26-06-2026, 11:35 PM
नेहा ने गुप्ता जी के सीने पर दोनों हाथ रखे और एक ज़ोरदार झटके से उन्हें पीछे धकेल दिया।
न मुझे समझ में आया, न गुप्ता जी को कि क्या हुआ।
गुप्ता जी थोड़ा पीछे हट गए। उनके होंठों पर नेहा की थूक चमक रही थी। उनकी आँखें हैरानी से बड़ी हो गई थीं।
नेहा की साँसें तेज़ थीं। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँखें अभी भी आधी बंद थीं।
नेहा ने आस-पास देखा, जैसे कुछ ढूँढ रही हो।
उसकी नज़र खाली ग्लास पर पड़ी।
वो खड़ी हुई, ग्लास उठाया और किचन के स्लैब की तरफ़ चली गई।
वहाँ जाकर उसने बोतल से अपने लिए नया पेग बनाना शुरू कर दिया।
यहाँ गुप्ता जी ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट जलाई।
एक लंबा कश लिया।
फिर अपने बाजू को हिम्मत देकर खड़े हो गए और धीरे-धीरे नेहा की तरफ़ बढ़ने लगे।
नेहा स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।
गुप्ता जी उसके ठीक पीछे पहुँच गए।
उन्होंने सिगरेट का कश लिया और नेहा की कमर पर हाथ रख दिया।
गुप्ता जी: (पीछे से, भारी और नशीली आवाज़ में)
“क्या हुआ बेटी...?
अचानक क्यों भाग गई?
अंकल को अकेला छोड़ दिया...”
नेहा का शरीर हल्का सा सख्त हो गया।
वो पेग बनाती रही, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ लिया और उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया,
गुप्ता जी: “डर गई क्या?
अभी तो मजा शुरू हुआ था...”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
वो बस पेग बनाती रही, लेकिन उसका शरीर अब गुप्ता जी से सटा हुआ था।
वो खड़ी हुई, ग्लास उठाया और किचन के स्लैब की तरफ़ चली गई।
वहाँ जाकर उसने बोतल से अपने लिए नया पेग बनाना शुरू कर दिया।
यहाँ गुप्ता जी ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट जलाई।
एक लंबा कश लिया।
फिर अपने बाजू को हिम्मत देकर खड़े हो गए और धीरे-धीरे नेहा की तरफ़ बढ़ने लगे।
गुप्ता जी इतने नशे में थे कि ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।
नेहा स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।
गुप्ता जी उसके ठीक पीछे पहुँच गए।
वे झूलते हुए, लड़खड़ाते हुए नेहा के पीछे पहुँच गए, जहाँ वो किचन स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।
वे नेहा के ठीक पीछे खड़े हो गए।
नशे की वजह से उनका बैलेंस नहीं बन पा रहा था, इसलिए वे आगे झुक गए।
पीछे गुप्ता जी, आगे नेहा।
मैं सोफे से साफ़ नहीं देख पा रहा था, लेकिन जो नज़ारा दिख रहा था, वो काफी था।
गुप्ता जी की कमर नेहा की गांड़ से सटी हुई थी।
उनका लंड, जो पैंट में था, नेहा की गांड़ पर दबा हुआ था।
नेहा का शरीर एकदम सख्त हो गया।
गुप्ता जी ने दोनों हाथों से नेहा की कमर पकड़ ली और अपने लंड को उसकी गांड़ पर धीरे-धीरे रगड़ने लगे।
गुप्ता जी: (नशे में भारी, गंदी आवाज़ में)
“उफ्फ बेटी... कितनी गर्म है तेरी गांड़..."
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
उसके हाथ काउंटर पर टिके हुए थे। उसकी साँसें बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।
वो न तो आगे बढ़ी, न पीछे हटी — बस चुपचाप खड़ी रही, जबकि गुप्ता जी उसके पीछे से उसे रगड़ रहे थे।
गुप्ता जी ने अपनी कमर हल्के-हल्के आगे-पीछे करने शुरू कर दी।
उनका लंड नेहा की पैंटी वाली गांड़ पर ऊपर-नीचे रगड़ खा रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ नेहा की गर्दन पर थे।
गुप्ता जी: (गर्दन चूसते हुए, भारी आवाज़ में)
“यहाँ क्यों आ गई?
मैं तो तेरे होंठों का रस पान कर रहा था...
कितना मज़ा आ रहा था...”
ये बोलते हुए उन्होंने नेहा की गर्दन पर गहरे किस करने शुरू कर दिए — चूस रहे थे, हल्का-हल्का काट रहे थे, अपनी गर्म जीभ से चाट रहे थे।
नेहा ने हल्की सी गर्दन घुमाकर, काँपती हुई आवाज़ में कहा,
नेहा: “वो... मेरा पेग खत्म हो गया था... इसीलिए...”
गुप्ता जी ने हँसते हुए नेहा की गर्दन पर और जोर से किस किया। उनका एक हाथ नेहा की कमर से नीचे सरक गया और उसकी गांड़ को कसकर दबा लिया।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनकी आवाज़ अब और भारी और गंदी हो गई थी।
गुप्ता जी: “तुझे दारू पीने की बेन की लौड़ी... तो पहले बताती ना...
ये देख, तूने मेरे ऊपर कितनी गिराई है...”
उन्होंने नेहा के दोनों कंधे पकड़ लिए और जोर देकर उसे पीछे घुमा दिया।
अब नेहा गुप्ता जी की तरफ़ मुंह करके खड़ी थी।
गुप्ता जी ने अपना गीला कुर्ता दिखाते हुए बोले,
गुप्ता जी: “देख... कितना गीला कर दिया तूने...
तेरे पेग की वजह से...”
नेहा की साँसें तेज़ हो गई थीं।
गुप्ता जी: (नेहा की आँखों में देखते हुए, मुस्कुराते हुए)
“अब तो तुझे साफ़ करना पड़ेगा ना बेटी...
जो तूने गिराया है...”
नेहा ने मेरी तरफ़ एक असहाय नज़र डाली।
उसका चेहरा शर्म और नशे से लाल था।
गुप्ता जी बदबदा रहे थे।
गुप्ता जी: “मैंने देखा... तूने सम के गले से व्हिस्की साफ़ की...
वो तो थोड़ी सी थी...
मुझ पर तो तूने पूरी गिरा दी है...”
