27-06-2026, 05:15 PM
भाग ~ २१
सारे रास्ते मैं अनीता की बातों के बारे में ही सोचता आया था और अब मुझे भी एहसास होने लगा था कि उसने सच कहा था। मतलब सच में हमारे बीच का प्यार भाई बहन वाला नहीं बल्कि प्रेमियों वाला था। मुझे समझ आ गया था कि क्यों अनीता से बातें करने पर मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो जाती थीं। जाहिर है...मैं भले ही पूरी तरह उस एहसास से परिचित नहीं था लेकिन सीने के जिस हिस्से में प्रेम और नफरत का ही जन्म होता है वो तो पहले ही उस चीज का एहसास कर चुका था। उसने इस एहसास को मुझे जताया भी होगा मगर मैं नासमझ था जो नजरअंदाज कर गया और उसे ठीक से समझ नहीं पाया था।
खैर अब भला क्या हो सकता था? इंसान अपने भाग्य...नसीब..या नियति के खिलाफ भला कैसे जा सकता है। उसमें इतना सामर्थ्य ही नहीं है कि वो विधाता की इच्छा के विरुद्ध जाने का सोच भी ले।
अब जबकि मैं समझ चुका था कि ये प्रेमियों वाला ही प्यार है तो बड़ा अजीब महसूस होने लगा था मुझे। बार बार खुद से यही कहता कि ऐसा कैसे कर सकता हूं मैं। अनीता मेरी छोटी बहन है....फिर भी वो इस बात को मुझसे पहले समझ गई और मैं समझ न सका था। जाने क्या सोच रही होगी अब वो मेरे बारे में? वो एकाएक नदी से बाहर चली गई थी...इसका मतलब यही हुआ कि अब वो मेरे करीब नहीं रहना चाहती है। या ये कहें कि वो मेरी प्रेमिका नहीं बनना चाहती है। मां की कोख से जन्म लेने पर जो रिश्ता हमारे बीच बन गया था वो उसी रिश्ते को बनाए रखना चाहती है।
यही सब सोचते हुए मैं घर पहुंचा। घर में दाखिल होते ही एकाएक मुझे अजीब सा एहसास होने लगा। धड़कनें ये सोच कर तेज हो गईं कि अब अनीता के सामने कैसे जाऊंगा? उससे नजरें कैसे मिलाऊंगा? उससे बात कैसे कर सकूंगा? मेरे जैसा ही हाल उसका भी तो होगा।
मैं धड़कते दिल के साथ चुपचाप आंगन से होते हुए कमरे में चला गया। दिलो दिमाग में फिर से तूफान खड़ा हो गया था जिसे काबू करने का प्रयास करते हुए मैं तेल कंघी कर के कपड़े पहनने लगा था। इस बीच कई बार मेरे मन में खयाल आया कि अनीता के पास जाऊं...उससे इस बारे में बात करूं मगर जाने क्यों अनीता के पास जाने की हिम्मत न हुई।
इस सबके बीच कई बार ऐसा हुआ कि मैं बहुत ज्यादा दुखी हुआ और मेरी आंखों में आंसू भर आए। ऐसा शायद इस लिए कि जो कुछ हुआ था उससे भाई बहन के रिश्ते की जीत हुई थी और अंदर का प्रेम या प्रेमी वाला रिश्ता जो अंजाने में खुद ही बनता जा रहा था वो एक ही पल में टूट गया था। अब क्योंकि दिलो में कोमल जज़्बात पलते हैं तो जब जज़्बात आहत होते हैं तो पीड़ा होना स्वाभाविक ही है। यही वजह थी कि मैं दुखी हो जाता था और मेरी आंखों में आंसू भर आते थे।
कपड़े पहन कर मैं कमरे से बाहर निकला। आंगन में पहुंचा तो अनायास ही मेरी नजर रसोई में खाना बना रही अनीता पर पड़ गई। उसे देखते ही दिल धक्क से रह गया। अंदर का तूफान तेज हो गया। शायद उसे भी मेरे वहां पर होने का एहसास हो गया था इस लिए न चाहते हुए भी वो एक नजर मुझे देखने के लिए मजबूर हो गई थी।
हमारी नजरें मिलीं तो मेरे जज्बात मचल उठे। अंदर एक हूक सी उठी जिसके कारण मेरा पूरा बदन हिल सा गया। तभी उसने अपनी नजरें फेर ली। मुझे ऐसा लगा जैसे खिले हुए गुलिस्तां में अचानक खिजां(पतझड़) ने अपनी दृष्टि डाल दी हो।
मेरा दिल पूरा जोर लगा के कह रहा था कि मैं रसोई में उसके पास जाऊं और उससे बात करूं लेकिन दिमाग मुझे जाने की इजाजत नहीं दे रहा था। अंदर से वो साहस ही नहीं हो रहा था कि मैं उसके पास जाऊं मगर....जज्बात जब प्रबल रूप धारण कर लेते हैं तो इंसान मजबूर हो जाता है। वही मेरे साथ हुआ।
मैं धड़कते दिल के साथ रसोई की तरफ बढ़ चला। उधर अनीता को भी पता चल गया कि मैं उसी की तरफ आ रहा हूं। उसने कनखियों से एक बार मेरी तरफ देखा। उसके हाव भाव में बदलाव साफ नजर आया। ऐसा लगा जैसे अचानक ही उसे मुझसे संकोच अथवा घबराहट होने लगी हो।
"तु..तुझसे बात करना है मुझे।" रसोई के पास पहुंचते ही मैंने हिम्मत कर के उससे कहा।
"प..पर मुझे नहीं करना।" उसने दो टूक लहजे में कहा─"तू...तू चला जा यहां से।"
"वाह...कितना जल्दी बदल गई न तू।" उसके बर्ताव से मुझे दुख हुआ─"दो ही पल में भाई बहन का प्यार भूल गई तू।"
"वो..वो भाई बहन का प्यार नहीं है।" उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा─"क्या अभी तक तुझे समझ नहीं आया है?"
