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अध्याय -16
विशाल की यह घिनौनी और बेहद आक्रामक शर्त सुनते ही आयशा का पूरा वजूद कांप उठता है। उनका दिमाग सुन्न हो जाता है।
आयशा (मन में भयंकर सदमे में डूबते हुए): "या खुदा... यह दरिंदा मुझसे क्या मांग रहा है? मुझे इसके सामने खुद अपने मुँह से सूट उतारने की भीख मांगनी होगी? और इसके बाद, सिर्फ लाल अंडरगारमेंट्स में, इसके सामने... नहीं! मैं यह कैसे करूँगी? लेकिन... अगर मैंने मना कर दिया, तो सायमा की वो २१ तस्वीरें यह कभी डिलीट नहीं करेगा। मेरी बच्ची की ज़िंदगी इसके हाथ में है... उफ़, मेरे इस तंग काले सूट के अंदर मेरे मम्मे इस कल्पना से ही कितनी बुरी तरह तड़प रहे हैं... मेरे गुलाबी निपल्स इस बेशरम शर्त को सुनकर और भी सख्त हो गए हैं…"
विशाल (अम्मी की गर्दन पर अपनी जीभ फेरते हुए, कामुक लहज़े में): "सोच लो आयशा... फैसला तुम्हारे हाथ में है।"
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आयशा के दिमाग में एक भयंकर तूफ़ान चल रहा है। एक तरफ उनकी ममता और बेटी की इज़्ज़त का सवाल है, दूसरी तरफ उनकी खुद की आबरू। बहुत सोचने के बाद, आखिरकार वह अपनी सायमा की खातिर विशाल के आगे पूरी तरह घुटने टेकने का फैसला कर लेती हैं।
आयशा (मन में बेहद शर्म और सिहरन के साथ): "मुझे अपनी बच्ची के लिए यह ज़हर पीना ही होगा... इसके अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं है। या खुदा, मुझे इस बेशरमी के लिए माफ़ करना..."
वह अपनी आँखें कसकर बंद कर लेती हैं । उनके काले सूट के भीतर बंद उनके दोनों भारी मम्मों के गुलाबी निपल्स इस वक्त खौफ और उत्तेजना से पत्थर की तरह कड़े हो चुके हैं। वह बिल्कुल धीमी, कांपती और मरती हुई आवाज़ में विशाल के कान के पास फुसफुसाती हैं, ताकि सिर्फ वही सुन सके।
आयशा (बेहद धीमी आवाज़ में): "मेरा... मेरा काला सूट हटा दो... विशाल जी..."
विशाल के चेहरे पर एक शैतानी और कामुक मुस्कान आ जाती है। वह इतनी आसानी से आयशा को छोड़ने वाला नहीं था। वह उनकी मर्यादा और गुरूर को पूरी तरह कुचलकर चरम मज़ा लेना चाहता था।
विशाल (जानबूझकर ज़ोर से और कड़क आवाज़ में): "अरे आयशा जी! ज़रा ज़ोर से बोलिए... मुझे आपकी आवाज़ बिल्कुल साफ नहीं सुनाई दे रही है। क्या कहा आपने? आप अपने इस खूबसूरत बदन से क्या उतारना चाहती हैं? ज़रा खुलकर और ऊँची आवाज़ में कहिए, मैं सुनना चाहता हूँ कि आप इस वक्त मुझसे क्या चाहती हैं!"