नेहा बस चुपचाप देख रही थी।
कभी गुप्ता जी को, कभी मेरी तरफ़।
गुप्ता जी दोनों हाथों से अपने कुर्ते को उतारने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नशे की वजह से उनका बैलेंस बिगड़ रहा था। वो बार-बार लड़खड़ा रहे थे, कुर्ता आधा ऊपर चढ़ा, आधा नीचे। उनकी तोंद और बालों भरी छाती आधे-आधे दिख रही थी।
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।
उसने हल्के से इशारा किया — पास आने का।
मुझे लगा वो कहेगी — “बाहर ले जा इस छुटिये को”।
मैं पास पहुँचा।
नेहा ने मेरी आँखों में देखा और बहुत धीमी, नशीली आवाज़ में बोली,
नेहा: “बेबी... हेल्प करो ना अंकल की...”
मैं एक पल के लिए स्तब्ध रह गया।
गुप्ता जी अभी भी कुर्ता उतारने की कोशिश में जुटे हुए थे, लड़खड़ाते हुए।
नेहा मेरे बहुत करीब खड़ी थी
उसने मेरी तरफ़ देखकर हल्का सा सिर हिलाया — जैसे मुझे आगे बढ़ने का इशारा कर रही हो।
गुप्ता जी ने मुझे देखा और नशे में हँसते हुए बोले,
गुप्ता जी: “हाँ बेटा... आ जा...
अपनी बीवी के अंकल की मदद कर...
कुर्ता उतारने में भी मदद चाहिए अब...”
मैं वहीं खड़ा था।
मेरा दिमाग पूरी तरह उलझ गया था।
मैंने सहारा दिया।
नेहा जो कह रही थी, वैसा ही किया।
मैंने गुप्ता जी के कुर्ते के किनारे पकड़े और गर्दन के ऊपर से बाहर निकाल दिया।
गुप्ता जी अब ऊपर से पूरी तरह नंगे हो गए।
उनकी छाती पर घने बाल थे — आधे सफेद, आधे काले।
आधा शरीर पसीने और छलकी हुई व्हिस्की से गीला था।
एक हाथ में सिगरेट थी।
गुप्ता जी: (नशे में हँसते हुए, सिगरेट का कश लेते हुए)
“बेटी... दारू वेस्ट नहीं करनी चाहिए...”
उनकी तोंद बाहर निकली हुई थी। छाती के बालों पर व्हिस्की की बूँदें चमक रही थीं।
नेहा उनके सामने खड़ी थी।
वो गुप्ता जी की नंगी छाती को देख रही थी।
गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ एक कदम बढ़ाया। उनकी नंगी छाती अब नेहा के स्तनों से सिर्फ़ कुछ इंच दूर थी।
नेहा ने एक बार मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में शर्म, नशा और एक अजीब सी हिम्मत थी। फिर वो धीरे-धीरे गुप्ता जी की तरफ़ मुड़ी।
गुप्ता जी अभी भी नंगे ऊपर वाले हिस्से के साथ खड़े थे।
नेहा ने आगे बढ़कर सबसे पहले गुप्ता जी की दाईं छाती पर हल्के से जीभ फेरी।
फिर उनके left nipple को अपनी गर्म, नम जीभ से चाटा।
उसने धीरे-धीरे nipple को घेरते हुए चाटा, फिर हल्का सा काट भी लिया।
गुप्ता जी की साँस भारी हो गई।
नेहा ने उनके कंधों पर जीभ फिराई — दाएँ कंधे से बाएँ कंधे तक, धीरे-धीरे।
फिर उनकी गर्दन के नीचे, कॉलर बोन पर चाटा।
उसके बाद वो धीरे-धीरे नीचे की तरफ़ गई।
सकी जीभ गुप्ता जी की तोंद पर घूम रही थी।
वो नाभि के पास पहुँची, और अपनी जीभ को नाभि के अंदर डालकर चाटने लगी।
गोल-गोल घुमाते हुए, चूसते हुए।
गुप्ता जी की साँसें अब और तेज़ हो गई थीं।
उनका एक हाथ नेहा के बालों में था, दूसरे हाथ से वो अपनी पैंट के ऊपर से लंड मसल रहे थे।
नेहा की जीभ नाभि से नीचे की तरफ़ सरक रही थी।
उसने गुप्ता जी की तोंद के नीचे वाले बालों को भी चाटा।
गुप्ता जी: (हाँफते हुए)
“उफ्फ... कितनी अच्छी रंडी है तू...
अंकल की तोंद चाट रही है... नाभि चूस रही है...”
नेहा कुछ नहीं बोली।
मैं थोड़ी देर तक चुपचाप बैठा देख रहा था — नेहा को वो सब करते हुए जो गुप्ता जी कह रहे थे।
जब नेहा गुप्ता जी के nipple चाट रही थी, तब उन्होंने अपनी जलती हुई सिगरेट मुझे आगे बढ़ा दी।
गुप्ता जी: (नशे में मुस्कुराते हुए, एक अर्थपूर्ण इशारा करते हुए)
“बहुत मज़ा आ रहा है तेरी बीवी के साथ...”
मैंने सिगरेट ले ली।
मेरा हाथ हल्का सा काँप रहा था।
नेहा बिल्कुल submissive mood में चली गई थी।
जहाँ-जहाँ गुप्ता जी कह रहे थे, नेहा वहाँ-वहाँ चाट रही थी।
उसकी गर्म, नम जीभ गुप्ता जी की छाती पर, निप्पल पर, तोंद पर, नाभि में... हर जगह घूम रही थी।
गुप्ता जी के घने बालों पर भी उसकी थूक चमक रही थी।
थोड़ी देर बाद नेहा सीधी खड़ी हो गई।
उसने एक उँगली अपने दाँतों में दबाकर, बहुत ही cute और शरारती अंदाज़ में कहा,
नेहा: “सब साफ़ हो गया अंकल...”
उसका पूरा चेहरा अपने ही थूक और व्हिस्की से चमक रहा था।
होंठ सूजे हुए थे, ठुड्डी पर थूक की एक पतली लकीर बह रही थी।
गुप्ता जी ने उसे देखा और संतुष्ट मुस्कान दी।
फिर उन्होंने हल्के से नेहा के गाल पर चांटा मारा — शाबाशी में।
गुप्ता जी: “Good girl...
तूने अच्छी कुतिया की तरह साफ़ कर दिया...”
उन्होंने मेरे हाथ से सिगरेट ली और नेहा के होंठों पर लगा दी।
नेहा ने एक गहरा कश लिया और पूरा धुआँ गुप्ता जी के चेहरे पर छोड़ दिया।
नेहा ने सब कुछ किया।
बिना मेरी तरफ़ एक बार भी देखे।
बिना मेरी इज्जत का कोई ख्याल किए।
वो पूरी तरह गुप्ता जी की बात मान रही थी — जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।
मैं उसे समझ नहीं पा रहा था।
ये वही नेहा थी जो कुछ घंटे पहले मुझसे चिपकी हुई थी, और अब...