"तू तो जानती है कि मैं बुद्धू हूं।" मैंने रसोई के पास ही खड़े खड़े कहा─"थोड़ा देर से समझ आया..पर हां समझ आ गया है...तो क्या??"
"तो...तो..क्या??" उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा─"तू सोच भी कैसे सकता है ऐसा?"
"मैंने तो ऐसा कुछ नहीं सोचा।" मैंने कहा─"पहले मुझे पता ही नहीं था मगर अब समझ आ गया है इस लिए ऐसा सोचने का सवाल ही नहीं है लेकिन...।"
उसने सवालिया निगाह से देखा मुझे।
"लेकिन क्या इससे भाई बहन के बीच का प्यार मिट जाएगा?" मैंने कहा─"तू अच्छे से जानती है कि हम दोनों ही प्रेमी वाले प्रेम के बारे में कुछ नहीं जानते थे। इसके बावजूद एक दूसरे से प्रेम तो कर रहे थे न...यही समझ कर कि हमारा ये प्यार भाई बहन वाला है? क्या मैंने या तूने कभी ये खुल के कहा है कि हम दोनों प्रेमी हैं...नहीं न? तो फिर कैसे अचानक हमारे बीच इस तरह का मन मुटाव पैदा हो सकता है?"
"मुझे पता है कि तू सही कह रहा है।" उसने चूल्हे में टंगी दाल की गंजी के मुंह को कटोरी से बंद करते हुए कहा─"लेकिन सच का पता चल जाने के बाद क्या तुझे लगता है कि अब हमारे बीच भाई बहन वाला प्यार हो सकता है? पहले हम दोनों भले ही इस बारे में नहीं जानते थे लेकिन वो प्यार प्रेमियों वाला ही था न। इस सच के उजागर हो जाने से भी तो वैसा ही प्रेम चलने लगेगा। क्या तुझे लगता है कि अचानक से अब उस तरह का प्यार मिटा कर हम भाई बहन वाला प्यार रख पाएंगे?"
"तू पता नहीं क्या क्या सोच रही है।" मैंने कहा─"अरे ये सब कुछ नहीं है अनीता। किसी के कुछ कह देने से थोड़ी न कोई बात मान्य हो जाती है। लोग कितना दूसरों को गंदी गंदी गालियां देते हैं...तो क्या गालियां देने से सामने वाला वैसा ही बन जाता है। मादरचोद कह देने से क्या सामने वाला सच में मादरचोद बन जाता है? बहिनचोद की गाली देने से क्या सामने वाला सच में बहिनचोद बन जाता है???"
"राजू...कैसी गंदी गंदी बातें कर रहा है तू?" अनीता मेरे मुख से गालियां सुन के असहज हो गई─"कुछ तो शर्म कर।"
"मैं ऐसी गालियों का नाम ले कर बस एक उदाहरण दे रहा हूं अनीता।" मैंने कहा─"मैं तुझे समझा रहा हूं कि किसी के कुछ कह देने से कोई बात मान्य नहीं हो जाती। उसी तरह हम भले ही अब जान गए हैं कि हमारा वो प्यार प्रेमियों वाला था तो उससे हम सच में प्रेमी प्रेमिका नहीं बन जाएंगे। हम भाई बहन थे और भाई बहन ही रहेंगे...इस हकीकत को न तू...न मैं और न ही कोई और बदल सकता है। इस लिए इस बारे में हम दोनों को बेकार में कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोचना चाहिए।"
अनीता कुछ न बोली। कुछ पलों तक मुझे अपलक देखती रही फिर वापस रोटी सेंकने लगी।
"देख..मैं तो कुछ नहीं सोच रहा।" मैंने पुनः कहा─"तू भी मत सोच....बस यही सोच के जैसे अब तक हम अंजान बने रहे थे वैसे ही आगे भी बने रहते हैं। कम से कम इससे हमारे भाई बहन के बीच का प्यार तो बना रहेगा। वरना खुद सोच कि ऐसा न होने पर क्या होगा? याद कर...कल रात मां हमारे इस प्यार के बारे में सुन के कितना खुश हो गई थी। ऊपर वाले को धन्यवाद दे रही थी वो। ये भी कहा था उसने कि अब से हम ऐसे ही एक दूसरे के साथ मिलजुल के रहें। अब अगर हम अचानक फिर से पहले जैसा बर्ताव करने लगेंगे तो सोच मां को कितना धक्का लगेगा।"
"अ..और अगर मां को ये पता चल गया कि हमारा प्यार प्रेमियों जैसा है तो??" अनीता ने कहा─"अगर मां को पता चल गया कि वो जैसा समझती है वैसा नहीं है तो??"
"यार मां को कैसे पता चल जाएगा भला?" अनीता को वापस सामान्य होता देख मैं अंदर ही अंदर थोड़ा खुश हुआ─"और वैसे भी दूसरा कोई ये सोच ही नहीं सकता कि हमारे बीच इस तरह का...मतलब प्रेमियों वाला प्यार हो सकता है...या हम प्रेमी प्रेमिका हो सकते हैं। हर कोई इसी सच को मानेगा कि हमारा प्यार भाई बहन वाला ही है। न तू किसी को बताएगी और न ही मैं...फिर कैसे भला कोई ये जान सकेगा?"
"अ...और वो जो...हम ऐसे नहाते हैं उसका क्या??" अनीता ने मासूम सी शक्ल बना के पूछा।
"मतलब???"
"म..मतलब मैं तेरे सामने अपना कुर्ता उतार के नहाने लग जाती हूं।" अनीता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा─"ऐसा भी तो भाई बहन के बीच नहीं होता न तो उसका क्या??"