अम्मी विशाल की इस नीचता पर अंदर तक रो पड़ती हैं, लेकिन बची हुई २१ तस्वीरों का खौफ उनके सिर पर नाच रहा था। वह अपनी बची-खुची शर्म को दरकिनार करते हुए, गहरी साँस लेती हैं। इस बार उनकी आवाज़ में लाचारी और उत्तेजना का एक ऐसा मिश्रण था कि वह छत के सन्नाटे को चीरती हुई गूँज गई।
आयशा (ऊँची और साफ़ आवाज़ में, हाँफते हुए): "मैंने कहा... मेरा काला सूट उतार दो विशाल जी!... और मुझे सिर्फ मेरे लाल अंडरगारमेंट्स में कर दो... मैं आपको अपना यह खूबसूरत जिस्म दिखाना चाहती हूँ।"
वह अपनी आँखें बंद कर लेती है, जैसे खुद को पूरी तरह से उसकी शर्तों और अपनी इस नई जागती हुई बेताबी के हवाले कर रही हो। उसके सीने का उभार उसकी तेज़ चलती साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा है।
दीवार की ओट में छुपा मैं... अम्मी के मुँह से निकले इन साफ़ और बेशरम शब्दों को सुनकर पूरी तरह से स्तब्ध रह गया। मेरा दिमाग सुन्न हो गया और जिस्म का पूरा खून खौल उठा। मुझे अपनी ही कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह मेरी वही पाक अम्मी थीं, जो एक गैर मर्द के सामने खुद को नंगा करने की भीख मांग रही थीं। इस खौफनाक और चरम कामुक कबूलनामे को सुनकर मेरे पैंट के अंदर तना हुआ मेरा अंग इस कदर बेकाबू होकर कसमसाया कि मेरी साँसें वहीं थम गईं।
विशाल के चेहरे पर एक चमक आ जाती है। वह अम्मी के बिल्कुल करीब आता है, जिससे उसकी जींस अम्मी के बदन से पूरी तरह से सट जाती है। उसके साँवले हाथ अम्मी के दुपट्टे/हिजाब पर टिकते हैं।
विशाल (कामुक आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "तो तुम्हारी यह ख्वाहिश सुनकर दिल खुश हो गया, आयशा... लो, सबसे पहले इस पर्दे को हटाते हैं।"
विशाल बहुत धीरे-धीरे और तसल्ली से अम्मी का दुपट्टा उनके बदन से सरकाकर छत के फर्श पर गिरा देता है। अम्मी की गोरी गर्दन और कंधे अब रात की ठंडी हवा में पूरी तरह नुमाया हो जाते हैं। इसके बाद, विशाल अम्मी की दोनों कलाइयों को पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठाता है।
विशाल (आयशा के दोनों हाथ ऊपर उठाते हुए, उनकी आँखों में देखते हुए): "अब अपने इन नाज़ुक हाथों को ऊपर ही उठाए रखो, आयशा...।"
जैसे ही उसने उनके दोनों हाथों को ऊपर की तरफ खींचा, आयशा का पूरा सीना तन गया। उनके काले सूट के टाइट कपड़े में कैद दोनों भारी मम्मे अब और भी ज़्यादा उभरकर सामने आ गए थे। उनके निप्पल उस महीन कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे, जो सीधे विशाल की आँखों के सामने थे। अपनी इस तनी हुई हालत में, उनके मम्मे मानो सीधे विशाल की उँगलियों और उसके मुँह के छुअन की भीख माँग रहे हों, जैसे कह रहे हों कि अब और इंतज़ार नहीं होता, इन्हें अपनी गिरफ्त में ले लो।
विशाल (बड़ी मुश्किल से अपनी नज़रें वहाँ से हटाता है, और अम्मी के तंग काले सूट के निचले हिस्से को पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ खींचने लगता है।)
जैसे-जैसे कपड़ा ऊपर जा रहा था, आयशा का गोरा नंगा बदन, जो बिल्कुल सफेद संगमरमर की तरह चमक रहा था, धीरे-धीरे नज़र आने लगता है। उनकी मखमली त्वचा देखकर विशाल की आँखें फटी की फटी रह गईं। इस बेधड़क और उत्तेजक नज़ारे ने विशाल के भीतर की आग को चरम पर पहुँचा दिया, और उसका लंड पूरी तरह से अकड़कर सीधा खड़ा हो चुका था, जो अब और ज़्यादा इंतज़ार करने के मूड में बिल्कुल नहीं था।
विशाल (हवस से हाँफते हुए): "उफ़्फ़ आयशा... क्या बदन पाया है तुमने। तुम्हारी यह मखमली और गोरी त्वचा... कसम से, इस उम्र में भी तुम किसी अप्सरा जैसी लगती हो। तुम्हारी खुशबू मुझे पागल कर रही है..."
