने पास के बिस्तर पर सो रही ज्योति की नींद में खलल डाल दी थी। वह दर्द की दवा के असर में गहरी नींद में थी, पर फोन की आवाज़ उसके कानों तक पहुँच चुकी थी। उसने आधी खुली आँखों और भारी आवाज़ में, नींद के झोंके में ही कुनमुनाना शुरू कर दी।
 
ज्योति (नींद में करवट बदलते हुए, बेहद धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ में): "उम्म्म्म... मम्मा... फोन बज रहा है... प्लीज उठा लो ना... बहुत शोर हो रहा है..."
 
ज्योति की आवाज़ कान में पड़ते ही जैसे कमरे के भीतर का सारा उन्माद एक पल में जम गया। मीरा का दिल खौफ के मारे हलक में आ गया, और शेर की हरकतें भी वहीं की वहीं थम गईं। दोनों के चेहरों पर एक गहरा डर साफ देखा जा सकता था।
 
शेर ने तुरंत मीरा के स्तन को अपने मुँह से आज़ाद किया और दोनों ने एक-दूसरे की तरफ बेहद डरी हुई नज़रों से देखा। फिर धीरे से अपनी गर्दनें घुमाकर बिस्तर पर पड़ी ज्योति की तरफ ताका, मानो उनके फेफड़ों की हवा रुक गई हो।
 
मीरा (खौफ से थरथराते हुए, बेहद धीमी फुसफुसाहट में): "हे भगवान... ज्योति जाग गई... शेर, अलग हटो मुझसे... प्लीज दूर हटो... अगर उसने हमें इस हाल में देख लिया तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी..."
 
शेर (अपनी आँखों को सिकोड़कर ज्योति को ध्यान से देखते हुए, दबी आवाज़ में): "शशश... चुप रहिए मेमसाब... ज़रा शांत हो जाइए..."
 
कमरे में कुछ सेकंड के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया कि दोनों को अपनी धड़कनें साफ़ सुनाई दे रही थीं। शेर और मीरा बिना हिले-डुले ज्योति को देखते रहे।
 
तभी ज्योति ने एक गहरी साँस ली, अपना हाथ तकिये पर फैलाया और दोबारा गहरी नींद की आगोश में समा गई। उसके चेहरे के ढीले पड़ते ही दोनों को इस बात का अहसास हुआ कि वह जागी नहीं थी, बल्कि सिर्फ नींद में बड़बड़ा रही थी।
 
शेर (एक गहरी राहत की साँस छोड़ते हुए, फुसफुसाया): "देखा मेमसाब? बिटिया तो अभी भी अपनी गहरी नींद में सो रही है। चोट की दवा का असर है, इतनी जल्दी नहीं जागेगी। बेकार ही डर रही थीं आप..."
 
मीरा (अपने कांपते हाथों से अपनी छाती को ढकने की नाकाम कोशिश करते हुए, आंसुओं के साथ): "शेर... खुदा के लिए अब तो रुक जाओ... मेरी बच्ची यहीं सो रही है... अपनी ममता का वास्ता देकर कहती हूँ, अब और मत करो..."
 
अभी मीरा के आँसू थमे भी नहीं थे कि मेज पर रखा मोबाइल एक बार फिर स्क्रीन पर 'सरताज' का नाम चमकाते हुए पूरी ताक़त से बज उठा।
 
इस बार घंटी की आवाज़ सुनते ही शेर ने बिना कोई वक़्त गंवाए झटके से फोन उठाया और सलीके से उसका रिंगर म्यूट कर दिया ताकि ज्योति की नींद में दोबारा खलल न पड़े। फोन की स्क्रीन अब भी लगातार जगमगा रही थी। शेर ने हाथ में पकड़े उस बजते हुए फोन को मीरा के चेहरे के सामने लहराया।
 
शेर (फोन को म्यूट रखकर, मीरा के बिल्कुल करीब आते हुए बेहद धीमी और ठंडी आवाज़ में): "लो मेमसाब, मालिक का फोन फिर से आ गया। मालिक समझ लेंगे कि आप बिटिया की देखभाल में  मसरूफ हो।"
 
