01-07-2026, 06:52 PM
नेहा हँसते हुए ना में सिर हिलाने लगी, जैसे मासूम बच्ची की तरह।
अचानक गुप्ता जी का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने झटके से नेहा की गर्दन पकड़ ली।
गुप्ता जी ने गर्दन कसकर पकड़ते हुए नेहा को दीवार से चिपका लिया। नेहा की नंगी देह उनके शरीर से सट गई।
नेहा: (अभी भी हँसते हुए, बिल्कुल डरे बिना)
“क्या हुआ गुप्ता जी... खाइए ना... मैं भी कंपेयर कर सकूँ कि बाप अच्छे से करता है या बेटा...”
सीन एकदम से बदल चुका था।
अभी तक जो मेरी सबमिसिव पत्नी गुप्ता जी के सामने नंगी खड़ी थी, वो अचानक उन्हें चिढ़ा रही थी। जैसे उसे पता चल गया हो कि इनको गुस्सा दिलाकर और उत्तेजित कैसे किया जाए।
गुप्ता जी का हाथ अभी भी उसकी गर्दन पर था, उँगलियाँ हल्के से दब रही थीं।
गुप्ता जी: (गुस्से में)
“नहीं नहीं... तू झूठ बोल रही है!”
नेहा: (हँसते हुए, आँखों में शरारत लिए, गर्दन पर उनका हाथ होने के बावजूद)
“क्यों? आपको झूठा पसंद नहीं है क्या...?
वैसे भी आप चख चुके हैं अपने बेटे को... मेरे होंठों से... मेरे boobs से...”
नेहा को बिल्कुल फर्क नहीं पड़ रहा था कि गुप्ता जी क्या बोल रहे हैं। वो हँसते हुए, बेफिक्र होकर बोल रही थी।
गुप्ता जी: (गुस्से में, दाँत पीसते हुए)
“नहीं... मेरा बेटा तुम लोगों की तरह नहीं है... वो बहुत शरीफ है!”
नेहा: (हँसते हुए, शरारत से)
“हाँ बहुत शरीफ है राहुल... तभी तो उसने टॉयलेट का गंदा फर्श भी नहीं देखा... वहीं बैठ गया नीचे...”
थप्पड़!
थप्पड़!
थप्पड़!
तीन जोरदार तमाचे नेहा के नाजुक गालों पर पड़े। हर तमाचे के साथ नेहा का सिर हिल गया, उसके गाल लाल होकर चमकने लगे।
मुझे भी गुस्सा आया।
पर हर तमाचे के साथ मेरे लंड ने अलग रिस्पॉन्स दिया — हर थप्पड़ पर मेरा लंड जोर से झटका खा रहा था। पत्थर जैसा खड़ा होकर बार-बार ऊपर की तरफ उछल रहा था, जैसे हर झटके में और ज़्यादा उत्तेजित हो रहा हो।
मैं तेजी से आगे बढ़ा कि गुप्ता जी का हाथ पकड़ लूँ।
लेकिन नेहा पूरी मस्ती में थी। उसने बायाँ हाथ पीछे करके मुझे रोक दिया — आँखों में साफ़ इशारा: “रुक जा”।
फिर वो गुप्ता जी की तरफ मुड़ी। अपनी नंगी देह को उनके शरीर से और भी चिपकाते हुए, उसने छाती आगे की।
भारी boobs उनके सीने से जोर-जोर से रगड़ खा रहे थे।
नेहा का पूरा चेहरा अब लाल हो चुका था।
गालों पर तमाचों के निशान गहरे लाल थे।
हाँफते हुए भी वो हँस रही थी।
गुप्ता जी: (गुस्से और नशे में चीखते हुए)
“साली बोल... ये झूठ है... मादरचोद... रंडी... कुतिया... मेरा बेटा... मेरा बेटा...!”
शराब का असर अब पूरी पीक पर था।
गुप्ता जी को शब्द भी ठीक से नहीं मिल रहे थे।
उनका हाथ अभी भी नेहा की गर्दन पर कसा हुआ था।
नेहा फिर भी नहीं रुकी।
वो हँसते-हँसते बोलती रही।
नेहा: (शरारत भरी आवाज़ में)
“मैं तो सु-सु गई थी... मैंने बोला थोड़ा क्लीन करने दो...
मगर आपका प्यारा बच्चा नहीं माना...
उसे फर्क नहीं पड़ा कि चूत गंदी है या साफ...
पूरी शिद्दत से उसने...”
गुप्ता जी और करीब आ गए।
उन्होंने नेहा की बात बीच में ही रोक दी।
अपना मुँह आगे बढ़ाकर नेहा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
चुप्प...