एक ज़ोरदार सरसराहट के साथ, विशाल वह काला सूट अम्मी के सिर के ऊपर से पूरी तरह खींचकर अलग कर देता है।
अब अम्मी छत के उस मद्धम अंधेरे में सिर्फ नीचे ढीली सलवार और ऊपर सुर्ख लाल रंग की ब्रा में खड़ी थीं। काले सूट के हटते ही उनके दोनों भारी, गोल और सुडौल मम्मे उस तंग ब्रा से 50% से भी ज़्यादा बाहर छलक आए थे।
गोरे बदन पर वह लाल रंग बिजली की तरह कौंध रहा था, और उनके दोनों गुलाबी निपल्स ब्रा के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को तड़प रहे थे।
विशाल की भूखी निगाहें अम्मी के इस मखमली और बेपर्दा बदन पर टिक गईं, जिससे उसकी रगों में दौड़ता खून खौलने लगा।
आयशा (शर्म और बेबसी से अपनी आँखें बंद किए हुए, अपनी बांहों से बदन को ढँकने की नाकाम कोशिश करते हुए): "अह्ह... विशाल... बस करो... "
दीवार की ओट में छुपा मैं... अपनी अम्मी को इस रूप में देखकर वह एक भयंकर और खौफनाक मानसिक द्वंद्व में फंस चुका था। मेरा दिल और दिमाग बुरी तरह दो हिस्सों में टूट रहे थे।
मैं (मन में पागलों की तरह सोचते हुए): "एक हिस्सा बुरी तरह चिल्ला रहा था कि अभी के अभी बाहर निकलूँ, उस दरिंदे विशाल का कॉलर पकड़ूँ और इस गंदे खेल को हमेशा के लिए खत्म कर दूँ! अपनी अम्मी की आबरू बचा लूँ। लेकिन... मेरे वजूद का दूसरा हिस्सा, जो वासना की आग में अंधा हो चुका था, वह चाहता था कि यह मंज़र यहीं न रुके, बल्कि आगे बढ़ता रहे... क्योंकि जिंदगी में पहली बार मैं अपनी सगी अम्मी को इस अर्धनग्न, इतने कामुक और मदहोश कर देने वाले रूप में देख रहा था। उनके वो भारी मम्मे... वो लाल ब्रा... इस नजारे ने मेरे पैंट के अंदर तने अंग को बेकाबू कर दिया था। मैं अपनी नजरें वहाँ से हटा ही नहीं पा रहा था।"
विशाल (अपनी कांपती, हवस भरी उँगलियों को अम्मी के चेहरे पर फेरते हुए): "उफ़्फ़ आयशा... मुझे इस जवानी के दीदार तो करने दो..."
यह कहते ही उसने अम्मी के उन हाथों को उनके सीने से झटके से हटाया, जिनसे वे खुद को ढकने की एक नाकाम कोशिश कर रही थीं, और उन्हें दोबारा ऊपर की तरफ खींच दिया।
इस अचानक हरकत से आयशा का पूरा बदन एक बार फिर सीधा तन गया, और लाल ब्रा में जकड़े उनके दोनों भारी मम्मे पूरी तरह से बेपर्दा होकर विशाल की आँखों के ठीक सामने आ गए, मानो इस तन्हाई में अपनी आज़ादी की भीख माँग रहे हों।
विशाल के मजबूत हाथ अम्मी के गालों से फिसलते हुए उनकी गोरी सुराहीदार गर्दन पर आते हैं। उसकी एक उँगली आयशा के काँपते हुए रसीले होंठों पर धीरे-धीरे घूमने लगती है, जिससे अम्मी की साँसें और भी ज़्यादा बेकाबू होने लगती हैं।
फिर विशाल अपनी उँगलियों को और नीचे ले जाता है। वह ब्रा को बिना हटाए, उसके ऊपर से ही उनके उन 50% से ज़्यादा बाहर छलकते भारी, गर्म मम्मों को अपनी दोनों हथेलियों में भरकर बेरहमी से भींचने लगता है। ब्रा के तंग कपड़े के ऊपर से जब विशाल के हाथों का वह भारी और सख्त दबाव अम्मी के नाज़ुक बदन पर पड़ता है, तो आयशा के मुँह से एक तीखी और गहरी सिसकारी फूट पड़ती है।
आयशा (अपनी आँखें बंद किए, दर्द और लज्जा के मिले-जुले अहसास में हाँफते हुए फुसफुसाती है): "अह्ह्ह... प्लीज विशाल, ऐसे मत करो... मुझे... मुझे कुछ अजीब सा फील हो रहा है... रुक जाओ..."