"ये तेरी इच्छा पर निर्भर करता है कि तुझे कैसे नहाना है मेरे सामने।" मैंने कहा─"अगर तुझे लगता है कि मेरे सामने तेरा कुर्ता उतार के नहाना गलत है तो मत नहा ऐसे। मैं तुझसे पहले ही बोल चुका हूं कि मैं तुझे किसी बात के लिए मजबूर नहीं करूंगा..क्योंकि मैं तुझे...मतलब अपनी बहन को बहुत प्यार करता हूं। मैं बस तुझे खुश देखना चाहता हूं।"
अनीता अपलक देखने लगी मुझे। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि क्या मैं फिर से प्रेमियों जैसा प्यार दिखाने लगा हूं या ये सिर्फ भाई वाला प्यार है।
"यार...कितना सोचती है तू।" मैंने कहा─"मत सोच न कुछ। क्यों बेमतलब हमारे बीच दूरियां बनाने पर तुली है? प्यार भाई बहन का हो या प्रेमियों वाला...प्यार तो प्यार ही होता है न। कोई बात गलत तब होती है जब वो रिश्ते की मर्यादा को पार कर के की जाए। तू खुद सोच...क्या हमने कभी कुछ गलत किया है...क्या हमने रिश्ते की कोई मर्यादा तोड़ी है?"
"हां...ऐसा तो हमने कभी नहीं किया।" अनीता ने धीरे से कहा─"पर मैंने तेरे सामने कुर्ता भी तो उतारा है। क्या ऐसा कोई बहन अपने भाई के सामने करती है? ये भी तो गलत ही है न?"
"अगर ये तुझे सच में गलत लगता है तो अब से तू मेरे सामने मत उतारना अपना कुर्ता।" मैंने कहा─"मैं वैसे भी तुझे किसी बात के लिए मजबूर करने का नहीं सोच सकता। मैं सिर्फ तेरी खुशी चाहता हूं। बाकी गलत सिर्फ कुर्ता उतार देने बस से नहीं हो जाता बल्कि किसी बात को गलत तब माना जाता है जब किसी की इच्छा के बिना हम कोई गलत काम करने लग जाएं। या किसी के साथ कोई जोर जबरदस्ती करने लगें....गलत इसे कहा जाता है। अगर कोई अपनी इच्छा से...खुशी से कुछ भी करे और सामने वाला भी उसकी खुशी का सम्मान कर के उसका साथ दे तो वो गलत नहीं होता। आदमी की नीयत साफ होनी चाहिए अनीता....आदमी के इरादे गंदे नहीं होने चाहिए।"
"ठीक है अब तू जा।" अनीता ने कहा─"मुझे सोचने दे इस बारे में।"
मैंने भी इस वक्त उस पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं समझा इस लिए वहां से चल पड़ा और बरामदे में रखी खाट पर लेट गया।
इतनी सारी बातों के बाद इतना तो हो गया था कि वो मुझसे बातें करने लगी थी और हम थोड़ा सहज हो गए थे। उसके बर्ताव ने मुझे ये भी एहसास करवा दिया था कि वो मुझसे नाराज नहीं है और हमारे बीच जो भी बातें हुई हैं उनके बारे में सोच कर निश्चित ही वो पूरी तरह सामान्य हो जाएगी। उसके बाद शायद फिर से हमारे बीच सब कुछ ठीक हो जाएगा और हम फिर से वैसे ही हंसी खुशी एक दूसरे के साथ रहने लगेंगे जैसे इन दो दिनों से रहते आए हैं।
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कुछ देर में मां बापू आ गए थे।
उसके बाद ऐसा कोई मौका नहीं मिला जिससे मैं अनीता से बात कर सकूं। मुझे थोड़ी चिंता तो थी लेकिन अब इस बात का भरोसा भी था कि जल्द ही हम दोनों फिर से पहले जैसे घुल मिल जाएंगे।
घर के बाहर नीम के पेड़ के पास चारपाई पर लेटा मैं इसी सब के बारे में सोच रहा था कि सहसा तभी मुझे मंजू काकी का खयाल आ गया।
मुझे याद आया कि सुबह के वक्त उनसे क्या क्या बातें हुई थीं। मेरे समूचे जिस्म में ये सोच के झुरझुरी दौड़ गई कि वो मुझसे एक बेटा चाहती हैं। महज बेटे की चाह के लिए ही उन्होंने मझले काका के कहने पर मेरे बापू से अनैतिक अथवा अवैध संबंध बनाया था।
मैं सोचने लगा कि इस दुनिया में इंसान क्या क्या कर गुजरता है। कभी अपनी खुशी से तो कभी मजबूरी से। मंजू काकी भी एक बेटे के लिए मजबूर थी, तभी तो वो इस हद तक गुजर गईं थी और अभी आगे भी गुजर जाने का सोचे बैठी थीं।
मुझे याद आया कि इसके लिए मैंने उनसे सोचने के लिए समय मांगा था। इसका मतलब मुझे सचमुच इस बारे में सोचना होगा और फिर उन्हें बताना होगा कि मैं उनकी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूं या नहीं।
अगले ही पल मैं सचमुच सोचने लगा कि मुझे क्या करना चाहिए? क्या सच में काकी की इच्छा पूरी करने के लिए मुझे उनके साथ वही सब करना चाहिए जो एक पति अपनी पत्नी के साथ करता है? इस खयाल ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी दौड़ा दी। मेरी धडकनें भी थोड़ा तेज हो गईं। मन में अजीब अजीब से खयाल आने लगे।
एकाएक मैंने सोचा कि कहीं वो मुझे किसी मुसीबत में तो नहीं फंसा देना चाहती हैं? मतलब कि हो सकता है कि वो मुझे इस तरीके से फंसा कर एक तरह से हमेशा के लिए मेरा मुंह बंद करा देना चाहती होंगी। ऐसा इस लिए क्योंकि उनकी कमजोरी और उनकी पोल पट्टी मैं जानता हूं जिससे वो हमेशा यही सोच के डरी हुई रहेंगी कि कहीं किसी दिन मैं उनका ये राज किसी को बता न दूं। ऐसे हालात से बचने का उनके पास फिलहाल यही एक उपाय हो सकता है कि वो मुझे भी ऐसे किसी जाल में फांस लें। ताकि मेरी कमजोरी भी उनके हाथ लग जाए और उनकी तरह मैं भी किसी के सामने अपना ये राज खुल जाने के डर से मुंह बंद किए रहूं।