मीरा (हाँफते हुए, अपने गाउन के खुले हिस्से को दोनों हाथों से भींचकर समेटते हुए): "हाँ... हाँ शेर... और हट जाओ यहाँ से… भगवान के लिए दूर हो जाओ मुझसे... मुझे फोन दो ताकि मैं उनसे बात कर सकूं।"
 
शेर (अपनी नज़रें मीरा के कांपते होंठों पर गड़ाए रखकर): "हट तो मैं अभी जाऊँगा मेमसाब... लेकिन मेरी एक शर्त है। आपको मुझसे एक वादा करना होगा..."
 
मीरा (खौफ और अविश्वास से उसे देखते हुए, सिसककर): "कैसा… कैसा वादा? क्या चाहते हो तुम अब?"
 
शेर (सीधा मीरा की आँखों में झाँककर, भारी और गहरी आवाज़ में): "वादा यह मेमसाब... कि आगे चलकर, जब भी मुझे मौका मिले, आप मुझे अपने इस मखमली और गोरे शरीर को छूने और महसूस करने दोगी। आप कभी ना नहीं करोगी।"
 
मीरा (घबराकर पीछे हटते हुए, कांपती आवाज़ में): "नहीं... नहीं शेर, यह तुम क्या कह रहे हो? यह कभी नहीं हो सकता, मैं ऐसा वादा कैसे कर सकती हूँ!"
 
 
शेर (मीरा की लाचारी का मज़ा लेते हुए): "मैं कुछ अलग थोड़ा माँग रहा हूँ मेमसाब, जैसे मैं आज आपको छू रहा हूँ... बस ऐसे ही तो आगे भी छूने की अनुमति माँग रहा हूँ। आज तो मैं अच्छे से आपको महसूस भी नहीं कर पाया और आपके पति का फोन आ गया..."
 
मीरा (आँखें फैलाकर, फूट-फूट कर रोते हुए अपना सिर हिलाते हुए): "नहीं... नहीं शेर... ऐसा पाप मत करवाओ मुझसे... मैं एक शादीशुदा औरत हूँ, ज्योति की माँ हूँ... मैं ऐसा वादा कैसे कर सकती हूँ..."
 
 
शेर (अपनी आँखों में वासना और चालाकी छुपाए हुए, गहरी आवाज़ में): "हाँ, मुझे आपकी मर्यादा का अच्छे से पता है मेमसाब। मैं अपनी जुबान देता हूँ कि... मैं कभी मर्यादा पार नहीं करूँगा, जब तक आप मुझे खुद न कहें... बस मुझे इस बदन को सहलाने और चूसने का हक चाहिए। बोलो, मंजूर है?"
 
शेर (दबाव बढ़ाते हुए): "वक्त कम है मेमसाब, मालिक का फोन कटने वाला है।"
 
मीरा (अत्यंत अनिच्छा और गहरी लाचारी से, भारी मन के साथ अपनी आँखें मूँदते हुए): "ठीक है... मैं... मैं वादा करती हूँ।"
 
शेर (तुरंत बिस्तर पर सो रही ज्योति की तरफ इशारा करते हुए, अपनी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन और दबाव लाते हुए): "मेमसाब! आपको अपनी इस ज्योति बिटिया की कसम खानी होगी। अपनी इस लाडली बेटी की कसम खाकर कहो कि आप भविष्य में मेरे इस हक को नहीं ठुकराओगी। सोच लो... आज अगर मैं अपनी जान पर खेलकर इसे गाड़ी के आगे से न खींचता, तो आज तुम्हारी ये बेटी यहाँ इस बिस्तर पर सलामत नहीं सो रही होती। इसकी जिंदगी की सलामती का वास्ता दे रहा हूँ… खाओ, इसकी कसम!"
 