फिर उसका हाथ और नीचे सरकते हुए उनके उस रेशम जैसे चिकने, गर्म और नंगे पेट पर गोल-गोल घूमने लगता है।
आयशा (मन में हांफते हुए, बदन की सिहरन को दबाते हुए): "या खुदा... इसके हाथ मेरे पूरे बदन को अपवित्र कर रहे हैं... लेकिन मैं चाहकर भी पीछे नहीं हट सकती। मुझे सायमा के लिए यह सब सहना ही होगा..."
तभी विशाल एक गहरी साँस लेता है और अम्मी के सामने घुटनों के बल नीचे छत के फर्श पर बैठ जाता है। अम्मी की धड़कनें थम जाती हैं। वह नीचे झुककर अम्मी की सलवार के नाड़े को ढीला करता है और धीरे-धीरे उनकी सलवार को पैरों के रास्ते नीचे सरकाकर पूरी तरह बाहर निकाल देता है।
अब आयशा छत के उस मद्धम उजाले में सिर्फ और सिर्फ सुर्ख लाल रंग की ब्रा और पैन्टी में खड़ी थीं। उनका पूरा आलीशान जिस्म लगभग पूरी तरह नंगा हो चुका था।
विशाल (घुटनों के बल बैठा): "ओहहह माय गॉड... आयशा... तुम कोई औरत हो या कोई अप्सरा... यह क्या कयामत बदन है!"
दीवार की ओट में छुपा मैं और सामने बैठा विशाल... हम दोनों ही अम्मी के इस बेपनाह और कातिल हुस्न को देखकर पूरी तरह स्तब्ध रह गए थे। अम्मी की वह लाल पैन्टी इतनी ज़्यादा छोटी और तंग थी कि वह उनके सामने के कामुक उभार को बमुश्किल ढँक पा रही थी। विशाल की तीखी नज़रें उस पैन्टी के ठीक बीचों-बीच बने एक गीले दाग पर पड़ती हैं, जो अम्मी के भीतर छिपी कामुक उत्तेजना की गवाही दे रहा था।
विशाल (उस गीले पैच पर उंगली टिकाते हुए कुटिलता से हंसता है): "ज़रा देखो तो आयशा जी... मुँह से तो आप मना कर रही हैं, लेकिन आपकी यह बेशरम पैन्टी बता रही है कि आप अंदर से कितनी ज़्यादा गीली हो चुकी हैं... मेरा 10 इंच का औज़ार देखकर आपकी प्यास जाग उठी है ना?"
विशाल की नजरें ऊपर उठती हैं। अम्मी की दोनों जांघें इतनी खूबसूरत, बेदाग, चिकनी और पूरी तरह से नंगी थीं कि रात के अंधेरे में भी चमक रही थीं। अम्मी इस वक़्त पकड़े जाने के खौफ और बदन में उठती एक अनजानी, तीखी कामुक उत्तेजना के मारे अंदर तक बुरी तरह थरथरा रही थीं।
मैं (पैंट के अंदर लोहे की तरह तने अपने अंग को दबाते हुए): "हे भगवान... यह मेरी अम्मी हैं... इतनी सुडौल जांघें, वो छोटी सी लाल पैन्टी और उस पर वो कामुक गीलापन... इस नज़ारे ने मेरे दिमाग की नसें फाड़ दी थीं। विशाल के साथ-साथ मैं भी अम्मी के इस नग्न रूप का दीवाना हो चुका था। मेरा अंग इस कदर कड़ा हो चुका था कि अब मुझसे वहाँ चुपचाप खड़े रहना बर्दाश्त नहीं हो रहा था।"
विशाल (नीचे से उठकर अम्मी के बिल्कुल सामने खड़ा होता है, उनकी नंगी जांघों पर अपने हाथ फेरते हुए): "अब आयशा जान... तुम्हारी खूबसूरत जांघें और यह गीली पैन्टी देखने के बाद... मैं इन्हें हमेशा के लिए अपने दिल-दिमाग में बसा लेना चाहता हूँ।