मुझे अपना ये खयाल काफी हद तक जंचा लेकिन तभी मैं ये भी सोचने लगा कि क्या सचमुच ऐसा ही हो सकता है? मतलब कि क्या सच में वो मुझे किसी मुसीबत में डाल देना चाहती हैं? ऐसा भी तो हो सकता है कि वो सचमुच बेटे की चाह में पहले भी बापू से अवैध संबंध बना रहीं थी और अब मुझसे बनाना चाहती हैं।
अगर ऐसा न होता तो मुझे किसी जाल में फांसने के लिए उन्हें इस हद तक गिरने की क्या जरूरत थी? मतलब वो किसी और तरीके से भी तो मुझे किसी मुसीबत में फांस सकती थीं जिससे मैं अपना मुंह बंद किए रहता। इसके बावजूद अगर वो मेरे साथ इस हद तक जाना चाहती हैं तो साफ है कि उन्होंने बेटे की चाह का जो भावुक किस्सा सुनाया था वो सच ही था। यानी सचमुच उन्हें और काका को एक बेटा चाहिए।
चारपाई पर पड़े पड़े मैंने एक गहरी सांस ली और सोच लिया कि मुझे क्या करना है। मैंने फैसला कर लिया कि मैं मंजू काकी को अपने बेटे की मां बनाऊंगा। मुझे बखूबी एहसास था कि ये कदम बड़ा ही जोखिम भरा है लेकिन कहीं न कहीं मेरे अंदर ये चाह भी थी कि किसी औरत के साथ चुदाई करने में किस तरह का मजा मिलता है? अपने मित्रों से बहुत किस्से सुने थे मैंने लेकिन अब इसमें मिलने वाले मजे का अनुभव करना चाहता था मैं।
मंजू काकी को चोदने का सोच कर ही जिस्म में रोमांच की लहर दौड़ने लगी। धडकनें अलग ही अंदाज में धड़कने लगीं। एकाएक ही अंदर तीव्र इच्छा होने लगी कि फटाफट मंजू काकी के पास पहुंच जाऊं और मझले काका की तरह उनको चोदना शुरू कर दूं। ये सोचते हुए अनायास ही मेरा हाथ मेरे लन्ड पर पहुंच गया। अगले ही पल मैं ये महसूस कर के चौंक पड़ा कि मेरा लन्ड एकदम से खड़ा है।
मैं हड़बड़ा कर उठा और इधर उधर नजरें घुमाई। आस पास कोई नहीं था। घर के खुले दरवाजे के पार खाली आंगन दिखा तो मैंने ये सोच कर राहत की सांस ली कि किसी ने मेरे खड़े लन्ड के उभार को नहीं देखा।
चारपाई पर वापस लेट कर मैं सोचने लगा कि क्या करूं? बार बार यही इच्छा हो रही थी कि मंजू काकी के घर जाऊं मगर वहां मझले काका भी होंगे और उनकी दोनों बेटियां भी जिसकी वजह से ऐसा कुछ होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
कुछ देर इसी बारे में सोचते सोचते जब मुझसे न रहा गया तो मैं एक झटके से उठ बैठा। एक बार पलट कर घर के खुले दरवाजे पर नजर डाली और फिर चारपाई से उतर कर मंजू काकी के घर की तरफ चल पड़ा। दिल की धड़कनें एकाएक ही तेज तेज चलने लगीं थी। मन में तरह तरह के विचार उभरने लगे थे।
कुछ ही देर में मैं मझले काका के घर के बाहर पहुंच गया। दोपहर के वक्त ज्यादातर लोग घर के अंदर ही होते थे या फिर अपने खेतों पर। जैसे ही मैंने सड़क से उतर कर मझले काका के घर की तरफ मुड़ा तो मेरी धडकनें और भी ज्यादा तेज तेज चलने लगीं।
मन में अब ये सवाल उठने लगे कि क्या मझले काका घर पर ही होंगे? मतलब हो सकता है कि वो खा पी कर खेत तरफ चले गए हों। हवा चल रही थी तो ओसाने का काम आसानी से हो सकता है। मैं यही दुआ कर रहा था कि मझले काका खेत तरफ ही चले गए हों। फिर खयाल आया कि उनकी दोनों बेटियां भी तो घर में ही होंगी। वैसे तो सुनीता और रानी अभी छोटी थीं लेकिन फिर भी उनकी मौजूदगी में इस तरह का कोई काम करना ठीक नहीं था।
अभी मैं घर के दरवाजे के पास ही पहुंचा था कि तभी मझले काका एकदम से दरवाजा खोल कर बाहर निकले। एक पल के लिए तो मैं उन्हें ऐसे निकल आया देख चौंक ही पड़ा था लेकिन फिर जल्दी ही खुद को सम्हाल लिया।
"अरे...करेजा तू यहां??" काका ने मुझे देखते ही एकदम से कहा─"क्या खेत तरफ जाने वाला है तू?"
"वो..वो काका मैं...।"
"नहीं नहीं, अभी बहुत तेज धूप है।" मेरी बात पूरी होने से पहले ही वो बोल पड़े─"अभी तेरा खेत तरफ जाना ठीक नहीं है। बड़ी जोर की लू बह रही है। ऐसे में तुझे लू लग गई तो बीमार हो जाएगा। एक काम कर थोड़ी देर अंदर जा कर आराम कर ले। बाद में अपनी काकी को ले कर आ जाना, ठीक है?"
"ठी..ठीक है काका।" मैं उनकी इस बात से मन ही मन बड़ा खुश हो गया।
"अच्छा, मैं जा रहा हूं।" फिर उन्होंने कहा─"आज हवा बढ़िया चल रही है इस लिए गेहूं ओसाने में सहूलियत होगी।"
उनकी बात पर मैंने सिर हिलाया। उसके बाद जैसे ही वो बाहर तरफ चल पड़े तो मैं भी पलट कर दरवाजे से अंदर की तरफ चल पड़ा। मन में यही खयाल था कि अच्छा हुआ काका के रूप में एक बाधा टल गई। अब मुझे सिर्फ सुनीता और रानी की ही चिंता थी। मैं दुआ करने लगा कि काश उनका भी कोई ऐसा इंतजाम हो जाए जिससे मंजू काकी के साथ खुल कर कुछ भी करने में आसानी हो जाए।
जारी है...........
