01-07-2026, 06:51 PM
एक और ज़ोरदार थप्पड़।
नेहा की गांड़ फिर से थरथराई। लाल निशान और गहरा हो गया।
लेकिन इस बार गुप्ता जी ने थप्पड़ मारने में इतना ज़ोर लगा दिया कि उनका बैलेंस बिगड़ गया।
वे लड़खड़ाए और ज़मीन पर गिर गए।
धड़ाम!
गुप्ता जी ज़मीन पर बैठ गए, थोड़े से झुककर।
नेहा ने थप्पड़ के दर्द से “आह्ह्ह...” की आवाज़ निकाली।
वो कुछ समझ पाती, उससे पहले गुप्ता जी के गिरने की आवाज़ आई — धड़ाम!
नेहा ने पीछे मुड़कर देखा।
गुप्ता जी ज़मीन पर पड़े हुए थे।
फिर उसने मुझे देखा — मैं भी ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा था।
ये देखकर नेहा की एकदम से हँसी निकल गई।
रात में पहली बार नेहा ने अपना submissive चरित्र ब्रेक किया था।
शायद सीन देखकर उससे रुका ही नहीं गया।
वो गुप्ता जी की तरफ़ इशारा करके ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।
उसकी आँखों में अभी भी पानी था — जो थप्पड़ के बाद आया था — लेकिन अब वो खुलकर हँस रही थी।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
मुझे हँसते देखकर वो और ज़ोर से हँस पड़ी।
गुप्ता जी का चेहरा लाल हो रहा था।
उन्हें लग रहा था कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है।
पहले उन्होंने अपने बल पर उठने की कोशिश की, लेकिन नशे की वजह से उनका शरीर हिला भी नहीं।
फिर वो थोड़ा सरकते हुए, पेट के बल रेंगते हुए नेहा के पास पहुँचे।
नेहा खड़ी थी।
गुप्ता जी ज़मीन पर पेट के बल लेटे हुए थे।
उन्होंने पहले एक हाथ से नेहा के बाएँ पैर को नीचे से पकड़ लिया, फिर दूसरे हाथ से दाएँ पैर को।
दोनों हाथों से नेहा की टाँगों को कसकर पकड़कर उन्होंने खींचने की कोशिश शुरू कर दी।
नेहा की टाँगें अब गुप्ता जी के हाथों में थीं।
वो ज़मीन पर पड़े हुए थे और नेहा की जाँघों को खींच रहे थे, जैसे उसे अपने पास खींचना चाहते हों।
गुप्ता जी के हाथ नेहा की जाँघों पर चढ़ रहे थे।
वे लड़खड़ाते हुए बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे थे, जैसे किसी तरह खड़े होना चाहते हों।
फिर उन्होंने नेहा की जाँघों को कसकर पकड़ लिया और जैसे-तैसे अपने घुटनों पर आ गए।
जैसे ही बैलेंस बना, सबसे पहला काम उन्होंने नेहा की जाँघों में फँसी हुई पैंटी को ज़मीन की तरफ़ एक ज़ोरदार झटके से खींच लिया।
पैंटी नेहा की जाँघों से निकलकर ज़मीन पर गिर गई।
अब नेहा पूरी तरह नंगी खड़ी थी।
नेहा की हँसी तो बंद हो चुकी थी, लेकिन उसकी खिलखिलाहट अभी भी हवा में तैर रही थी।
घुटनों पर बैठे गुप्ता जी के ठीक सामने नेहा की चूत थी — पूरी तरह नंगी, गुलाबी और हल्के-हल्के रिस रही थी। छोटी-छोटी बूँदें उसकी जाँघों की अंदरूनी सतह पर चमक रही थीं।
जैसे ही गुप्ता जी ने अपना मुँह और करीब लाया, नेहा की खिलखिलाहट एकदम से रुक गई।
उसने गुप्ता जी की गर्म साँसें अपनी चूत पर महसूस कीं।
नेहा नीचे झाँक कर देख रही थी। गुप्ता जी उसकी चूत से बस एक इंच दूर थे। उनकी गर्म हाँफती साँसें सीधे उसकी नम फाँकों पर पड़ रही थीं।
गुप्ता जी: (नशे और उत्तेजना में भारी आवाज़ में)
“साली बिलकुल कसी हुई है... ये मादरचोद करता क्या है इसके साथ फिर?”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस उसने अपना हाथ नीचे किया और गुप्ता जी के हल्के सफ़ेद बालों में उँगलियाँ फिराने लगी — धीरे-धीरे, लगभग प्यार से समवारते हुए।
गुप्ता जी: (और करीब आते हुए, होंठों से लगभग छूते हुए)
“मरदचोद कुछ तो करता होगा ना... नहीं तो तू काम का इसे छोड़ देती?”