वह अपनी पैंट की जेब से अपना फोन निकालता है, स्क्रीन ऑन करता है और सीधे उसका कैमरा खोलकर वीडियो रिकॉर्डिंग चालू कर देता है।
फोन का लेंस अम्मी के उस लाल ब्रा और पैन्टी में लिपटे गोरे बदन के ठीक सामने टिकाते हुए वह अपनी भारी, हवस भरी आवाज़ में हुक्म देता है, "आयशा जी... इतनी खूबसूरत चीज़ को मैं हमेशा के लिए कैद न करूँ, ऐसा कैसे हो सकता है? ज़रा धीरे से अपनी जगह पर घूम जाओ... टर्न अराउंड ... मुझे पीछे का नज़ारा भी देखना है। मैं तुम्हारी यह रसीली गांड भी इस कैमरे में साफ़-साफ़ देखना चाहता हूँ।"
विशाल की यह नई और शर्मनाक मांग सुनकर अम्मी का चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो जाता है। उनकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं और वह रोने जैसी आवाज़ में फुसफुसाती हैं, "नहीं विशाल... प्लीज वीडियो मत बनाओ... मैं हाथ जोड़ती हूँ... "
विशाल (कैमरे को आयशा के चेहरे के और भी करीब लाते हुए, अपनी बेहद सख्त और ठंडी आवाज़ में सीधे उसके कान के पास फुसफुसाता है): "भूल गई आयशा... वो 21 तस्वीरें अभी भी मेरे हाथ में हैं। अगर अपनी आगे की वीडियो नहीं बनवानी, तो मैं अभी इसी वक्त सायमा की सारी तस्वीरें ग्रुप चैट में डाल दूँगा। फिर सोच लो क्या तमाशा होगा।"
अपनी बेटी की इज़्ज़त के आगे बेबस अम्मी अपनी आँखें बंद कर लेती है। उनके बदन में खौफ और एक अनजानी उत्तेजना की कँपकँपी तेज़ हो जाती है। वह धीरे-धीरे, कांपते हुए अपनी पीठ विशाल और चालू कैमरे की तरफ घुमाने लगती है।
जैसे ही वह घूमती हैं, उनकी सलवार के हटने के बाद उनकी पूरी तरह से नंगी, चिकनी और सुडौल जांघों का ऊपरी हिस्सा और उस बेहद छोटी लाल पैन्टी के पतले धागों के बीच से कसमसाते उनके भारी और गोल नितंब उस मद्धम रोशनी में पूरी तरह नुमाया हो जाते हैं।
विशाल कैमरे को थोड़ा नीचे ले जाकर उनके उस भारी उभार को पूरी बारीकी से रिकॉर्ड करने लगता है, और उसकी हवस भरी साँसें और तेज़ हो जाती हैं।
दीवार के पीछे छुपा मैं अपनी सगी अम्मी के जिस्म के इस आखिरी राज़ को इस तरह एक गैर मर्द के कैमरे के सामने नीलाम होते देख पूरी तरह पागल हो चुका था। गुस्से और चरम वासना के इस भयानक बवंडर ने मेरे पैंट के अंदर तने हुए अंग को इस कदर बेकाबू कर दिया था कि मेरी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी थी।
विशाल कैमरे को बंद करके फोन को अपनी जेब में रखता है और अम्मी के बेहद करीब आ जाता है। उसकी साँसें अम्मी के नंगे बदन की खुशबू से पूरी तरह महक रही थीं।
विशाल कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहता है, "थैंक यू आयशा जी... यह वीडियो मेरे लिए एक बेशकीमती खजाना है। अब... आप आगे क्या करना? याद है ना ?"