सारे रास्ते मैं अनीता की बातों के बारे में ही सोचता आया था और अब मुझे भी एहसास होने लगा था कि उसने सच कहा था। मतलब सच में हमारे बीच का प्यार भाई बहन वाला नहीं बल्कि प्रेमियों वाला था। मुझे समझ आ गया था कि क्यों अनीता से बातें करने पर मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो जाती थीं। जाहिर है...मैं भले ही पूरी तरह उस एहसास से परिचित नहीं था लेकिन सीने के जिस हिस्से में प्रेम और नफरत का ही जन्म होता है वो तो पहले ही उस चीज का एहसास कर चुका था। उसने इस एहसास को मुझे जताया भी होगा मगर मैं नासमझ था जो नजरअंदाज कर गया और उसे ठीक से समझ नहीं पाया था।
खैर अब भला क्या हो सकता था? इंसान अपने भाग्य...नसीब..या नियति के खिलाफ भला कैसे जा सकता है। उसमें इतना सामर्थ्य ही नहीं है कि वो विधाता की इच्छा के विरुद्ध जाने का सोच भी ले।
अब जबकि मैं समझ चुका था कि ये प्रेमियों वाला ही प्यार है तो बड़ा अजीब महसूस होने लगा था मुझे। बार बार खुद से यही कहता कि ऐसा कैसे कर सकता हूं मैं। अनीता मेरी छोटी बहन है....फिर भी वो इस बात को मुझसे पहले समझ गई और मैं समझ न सका था। जाने क्या सोच रही होगी अब वो मेरे बारे में? वो एकाएक नदी से बाहर चली गई थी...इसका मतलब यही हुआ कि अब वो मेरे करीब नहीं रहना चाहती है। या ये कहें कि वो मेरी प्रेमिका नहीं बनना चाहती है। मां की कोख से जन्म लेने पर जो रिश्ता हमारे बीच बन गया था वो उसी रिश्ते को बनाए रखना चाहती है।
यही सब सोचते हुए मैं घर पहुंचा। घर में दाखिल होते ही एकाएक मुझे अजीब सा एहसास होने लगा। धड़कनें ये सोच कर तेज हो गईं कि अब अनीता के सामने कैसे जाऊंगा? उससे नजरें कैसे मिलाऊंगा? उससे बात कैसे कर सकूंगा? मेरे जैसा ही हाल उसका भी तो होगा।
मैं धड़कते दिल के साथ चुपचाप आंगन से होते हुए कमरे में चला गया। दिलो दिमाग में फिर से तूफान खड़ा हो गया था जिसे काबू करने का प्रयास करते हुए मैं तेल कंघी कर के कपड़े पहनने लगा था। इस बीच कई बार मेरे मन में खयाल आया कि अनीता के पास जाऊं...उससे इस बारे में बात करूं मगर जाने क्यों अनीता के पास जाने की हिम्मत न हुई।
इस सबके बीच कई बार ऐसा हुआ कि मैं बहुत ज्यादा दुखी हुआ और मेरी आंखों में आंसू भर आए। ऐसा शायद इस लिए कि जो कुछ हुआ था उससे भाई बहन के रिश्ते की जीत हुई थी और अंदर का प्रेम या प्रेमी वाला रिश्ता जो अंजाने में खुद ही बनता जा रहा था वो एक ही पल में टूट गया था। अब क्योंकि दिलो में कोमल जज़्बात पलते हैं तो जब जज़्बात आहत होते हैं तो पीड़ा होना स्वाभाविक ही है। यही वजह थी कि मैं दुखी हो जाता था और मेरी आंखों में आंसू भर आते थे।
कपड़े पहन कर मैं कमरे से बाहर निकला। आंगन में पहुंचा तो अनायास ही मेरी नजर रसोई में खाना बना रही अनीता पर पड़ गई। उसे देखते ही दिल धक्क से रह गया। अंदर का तूफान तेज हो गया। शायद उसे भी मेरे वहां पर होने का एहसास हो गया था इस लिए न चाहते हुए भी वो एक नजर मुझे देखने के लिए मजबूर हो गई थी।
हमारी नजरें मिलीं तो मेरे जज्बात मचल उठे। अंदर एक हूक सी उठी जिसके कारण मेरा पूरा बदन हिल सा गया। तभी उसने अपनी नजरें फेर ली। मुझे ऐसा लगा जैसे खिले हुए गुलिस्तां में अचानक खिजां(पतझड़) ने अपनी दृष्टि डाल दी हो।
मेरा दिल पूरा जोर लगा के कह रहा था कि मैं रसोई में उसके पास जाऊं और उससे बात करूं लेकिन दिमाग मुझे जाने की इजाजत नहीं दे रहा था। अंदर से वो साहस ही नहीं हो रहा था कि मैं उसके पास जाऊं मगर....जज्बात जब प्रबल रूप धारण कर लेते हैं तो इंसान मजबूर हो जाता है। वही मेरे साथ हुआ।
मैं धड़कते दिल के साथ रसोई की तरफ बढ़ चला। उधर अनीता को भी पता चल गया कि मैं उसी की तरफ आ रहा हूं। उसने कनखियों से एक बार मेरी तरफ देखा। उसके हाव भाव में बदलाव साफ नजर आया। ऐसा लगा जैसे अचानक ही उसे मुझसे संकोच अथवा घबराहट होने लगी हो।
"तु..तुझसे बात करना है मुझे।" रसोई के पास पहुंचते ही मैंने हिम्मत कर के उससे कहा।
"प..पर मुझे नहीं करना।" उसने दो टूक लहजे में कहा─"तू...तू चला जा यहां से।"
"वाह...कितना जल्दी बदल गई न तू।" उसके बर्ताव से मुझे दुख हुआ─"दो ही पल में भाई बहन का प्यार भूल गई तू।"
"वो..वो भाई बहन का प्यार नहीं है।" उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा─"क्या अभी तक तुझे समझ नहीं आया है?"
"तू तो जानती है कि मैं बुद्धू हूं।" मैंने रसोई के पास ही खड़े खड़े कहा─"थोड़ा देर से समझ आया..पर हां समझ आ गया है...तो क्या??"