नेहा को बात पूरी नहीं करने दी।
दो मिनट तक उन्होंने नेहा को दीवार से जोर से चिपका रखा।
अपना पूरा वजन नेहा के नंगी शरीर पर डाल दिया।
एक हाथ नेहा के बालों में घुसकर कस गया था।
दूसरा हाथ गर्दन पर था।
गुप्ता जी के होंठ नेहा के होंठों को बुरी तरह चूस रहे थे।
ज़बान जबरदस्ती उसके मुँह में घुस रही थी।
गहरे, गुस्से भरे किस थे।
नेहा पहले हल्का विरोध कर रही थी।
फिर वो भी उनके किस में घुल गई।
उसकी नंगी देह उनके शरीर से रगड़ खा रही थी।
जब गुप्ता जी ने साँस लेने के लिए हटे, तो नेहा के होंठ सूज गए थे और चमक रहे थे।
नेहा ने अपनी उँगली उठाई और सूजे हुए होंठों के खास हिस्से पर रख दी।
ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ काटा गया हो।
दोनों के चेहरे एकदूसरे के बहुत करीब थे।
दोनों लंबी-लंबी साँसें ले रहे थे।
गुप्ता जी को लगा कि नेहा अब शांत हो गई है।
मगर नेहा का ये रूप अलग था।
नेहा: (हाँफते हुए, शरारत भरी मुस्कान के साथ)
“मगर मुझे किस में छोटे गुप्ता से ज़्यादा बड़ा गुप्ता पसंद आया...”
गुप्ता जी का चेहरा वापस तमतमा गया।
उन्होंने एक हाथ दीवार पर टिकाया।
दूसरे हाथ से नेहा के गले पर थोड़ा और ज़ोर डाल दिया।
नेहा का चेहरा और ज़्यादा लाल हो गया।
उसकी मुस्कुराहट गायब हो गई।
ऐसा लग रहा था जैसे उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही हो।
ये देखकर गुप्ता जी ने अपना हाथ गले से हटा लिया।
फिर उनका हाथ सीधा अपने पजामे के नाड़े पर चला गया।
गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में भारी आवाज़ में)
“साली... तुझे बताता हूँ बड़ा गुप्ता क्या कर सकता है... रंडी...”
जैसे ही गुप्ता जी का हाथ गले से हटा, नेहा खाँसते-खाँसते दीवार से सटी हुई नीचे सरक गई।
वो ज़मीन पर बैठ गई, पीठ दीवार से टिकी हुई।
लंबी-लंबी साँसें ले रही थी।
उसका चेहरा अभी भी लाल था।
थोड़ी देर बाद उसने सामने का नज़ारा देखा।
गुप्ता जी खड़े थे।
एक हाथ दीवार पर सहारे के लिए टिका हुआ था।
दूसरा हाथ अपने पजामे के नाड़े पर था।
बार-बार उँगलियाँ नाड़े की गाँठ पर फिसल रही थीं।
नशा और गुस्सा दोनों मिलकर उनकी उँगलियों को बेकाबू कर रहे थे।
वो बार-बार कोशिश कर रहे थे, लेकिन गाँठ नहीं खुल रही थी।
नेहा ने हल्का-सा मुस्कुराते हुए अपना हाथ बढ़ाया।
उस हाथ पर जो नाड़ा खोलने की कोशिश कर रहा था, उस पर हल्का सा चांटा मार दिया।
जैसे कह रही हो — “हटो, मैं करती हूँ।”
गुप्ता जी ने चौंककर हाथ हटा लिया।
नेहा ने दोनों हाथों का इस्तेमाल करके गुप्ता जी के पजामे का नाड़ा खोल दिया।
जब तक वो कर रही थी, गुप्ता जी बदबदा रहे थे।
गुस्से में।
गाालियाँ निकाल रहे थे।
गुप्ता जी: (भारी और नशीली आवाज़ में)
“बहुत शौक है रंडी बनने का...
आज बताऊँगा...
रात भर कुतिया की तरह चोदूँगा...”
नेहा की उँगलियों ने कमाल कर दिया।
सrrr...
पजामा एक झटके में नीचे आ गया।
अब गुप्ता जी के सामने डार्क नीले ट्रायंगुलर अंडरवियर में उनका खजाना छिपा हुआ था।
अंडरवियर इतना टाइट था कि आस-पास से घने बाल झाँक रहे थे।
नेहा ने दोनों हाथ अंडरवियर की इलास्टिक पर रखे।
और धीरे-धीरे नीचे खींच दिया।
गुप्ता जी: (अभी भी बदबदाते हुए)
“कुतिया... ऐसे लंड से नहीं चुदा करे तू...
आज असली मर्द क्या होता है पता चलेगा...”