थोड़ी देर बाद हमारी नज़रें मिलीं।
नेहा ने मुझे देखा, आँख मारते हुए हल्का सा इशारा किया।
मुझे समझ में आ गया — उसे मजा आ रहा था।
बहुत मजा आ रहा था।
फिर उसने दूसरा इशारा किया — जैसे पूछ रही हो, “तुम ठीक हो?”
मैंने कंधे उचकाए — “पता नहीं” वाला इशारा।
फिर अपना हाथ नीचे ले जाकर पैंट के ऊपर से अपना खड़ा तंबू दिखा दिया।
नेहा ने उसे देखा।
उसके होंठों पर एक छोटी सी शरारती मुस्कान आई।
उसने हल्का सा सिर हिलाया, जैसे कह रही हो — “अच्छा है...”
गुप्ता जी हमें ये सब करते हुए देख रहे थे।
उन्होंने नेहा के गाल पर फिर से एक हल्का सा चांटा मारा — शाबाशी वाला, लेकिन authority के साथ।
फिर उन्होंने नेहा का चेहरा अपनी तरफ़ घुमा लिया।
गुप्ता जी: (नेहा की ठोड़ी पकड़कर, सख्ती से)
“सब ध्यान मेरी तरफ़ दे...
सम को बाद में देख लेना...
अभी तो अंकल के सामने है तू...”
नेहा अब किचन स्लैब पर झुकी हुई थी।
उसकी पीठ slab की तरफ़ थी, यानी गुप्ता जी के सामने।
दोनों कोहनियाँ स्लैब पर टिकी हुई थीं, कमर थोड़ी ऊपर उठी हुई।
शर्ट अब उसके कंधों पर लटक रही थी, लगभग खुल चुकी थी।
उनका दायाँ हाथ धीरे-धीरे नीचे सरकने लगा।
पहले गर्दन को छुआ, नीली नसों को उँगलियों से दबाया।
फिर और नीचे... नेहा के मंगलसूत्र को छुआ, उसे हल्का सा खींचा, देखा।
मेरी तरफ़ देखकर घिनौनी मुस्कान दी।
फिर हाथ और नीचे गया... गहरी क्लिवेज में उतरा।
लेकिन स्तनों को छुआ नहीं। जानबूझकर छोड़ दिया।
हाथ और नीचे सरका...
बटनों तक पहुँचा।
पहले एक हाथ से बटन खोलने की कोशिश की, लेकिन नशे में नहीं हो पा रहा था।
नेहा के मुँह से हल्की सी हँसी निकल गई।
गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में)
“चुप साली रंडी...”
उन्होंने दूसरा हाथ भी लगा दिया और दोनों बटन एक साथ खोल दिए।
शर्ट अब बस कंधों पर लटक रही थी।
नेहा के दोनों स्तन पूरी तरह सामने आ गए थे
भारी, गोल, nipples सख्त होकर खड़े थे।
गुप्ता जी ने शर्ट को थोड़ा और खोला।
फिर उनका हाथ और नीचे सरक गया।
सीधे नेहा की गहरी नाभि पर पहुँचा।
एक उँगली अंदर डाल दी और कुरेदना शुरू कर दिया।
नेहा के चेहरे के भाव बदलने लगे।
उसकी आँखें आधी बंद हो गईं, होंठ हल्के से खुले, साँसें भारी और अनियमित हो गईं।
कभी-कभी हल्की सिसकारी निकल जाती थी।
प्ता जी का हाथ और नीचे सरक गया।
अब उनकी उँगलियाँ नेहा की पैंटी के किनारे पर थीं।
गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ देखा, उनकी आँखों में भूख और विजय का मिश्रण था।
गुप्ता जी: (धीमी, काँपती हुई आवाज़ में)
“कितनी बार ये मैंने सपने में देखा है...
आज हाथ लगने वाला है...”
उन्होंने धीरे-धीरे दो उँगलियाँ नेहा की चूत के ऊपर रख दीं।
पैंटी के ऊपर से ही उसकी गर्मी और नमी महसूस कर रहे थे।
उँगलियाँ चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे-धीरे महसूस कर रही थीं, दबा रही थीं।
फिर नीचे की तरफ़ सरकीं और छेद को हल्का सा दबाया।
नेहा: “आह...”
नेहा के मुँह से हल्की सी आह निकली। उसका शरीर हल्का सा काँप गया।
गुप्ता जी मुस्कुराए।
फिर पैंटी के ऊपर से ही उँगलियाँ ऊपर-नीचे करने लगे — लकीर के अंदर, चूत की पूरी लंबाई को सहलाते हुए।
गुप्ता जी: (संतुष्ट स्वर में)
“ये तो सपने से भी बेहतर है...
बहुत टाइट है तेरी चूत रंडी...”
नेहा अब स्लैब पर और झुक गई थी। उसकी कमर पीछे की तरफ़ उठी हुई थी।
गुप्ता जी की उँगलियाँ पैंटी के कपड़े के ऊपर से ही तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थीं।
नेहा की साँसें अब पूरी तरह अनियमित हो चुकी थीं।
उसके स्तन नीचे लटक रहे थे, शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की पैंटी के ऊपर से चूत को रगड़ते हुए कहा,
गुप्ता जी: “ये इतनी टाइट कैसे है?
ये चोदू तुझे चोदता नहीं क्या धंधे से?”
फिर थोड़ा मुस्कुराए और बोले,
गुप्ता जी: “या फिर छोटा है साले का?”
वो लगातार नेहा की चूत को पैंटी के ऊपर से रगड़ रहे थे।
हम दोनों शांत थे।
गुप्ता जी ने फिर पूछा,
गुप्ता जी: “बता ना...”
लगा कि उन्होंने ऐसे ही नहीं पूछा था।
उन्हें जवाब चाहिए था।
नेहा मस्ती के मूड में थी।
उसने बिना कुछ बोले, अपनी उँगली और अँगूठे से इशारा किया — छोटा वाला साइन।
मतलब साफ़ था — छोटा है।
गुप्ता जी ज़ोर से गंदी हँसी हँसे।
उनकी हँसी में मजा, घिन और विजय तीनों थे।
गुप्ता जी: (हँसते हुए)
“हाहाहा... छोटा है?
अरे वाह...