"तो...तो..क्या??" उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा─"तू सोच भी कैसे सकता है ऐसा?"
"मैंने तो ऐसा कुछ नहीं सोचा।" मैंने कहा─"पहले मुझे पता ही नहीं था मगर अब समझ आ गया है इस लिए ऐसा सोचने का सवाल ही नहीं है लेकिन...।"
उसने सवालिया निगाह से देखा मुझे।
"लेकिन क्या इससे भाई बहन के बीच का प्यार मिट जाएगा?" मैंने कहा─"तू अच्छे से जानती है कि हम दोनों ही प्रेमी वाले प्रेम के बारे में कुछ नहीं जानते थे। इसके बावजूद एक दूसरे से प्रेम तो कर रहे थे न...यही समझ कर कि हमारा ये प्यार भाई बहन वाला है? क्या मैंने या तूने कभी ये खुल के कहा है कि हम दोनों प्रेमी हैं...नहीं न? तो फिर कैसे अचानक हमारे बीच इस तरह का मन मुटाव पैदा हो सकता है?"
"मुझे पता है कि तू सही कह रहा है।" उसने चूल्हे में टंगी दाल की गंजी के मुंह को कटोरी से बंद करते हुए कहा─"लेकिन सच का पता चल जाने के बाद क्या तुझे लगता है कि अब हमारे बीच भाई बहन वाला प्यार हो सकता है? पहले हम दोनों भले ही इस बारे में नहीं जानते थे लेकिन वो प्यार प्रेमियों वाला ही था न। इस सच के उजागर हो जाने से भी तो वैसा ही प्रेम चलने लगेगा। क्या तुझे लगता है कि अचानक से अब उस तरह का प्यार मिटा कर हम भाई बहन वाला प्यार रख पाएंगे?"
"तू पता नहीं क्या क्या सोच रही है।" मैंने कहा─"अरे ये सब कुछ नहीं है अनीता। किसी के कुछ कह देने से थोड़ी न कोई बात मान्य हो जाती है। लोग कितना दूसरों को गंदी गंदी गालियां देते हैं...तो क्या गालियां देने से सामने वाला वैसा ही बन जाता है। मादरचोद कह देने से क्या सामने वाला सच में मादरचोद बन जाता है? बहिनचोद की गाली देने से क्या सामने वाला सच में बहिनचोद बन जाता है???"
"राजू...कैसी गंदी गंदी बातें कर रहा है तू?" अनीता मेरे मुख से गालियां सुन के असहज हो गई─"कुछ तो शर्म कर।"
"मैं ऐसी गालियों का नाम ले कर बस एक उदाहरण दे रहा हूं अनीता।" मैंने कहा─"मैं तुझे समझा रहा हूं कि किसी के कुछ कह देने से कोई बात मान्य नहीं हो जाती। उसी तरह हम भले ही अब जान गए हैं कि हमारा वो प्यार प्रेमियों वाला था तो उससे हम सच में प्रेमी प्रेमिका नहीं बन जाएंगे। हम भाई बहन थे और भाई बहन ही रहेंगे...इस हकीकत को न तू...न मैं और न ही कोई और बदल सकता है। इस लिए इस बारे में हम दोनों को बेकार में कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोचना चाहिए।"
अनीता कुछ न बोली। कुछ पलों तक मुझे अपलक देखती रही फिर वापस रोटी सेंकने लगी।
"देख..मैं तो कुछ नहीं सोच रहा।" मैंने पुनः कहा─"तू भी मत सोच....बस यही सोच के जैसे अब तक हम अंजान बने रहे थे वैसे ही आगे भी बने रहते हैं। कम से कम इससे हमारे भाई बहन के बीच का प्यार तो बना रहेगा। वरना खुद सोच कि ऐसा न होने पर क्या होगा? याद कर...कल रात मां हमारे इस प्यार के बारे में सुन के कितना खुश हो गई थी। ऊपर वाले को धन्यवाद दे रही थी वो। ये भी कहा था उसने कि अब से हम ऐसे ही एक दूसरे के साथ मिलजुल के रहें। अब अगर हम अचानक फिर से पहले जैसा बर्ताव करने लगेंगे तो सोच मां को कितना धक्का लगेगा।"
"अ..और अगर मां को ये पता चल गया कि हमारा प्यार प्रेमियों जैसा है तो??" अनीता ने कहा─"अगर मां को पता चल गया कि वो जैसा समझती है वैसा नहीं है तो??"
"यार मां को कैसे पता चल जाएगा भला?" अनीता को वापस सामान्य होता देख मैं अंदर ही अंदर थोड़ा खुश हुआ─"और वैसे भी दूसरा कोई ये सोच ही नहीं सकता कि हमारे बीच इस तरह का...मतलब प्रेमियों वाला प्यार हो सकता है...या हम प्रेमी प्रेमिका हो सकते हैं। हर कोई इसी सच को मानेगा कि हमारा प्यार भाई बहन वाला ही है। न तू किसी को बताएगी और न ही मैं...फिर कैसे भला कोई ये जान सकेगा?"
"अ...और वो जो...हम ऐसे नहाते हैं उसका क्या??" अनीता ने मासूम सी शक्ल बना के पूछा।
"मतलब???"
"म..मतलब मैं तेरे सामने अपना कुर्ता उतार के नहाने लग जाती हूं।" अनीता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा─"ऐसा भी तो भाई बहन के बीच नहीं होता न तो उसका क्या??"