लगा था जैसे कोई बड़ा साँप निकलेगा।
साँप तो निकला...
मगर सोया हुआ।
गुप्ता जी का लंड अर्द्ध-उत्तेजित अवस्था में लटक रहा था।
मोटा, लेकिन अभी पूरी तरह खड़ा नहीं हुआ था।
सिरा भारी, गोल, और घने बालों से घिरा हुआ।
नेहा ने पहले गंभीर चेहरे से गुप्ता जी के लटके हुए लंड की तरफ देखा।
फिर उसने सिर ऊपर उठाया।
पहले गुप्ता जी की तरफ।
फिर मेरी तरफ।
मैं बहुत पास खड़ा था।
अचानक नेहा की हँसी फूट पड़ी।
ज़ोर से।
जोर-जोर से।
नेहा: (हँसते-हँसते, आँखों में आँसू आ गए)
“हाहाहा... बड़ा गुप्ता तो फुस्स निकला... छोटा गुप्ता जीत गया!”
गुप्ता जी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
उनका चेहरा और लाल हो गया।
शायद बढ़ती उम्र, ज़्यादा शराब और गुस्से की वजह से खून लंड तक पहुँच ही नहीं पा रहा था।
नेहा की बातें उन्हें और गुस्सा दिला रही थीं।
गुप्ता जी: (गुस्से में चीखते हुए)
“रुक साली... अभी खड़ा होगा!”
उन्होंने अपना लंड हाथ में ले लिया और हिलाने की कोशिश करने लगे।
नेहा: (हँसी नहीं रुक रही थी)
“हाहाहा... बातें बड़ी-बड़ी... धमाका होगा... आप तो फुस्सी निकाले!”
मुझे लगा अब नेहा को रोकना चाहिए।
कहीं गुस्से में इस बूढ़े का हार्ट अटैक न हो जाए।
गुप्ता जी ने पहले हाथ से लंड हिलाकर खड़ा करने की कोशिश की।
फिर दूसरा हाथ दीवार से हटाकर नेहा को एक और जोरदार थप्पड़ मार दिया।
थप्पड़!
गुप्ता जी: (चीखते हुए)
“चुप साली!”
फिर उन्होंने नेहा के बालों को मुठ्ठी में कसकर पकड़ लिया।
कमर आगे बढ़ाई और अपना लटका हुआ लंड नेहा के चेहरे के पास ले गए।
गुप्ता जी: (भारी आवाज़ में)
“साली मुँह में ले... तैयार कर... फिर देखना कितना बड़ा है तेरे चूतिए पति से...”
नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में सीधे देखा।
और ना में सिर हिला दिया।
गुप्ता जी ने अपना लटका हुआ लंड नेहा के चेहरे पर फेरना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे, गुस्से और हताशा के साथ वो उसे नेहा के गालों पर, सूजे हुए होंठों पर, और नाक पर रगड़ रहे थे।
पूरी कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह लंड खड़ा हो जाए।
नेहा ने अपना मुँह कसकर बंद कर लिया था।
होंठों को भींचे हुए ऊपर गुप्ता जी की तरफ देख रही थी।
उसकी आँखों में अभी भी वही शरारत और चुनौती थी।
गुप्ता जी ने नेहा के बालों को और कसकर खींचा।
उसका सिर पीछे की तरफ झुक गया।
गुप्ता जी: (गुस्से में गरजते हुए)
“खोल ना साली मुँह...!”
नेहा ने हल्का सा ना में सिर हिला दिया।
उसके होंठ और भी कस गए।
वो बिल्कुल नहीं खोल रही थी।
गुप्ता जी के लंड से प्रीकम बह रहा था।
नेहा के पूरे चेहरे को गीला कर रहा था।
नेहा उसे करने दे रही थी।
मगर जैसे ही गुप्ता जी लंड का टोपा उसके होंठों पर लगाकर मुँह में डालने की कोशिश करते, नेहा मुँह फेर लेती।
नेहा: (शरारत भरी आवाज़ में)
“आप मुझसे ज़बरदस्ती नहीं कर सकते अंकल...”
जैसे वो कोई खेल खेल रही हो।
मैंने देखा — गुप्ता जी का हाथ ढीले लंड की खाल को तेज़ी से ऊपर-नीचे कर रहा था।
गुप्ता जी: (गुस्से में)
“साली... रंडी... ज़बरदस्ती बोल रही है... खोल ना मुँह कुतिया...”
और वो और होल्ड नहीं कर पाए।
सफ़ेद पानी की एक लहर सी उनके लंड के टोपे के छेद से बाहर निकली।
नेहा के चेहरे पर।
एक... दो... तीन... चार... पाँच...