कोई बात नहीं बेटी...
अंकल का मोटा वाला आज तेरी चूत को ठीक कर देगा...”
गुप्ता जी की दो उँगलियाँ नेहा की चूत की फाँकों की लकीर में पैंटी के ऊपर से दब रही थीं।
पैंटी अब पूरी तरह भीग चुकी थी, जिसकी वजह से कपड़ा चूत से चिपक गया था।
नेहा की मोटी, सूजी हुई फाँकें और बीच की गहरी लकीर साफ़ दिख रही थी।
जैसे-जैसे गुप्ता जी अपनी उँगलियाँ ऊपर-नीचे कर रहे थे, नेहा अपनी कमर को रिदम में हिला रही थी।
धीरे-धीरे आगे-पीछे...
पूरी तरह से अपनी चूत को उनकी उँगलियों पर रगड़ रही थी।
गुप्ता जी ने जैसे-तैसे संभलते हुए अपना दूसरा हाथ नेहा के आगे की तरफ़ ले जाया।
मुझे लग रहा था कि उनके सामने अब फेवरेट डिश रखी हुई है।
उन्होंने नेहा के एक स्तन को पूरा हाथ में भर लिया।
उसका मोटा, भारी स्तन उनके बड़े हाथ में पूरी तरह समा गया।
थोड़ी देर तक उन्होंने शेप और साइज़ को हाथ से टटोला — दबाया, मसला, ऊपर से नीचे तक सहलाया।
फिर मुस्कुराकर बोले,
गुप्ता जी: “तुझे ब्रा की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी...
ये बिना ब्रा के भी शेप में तने हुए हैं...
देख... ये निप्पल कैसे मेरी तरफ़ देख रहा है...”
समझ नहीं आ रहा था कि क्या खाऊँ और क्या नहीं।
गुप्ता जी का एक हाथ उसकी चूत पर पैंटी के ऊपर से रगड़ रहा था, दूसरा हाथ अब उसके नंगे स्तन को मसल रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ रखा था। उन्होंने नेहा को थोड़ा और झुका दिया।
गुप्ता जी: “कितना सख्त हो गया है... अंकल को चूसने का मन कर रहा है...”
नेहा की आँखें आधी बंद थीं। उसने हल्की, शरारती आवाज़ में कहा,
नेहा: “किसी का वेट कर रहे हो अंकल...? कोई आने वाला है क्या?”
10 सेकंड लगे गुप्ता जी को जोक समझने में।
गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में)
“भेन की लौड़ी... मुझसे बकचोदी मत कर...”
बोलकर उन्होंने नेहा के एक स्तन को पूरा हाथ में भर लिया और जोर से दबा दिया।
नेहा के मुँह से “आह्ह्ह...” निकली।
फिर गुप्ता जी झुके और नेहा के nipple को मुँह में ले लिया।
उन्होंने पहले nipple को जीभ से चारों तरफ घेरा, फिर पूरा मुँह खोलकर स्तन का बड़ा हिस्सा मुँह में ले लिया।
गुप्ता जी ने नेहा के दूसरे स्तन पर मुँह लगा दिया।
वे बार-बार जोर-जोर से चूस रहे थे। नेहा का मंगलसूत्र बार-बार उनके चेहरे और मुँह पर टकरा रहा था, लेकिन वे उसे हटाने की बजाय और ज़ोर से चूस रहे थे।
नेहा की साँसें अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थीं। उसकी आँखें बंद थीं, होंठ खुले हुए थे।
थोड़ी देर बाद नेहा ने हल्की, काँपती हुई आवाज़ में पूछा,
नेहा: “मंगलसूत्र उतार दूँ अंकल?”
उसने हाथ उठाकर मंगलसूत्र खोलने की कोशिश की।
गुप्ता जी: (तुरंत सख्ती से, स्तन चूसते हुए)
“नहीं! मत उतारो।”
वे नेहा के स्तन को मुँह से छोड़कर ऊपर उठे और उसकी आँखों में देखते हुए बोले,
गुप्ता जी: “वहाँ रहने दो...
ये मुझे याद दिलाएगा कि तुम्हारा पति घर में बैठा अपनी बीवी को देख रहा है...
और मैं उसके स्वादिष्ट मम्मे चूस रहा हूँ!”
ये कहते हुए उन्होंने नेहा के दोनों स्तनों को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया और जोर-जोर से मसलने लगे। मंगलसूत्र अब भी उनके हाथों और नेहा की छाती के बीच लटक रहा था।
नेहा गुप्ता जी की आँखों में सीधे देखते हुए बोली,
नेहा: “ये गलत है अंकल जी...
आपने मेरे पति को बस अपना कुत्ता समझ लिया है...
आप मेरे सामने मेरे पति की बेइज्जती कर रहे हैं...”
उसकी आवाज़ में शर्म थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी हिम्मत और उत्तेजना भी थी।
जैसे वो गुप्ता जी के मुँह में अपनी बात डाल रही हो।
वो मुझे भी उस अपमान में शामिल करना चाहती थी, जो वो खुद महसूस कर रही थी।
जोर-जोर से चूसने लगे — “चुप... चुप... चुप...” की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। बीच-बीच में नेहा का मंगलसूत्र उनके मुँह में आ जा रहा था, वो उसे भी चूस लेते थे।
नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में देखते हुए, तेज़ और भारी साँसों के साथ कहा,
नेहा: “अंकल जी... मेरा पति... वो तो आपका वफादार कुत्ता है...
और आप उसके अपने घर में उसकी बीवी को लेना चाहते हैं!”
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ लिया। उनकी आवाज़ अब पूरी तरह अल्फा मेल वाली हो गई थी,
गुप्ता जी: “नेहा... तुम्हारा पति तो मेरे सामने कुछ भी नहीं है।
उसे कोई इज्जत नहीं है। वो हमेशा मुझसे डरता है।
मैं असली मर्द हूँ।
तुम चिंता मत करो मेरी जान... मैं तुम्हारी पूरी देखभाल करूँगा।
वो एक शब्द भी नहीं बोलेगा...
जो मैं कहूँगा, वो करेगा।
अगर मैं कहूँगा तो बैठ जाएगा...
अगर कहूँगा तो खड़ा हो जाएगा...”
गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराते हुए बोले,
गुप्ता जी: “देखना चाहती हो?”
नेहा ने पहले मेरी तरफ़ देखा।
मेरा चेहरा बिल्कुल भावहीन था।
फिर उसने गुप्ता जी की तरफ़ देखा।
बहुत छोटी, काँपती हुई आवाज़ में बोली,
नेहा: “हाँ...”