वह अपनी आँखों को पूरी तरह मीरा के चेहरे पर गड़ाए हुए था, क्योंकि वह जानता था कि एक माँ के लिए उसकी औलाद से बढ़कर कुछ नहीं होता।
 
वह मीरा को एक ऐसी अटूट और भयानक कसम के जाल में बाँध देना चाहता था, जिसे तोड़ने की हिम्मत वह भविष्य में कभी चाहकर भी न कर सके और हमेशा के लिए उसके सामने घुटने टेक दे।
 
मीरा (बिस्तर पर सो रही अपनी मासूम बच्ची को देखकर बुरी तरह टूटते हुए, उसका पूरा बदन थर-थर काँप रहा था): "शेर... तुम... तुम बहुत गिरे हुए इंसान हो... अपनी ही बचाई बच्ची की जान की कसम खिला रहे हो मुझे... उफ्फ..."
 
शेर (लगातार बजते हुए फोन की स्क्रीन को मीरा की आँखों के ठीक सामने लाते हुए, चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान के साथ): "वक्त कम है मेमसाब, मालिक का फोन कटने वाला है। अगर यह कट गया, तो दोबारा आएगा और फिर आपको उन्हें जवाब देना भारी पड़ जाएगा। जल्दी कीजिए... कसम खाइए, वरना मैं फोन नहीं दूँगा!"
 
 
मीरा (बेबसी और खौफ के चरम पर पहुँचकर, अपने हाथ ज्योति की तरफ उठाते हुए रुआंसी आवाज़ में): "ठीक है... ठीक है! मैं... मैं अपनी ज्योति बेटी की कसम खाती हूँ... कि मैं... मैं तुम्हें आगे भी अपने शरीर को छूने दोगी... पर तुम अपनी मर्यादा कभी पार नहीं करोगे... बस अब रुक जाओ शेर... प्लीज..."
 
मीरा के मुँह से ज्योति की कसम सुनते ही शेर के चेहरे पर एक शैतानी और कामुक जीत की चमक तैर गई। उसने तुरंत फोन का म्यूट हटा लिया, उसे मीरा की तरफ बढ़ा दिया। स्क्रीन पर सरताज सिंह का नंबर अभी भी फ्लैश हो रहा था। शेर ने एक गहरी साँस ली, और मीरा के चेहरे के बिल्कुल करीब आकर फुसफुसाया।
 
शेर (फोन मीरा के हाथ में थमाते हुए, बेहद धीमी और हुक्म देती आवाज़ में): "लो मेमसाब, अब आप अपने सरताज जी से बात करो। उन्हें आज की पूरी घटना के बारे में बताओ। उन्हें अच्छे से समझाओ कि कैसे इस शेर ने अपनी जान दांव पर लगाकर आपकी ज्योति बिटिया की जान बचाई है… और आप कैसे यहाँ कमरे में खुद अपने हाथों से इस शेर की सेवा और देखरेख कर रही हैं। बताओ उन्हें..."
 
मीरा (कांपते हाथों से फोन पकड़ते हुए, आँखों में खौफ लिए): "शेर... प्लीज... हट जाओ मेरे पास से... मैं... मैं बात कैसे करूँगी इस हाल में..."
 
शेर (कुटिलता से मुस्कुराते हुए, अपना हाथ मीरा के गाउन के अंदर डालते हुए): "बात तो आपको करनी ही पड़ेगी मेमसाब, और आवाज़ बिल्कुल साफ और सीधी निकलनी चाहिए। आपके मुँह से ज़रा सी भी ऊँची आवाज़ या सिसकी बाहर नहीं आनी चाहिए, वरना मालिक तुरंत भांप जाएंगे। जब तक आप मालिक से फोन पर बात करोगी... मैं तब तक आपकी सेवा करता रहूँगा।"
 
मीरा (दहशत से अपनी आँखें फैलाते हुए): ", शेर… ऐसा मत करो…"
 