नेहा शर्माते हुए मुस्कुराई। उसकी आँखें आधी बंद थीं। गुप्ता जी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए वो धीमी, लेकिन बिना किसी शर्म के आवाज़ में बोली:
नेहा:
“और भी तरीके होते हैं...”
गुप्ता जी: (हँसते हुए, नाक से नेहा की चूत के पास ही)
“हम्म... लगा मुझे... इसे देखकर ही लगता है ये अच्छे से खाता होगा इसे।”
नेहा: (मुस्कुराते हुए, गुप्ता जी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए)
“बहुत अच्छे से...”
गुप्ता जी: (ज़बान की नोक से हल्का-हल्का चाटते हुए)
“जो साले अपने लंड से कुछ नहीं कर पाते... वो ऐसे स्किल में माहिर हो जाते हैं।”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराती रही।
मेरा मजाक उड़ाया जा रहा था।
मगर कोई नहीं हँसा। कमरे में सिर्फ़ भारी साँसें और नेहा की हल्की सिसकारियाँ थीं।
गुप्ता जी: (अपनी ज़बान को थोड़ा और अंदर घुसाते हुए)
“पर साला मुझे ज़रूरत नहीं पड़ी कभी इसकी... या साली तेरी जैसी चूत कभी नहीं मिली।
मगर आज...”
नेहा: (आँखें बंद करके, हल्के से काँपते हुए)
“आज क्या...?”
गुप्ता जी ने नेहा की चूत पर हल्के से फूँक मारी। गर्म हवा उसकी नम फाँकों पर पड़ी तो नेहा का पूरा शरीर सिहर गया।
नेहा:
“अच्छा करके दिखाइए ट्राई... मुझे लगता है आप भी अच्छा ही करेंगे।”
गुप्ता जी : (आँखें खोलकर, शरारत भरी नज़र से नीचे देखते हुए)
“अच्छा बेटी... क्यों लगता है तुझे ऐसा?”
नेहा: (धीरे से, लेकिन पूरी शरारत के साथ)
“मुझे लगता है क्योंकि ये आपके खून में है... आशा है आपको किसी की जूठी चीज़ खाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।”
मैं और गुप्ता जी दोनों ही एक पल के लिए चुप।
हम दोनों सोच रहे थे कि नेहा क्या बोल रही है।
नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में देखा और... आँख मार दी।
कुछ तो था जो वो गुप्ता जी को सिर्फ़ उनके कान में सिहरों भरे शब्दों में कह रही थी। मैं नहीं समझ पाया।
पर गुप्ता जी का चेहरा एकदम बदल गया। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं, फिर नशे और उत्तेजना में जल उठीं।
गुप्ता जी: (हँसते हुए, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी गर्मी)
“चुप मादरचोद... झूठ बोल रही है साली!”
और नेहा फिर से खिलखिला पड़ी।
ये हँसी कुछ अलग थी — जैसे किसी को चिढ़ाते हुए, शरारत से हँस रही हो।
गुप्ता जी का हाथ नेहा की जाँघों से ऊपर चढ़ता हुआ उसके कंधे तक पहुँच गया। वो खड़े होने के लिए सहारा ढूंढ रहे थे। नेहा हँसते-हँसते अपना हाथ बढ़ाकर उन्हें सहारा देने लगी।
लड़खड़ाते हुए, हाँफते हुए गुप्ता जी किसी तरह अपने पैरों पर खड़े हो गए।
मुझे अभी भी पूरी तरह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हो रहा है।
गुप्ता जी: (गुस्से और नशे में)
“तू साली झूठ बोल रही है... मेरा बेटा ऐसा नहीं है!”