जैसे कई सालों का स्टोर करके रखा हो।
नेहा के खूबसूरत चेहरे पर गाढ़ा, गर्म वीर्य छिटक गया।
उसकी आँखें, गाल, होंठ, नाक — सब कुछ ढक गया।
थोड़ी देर सब शांत रहा।
जैसे कोई तूफ़ान गुज़र गया हो।
सबसे पहले गुप्ता जी ने नेहा के बालों को छोड़ा।
जैसे नशा उतर गया हो।
जैसे कोई सीन खत्म होने के बाद डायरेक्टर ने “कट” बोल दिया हो।
वे अपने सहारे से खड़े नहीं हो पा रहे थे।
इसलिए ज़मीन पर धड़ाम से गिर गए।
गुप्ता जी: (बार-बार)
“सॉरी... सॉरी... सॉरी बेटी... सॉरी बेटा...”
उन्हें महसूस हुआ कि पिछले 15 मिनट में उन्होंने क्या करने की कोशिश की थी।
सिक्युरिटी में इसके लिए कई साल की सज़ा है।
थोड़ी और हिम्मत करके वे उठे।
“सॉरी... सॉरी...” अभी भी ज़ुबान पर था।
और वो बाथरूम की तरफ़ भागे।
फिर वहाँ से हमें उल्टियों की आवाज़ें आने लगी।
नेहा मेरे पास बैठी थी।
उसका चेहरा अभी भी गुप्ता जी के सफ़ेद पानी में सना हुआ था।
बेहद खूबसूरत लग रही थी।
मैं
“ये सब क्या था?”
मैं:
“क्या तुम और राहुल...?”
नेहा ने मेरी आँखों में देखते हुए ना का इशारा किया।
मैं:
“फिर क्यों?”
इस बार नेहा सीधे मेरी तरफ़ बढ़ी।
होंठ से होंठ मिले।
वो होंठ जो अभी गुप्ता जी से चिपके हुए थे।
जिन्हें खोलने के लिए गुप्ता जी ने लंड रगड़ा था।
मगर बेझिझक नेहा ने किस का स्वागत किया।
हमारे चेहरे मिले।
गुप्ता जी का पानी अब मेरे मुँह पर भी चिपचिपा रहा था।
नेहा ने मेरे लंड की हार्डनेस को अच्छे से महसूस किया।
फिर नेहा खड़े होने की कोशिश करती है, मेरे साथ।
वो स्लैब पर रखे गुप्ता जी के पैकेट से एक सिगरेट निकालती है।
मेरा हाथ पकड़कर सोफ़े की तरफ़ बढ़ी।
नेहा: (सिगरेट जलाते हुए)
“मुझे लगा नहीं था कि एक ही रात में...”
मैं:
“रात में क्या बेबी...?”
नेहा:
“कुछ नहीं... चेक करो... मर तो नहीं गया साला हमारे बाथरूम में... और कोई गंदगी की होगी तो बूढ़ा खुद साफ़ करे।”
सीधा साला।
कोई गुप्ता जी नहीं।
कोई इज़्ज़त नहीं।
ये वही नेहा थी जो आधे घंटे पहले इतनी सबमिसिव प्ले कर रही थी।
थोड़ी देर बाद मैं गुप्ता जी को आधी बेहोश हालत में बाथरूम से लाया।
आते ही सोफ़े पर पटका।
वो अपने कपड़े ढूंढ रहे थे।
मैंने मदद की।
बैकग्राउंड में “सॉरी... सॉरी...” बज रहा था।
पूरे कपड़े पहनने के बाद वो नेहा के पास आता है।
नेहा नंगी।
टाँगें खुली।
कोई शर्म नहीं।
सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए।
पास आते ही वो किसी बच्चे की तरह रोने लगता है।
वो आदमी जो थोड़ी देर पहले मेरे खानदान को चोदने की बातें कर रहा था।
नेहा ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
नेहा:
“It’s ok uncle... कोई बात नहीं... मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी... प्लीज़ आप ये रोना-धोना मत कीजिए...”
गुप्ता जी:
“I am sorry बेटी... मैं अब कभी नहीं...”
नेहा ने पूरा सेंटेंस होने नहीं दिया।
“लेकर जाओ इसको... घर छोड़ दो।”
मैं अंकल को पकड़कर घर ले गया।
3 बज रहे थे।
उनका दरवाज़ा खुला था।
उनका रोज़ का हाल था ऐसा।
घर से कोई नहीं जागा।
वापस आया तो नेहा हमारी ऑफ़िस चेयर पर बैठी हुई थी।
लैपटॉप ऑन था।
वो एक ईमेल का जवाब दे रही थी।
“हम तैयार हैं... आप प्लीज़ डेट्स कन्फ़र्म कीजिए...”