विशाल का यह अप्रत्यक्ष इशारा आयशा को अच्छी तरह समझ आ गया था कि अब उन्हें आगे बढ़कर उसे चूमना होगा।
आयशा, जो इस वक्त सिर्फ अपनी लाल ब्रा और पैन्टी में खड़ी थीं, शर्म और कँपकँपी से अपनी आँखें मूँदे हुए थीं। विशाल के इस सवाल ने उनके भीतर की उस अनजानी उत्तेजना और बेबसी को और भी बढ़ा दिया था।
वह धीरे से अपनी आँखें खोलती हैं, विशाल के उस साँवले और चौड़े सीने की तरफ देखती हैं, और कांपते कदमों से उसके और करीब बढ़ जाती हैं। उनके भारी मम्मों का उभार विशाल के मजबूत जिस्म को छूने ही वाला था।
दीवार की ओट में छुपा मैं, अपनी अम्मी को इस तरह उस गैर मर्द के करीब जाते देख, अपनी साँसें रोककर इस चरम कामुक मोड़ का गवाह बन रहा था।
दोनों के बीच का फासला अब बिल्कुल खत्म हो गया था। छत की ठंडी, मंद-मंद हवा... अब उनके बीच से गुज़रना बंद हो गया था।
उनके जिस्मों की गर्मी ने उनके गिर्द एक छोटा सा, गर्म, बेस्र दायरा बना लिया था। विशाल इतना करीब था कि अम्मी उसके जिस्म की महक... उसके सांसों की गर्मी... अपने चेहरे पर महसूस कर सकती थीं।
वह धीरे से आगे बढ़ी और अपने कांपते हुए, रसीले होठों को विशाल के साँवले चेहरे की ओर उठा दिया।
उनका चुंबन बेहद झिझकता हुआ, धीमा और अनमना सा था।
अम्मी एकदम पीछे हट गईं। जैसे उन्हें अचानक होश आ गया हो।
"विशाल… नहीं," उन्होंने कांपती हुई आवाज़ में कहा। मैं उनकी आवाज़ साफ़ सुन सकता था। "यह... यह गलत है। हमें... हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।"
विशाल की मुस्कुराहट... रुक गई। उसके चेहरे पर एक पल के लिए सख्ती आई।
"गलत?" उसने धीरे से, आवाज़ में एक कोल्डनेस लिए कहा। "तो फिर तुम यहाँ आईं ही क्यों, आयशा?"
इससे पहले कि अम्मी जवाब दे पातीं, उसने फुर्ती से आगे बढ़कर वह आखिरी, बचा-कुचा फासला भी मिटा दिया। और फौरन उसने अपना मज़बूत हाथ अम्मी की कमर पर लपेटकर उन्हें अपनी ओर एक झटके से खींच लिया। उसकी गर्म हथेली आयशा के नर्म, गर्म जिस्म को महसूस कर रही थी।
अम्मी की एक दबी हुई "उफ़" की आवाज़ निकली, जब उनका सीना उसके सख्त, कसरती जिस्म से कुचल गया।
और फिर, बिना एक पल ज़ाया किए, बिना उन्हें सांस लेने का मौका दिए, उसने अपना मुँह उनके मुँह पर दबा दिया।
मैं वहीं, दरवाज़े की ओट में, एक ज़िंदा लाश की तरह खड़ा था। यह एक हमला था। उसने अम्मी के होठों को... कब्ज़े में ले लिया था।
अम्मी ने शायद यह उम्मीद नहीं की थी कि विशाल ऐसा करने की जुर्रत करेगा। अम्मी की आँखें फैल गईं जैसे उनको कोई शॉक लगा हो। उनका पूरा जिस्म, एक पल के लिए, उस अचानक हमले से अकड़ गया था।
उन्होंने अपने मेहंदी-रचे हाथ उठाए और उन्हें विशाल के सीने पर, उस कसी हुई ब्राउन टी-शर्ट पर रखा और उसे पीछे धकेलने की कोशिश करने लगीं।
"मम्मफ़… नहीं… रुको…" उनकी आवाज़ उस किस में ही दबकर, एक बेबस गुनगुनाहट बनकर रह गई।
लेकिन उनका धकेलना बहुत कमज़ोर था। उनकी कोशिश में ज़ोर नहीं था। उनकी उंगलियाँ उसके सख्त सीने पर बेजान सी फिसल रही थीं। वह आदमी एक पत्थर की तरह... हिला तक नहीं।
विशाल ने किस नहीं तोड़ा। वह और सख्ती से, और गहराई से अम्मी को चूमने लगा। उसने उनके होठों का पूरा ज़ायका लेते हुए, उनके निचले होंठ को अपने दांतों में हल्का सा... दबाया।
मैं वहीं, दरवाज़े की ओट में, एक ज़िंदा लाश की तरह खड़ा था।
धीरे-धीरे अम्मी के हाथों ने उसको धकेलना बंद कर दिया था जैसे कि उन्होंने हार मान ली हो। उनका जिस्म, जो अब तक उस हमले के खिलाफ अकड़ा हुआ था, वह धीरे-धीरे नर्म पड़ने लगा। और फिर जैसे उनके अंदर की सारी ताक़त निकल गई हो, अम्मी उस आदमी की बाहों में पूरी तरह पिघल गईं।
फिर उनका एक हाथ विशाल के सीने से धीरे से ऊपर उठा... और उस आदमी के कंधे को सख्ती से पकड़ लिया। उनकी मेहंदी-रची उंगलियाँ उसकी ब्राउन टी-शर्ट को जकड़ रही थीं।
और दूसरा हाथ उसकी गर्दन से होकर उसके घने, काले बालों में घुस गया। उन्होंने उसके सिर को पकड़ा और उसे अपनी तरफ खींचा और उनकी आँखें बंद हो गईं।
फिर वह, उस गैर मर्द के किस का रिस्पॉन्स देने लगीं उसी पैशन के साथ। यह अब एक हमला नहीं था। यह एक मुकाबला था। उनके होंठ, जो अब तक उसके नीचे दबे हुए थे, अब... उसके होठों के खिलाफ... जवाबी हरकत करने लगे। उन्होंने अपना मुँह... थोड़ा और... खोल दिया।
जैसे ही विशाल ने उनका यह बदलाव महसूस किया, उसके हलक से एक हल्की, गुर्राती हुई आवाज़ निकली।
“मम्मम्मफ़…..”