उस वाक्य ने मुझे तुरंत क्लियर कर दिया — नेहा ने गुप्ता जी को उनके बेटे के बारे में चिढ़ाया था।
मुझे याद आया जब मेने नेहा को पार्टी में राहुल के साथ टॉयलेट से बहार आते हुए देखा था
नेहा की गांड़ फिर से थरथराई। लाल निशान और गहरा हो गया।
लेकिन इस बार गुप्ता जी ने थप्पड़ मारने में इतना ज़ोर लगा दिया कि उनका बैलेंस बिगड़ गया।
वे लड़खड़ाए और ज़मीन पर गिर गए।
धड़ाम!
गुप्ता जी ज़मीन पर बैठ गए, थोड़े से झुककर।
नेहा ने थप्पड़ के दर्द से “आह्ह्ह...” की आवाज़ निकाली।
वो कुछ समझ पाती, उससे पहले गुप्ता जी के गिरने की आवाज़ आई — धड़ाम!
नेहा ने पीछे मुड़कर देखा।
गुप्ता जी ज़मीन पर पड़े हुए थे।
फिर उसने मुझे देखा — मैं भी ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा था।
ये देखकर नेहा की एकदम से हँसी निकल गई।
रात में पहली बार नेहा ने अपना submissive चरित्र ब्रेक किया था।
शायद सीन देखकर उससे रुका ही नहीं गया।
वो गुप्ता जी की तरफ़ इशारा करके ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।
उसकी आँखों में अभी भी पानी था — जो थप्पड़ के बाद आया था — लेकिन अब वो खुलकर हँस रही थी।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
मुझे हँसते देखकर वो और ज़ोर से हँस पड़ी।
गुप्ता जी का चेहरा लाल हो रहा था।
उन्हें लग रहा था कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है।
पहले उन्होंने अपने बल पर उठने की कोशिश की, लेकिन नशे की वजह से उनका शरीर हिला भी नहीं।
फिर वो थोड़ा सरकते हुए, पेट के बल रेंगते हुए नेहा के पास पहुँचे।
नेहा खड़ी थी।
गुप्ता जी ज़मीन पर पेट के बल लेटे हुए थे।
उन्होंने पहले एक हाथ से नेहा के बाएँ पैर को नीचे से पकड़ लिया, फिर दूसरे हाथ से दाएँ पैर को।
दोनों हाथों से नेहा की टाँगों को कसकर पकड़कर उन्होंने खींचने की कोशिश शुरू कर दी।
नेहा की टाँगें अब गुप्ता जी के हाथों में थीं।
वो ज़मीन पर पड़े हुए थे और नेहा की जाँघों को खींच रहे थे, जैसे उसे अपने पास खींचना चाहते हों।
गुप्ता जी के हाथ नेहा की जाँघों पर चढ़ रहे थे।
वे लड़खड़ाते हुए बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे थे, जैसे किसी तरह खड़े होना चाहते हों।
फिर उन्होंने नेहा की जाँघों को कसकर पकड़ लिया और जैसे-तैसे अपने घुटनों पर आ गए।
जैसे ही बैलेंस बना, सबसे पहला काम उन्होंने नेहा की जाँघों में फँसी हुई पैंटी को ज़मीन की तरफ़ एक ज़ोरदार झटके से खींच लिया।
पैंटी नेहा की जाँघों से निकलकर ज़मीन पर गिर गई।
अब नेहा पूरी तरह नंगी खड़ी थी।
नेहा की हँसी तो बंद हो चुकी थी, लेकिन उसकी खिलखिलाहट अभी भी हवा में तैर रही थी।
घुटनों पर बैठे गुप्ता जी के ठीक सामने नेहा की चूत थी — पूरी तरह नंगी, गुलाबी और हल्के-हल्के रिस रही थी। छोटी-छोटी बूँदें उसकी जाँघों की अंदरूनी सतह पर चमक रही थीं।
जैसे ही गुप्ता जी ने अपना मुँह और करीब लाया, नेहा की खिलखिलाहट एकदम से रुक गई।
उसने गुप्ता जी की गर्म साँसें अपनी चूत पर महसूस कीं।
नेहा नीचे झाँक कर देख रही थी। गुप्ता जी उसकी चूत से बस एक इंच दूर थे। उनकी गर्म हाँफती साँसें सीधे उसकी नम फाँकों पर पड़ रही थीं।
गुप्ता जी: (नशे और उत्तेजना में भारी आवाज़ में)
“साली बिलकुल कसी हुई है... ये मादरचोद करता क्या है इसके साथ फिर?”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस उसने अपना हाथ नीचे किया और गुप्ता जी के हल्के सफ़ेद बालों में उँगलियाँ फिराने लगी — धीरे-धीरे, लगभग प्यार से समवारते हुए।
गुप्ता जी: (और करीब आते हुए, होंठों से लगभग छूते हुए)
“मरदचोद कुछ तो करता होगा ना... नहीं तो तू काम का इसे छोड़ देती?”