इससे पहले कि मीरा अपनी बात पूरी कर पाती या शेर को पीछे धकेल पाती, शेर ने अपनी बात पर अमल कर दिया। उसने बिना कोई मौका दिए एक हाथ से मीरा की पीठ को जकड़ा और अपना मुँह नीचे झुकाकर सीधे मीरा के बाएं स्तन के गोरे उभार को अपने मुँह में दबोच लिया। उसका दूसरा भारी हाथ मीरा के दाहिने स्तन को मसलने लगा।
 
ठीक उसी पल, फोन के स्पीकर से सरताज सिंह की बेहद चिंतित और घबराई हुई आवाज़ गूँज उठी।
 
सरताज सिंह (फोन पर, बेहद बेचैनी से): "हेलो? हेलो... मीरा! भाग्यवान, तुम फोन क्यों नहीं उठा रही थी? मैं कब से रिंग कर रहा हूँ! मेरी बच्ची ठीक तो है ना? ज्योति कैसी है? और शेर का क्या हाल है?"
 
इधर फोन पर पति की आवाज़ आ रही थी, और उधर नीचे शेर की जीभ और नुकीले दाँत मीरा के नाज़ुक स्तन को चूस रहे थे। उस तीव्र कामुक और दर्दभरे हमले से मीरा का पूरा बदन काठ की तरह अकड़ गया।
 
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और उसके हलक से एक तीखी सिसकी निकलने ही वाली थी। मीरा ने अपने होंठों को दांतों तले चबाया और अपनी आवाज़ को सामान्य करने की नाकाम कोशिश की।
 
मीरा ( बेहद लड़खड़ाती और भारी आवाज़ में): "ह-हेलो... हाँ... जी... सुन रही हूँ..."
 
सरताज सिंह (फिक्र से): "मीरा, तुम्हारी आवाज़ को क्या हुआ? इतनी भारी क्यों लग रही है? तुम रो रही हो क्या?"
 
मीरा (नीचे शेर की जीभ की गीली छुअन से अपनी आँखें भींचते हुए): "नहीं... वो... वो बस घबराहट की वजह से... जी। ज्योति... ज्योति अब बिल्कुल ठीक है, सो रही है पास में। अह्ह..."
 
सरताज सिंह: "और शेर? गार्ड बता रहा था कि उसे बहुत गहरी चोटें आई हैं? उसने मेरी बच्ची के लिए अपनी जान लगा दी!"
 
मीरा (शेर के हाथों के तीखे दबाव और उसके मुँह के मादक खिंचाव के बीच अपनी पीठ को पीछे की तरफ मोड़ते हुए, एक गहरी सिसकी को हलक में ही दबाकर): "हाँ... जी... शेर को... उफ्फ... बहुत चोट लगी है। वह लहूलुहान हो गया था। मैं... मैं खुद खड़े रहकर उसकी सेवा-देखभाल कर रही हूँ... उसकी पट्टियाँ और दवा का ध्यान रख रही हूँ... आप... आप फिक्र मत कीजिए..."
 
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'हे भगवान, मैं अपने ही पति से कितना बड़ा झूठ बोल रही हूँ! सरताज जिसके लिए इतने फिक्रमंद हो रहे हैं, वो इस वक्त मेरे जिस्म को नोच रहा है। मैं कितनी लाचार हूँ... एक तरफ फोन पर पति की आवाज़ है और दूसरी तरफ इस जंगली की जीभ और दाँत मेरे सीने को छील रहे हैं। अगर सरताज को ज़रा भी शक हुआ तो मेरा घर उजड़ जाएगा... उफ्फ, यह शेर... कितना बेरहम है!'
 