"ये तेरी इच्छा पर निर्भर करता है कि तुझे कैसे नहाना है मेरे सामने।" मैंने कहा─"अगर तुझे लगता है कि मेरे सामने तेरा कुर्ता उतार के नहाना गलत है तो मत नहा ऐसे। मैं तुझसे पहले ही बोल चुका हूं कि मैं तुझे किसी बात के लिए मजबूर नहीं करूंगा..क्योंकि मैं तुझे...मतलब अपनी बहन को बहुत प्यार करता हूं। मैं बस तुझे खुश देखना चाहता हूं।"
अनीता अपलक देखने लगी मुझे। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि क्या मैं फिर से प्रेमियों जैसा प्यार दिखाने लगा हूं या ये सिर्फ भाई वाला प्यार है।
"यार...कितना सोचती है तू।" मैंने कहा─"मत सोच न कुछ। क्यों बेमतलब हमारे बीच दूरियां बनाने पर तुली है? प्यार भाई बहन का हो या प्रेमियों वाला...प्यार तो प्यार ही होता है न। कोई बात गलत तब होती है जब वो रिश्ते की मर्यादा को पार कर के की जाए। तू खुद सोच...क्या हमने कभी कुछ गलत किया है...क्या हमने रिश्ते की कोई मर्यादा तोड़ी है?"
"हां...ऐसा तो हमने कभी नहीं किया।" अनीता ने धीरे से कहा─"पर मैंने तेरे सामने कुर्ता भी तो उतारा है। क्या ऐसा कोई बहन अपने भाई के सामने करती है? ये भी तो गलत ही है न?"
"अगर ये तुझे सच में गलत लगता है तो अब से तू मेरे सामने मत उतारना अपना कुर्ता।" मैंने कहा─"मैं वैसे भी तुझे किसी बात के लिए मजबूर करने का नहीं सोच सकता। मैं सिर्फ तेरी खुशी चाहता हूं। बाकी गलत सिर्फ कुर्ता उतार देने बस से नहीं हो जाता बल्कि किसी बात को गलत तब माना जाता है जब किसी की इच्छा के बिना हम कोई गलत काम करने लग जाएं। या किसी के साथ कोई जोर जबरदस्ती करने लगें....गलत इसे कहा जाता है। अगर कोई अपनी इच्छा से...खुशी से कुछ भी करे और सामने वाला भी उसकी खुशी का सम्मान कर के उसका साथ दे तो वो गलत नहीं होता। आदमी की नीयत साफ होनी चाहिए अनीता....आदमी के इरादे गंदे नहीं होने चाहिए।"
"ठीक है अब तू जा।" अनीता ने कहा─"मुझे सोचने दे इस बारे में।"
मैंने भी इस वक्त उस पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं समझा इस लिए वहां से चल पड़ा और बरामदे में रखी खाट पर लेट गया।
इतनी सारी बातों के बाद इतना तो हो गया था कि वो मुझसे बातें करने लगी थी और हम थोड़ा सहज हो गए थे। उसके बर्ताव ने मुझे ये भी एहसास करवा दिया था कि वो मुझसे नाराज नहीं है और हमारे बीच जो भी बातें हुई हैं उनके बारे में सोच कर निश्चित ही वो पूरी तरह सामान्य हो जाएगी। उसके बाद शायद फिर से हमारे बीच सब कुछ ठीक हो जाएगा और हम फिर से वैसे ही हंसी खुशी एक दूसरे के साथ रहने लगेंगे जैसे इन दो दिनों से रहते आए हैं।
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कुछ देर में मां बापू आ गए थे।
उसके बाद ऐसा कोई मौका नहीं मिला जिससे मैं अनीता से बात कर सकूं। मुझे थोड़ी चिंता तो थी लेकिन अब इस बात का भरोसा भी था कि जल्द ही हम दोनों फिर से पहले जैसे घुल मिल जाएंगे।
घर के बाहर नीम के पेड़ के पास चारपाई पर लेटा मैं इसी सब के बारे में सोच रहा था कि सहसा तभी मुझे मंजू काकी का खयाल आ गया।
मुझे याद आया कि सुबह के वक्त उनसे क्या क्या बातें हुई थीं। मेरे समूचे जिस्म में ये सोच के झुरझुरी दौड़ गई कि वो मुझसे एक बेटा चाहती हैं। महज बेटे की चाह के लिए ही उन्होंने मझले काका के कहने पर मेरे बापू से अनैतिक अथवा अवैध संबंध बनाया था।
मैं सोचने लगा कि इस दुनिया में इंसान क्या क्या कर गुजरता है। कभी अपनी खुशी से तो कभी मजबूरी से। मंजू काकी भी एक बेटे के लिए मजबूर थी, तभी तो वो इस हद तक गुजर गईं थी और अभी आगे भी गुजर जाने का सोचे बैठी थीं।
मुझे याद आया कि इसके लिए मैंने उनसे सोचने के लिए समय मांगा था। इसका मतलब मुझे सचमुच इस बारे में सोचना होगा और फिर उन्हें बताना होगा कि मैं उनकी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूं या नहीं।
अगले ही पल मैं सचमुच सोचने लगा कि मुझे क्या करना चाहिए? क्या सच में काकी की इच्छा पूरी करने के लिए मुझे उनके साथ वही सब करना चाहिए जो एक पति अपनी पत्नी के साथ करता है? इस खयाल ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी दौड़ा दी। मेरी धडकनें भी थोड़ा तेज हो गईं। मन में अजीब अजीब से खयाल आने लगे।
एकाएक मैंने सोचा कि कहीं वो मुझे किसी मुसीबत में तो नहीं फंसा देना चाहती हैं? मतलब कि हो सकता है कि वो मुझे इस तरीके से फंसा कर एक तरह से हमेशा के लिए मेरा मुंह बंद करा देना चाहती होंगी। ऐसा इस लिए क्योंकि उनकी कमजोरी और उनकी पोल पट्टी मैं जानता हूं जिससे वो हमेशा यही सोच के डरी हुई रहेंगी कि कहीं किसी दिन मैं उनका ये राज किसी को बता न दूं। ऐसे हालात से बचने का उनके पास फिलहाल यही एक उपाय हो सकता है कि वो मुझे भी ऐसे किसी जाल में फांस लें। ताकि मेरी कमजोरी भी उनके हाथ लग जाए और उनकी तरह मैं भी किसी के सामने अपना ये राज खुल जाने के डर से मुंह बंद किए रहूं।