नेहा शर्माते हुए मुस्कुराई। उसकी आँखें आधी बंद थीं। गुप्ता जी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए वो धीमी, लेकिन बिना किसी शर्म के आवाज़ में बोली:
नेहा:
“और भी तरीके होते हैं...”
गुप्ता जी: (हँसते हुए, नाक से नेहा की चूत के पास ही)
“हम्म... लगा मुझे... इसे देखकर ही लगता है ये अच्छे से खाता होगा इसे।”
नेहा: (मुस्कुराते हुए, गुप्ता जी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए)
“बहुत अच्छे से...”
गुप्ता जी: (ज़बान की नोक से हल्का-हल्का चाटते हुए)
“जो साले अपने लंड से कुछ नहीं कर पाते... वो ऐसे स्किल में माहिर हो जाते हैं।”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराती रही।
मेरा मजाक उड़ाया जा रहा था।
मगर कोई नहीं हँसा। कमरे में सिर्फ़ भारी साँसें और नेहा की हल्की सिसकारियाँ थीं।
गुप्ता जी: (अपनी ज़बान को थोड़ा और अंदर घुसाते हुए)
“पर साला मुझे ज़रूरत नहीं पड़ी कभी इसकी... या साली तेरी जैसी चूत कभी नहीं मिली।
मगर आज...”
नेहा: (आँखें बंद करके, हल्के से काँपते हुए)
“आज क्या...?”
गुप्ता जी ने नेहा की चूत पर हल्के से फूँक मारी। गर्म हवा उसकी नम फाँकों पर पड़ी तो नेहा का पूरा शरीर सिहर गया।
नेहा:
“अच्छा करके दिखाइए ट्राई... मुझे लगता है आप भी अच्छा ही करेंगे।”
गुप्ता जी : (आँखें खोलकर, शरारत भरी नज़र से नीचे देखते हुए)
“अच्छा बेटी... क्यों लगता है तुझे ऐसा?”
नेहा: (धीरे से, लेकिन पूरी शरारत के साथ)
“मुझे लगता है क्योंकि ये आपके खून में है... आशा है आपको किसी की जूठी चीज़ खाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।”
मैं और गुप्ता जी दोनों ही एक पल के लिए चुप।
हम दोनों सोच रहे थे कि नेहा क्या बोल रही है।
नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में देखा और... आँख मार दी।
कुछ तो था जो वो गुप्ता जी को सिर्फ़ उनके कान में सिहरों भरे शब्दों में कह रही थी। मैं नहीं समझ पाया।
पर गुप्ता जी का चेहरा एकदम बदल गया। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं, फिर नशे और उत्तेजना में जल उठीं।
गुप्ता जी: (हँसते हुए, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी गर्मी)
“चुप मादरचोद... झूठ बोल रही है साली!”
और नेहा फिर से खिलखिला पड़ी।
ये हँसी कुछ अलग थी — जैसे किसी को चिढ़ाते हुए, शरारत से हँस रही हो।
गुप्ता जी का हाथ नेहा की जाँघों से ऊपर चढ़ता हुआ उसके कंधे तक पहुँच गया। वो खड़े होने के लिए सहारा ढूंढ रहे थे। नेहा हँसते-हँसते अपना हाथ बढ़ाकर उन्हें सहारा देने लगी।
लड़खड़ाते हुए, हाँफते हुए गुप्ता जी किसी तरह अपने पैरों पर खड़े हो गए।
मुझे अभी भी पूरी तरह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हो रहा है।
गुप्ता जी: (गुस्से और नशे में)
“तू साली झूठ बोल रही है... मेरा बेटा ऐसा नहीं है!”
उस वाक्य ने मुझे तुरंत क्लियर कर दिया — नेहा ने गुप्ता जी को उनके बेटे के बारे में चिढ़ाया था।
मुझे याद आया जब मेने नेहा को पार्टी में राहुल के साथ टॉयलेट से बहार आते हुए देखा था


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