गुप्ता जी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
न मुझे समझ में आया, न गुप्ता जी को कि क्या हुआ।
गुप्ता जी थोड़ा पीछे हट गए। उनके होंठों पर नेहा की थूक चमक रही थी। उनकी आँखें हैरानी से बड़ी हो गई थीं।
नेहा की साँसें तेज़ थीं। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँखें अभी भी आधी बंद थीं।
नेहा ने आस-पास देखा, जैसे कुछ ढूँढ रही हो।
उसकी नज़र खाली ग्लास पर पड़ी।
वो खड़ी हुई, ग्लास उठाया और किचन के स्लैब की तरफ़ चली गई।
वहाँ जाकर उसने बोतल से अपने लिए नया पेग बनाना शुरू कर दिया।
यहाँ गुप्ता जी ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट जलाई।
एक लंबा कश लिया।
फिर अपने बाजू को हिम्मत देकर खड़े हो गए और धीरे-धीरे नेहा की तरफ़ बढ़ने लगे।
नेहा स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।
गुप्ता जी उसके ठीक पीछे पहुँच गए।
उन्होंने सिगरेट का कश लिया और नेहा की कमर पर हाथ रख दिया।
गुप्ता जी: (पीछे से, भारी और नशीली आवाज़ में)
“क्या हुआ बेटी...?
अचानक क्यों भाग गई?
अंकल को अकेला छोड़ दिया...”
नेहा का शरीर हल्का सा सख्त हो गया।
वो पेग बनाती रही, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ लिया और उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया,
गुप्ता जी: “डर गई क्या?
अभी तो मजा शुरू हुआ था...”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
वो बस पेग बनाती रही, लेकिन उसका शरीर अब गुप्ता जी से सटा हुआ था।
वो खड़ी हुई, ग्लास उठाया और किचन के स्लैब की तरफ़ चली गई।
वहाँ जाकर उसने बोतल से अपने लिए नया पेग बनाना शुरू कर दिया।
यहाँ गुप्ता जी ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट जलाई।
एक लंबा कश लिया।
फिर अपने बाजू को हिम्मत देकर खड़े हो गए और धीरे-धीरे नेहा की तरफ़ बढ़ने लगे।
गुप्ता जी इतने नशे में थे कि ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।
नेहा स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।
गुप्ता जी उसके ठीक पीछे पहुँच गए।
वे झूलते हुए, लड़खड़ाते हुए नेहा के पीछे पहुँच गए, जहाँ वो किचन स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।
वे नेहा के ठीक पीछे खड़े हो गए।
नशे की वजह से उनका बैलेंस नहीं बन पा रहा था, इसलिए वे आगे झुक गए।
पीछे गुप्ता जी, आगे नेहा।
मैं सोफे से साफ़ नहीं देख पा रहा था, लेकिन जो नज़ारा दिख रहा था, वो काफी था।
गुप्ता जी की कमर नेहा की गांड़ से सटी हुई थी।
उनका लंड, जो पैंट में था, नेहा की गांड़ पर दबा हुआ था।
नेहा का शरीर एकदम सख्त हो गया।
गुप्ता जी ने दोनों हाथों से नेहा की कमर पकड़ ली और अपने लंड को उसकी गांड़ पर धीरे-धीरे रगड़ने लगे।
गुप्ता जी: (नशे में भारी, गंदी आवाज़ में)
“उफ्फ बेटी... कितनी गर्म है तेरी गांड़..."
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
उसके हाथ काउंटर पर टिके हुए थे। उसकी साँसें बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।
वो न तो आगे बढ़ी, न पीछे हटी — बस चुपचाप खड़ी रही, जबकि गुप्ता जी उसके पीछे से उसे रगड़ रहे थे।
गुप्ता जी ने अपनी कमर हल्के-हल्के आगे-पीछे करने शुरू कर दी।
उनका लंड नेहा की पैंटी वाली गांड़ पर ऊपर-नीचे रगड़ खा रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ नेहा की गर्दन पर थे।
गुप्ता जी: (गर्दन चूसते हुए, भारी आवाज़ में)
“यहाँ क्यों आ गई?
मैं तो तेरे होंठों का रस पान कर रहा था...
कितना मज़ा आ रहा था...”
ये बोलते हुए उन्होंने नेहा की गर्दन पर गहरे किस करने शुरू कर दिए — चूस रहे थे, हल्का-हल्का काट रहे थे, अपनी गर्म जीभ से चाट रहे थे।
नेहा ने हल्की सी गर्दन घुमाकर, काँपती हुई आवाज़ में कहा,
नेहा: “वो... मेरा पेग खत्म हो गया था... इसीलिए...”
गुप्ता जी ने हँसते हुए नेहा की गर्दन पर और जोर से किस किया। उनका एक हाथ नेहा की कमर से नीचे सरक गया और उसकी गांड़ को कसकर दबा लिया।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनकी आवाज़ अब और भारी और गंदी हो गई थी।
गुप्ता जी: “तुझे दारू पीने की बेन की लौड़ी... तो पहले बताती ना...
ये देख, तूने मेरे ऊपर कितनी गिराई है...”
उन्होंने नेहा के दोनों कंधे पकड़ लिए और जोर देकर उसे पीछे घुमा दिया।
अब नेहा गुप्ता जी की तरफ़ मुंह करके खड़ी थी।
गुप्ता जी ने अपना गीला कुर्ता दिखाते हुए बोले,
गुप्ता जी: “देख... कितना गीला कर दिया तूने...
तेरे पेग की वजह से...”
नेहा की साँसें तेज़ हो गई थीं।
गुप्ता जी: (नेहा की आँखों में देखते हुए, मुस्कुराते हुए)
“अब तो तुझे साफ़ करना पड़ेगा ना बेटी...
जो तूने गिराया है...”
नेहा ने मेरी तरफ़ एक असहाय नज़र डाली।
उसका चेहरा शर्म और नशे से लाल था।
गुप्ता जी बदबदा रहे थे।
गुप्ता जी: “मैंने देखा... तूने सम के गले से व्हिस्की साफ़ की...
वो तो थोड़ी सी थी...
मुझ पर तो तूने पूरी गिरा दी है...”