The End
(End of Chapter 3)
अचानक गुप्ता जी का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने झटके से नेहा की गर्दन पकड़ ली।
गुप्ता जी ने गर्दन कसकर पकड़ते हुए नेहा को दीवार से चिपका लिया। नेहा की नंगी देह उनके शरीर से सट गई।
नेहा: (अभी भी हँसते हुए, बिल्कुल डरे बिना)
“क्या हुआ गुप्ता जी... खाइए ना... मैं भी कंपेयर कर सकूँ कि बाप अच्छे से करता है या बेटा...”
सीन एकदम से बदल चुका था।
अभी तक जो मेरी सबमिसिव पत्नी गुप्ता जी के सामने नंगी खड़ी थी, वो अचानक उन्हें चिढ़ा रही थी। जैसे उसे पता चल गया हो कि इनको गुस्सा दिलाकर और उत्तेजित कैसे किया जाए।
गुप्ता जी का हाथ अभी भी उसकी गर्दन पर था, उँगलियाँ हल्के से दब रही थीं।
गुप्ता जी: (गुस्से में)
“नहीं नहीं... तू झूठ बोल रही है!”
नेहा: (हँसते हुए, आँखों में शरारत लिए, गर्दन पर उनका हाथ होने के बावजूद)
“क्यों? आपको झूठा पसंद नहीं है क्या...?
वैसे भी आप चख चुके हैं अपने बेटे को... मेरे होंठों से... मेरे boobs से...”
नेहा को बिल्कुल फर्क नहीं पड़ रहा था कि गुप्ता जी क्या बोल रहे हैं। वो हँसते हुए, बेफिक्र होकर बोल रही थी।
गुप्ता जी: (गुस्से में, दाँत पीसते हुए)
“नहीं... मेरा बेटा तुम लोगों की तरह नहीं है... वो बहुत शरीफ है!”
नेहा: (हँसते हुए, शरारत से)
“हाँ बहुत शरीफ है राहुल... तभी तो उसने टॉयलेट का गंदा फर्श भी नहीं देखा... वहीं बैठ गया नीचे...”
थप्पड़!
थप्पड़!
थप्पड़!
तीन जोरदार तमाचे नेहा के नाजुक गालों पर पड़े। हर तमाचे के साथ नेहा का सिर हिल गया, उसके गाल लाल होकर चमकने लगे।
मुझे भी गुस्सा आया।
पर हर तमाचे के साथ मेरे लंड ने अलग रिस्पॉन्स दिया — हर थप्पड़ पर मेरा लंड जोर से झटका खा रहा था। पत्थर जैसा खड़ा होकर बार-बार ऊपर की तरफ उछल रहा था, जैसे हर झटके में और ज़्यादा उत्तेजित हो रहा हो।
मैं तेजी से आगे बढ़ा कि गुप्ता जी का हाथ पकड़ लूँ।
लेकिन नेहा पूरी मस्ती में थी। उसने बायाँ हाथ पीछे करके मुझे रोक दिया — आँखों में साफ़ इशारा: “रुक जा”।
फिर वो गुप्ता जी की तरफ मुड़ी। अपनी नंगी देह को उनके शरीर से और भी चिपकाते हुए, उसने छाती आगे की।
भारी boobs उनके सीने से जोर-जोर से रगड़ खा रहे थे।
नेहा का पूरा चेहरा अब लाल हो चुका था।
गालों पर तमाचों के निशान गहरे लाल थे।
हाँफते हुए भी वो हँस रही थी।
गुप्ता जी: (गुस्से और नशे में चीखते हुए)
“साली बोल... ये झूठ है... मादरचोद... रंडी... कुतिया... मेरा बेटा... मेरा बेटा...!”
शराब का असर अब पूरी पीक पर था।
गुप्ता जी को शब्द भी ठीक से नहीं मिल रहे थे।
उनका हाथ अभी भी नेहा की गर्दन पर कसा हुआ था।
नेहा फिर भी नहीं रुकी।
वो हँसते-हँसते बोलती रही।
नेहा: (शरारत भरी आवाज़ में)
“मैं तो सु-सु गई थी... मैंने बोला थोड़ा क्लीन करने दो...
मगर आपका प्यारा बच्चा नहीं माना...
उसे फर्क नहीं पड़ा कि चूत गंदी है या साफ...
पूरी शिद्दत से उसने...”
गुप्ता जी और करीब आ गए।
उन्होंने नेहा की बात बीच में ही रोक दी।
अपना मुँह आगे बढ़ाकर नेहा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
चुप्प...