जब मीरा फोन पर कांपती आवाज़ में यह सब बोल रही थी, तब शेर उसके स्तन को अपने मुँह के भीतर और गहराई से भींचकर मज़े से चूस रहा था।
 
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'वाह मेमसाब, वाह! मालिक बैठकर मेरी सलामती की दुआ माँग रहे हैं, और यहाँ उनकी आलीशान बीवी मेरे मुँह में अपना अमृत उड़ेल रही है। तुम्हारी इस मजबूरी और कांपती आवाज़ का मज़ा ही कुछ और है। तुम जितनी छटपटाओगी, मुझे उतना ही ज़्यादा मज़ा आएगा। अब तो तुम इस शेर के पिंजरे में हमेशा के लिए कैद हो चुकी हो, मालकिन!'
वह अपनी आँखें तिरछी करके मीरा के तमतमाए हुए चेहरे को देख रहा था, मानो वह अपनी मालकिन की बेबसी और इस लुका-छिपी के खेल का पूरा आनंद उठा रहा हो।
 
मीरा अभी फोन पर सरताज को संभालने की कोशिश कर ही रही थी कि शेर ने अपनी वहशीयत को एक कदम और आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया।
 
इससे पहले कि मीरा कुछ समझ पाती या संभल पाती, शेर ने एक ही झटके में उसकी रेशमी नाइटी को ऊपर से पकड़कर पूरी ताकत से नीचे की तरफ खींच दिया। एक सरसराहट के साथ नाइटी का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह सरक गया।
 
क्षण भर में ही, मीरा के दोनों सुडौल मुम्मे शेर की खों के सामने पूरी तरह से नंगे हो गए। डर और अचानक पैदा हुई मादक उत्तेजना के मिले-जुले सैलाब के कारण उनके उभरे हुए लाल निप्पल पूरी तरह सख्त होकर बाहर की तरफ अकड़ रहे थे।
 
इस अचानक हुए नग्न हमले से मीरा का दिल जैसे सीने में ही बैठ गया और उसकी आवाज़ खौफ के मारे हलक में ही रुंध कर रह गई। वह चाहकर भी मुँह से कोई शब्द नहीं निकाल पाई।
 
सरताज सिंह (फोन पर, मीरा की लंबी खामोशी से थोड़ा चिंतित होकर): "हेलो? हेलो मीरा... तुम सुन रही हो ना? क्या हुआ, तुम अचानक चुप क्यों हो गई? सब ठीक तो है ना वहाँ?"
 
शेर ने जब मीरा के उस बेपर्दा, मखमली गोरे जिस्म को अपनी आँखों के सामने इस तरह पूरी तरह खुला देखा, तो उसकी आँखों में वासना की एक भूखी चमक कौंध गई। वह  मीरा के सुडौल वक्ष और उन सख्त हो चुके लाल निप्पलों को एकटक घूरने लगा। उसके चेहरे पर एक गहरी, वहशी मुस्कान तैर गई और उसने अपनी जीभ को सूखे होंठों पर फेरा।
 
(शेर के अंतर्मन के विचार):
'ओह भाई साहब... क्या चीज़ है! कसम से, आज तक ऐसा रूप सिर्फ सपनों में देखा था। यह गोरा रंग, यह कयामत जैसा बदन और ये डर से अकड़े हुए लाल निप्पल... अब तो चाहे जो हो जाए, मैं इस बदन को पूरा भोगे बिना यहाँ से नहीं हिलने वाला। मालिक फोन पर चिल्लाते रहें, पर मालकिन की यह जवानी अब पूरी की पूरी मेरी है।'
 
शेर (अपनी आँखों को मीरा के नग्न अंगों पर गड़ाए हुए, अत्यंत धीमी और मादक फुसफुसाहट में): "बोलिए मेमसाब... मालिक पूछ रहे हैं कि सब ठीक है ना..."
 
मीरा (शॉक और गहरे सदमे में डूबी हुई, आँखों में आँसू लिए ज़मीन को ताकती रही): "..."
 
(मीरा के अंतर्मन के विचार):
'मैं अपने पति को क्या जवाब दूँ? इस हैवान ने मुझे इस हाल में ला खड़ा किया है कि अब मेरे मुँह से शब्द भी नहीं निकल रहे। मेरा गला पूरी तरह रूंध चुका है। काश मैं चीख पाती, काश मैं सरताज को सब सच बता पाती... पर मेरी हिम्मत पूरी तरह टूट चुकी है।'

 

 
Deepak Kapoor
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