नेहा बस चुपचाप देख रही थी।
कभी गुप्ता जी को, कभी मेरी तरफ़।
गुप्ता जी दोनों हाथों से अपने कुर्ते को उतारने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नशे की वजह से उनका बैलेंस बिगड़ रहा था। वो बार-बार लड़खड़ा रहे थे, कुर्ता आधा ऊपर चढ़ा, आधा नीचे। उनकी तोंद और बालों भरी छाती आधे-आधे दिख रही थी।
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।
उसने हल्के से इशारा किया — पास आने का।
मुझे लगा वो कहेगी — “बाहर ले जा इस छुटिये को”।
मैं पास पहुँचा।
नेहा ने मेरी आँखों में देखा और बहुत धीमी, नशीली आवाज़ में बोली,
नेहा: “बेबी... हेल्प करो ना अंकल की...”
मैं एक पल के लिए स्तब्ध रह गया।
गुप्ता जी अभी भी कुर्ता उतारने की कोशिश में जुटे हुए थे, लड़खड़ाते हुए।
नेहा मेरे बहुत करीब खड़ी थी
उसने मेरी तरफ़ देखकर हल्का सा सिर हिलाया — जैसे मुझे आगे बढ़ने का इशारा कर रही हो।
गुप्ता जी ने मुझे देखा और नशे में हँसते हुए बोले,
गुप्ता जी: “हाँ बेटा... आ जा...
अपनी बीवी के अंकल की मदद कर...
कुर्ता उतारने में भी मदद चाहिए अब...”
मैं वहीं खड़ा था।
मेरा दिमाग पूरी तरह उलझ गया था।
मैंने सहारा दिया।
नेहा जो कह रही थी, वैसा ही किया।
मैंने गुप्ता जी के कुर्ते के किनारे पकड़े और गर्दन के ऊपर से बाहर निकाल दिया।
गुप्ता जी अब ऊपर से पूरी तरह नंगे हो गए।
उनकी छाती पर घने बाल थे — आधे सफेद, आधे काले।
आधा शरीर पसीने और छलकी हुई व्हिस्की से गीला था।
एक हाथ में सिगरेट थी।
गुप्ता जी: (नशे में हँसते हुए, सिगरेट का कश लेते हुए)
“बेटी... दारू वेस्ट नहीं करनी चाहिए...”
उनकी तोंद बाहर निकली हुई थी। छाती के बालों पर व्हिस्की की बूँदें चमक रही थीं।
नेहा उनके सामने खड़ी थी।
वो गुप्ता जी की नंगी छाती को देख रही थी।
गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ एक कदम बढ़ाया। उनकी नंगी छाती अब नेहा के स्तनों से सिर्फ़ कुछ इंच दूर थी।
नेहा ने एक बार मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में शर्म, नशा और एक अजीब सी हिम्मत थी। फिर वो धीरे-धीरे गुप्ता जी की तरफ़ मुड़ी।
गुप्ता जी अभी भी नंगे ऊपर वाले हिस्से के साथ खड़े थे।
नेहा ने आगे बढ़कर सबसे पहले गुप्ता जी की दाईं छाती पर हल्के से जीभ फेरी।
फिर उनके left nipple को अपनी गर्म, नम जीभ से चाटा।
उसने धीरे-धीरे nipple को घेरते हुए चाटा, फिर हल्का सा काट भी लिया।
गुप्ता जी की साँस भारी हो गई।
नेहा ने उनके कंधों पर जीभ फिराई — दाएँ कंधे से बाएँ कंधे तक, धीरे-धीरे।
फिर उनकी गर्दन के नीचे, कॉलर बोन पर चाटा।
उसके बाद वो धीरे-धीरे नीचे की तरफ़ गई।
सकी जीभ गुप्ता जी की तोंद पर घूम रही थी।
वो नाभि के पास पहुँची, और अपनी जीभ को नाभि के अंदर डालकर चाटने लगी।
गोल-गोल घुमाते हुए, चूसते हुए।
गुप्ता जी की साँसें अब और तेज़ हो गई थीं।
उनका एक हाथ नेहा के बालों में था, दूसरे हाथ से वो अपनी पैंट के ऊपर से लंड मसल रहे थे।
नेहा की जीभ नाभि से नीचे की तरफ़ सरक रही थी।
उसने गुप्ता जी की तोंद के नीचे वाले बालों को भी चाटा।
गुप्ता जी: (हाँफते हुए)
“उफ्फ... कितनी अच्छी रंडी है तू...
अंकल की तोंद चाट रही है... नाभि चूस रही है...”
नेहा कुछ नहीं बोली।
मैं थोड़ी देर तक चुपचाप बैठा देख रहा था — नेहा को वो सब करते हुए जो गुप्ता जी कह रहे थे।
जब नेहा गुप्ता जी के nipple चाट रही थी, तब उन्होंने अपनी जलती हुई सिगरेट मुझे आगे बढ़ा दी।
गुप्ता जी: (नशे में मुस्कुराते हुए, एक अर्थपूर्ण इशारा करते हुए)
“बहुत मज़ा आ रहा है तेरी बीवी के साथ...”
मैंने सिगरेट ले ली।
मेरा हाथ हल्का सा काँप रहा था।
नेहा बिल्कुल submissive mood में चली गई थी।
जहाँ-जहाँ गुप्ता जी कह रहे थे, नेहा वहाँ-वहाँ चाट रही थी।
उसकी गर्म, नम जीभ गुप्ता जी की छाती पर, निप्पल पर, तोंद पर, नाभि में... हर जगह घूम रही थी।
गुप्ता जी के घने बालों पर भी उसकी थूक चमक रही थी।
थोड़ी देर बाद नेहा सीधी खड़ी हो गई।
उसने एक उँगली अपने दाँतों में दबाकर, बहुत ही cute और शरारती अंदाज़ में कहा,
नेहा: “सब साफ़ हो गया अंकल...”
उसका पूरा चेहरा अपने ही थूक और व्हिस्की से चमक रहा था।
होंठ सूजे हुए थे, ठुड्डी पर थूक की एक पतली लकीर बह रही थी।
गुप्ता जी ने उसे देखा और संतुष्ट मुस्कान दी।
फिर उन्होंने हल्के से नेहा के गाल पर चांटा मारा — शाबाशी में।
गुप्ता जी: “Good girl...
तूने अच्छी कुतिया की तरह साफ़ कर दिया...”
उन्होंने मेरे हाथ से सिगरेट ली और नेहा के होंठों पर लगा दी।
नेहा ने एक गहरा कश लिया और पूरा धुआँ गुप्ता जी के चेहरे पर छोड़ दिया।
नेहा ने सब कुछ किया।
बिना मेरी तरफ़ एक बार भी देखे।
बिना मेरी इज्जत का कोई ख्याल किए।
वो पूरी तरह गुप्ता जी की बात मान रही थी — जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।
मैं उसे समझ नहीं पा रहा था।
ये वही नेहा थी जो कुछ घंटे पहले मुझसे चिपकी हुई थी, और अब...