नेहा को बात पूरी नहीं करने दी।
दो मिनट तक उन्होंने नेहा को दीवार से जोर से चिपका रखा।
अपना पूरा वजन नेहा के नंगी शरीर पर डाल दिया।
एक हाथ नेहा के बालों में घुसकर कस गया था।
दूसरा हाथ गर्दन पर था।
गुप्ता जी के होंठ नेहा के होंठों को बुरी तरह चूस रहे थे।
ज़बान जबरदस्ती उसके मुँह में घुस रही थी।
गहरे, गुस्से भरे किस थे।
नेहा पहले हल्का विरोध कर रही थी।
फिर वो भी उनके किस में घुल गई।
उसकी नंगी देह उनके शरीर से रगड़ खा रही थी।
जब गुप्ता जी ने साँस लेने के लिए हटे, तो नेहा के होंठ सूज गए थे और चमक रहे थे।
नेहा ने अपनी उँगली उठाई और सूजे हुए होंठों के खास हिस्से पर रख दी।
ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ काटा गया हो।
दोनों के चेहरे एकदूसरे के बहुत करीब थे।
दोनों लंबी-लंबी साँसें ले रहे थे।
गुप्ता जी को लगा कि नेहा अब शांत हो गई है।
मगर नेहा का ये रूप अलग था।
नेहा: (हाँफते हुए, शरारत भरी मुस्कान के साथ)
“मगर मुझे किस में छोटे गुप्ता से ज़्यादा बड़ा गुप्ता पसंद आया...”
गुप्ता जी का चेहरा वापस तमतमा गया।
उन्होंने एक हाथ दीवार पर टिकाया।
दूसरे हाथ से नेहा के गले पर थोड़ा और ज़ोर डाल दिया।
नेहा का चेहरा और ज़्यादा लाल हो गया।
उसकी मुस्कुराहट गायब हो गई।
ऐसा लग रहा था जैसे उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही हो।
ये देखकर गुप्ता जी ने अपना हाथ गले से हटा लिया।
फिर उनका हाथ सीधा अपने पजामे के नाड़े पर चला गया।
गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में भारी आवाज़ में)
“साली... तुझे बताता हूँ बड़ा गुप्ता क्या कर सकता है... रंडी...”
जैसे ही गुप्ता जी का हाथ गले से हटा, नेहा खाँसते-खाँसते दीवार से सटी हुई नीचे सरक गई।
वो ज़मीन पर बैठ गई, पीठ दीवार से टिकी हुई।
लंबी-लंबी साँसें ले रही थी।
उसका चेहरा अभी भी लाल था।
थोड़ी देर बाद उसने सामने का नज़ारा देखा।
गुप्ता जी खड़े थे।
एक हाथ दीवार पर सहारे के लिए टिका हुआ था।
दूसरा हाथ अपने पजामे के नाड़े पर था।
बार-बार उँगलियाँ नाड़े की गाँठ पर फिसल रही थीं।
नशा और गुस्सा दोनों मिलकर उनकी उँगलियों को बेकाबू कर रहे थे।
वो बार-बार कोशिश कर रहे थे, लेकिन गाँठ नहीं खुल रही थी।
नेहा ने हल्का-सा मुस्कुराते हुए अपना हाथ बढ़ाया।
उस हाथ पर जो नाड़ा खोलने की कोशिश कर रहा था, उस पर हल्का सा चांटा मार दिया।
जैसे कह रही हो — “हटो, मैं करती हूँ।”
गुप्ता जी ने चौंककर हाथ हटा लिया।
नेहा ने दोनों हाथों का इस्तेमाल करके गुप्ता जी के पजामे का नाड़ा खोल दिया।
जब तक वो कर रही थी, गुप्ता जी बदबदा रहे थे।
गुस्से में।
गाालियाँ निकाल रहे थे।
गुप्ता जी: (भारी और नशीली आवाज़ में)
“बहुत शौक है रंडी बनने का...
आज बताऊँगा...
रात भर कुतिया की तरह चोदूँगा...”
नेहा की उँगलियों ने कमाल कर दिया।
सrrr...
पजामा एक झटके में नीचे आ गया।
अब गुप्ता जी के सामने डार्क नीले ट्रायंगुलर अंडरवियर में उनका खजाना छिपा हुआ था।
अंडरवियर इतना टाइट था कि आस-पास से घने बाल झाँक रहे थे।
नेहा ने दोनों हाथ अंडरवियर की इलास्टिक पर रखे।
और धीरे-धीरे नीचे खींच दिया।
गुप्ता जी: (अभी भी बदबदाते हुए)
“कुतिया... ऐसे लंड से नहीं चुदा करे तू...
आज असली मर्द क्या होता है पता चलेगा...”
लगा था जैसे कोई बड़ा साँप निकलेगा।
साँप तो निकला...