उसने किस तोड़ने के बजाय, उसे और गहरा, और गीला कर दिया। उनके होंठ अब एक-दूसरे पर बेकाबू होकर फिसल रहे थे।
वह गहरा, महीन रंग... वह लिप, जिसे अम्मी ने आईने के सामने इतनी एहतियात से लगाई थी... अब पूरी तरह तबाह हो चुकी थी। रंग... उनके दोनों होठों से फिसलकर, उनके चेहरों पर, उनकी ठुड्डी पर... फैल रहा था।
आयशा के भीतर छिपी कामुक उत्तेजना का बांध पूरी तरह टूट गया। पकड़े जाने का खौफ, बेटी को बचाने का जुनून और इतने लंबे समय से दबी हुई बदन की प्यास—इन सबने मिलकर आयशा को पूरी तरह बेकाबू कर दिया।
विशाल का मुँह पूरी तरह से अम्मी के मुँह पर लॉक हो चुका था। दोनों के होठ एक-दूसरे में कसमसा रहे थे और वे दोनों पागलों की तरह एक-दूसरे की जीभ को चूस रहे थे, जैसे मुँह के भीतर जीभों की कोई भयंकर जंग चल रही हो।
अम्मी अब विशाल के चुंबन का जवाब दोगुनी शिद्दत से दे रही थीं, उनके मुँह से निकलने वाली गर्म सिसकारियां विशाल के हलक में समा रही थीं।
इसी मदहोशी का फायदा उठाकर विशाल के दोनों मजबूत और बड़े हाथ अम्मी की उस छोटी लाल पैन्टी के ऊपर से उनकी भारी, गोल और मखमली गांड पर जम गए। वह अपनी उँगलियों को उनके नितंबों के मांस में धंसाते हुए उन्हें बेरहमी से भींचने और ऊपर की तरफ उठाने लगा।
इस ज़ोरदार खिंचाव की वजह से अम्मी का आगे का हिस्सा विशाल के चौड़े, गठीले सीने से पूरी तरह से सट गया। उस सुर्ख लाल ब्रा में कैद उनके दोनों सुडौल मम्मे विशाल के सीने पर बुरी तरह कसमसाने और पिसने लगे थे।
जैसे-जैसे विशाल अपनी जींस के अंदर तने हुए अंग को अम्मी के पेट और जांघों पर रगड़ रहा था, अम्मी उतनी ही दीवानगी से उसके सीने पर अपने स्तनों को रगड़ते हुए उसके होठों को और गहराई से काट रही थीं।
दीवार के पीछे छुपा मैं अपनी सगी अम्मी को एक गैर मर्द की बांहों में इस कदर कामुकता से पिघलते और जंगली अंदाज़ में चूमते देख अंदर तक हिल गया था।
गुस्से की हर सीमा खत्म हो चुकी थी और वासना की आग अपने चरम पर थी। मेरे पैंट के अंदर लोहे की छड़ बन चुका मेरा लंड अब बाहर आने को तड़प रहा था, और छत का वह सन्नाटा सिर्फ उन दोनों के होठों के आपस में टकराने की गीली और कामुक आवाज़ों से गूँज रहा था।
मैं वहीं खड़ा रहा। मैं उनकी दबी हुई 'आह' की आवाज़ें, उनके जिस्मों के मिलने की हल्की सरसराहट... उनके होठों की चप-चपाहट... सब सुन सकता था।
विशाल और अम्मी एक-दूसरे को बहुत ही शिद्दत के साथ किस कर रहे थे। मेरी पाकीज़ा और बा-पर्दा माँ अब बिल्कुल ही बेशर्म हो गई थीं। अम्मी का यह रूप मैंने कभी सपनों में भी नहीं सोचा था।
फिर... अचानक... विशाल रुक गया। उसने किस को तोड़ा। दोनों... हाँफ रहे थे। उनके माथे अब भी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उनकी भारी, गर्म सांसें उस ठंडी हवा में मिल रही थीं।
अम्मी की आँखें अब भी बंद थीं, उनका जिस्म अभी तक उस पैशन से कांप रहा था।
"तुम..." विशाल ने एक खुरदुरी, हांफती हुई आवाज़ में कहा। उसका अंगूठा अम्मी के सूजे हुए, लिपस्टिक से सने होठों के कोने पर फिरा। "...तुम्हारा टेस्ट..."