थोड़ी देर बाद हमारी नज़रें मिलीं।
नेहा ने मुझे देखा, आँख मारते हुए हल्का सा इशारा किया।
मुझे समझ में आ गया — उसे मजा आ रहा था।
बहुत मजा आ रहा था।
फिर उसने दूसरा इशारा किया — जैसे पूछ रही हो, “तुम ठीक हो?”
मैंने कंधे उचकाए — “पता नहीं” वाला इशारा।
फिर अपना हाथ नीचे ले जाकर पैंट के ऊपर से अपना खड़ा तंबू दिखा दिया।
नेहा ने उसे देखा।
उसके होंठों पर एक छोटी सी शरारती मुस्कान आई।
उसने हल्का सा सिर हिलाया, जैसे कह रही हो — “अच्छा है...”
गुप्ता जी हमें ये सब करते हुए देख रहे थे।
उन्होंने नेहा के गाल पर फिर से एक हल्का सा चांटा मारा — शाबाशी वाला, लेकिन authority के साथ।
फिर उन्होंने नेहा का चेहरा अपनी तरफ़ घुमा लिया।
गुप्ता जी: (नेहा की ठोड़ी पकड़कर, सख्ती से)
“सब ध्यान मेरी तरफ़ दे...
सम को बाद में देख लेना...
अभी तो अंकल के सामने है तू...”
नेहा अब किचन स्लैब पर झुकी हुई थी।
उसकी पीठ slab की तरफ़ थी, यानी गुप्ता जी के सामने।
दोनों कोहनियाँ स्लैब पर टिकी हुई थीं, कमर थोड़ी ऊपर उठी हुई।
शर्ट अब उसके कंधों पर लटक रही थी, लगभग खुल चुकी थी।
उनका दायाँ हाथ धीरे-धीरे नीचे सरकने लगा।
पहले गर्दन को छुआ, नीली नसों को उँगलियों से दबाया।
फिर और नीचे... नेहा के मंगलसूत्र को छुआ, उसे हल्का सा खींचा, देखा।
मेरी तरफ़ देखकर घिनौनी मुस्कान दी।
फिर हाथ और नीचे गया... गहरी क्लिवेज में उतरा।
लेकिन स्तनों को छुआ नहीं। जानबूझकर छोड़ दिया।
हाथ और नीचे सरका...
बटनों तक पहुँचा।
पहले एक हाथ से बटन खोलने की कोशिश की, लेकिन नशे में नहीं हो पा रहा था।
नेहा के मुँह से हल्की सी हँसी निकल गई।
गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में)
“चुप साली रंडी...”
उन्होंने दूसरा हाथ भी लगा दिया और दोनों बटन एक साथ खोल दिए।
शर्ट अब बस कंधों पर लटक रही थी।
नेहा के दोनों स्तन पूरी तरह सामने आ गए थे
भारी, गोल, nipples सख्त होकर खड़े थे।
गुप्ता जी ने शर्ट को थोड़ा और खोला।
फिर उनका हाथ और नीचे सरक गया।
सीधे नेहा की गहरी नाभि पर पहुँचा।
एक उँगली अंदर डाल दी और कुरेदना शुरू कर दिया।
नेहा के चेहरे के भाव बदलने लगे।
उसकी आँखें आधी बंद हो गईं, होंठ हल्के से खुले, साँसें भारी और अनियमित हो गईं।
कभी-कभी हल्की सिसकारी निकल जाती थी।
प्ता जी का हाथ और नीचे सरक गया।
अब उनकी उँगलियाँ नेहा की पैंटी के किनारे पर थीं।
गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ देखा, उनकी आँखों में भूख और विजय का मिश्रण था।
गुप्ता जी: (धीमी, काँपती हुई आवाज़ में)
“कितनी बार ये मैंने सपने में देखा है...
आज हाथ लगने वाला है...”
उन्होंने धीरे-धीरे दो उँगलियाँ नेहा की चूत के ऊपर रख दीं।
पैंटी के ऊपर से ही उसकी गर्मी और नमी महसूस कर रहे थे।
उँगलियाँ चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे-धीरे महसूस कर रही थीं, दबा रही थीं।
फिर नीचे की तरफ़ सरकीं और छेद को हल्का सा दबाया।
नेहा: “आह...”
नेहा के मुँह से हल्की सी आह निकली। उसका शरीर हल्का सा काँप गया।
गुप्ता जी मुस्कुराए।
फिर पैंटी के ऊपर से ही उँगलियाँ ऊपर-नीचे करने लगे — लकीर के अंदर, चूत की पूरी लंबाई को सहलाते हुए।
गुप्ता जी: (संतुष्ट स्वर में)
“ये तो सपने से भी बेहतर है...
बहुत टाइट है तेरी चूत रंडी...”
नेहा अब स्लैब पर और झुक गई थी। उसकी कमर पीछे की तरफ़ उठी हुई थी।
गुप्ता जी की उँगलियाँ पैंटी के कपड़े के ऊपर से ही तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थीं।
नेहा की साँसें अब पूरी तरह अनियमित हो चुकी थीं।
उसके स्तन नीचे लटक रहे थे, शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की पैंटी के ऊपर से चूत को रगड़ते हुए कहा,
गुप्ता जी: “ये इतनी टाइट कैसे है?
ये चोदू तुझे चोदता नहीं क्या धंधे से?”
फिर थोड़ा मुस्कुराए और बोले,
गुप्ता जी: “या फिर छोटा है साले का?”
वो लगातार नेहा की चूत को पैंटी के ऊपर से रगड़ रहे थे।
हम दोनों शांत थे।
गुप्ता जी ने फिर पूछा,
गुप्ता जी: “बता ना...”
लगा कि उन्होंने ऐसे ही नहीं पूछा था।
उन्हें जवाब चाहिए था।
नेहा मस्ती के मूड में थी।
उसने बिना कुछ बोले, अपनी उँगली और अँगूठे से इशारा किया — छोटा वाला साइन।
मतलब साफ़ था — छोटा है।
गुप्ता जी ज़ोर से गंदी हँसी हँसे।
उनकी हँसी में मजा, घिन और विजय तीनों थे।
गुप्ता जी: (हँसते हुए)
“हाहाहा... छोटा है?
अरे वाह...
कोई बात नहीं बेटी...
अंकल का मोटा वाला आज तेरी चूत को ठीक कर देगा...”