मुझे अपना ये खयाल काफी हद तक जंचा लेकिन तभी मैं ये भी सोचने लगा कि क्या सचमुच ऐसा ही हो सकता है? मतलब कि क्या सच में वो मुझे किसी मुसीबत में डाल देना चाहती हैं? ऐसा भी तो हो सकता है कि वो सचमुच बेटे की चाह में पहले भी बापू से अवैध संबंध बना रहीं थी और अब मुझसे बनाना चाहती हैं।
अगर ऐसा न होता तो मुझे किसी जाल में फांसने के लिए उन्हें इस हद तक गिरने की क्या जरूरत थी? मतलब वो किसी और तरीके से भी तो मुझे किसी मुसीबत में फांस सकती थीं जिससे मैं अपना मुंह बंद किए रहता। इसके बावजूद अगर वो मेरे साथ इस हद तक जाना चाहती हैं तो साफ है कि उन्होंने बेटे की चाह का जो भावुक किस्सा सुनाया था वो सच ही था। यानी सचमुच उन्हें और काका को एक बेटा चाहिए।
चारपाई पर पड़े पड़े मैंने एक गहरी सांस ली और सोच लिया कि मुझे क्या करना है। मैंने फैसला कर लिया कि मैं मंजू काकी को अपने बेटे की मां बनाऊंगा। मुझे बखूबी एहसास था कि ये कदम बड़ा ही जोखिम भरा है लेकिन कहीं न कहीं मेरे अंदर ये चाह भी थी कि किसी औरत के साथ चुदाई करने में किस तरह का मजा मिलता है? अपने मित्रों से बहुत किस्से सुने थे मैंने लेकिन अब इसमें मिलने वाले मजे का अनुभव करना चाहता था मैं।
मंजू काकी को चोदने का सोच कर ही जिस्म में रोमांच की लहर दौड़ने लगी। धडकनें अलग ही अंदाज में धड़कने लगीं। एकाएक ही अंदर तीव्र इच्छा होने लगी कि फटाफट मंजू काकी के पास पहुंच जाऊं और मझले काका की तरह उनको चोदना शुरू कर दूं। ये सोचते हुए अनायास ही मेरा हाथ मेरे लन्ड पर पहुंच गया। अगले ही पल मैं ये महसूस कर के चौंक पड़ा कि मेरा लन्ड एकदम से खड़ा है।
मैं हड़बड़ा कर उठा और इधर उधर नजरें घुमाई। आस पास कोई नहीं था। घर के खुले दरवाजे के पार खाली आंगन दिखा तो मैंने ये सोच कर राहत की सांस ली कि किसी ने मेरे खड़े लन्ड के उभार को नहीं देखा।
चारपाई पर वापस लेट कर मैं सोचने लगा कि क्या करूं? बार बार यही इच्छा हो रही थी कि मंजू काकी के घर जाऊं मगर वहां मझले काका भी होंगे और उनकी दोनों बेटियां भी जिसकी वजह से ऐसा कुछ होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
कुछ देर इसी बारे में सोचते सोचते जब मुझसे न रहा गया तो मैं एक झटके से उठ बैठा। एक बार पलट कर घर के खुले दरवाजे पर नजर डाली और फिर चारपाई से उतर कर मंजू काकी के घर की तरफ चल पड़ा। दिल की धड़कनें एकाएक ही तेज तेज चलने लगीं थी। मन में तरह तरह के विचार उभरने लगे थे।
कुछ ही देर में मैं मझले काका के घर के बाहर पहुंच गया। दोपहर के वक्त ज्यादातर लोग घर के अंदर ही होते थे या फिर अपने खेतों पर। जैसे ही मैंने सड़क से उतर कर मझले काका के घर की तरफ मुड़ा तो मेरी धडकनें और भी ज्यादा तेज तेज चलने लगीं।
मन में अब ये सवाल उठने लगे कि क्या मझले काका घर पर ही होंगे? मतलब हो सकता है कि वो खा पी कर खेत तरफ चले गए हों। हवा चल रही थी तो ओसाने का काम आसानी से हो सकता है। मैं यही दुआ कर रहा था कि मझले काका खेत तरफ ही चले गए हों। फिर खयाल आया कि उनकी दोनों बेटियां भी तो घर में ही होंगी। वैसे तो सुनीता और रानी अभी छोटी थीं लेकिन फिर भी उनकी मौजूदगी में इस तरह का कोई काम करना ठीक नहीं था।
अभी मैं घर के दरवाजे के पास ही पहुंचा था कि तभी मझले काका एकदम से दरवाजा खोल कर बाहर निकले। एक पल के लिए तो मैं उन्हें ऐसे निकल आया देख चौंक ही पड़ा था लेकिन फिर जल्दी ही खुद को सम्हाल लिया।
"अरे...करेजा तू यहां??" काका ने मुझे देखते ही एकदम से कहा─"क्या खेत तरफ जाने वाला है तू?"
"वो..वो काका मैं...।"
"नहीं नहीं, अभी बहुत तेज धूप है।" मेरी बात पूरी होने से पहले ही वो बोल पड़े─"अभी तेरा खेत तरफ जाना ठीक नहीं है। बड़ी जोर की लू बह रही है। ऐसे में तुझे लू लग गई तो बीमार हो जाएगा। एक काम कर थोड़ी देर अंदर जा कर आराम कर ले। बाद में अपनी काकी को ले कर आ जाना, ठीक है?"
"ठी..ठीक है काका।" मैं उनकी इस बात से मन ही मन बड़ा खुश हो गया।
"अच्छा, मैं जा रहा हूं।" फिर उन्होंने कहा─"आज हवा बढ़िया चल रही है इस लिए गेहूं ओसाने में सहूलियत होगी।"
उनकी बात पर मैंने सिर हिलाया। उसके बाद जैसे ही वो बाहर तरफ चल पड़े तो मैं भी पलट कर दरवाजे से अंदर की तरफ चल पड़ा। मन में यही खयाल था कि अच्छा हुआ काका के रूप में एक बाधा टल गई। अब मुझे सिर्फ सुनीता और रानी की ही चिंता थी। मैं दुआ करने लगा कि काश उनका भी कोई ऐसा इंतजाम हो जाए जिससे मंजू काकी के साथ खुल कर कुछ भी करने में आसानी हो जाए।
जारी है...........
It's Rajan 


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