अम्मी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उनकी निगाहों में अब भी एक... नशा था।
"तुम्हें अंदाज़ा है," विशाल ने उनके कान के पास सरसराते हुए कहा, उसका हाथ अब भी उनकी कमर को सख्ती से पकड़े हुए था, "तुम मेरे साथ क्या कर रही हो?"
अम्मी के होठों पर एक हल्की सी मुस्कुराहट आई। "वही... जो तुम मेरे साथ कर रहे हो..."
विशाल के हलक से एक हल्की गुर्राहट निकली। "नहीं। तुम्हें नहीं पता।"
एक हाथ से अपनी ब्राउन टी-शर्ट को खींचता है और उसे दूर फेंक देता है।
जैसे ही विशाल का साँवला, चौड़ा और गठीला सीना पूरी तरह नंगा होता है, वह अपनी मर्दानगी दिखाते हुए अम्मी को अपनी मजबूत बांहों में ऊपर की तरफ उठा लेता है।
आयशा (अचानक हवा में उठने के कारण घबराकर, अपना संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी दोनों गोरी और नंगी जांघों को विशाल के कूल्हों के चारों तरफ कस लेती हैं): "अह्ह्ह... विशाल... क्या कर रहे हो तुम... मैं गिर जाऊँगी!"
जैसे ही आयशा की टांगें विशाल की जींस के चारों तरफ लिपटती हैं, उनकी उस छोटी लाल पैन्टी में कैद गीली चूत सीधे विशाल की पैंट के अंदर तने उसके १० इंच के लंड पर जाकर टिक जाती है। बदन के इस सीधे टकराव से आयशा के पूरे बदन में बिजली दौड़ जाती है।
आयशा (मन में चरम उत्तेजना से पिघलते हुए): "या खुदा... इसका वो कड़ा लंड सीधे मेरी पैन्टी पर दबाव बना रहा है… ऐसा लग रहा है जैसे वह इस पतले कपड़े को चीरकर मेरे अंदर समा जाएगा। मैं कितनी बेशरम हो चुकी हूँ, मैं खुद को इसकी बांहों में सौंप रही हूँ…"
विशाल अम्मी को हवा में उठाए हुए ही एक हाथ से उनके भारी नितंबों को थामता है और दूसरा मजबूत हाथ उनकी पूरी तरह नंगी, चिकनी और मखमली पीठ पर फेरने लगता है। वह फिर से पागलों की तरह उनके होठों को चूसना शुरू कर देता है।
विशाल (हाँफते हुए, अम्मी के होठों को चूसते हुए बीच-बीच में बुदबुदाता है): "उफ़्फ़ आयशा... क्या स्वाद है तुम्हारे इन होठों का... कसम से अमृत हैं ये। मैं पागल हो जाऊँगा..."
विशाल (अम्मी के मुँह के अंदर अपनी जीभ घुमाते हुए): "आह्ह्ह... आयशा... तुम बहुत गर्म हो..."
रात के उस मद्धम अंधेरे और सन्नाटे में, उन दोनों के मुँह से निकलने वाली कामुक सिसकारियां और कराहें अब साफ़-साफ़ गूँज रही थीं।
Deepak Kapoor
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