गुप्ता जी की दो उँगलियाँ नेहा की चूत की फाँकों की लकीर में पैंटी के ऊपर से दब रही थीं।
पैंटी अब पूरी तरह भीग चुकी थी, जिसकी वजह से कपड़ा चूत से चिपक गया था।
नेहा की मोटी, सूजी हुई फाँकें और बीच की गहरी लकीर साफ़ दिख रही थी।
जैसे-जैसे गुप्ता जी अपनी उँगलियाँ ऊपर-नीचे कर रहे थे, नेहा अपनी कमर को रिदम में हिला रही थी।
धीरे-धीरे आगे-पीछे...
पूरी तरह से अपनी चूत को उनकी उँगलियों पर रगड़ रही थी।
गुप्ता जी ने जैसे-तैसे संभलते हुए अपना दूसरा हाथ नेहा के आगे की तरफ़ ले जाया।
मुझे लग रहा था कि उनके सामने अब फेवरेट डिश रखी हुई है।
उन्होंने नेहा के एक स्तन को पूरा हाथ में भर लिया।
उसका मोटा, भारी स्तन उनके बड़े हाथ में पूरी तरह समा गया।
थोड़ी देर तक उन्होंने शेप और साइज़ को हाथ से टटोला — दबाया, मसला, ऊपर से नीचे तक सहलाया।
फिर मुस्कुराकर बोले,
गुप्ता जी: “तुझे ब्रा की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी...
ये बिना ब्रा के भी शेप में तने हुए हैं...
देख... ये निप्पल कैसे मेरी तरफ़ देख रहा है...”
समझ नहीं आ रहा था कि क्या खाऊँ और क्या नहीं।
गुप्ता जी का एक हाथ उसकी चूत पर पैंटी के ऊपर से रगड़ रहा था, दूसरा हाथ अब उसके नंगे स्तन को मसल रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ रखा था। उन्होंने नेहा को थोड़ा और झुका दिया।
गुप्ता जी: “कितना सख्त हो गया है... अंकल को चूसने का मन कर रहा है...”
नेहा की आँखें आधी बंद थीं। उसने हल्की, शरारती आवाज़ में कहा,
नेहा: “किसी का वेट कर रहे हो अंकल...? कोई आने वाला है क्या?”
10 सेकंड लगे गुप्ता जी को जोक समझने में।
गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में)
“भेन की लौड़ी... मुझसे बकचोदी मत कर...”
बोलकर उन्होंने नेहा के एक स्तन को पूरा हाथ में भर लिया और जोर से दबा दिया।
नेहा के मुँह से “आह्ह्ह...” निकली।
फिर गुप्ता जी झुके और नेहा के nipple को मुँह में ले लिया।
उन्होंने पहले nipple को जीभ से चारों तरफ घेरा, फिर पूरा मुँह खोलकर स्तन का बड़ा हिस्सा मुँह में ले लिया।
गुप्ता जी ने नेहा के दूसरे स्तन पर मुँह लगा दिया।
वे बार-बार जोर-जोर से चूस रहे थे। नेहा का मंगलसूत्र बार-बार उनके चेहरे और मुँह पर टकरा रहा था, लेकिन वे उसे हटाने की बजाय और ज़ोर से चूस रहे थे।
नेहा की साँसें अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थीं। उसकी आँखें बंद थीं, होंठ खुले हुए थे।
थोड़ी देर बाद नेहा ने हल्की, काँपती हुई आवाज़ में पूछा,
नेहा: “मंगलसूत्र उतार दूँ अंकल?”
उसने हाथ उठाकर मंगलसूत्र खोलने की कोशिश की।
गुप्ता जी: (तुरंत सख्ती से, स्तन चूसते हुए)
“नहीं! मत उतारो।”
वे नेहा के स्तन को मुँह से छोड़कर ऊपर उठे और उसकी आँखों में देखते हुए बोले,
गुप्ता जी: “वहाँ रहने दो...
ये मुझे याद दिलाएगा कि तुम्हारा पति घर में बैठा अपनी बीवी को देख रहा है...
और मैं उसके स्वादिष्ट मम्मे चूस रहा हूँ!”
ये कहते हुए उन्होंने नेहा के दोनों स्तनों को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया और जोर-जोर से मसलने लगे। मंगलसूत्र अब भी उनके हाथों और नेहा की छाती के बीच लटक रहा था।
नेहा गुप्ता जी की आँखों में सीधे देखते हुए बोली,
नेहा: “ये गलत है अंकल जी...
आपने मेरे पति को बस अपना कुत्ता समझ लिया है...
आप मेरे सामने मेरे पति की बेइज्जती कर रहे हैं...”
उसकी आवाज़ में शर्म थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी हिम्मत और उत्तेजना भी थी।
जैसे वो गुप्ता जी के मुँह में अपनी बात डाल रही हो।
वो मुझे भी उस अपमान में शामिल करना चाहती थी, जो वो खुद महसूस कर रही थी।
जोर-जोर से चूसने लगे — “चुप... चुप... चुप...” की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। बीच-बीच में नेहा का मंगलसूत्र उनके मुँह में आ जा रहा था, वो उसे भी चूस लेते थे।
नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में देखते हुए, तेज़ और भारी साँसों के साथ कहा,
नेहा: “अंकल जी... मेरा पति... वो तो आपका वफादार कुत्ता है...
और आप उसके अपने घर में उसकी बीवी को लेना चाहते हैं!”
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ लिया। उनकी आवाज़ अब पूरी तरह अल्फा मेल वाली हो गई थी,
गुप्ता जी: “नेहा... तुम्हारा पति तो मेरे सामने कुछ भी नहीं है।
उसे कोई इज्जत नहीं है। वो हमेशा मुझसे डरता है।
मैं असली मर्द हूँ।
तुम चिंता मत करो मेरी जान... मैं तुम्हारी पूरी देखभाल करूँगा।
वो एक शब्द भी नहीं बोलेगा...
जो मैं कहूँगा, वो करेगा।
अगर मैं कहूँगा तो बैठ जाएगा...
अगर कहूँगा तो खड़ा हो जाएगा...”
गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराते हुए बोले,
गुप्ता जी: “देखना चाहती हो?”
नेहा ने पहले मेरी तरफ़ देखा।
मेरा चेहरा बिल्कुल भावहीन था।
फिर उसने गुप्ता जी की तरफ़ देखा।
बहुत छोटी, काँपती हुई आवाज़ में बोली,
नेहा: “हाँ...”
गुप्ता जी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।


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