मगर सोया हुआ।
गुप्ता जी का लंड अर्द्ध-उत्तेजित अवस्था में लटक रहा था।
मोटा, लेकिन अभी पूरी तरह खड़ा नहीं हुआ था।
सिरा भारी, गोल, और घने बालों से घिरा हुआ।
नेहा ने पहले गंभीर चेहरे से गुप्ता जी के लटके हुए लंड की तरफ देखा।
फिर उसने सिर ऊपर उठाया।
पहले गुप्ता जी की तरफ।
फिर मेरी तरफ।
मैं बहुत पास खड़ा था।
अचानक नेहा की हँसी फूट पड़ी।
ज़ोर से।
जोर-जोर से।
नेहा: (हँसते-हँसते, आँखों में आँसू आ गए)
“हाहाहा... बड़ा गुप्ता तो फुस्स निकला... छोटा गुप्ता जीत गया!”
गुप्ता जी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
उनका चेहरा और लाल हो गया।
शायद बढ़ती उम्र, ज़्यादा शराब और गुस्से की वजह से खून लंड तक पहुँच ही नहीं पा रहा था।
नेहा की बातें उन्हें और गुस्सा दिला रही थीं।
गुप्ता जी: (गुस्से में चीखते हुए)
“रुक साली... अभी खड़ा होगा!”
उन्होंने अपना लंड हाथ में ले लिया और हिलाने की कोशिश करने लगे।
नेहा: (हँसी नहीं रुक रही थी)
“हाहाहा... बातें बड़ी-बड़ी... धमाका होगा... आप तो फुस्सी निकाले!”
मुझे लगा अब नेहा को रोकना चाहिए।
कहीं गुस्से में इस बूढ़े का हार्ट अटैक न हो जाए।
गुप्ता जी ने पहले हाथ से लंड हिलाकर खड़ा करने की कोशिश की।
फिर दूसरा हाथ दीवार से हटाकर नेहा को एक और जोरदार थप्पड़ मार दिया।
थप्पड़!
गुप्ता जी: (चीखते हुए)
“चुप साली!”
फिर उन्होंने नेहा के बालों को मुठ्ठी में कसकर पकड़ लिया।
कमर आगे बढ़ाई और अपना लटका हुआ लंड नेहा के चेहरे के पास ले गए।
गुप्ता जी: (भारी आवाज़ में)
“साली मुँह में ले... तैयार कर... फिर देखना कितना बड़ा है तेरे चूतिए पति से...”
नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में सीधे देखा।
और ना में सिर हिला दिया।
गुप्ता जी ने अपना लटका हुआ लंड नेहा के चेहरे पर फेरना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे, गुस्से और हताशा के साथ वो उसे नेहा के गालों पर, सूजे हुए होंठों पर, और नाक पर रगड़ रहे थे।
पूरी कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह लंड खड़ा हो जाए।
नेहा ने अपना मुँह कसकर बंद कर लिया था।
होंठों को भींचे हुए ऊपर गुप्ता जी की तरफ देख रही थी।
उसकी आँखों में अभी भी वही शरारत और चुनौती थी।
गुप्ता जी ने नेहा के बालों को और कसकर खींचा।
उसका सिर पीछे की तरफ झुक गया।
गुप्ता जी: (गुस्से में गरजते हुए)
“खोल ना साली मुँह...!”
नेहा ने हल्का सा ना में सिर हिला दिया।
उसके होंठ और भी कस गए।
वो बिल्कुल नहीं खोल रही थी।
गुप्ता जी के लंड से प्रीकम बह रहा था।
नेहा के पूरे चेहरे को गीला कर रहा था।
नेहा उसे करने दे रही थी।
मगर जैसे ही गुप्ता जी लंड का टोपा उसके होंठों पर लगाकर मुँह में डालने की कोशिश करते, नेहा मुँह फेर लेती।
नेहा: (शरारत भरी आवाज़ में)
“आप मुझसे ज़बरदस्ती नहीं कर सकते अंकल...”
जैसे वो कोई खेल खेल रही हो।
मैंने देखा — गुप्ता जी का हाथ ढीले लंड की खाल को तेज़ी से ऊपर-नीचे कर रहा था।
गुप्ता जी: (गुस्से में)
“साली... रंडी... ज़बरदस्ती बोल रही है... खोल ना मुँह कुतिया...”
और वो और होल्ड नहीं कर पाए।
सफ़ेद पानी की एक लहर सी उनके लंड के टोपे के छेद से बाहर निकली।
नेहा के चेहरे पर।
एक... दो... तीन... चार... पाँच...
जैसे कई सालों का स्टोर करके रखा हो।
नेहा के खूबसूरत चेहरे पर गाढ़ा, गर्म वीर्य छिटक गया।
उसकी आँखें, गाल, होंठ, नाक — सब कुछ ढक गया।
थोड़ी देर सब शांत रहा।
जैसे कोई तूफ़ान गुज़र गया हो।
सबसे पहले गुप्ता जी ने नेहा के बालों को छोड़ा।
जैसे नशा उतर गया हो।
जैसे कोई सीन खत्म होने के बाद डायरेक्टर ने “कट” बोल दिया हो।
वे अपने सहारे से खड़े नहीं हो पा रहे थे।
इसलिए ज़मीन पर धड़ाम से गिर गए।
गुप्ता जी: (बार-बार)
“सॉरी... सॉरी... सॉरी बेटी... सॉरी बेटा...”
उन्हें महसूस हुआ कि पिछले 15 मिनट में उन्होंने क्या करने की कोशिश की थी।
सिक्युरिटी में इसके लिए कई साल की सज़ा है।
थोड़ी और हिम्मत करके वे उठे।
“सॉरी... सॉरी...” अभी भी ज़ुबान पर था।
और वो बाथरूम की तरफ़ भागे।
फिर वहाँ से हमें उल्टियों की आवाज़ें आने लगी।
नेहा मेरे पास बैठी थी।
उसका चेहरा अभी भी गुप्ता जी के सफ़ेद पानी में सना हुआ था।
बेहद खूबसूरत लग रही थी।
मैं
“ये सब क्या था?”
मैं:
“क्या तुम और राहुल...?”
नेहा ने मेरी आँखों में देखते हुए ना का इशारा किया।
मैं:
“फिर क्यों?”
इस बार नेहा सीधे मेरी तरफ़ बढ़ी।
होंठ से होंठ मिले।
वो होंठ जो अभी गुप्ता जी से चिपके हुए थे।
जिन्हें खोलने के लिए गुप्ता जी ने लंड रगड़ा था।
मगर बेझिझक नेहा ने किस का स्वागत किया।
हमारे चेहरे मिले।
गुप्ता जी का पानी अब मेरे मुँह पर भी चिपचिपा रहा था।
नेहा ने मेरे लंड की हार्डनेस को अच्छे से महसूस किया।
फिर नेहा खड़े होने की कोशिश करती है, मेरे साथ।
वो स्लैब पर रखे गुप्ता जी के पैकेट से एक सिगरेट निकालती है।
मेरा हाथ पकड़कर सोफ़े की तरफ़ बढ़ी।
नेहा: (सिगरेट जलाते हुए)
“मुझे लगा नहीं था कि एक ही रात में...”
मैं:
“रात में क्या बेबी...?”
नेहा:
“कुछ नहीं... चेक करो... मर तो नहीं गया साला हमारे बाथरूम में... और कोई गंदगी की होगी तो बूढ़ा खुद साफ़ करे।”
सीधा साला।
कोई गुप्ता जी नहीं।
कोई इज़्ज़त नहीं।
ये वही नेहा थी जो आधे घंटे पहले इतनी सबमिसिव प्ले कर रही थी।
थोड़ी देर बाद मैं गुप्ता जी को आधी बेहोश हालत में बाथरूम से लाया।
आते ही सोफ़े पर पटका।
वो अपने कपड़े ढूंढ रहे थे।
मैंने मदद की।
बैकग्राउंड में “सॉरी... सॉरी...” बज रहा था।
पूरे कपड़े पहनने के बाद वो नेहा के पास आता है।
नेहा नंगी।
टाँगें खुली।
कोई शर्म नहीं।
सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए।
पास आते ही वो किसी बच्चे की तरह रोने लगता है।
वो आदमी जो थोड़ी देर पहले मेरे खानदान को चोदने की बातें कर रहा था।
नेहा ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
नेहा:
“It’s ok uncle... कोई बात नहीं... मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी... प्लीज़ आप ये रोना-धोना मत कीजिए...”
गुप्ता जी:
“I am sorry बेटी... मैं अब कभी नहीं...”
नेहा ने पूरा सेंटेंस होने नहीं दिया।
“लेकर जाओ इसको... घर छोड़ दो।”
मैं अंकल को पकड़कर घर ले गया।
3 बज रहे थे।
उनका दरवाज़ा खुला था।
उनका रोज़ का हाल था ऐसा।
घर से कोई नहीं जागा।
वापस आया तो नेहा हमारी ऑफ़िस चेयर पर बैठी हुई थी।
लैपटॉप ऑन था।
वो एक ईमेल का जवाब दे रही थी।
“हम तैयार हैं... आप प्लीज़ डेट्स कन्फ़र्म कीजिए...”
The End
(End of Chapter 3)


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