26-06-2026, 11:33 PM
उसका एक हाथ मेरी गर्दन पर था, दूसरा मेरी छाती पर।
उसकी शर्ट और ऊपर चढ़ गई थी।
मैंने भी जवाब में उसे किस किया।
हमारे होंठ एक-दूसरे को चूस रहे थे, जीभें आपस में उलझ रही थीं।
नेहा ने जानबूझकर हल्की-हल्की सिसकारी भरी — loud enough कि गुप्ता जी सुन सकें।
गुप्ता जी चुपचाप बैठे हमें देख रहे थे।
उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं। हाथ अब भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को मसल रहे थे।
उनके चेहरे पर हैरानी, उत्तेजना और एक अजीब सी विजय का भाव था।
नेहा ने किस के बीच में मेरे कान में फुसफुसाया,
नेहा: “देख रहे हैं ना वो..."
फिर उसने और गहरा किस किया।
मैं समझ गया था —
नेहा अब खेलने के मूड में आ चुकी थी।
और वो चाहती थी कि गुप्ता जी सब देखें।
किस खत्म होने के बाद हम दोनों ने एक साथ गुप्ता जी की तरफ़ देखा।
अब किसी में कोई शर्म नहीं बची थी।
गुप्ता जी हमें देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने अपना ग्लास उठाया और एक घूँट में पूरा खाली कर दिया। उनकी आँखें अभी भी नेहा की खुली शर्ट और पैंटी पर घूम रही थीं।
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ में पड़े पूरे भरे ग्लास को देखा।
वो मुस्कुराई, फिर मेरे कान के पास आई और बहुत मीठी, नशीली आवाज़ में बोली,
नेहा: “बेबी... तुम भी पियो ना...”
उसने एक हाथ से मेरा ग्लास पकड़ा और मेरे होंठों पर लगा दिया।
जैसे वो चाह रही हो कि मैं और ज़्यादा नशे में चला जाऊँ...
आज कुछ भी ऐसा न सोच सकूँ जो वास्तविक लगे।
मैंने ग्लास का घूँट लिया। नेहा ने ग्लास को और झुकाया, जिससे ज़्यादा व्हिस्की मेरे मुँह में चली गई। कुछ बूँदें मेरे होंठों से नीचे टपक गईं, मेरी गर्दन पर।
नेहा ने आगे बढ़कर उन बूँदों को अपनी जीभ से चाट लिया।
फिर मेरी आँखों में देखकर बोली,
नेहा: “आज रात... कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं...”
गुप्ता जी हमें देख रहे थे। उनकी मुस्कान अब और चौड़ी हो गई थी।
उन्होंने अपना खाली ग्लास टेबल पर रखा और बोले,
गुप्ता जी: “वाह बेटी...
अंकल को भी तो कुछ दो...
या... अंकल खुद ले लें?”
किस खत्म होने के बाद नेहा बैठी रही। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर गुप्ता जी की तरफ़ मुड़ी।
गुप्ता जी double meaning में बात कर रहे थे। उनकी मुस्कान और नज़र से साफ़ लग रहा था कि वो kiss लेना चाहते हैं या peg, कुछ समझ नहीं आ रहा था।
नेहा ने जानबूझकर peg ही समझ लिया। वो हल्के से मुस्कुराई और बोली,
नेहा: “क्यों नहीं अंकल... बहुत है...”
वो उठी।
जैसे ही वो उठी, उसकी शर्ट और खुल गई।
अब उसके हल्के भूरे रंग के निप्पल के किनारे साफ़ दिख रही थी। शर्ट का पतला कपड़ा उसके निप्पल्स पर चिपका हुआ था, जिससे उनकी शेप और सख्ती दोनों उभरकर सामने आ गई थी।
नेहा किचन स्लैब की तरफ़ गई और peg बनाने लगी।
नेहा ने ट्रे में तीन ग्लास तैयार किए।
जब वो ट्रे लेकर हमारे पास आई और झुकी तो उसके स्तन गुप्ता जी के सामने पूरी तरह लटक गए।
नेहा: (गुप्ता जी को ग्लास देते हुए)
“लीजिए अंकल...”
नेहा ने गुप्ता जी की तरफ़ ग्लास बढ़ाया।
मैंने तुरंत बीच में बोल दिया,
सम: “अंकल, मुझे लगता है आपको नहीं पीना चाहिए।
आपसे बोला भी नहीं जा रहा है।
आपने बहुत पी रखी है।”
गुप्ता जी ने एकदम से मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें नशे और गुस्से से लाल हो गई थीं। उन्होंने तेज़ आवाज़ में जवाब दिया,
गुप्ता जी: “चुप कर मादरचोद...
मुझे मत सिखा कि कितनी पीनी चाहिए!”
उनकी आवाज़ में इतना गुस्सा था कि कमरे में सन्नाटा छा गया।
नेहा का हाथ हल्का सा काँप गया।
गुप्ता जी ने नेहा से ग्लास छीन लिया और एक घूँट में आधा ग्लास खाली कर दिया। फिर नेहा की तरफ़ घूरते हुए बोले,
गुप्ता जी: “बेटी... तू तो दे रही है ना...
ये मादरचोद बीच में क्यों बोल रहा है?
नेहा मेरी तरफ़ असहाय नज़र से देख रही थी।
मैंने गुस्से को कंट्रोल करते हुए कहा,
सम: “अंकल... अब बस भी करिए।
आपको घर जाना चाहिए।”
गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखकर घिनौनी मुस्कान दी और बोले,
गुप्ता जी: “घर?
अभी तो पार्टी शुरू हुई है...
तेरी बीवी ने मुझे बुलाया है... और तू बीच में बोल रहा है?
चुप बैठ...”
नेहा ने हाथ बढ़ाकर ग्लास आगे किया।
गुप्ता जी ने ग्लास लेने की बजाय नेहा का हाथ थाम लिया और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।
नेहा लड़खड़ाई। आधा पेग उसके हाथ से छलक गया और गुप्ता जी के कुर्ते पर गिर गया।
गुप्ता जी: (नेहा को अपनी गोद की तरफ़ खींचते हुए, नशे में हँसते हुए)
“बेटी... ऐसे पिला ना...
जैसे तूने अपने इस कुत्ते को पिलाया था...”
नेहा उनके कंधे पर हाथ रखकर खुद को संभाल रही थी। उसकी शर्ट अब लगभग पूरी तरह खुल चुकी थी।
नेहा जब गुप्ता जी की तरफ़ झुकी तो पहले तो वो पूरी तरह उनके ऊपर गिर गई।
उसके भारी स्तन गुप्ता जी की छाती से ज़ोर से टकराए। गुप्ता जी ने तुरंत दोनों हाथों से नेहा की कमर पकड़ ली।
नेहा घबरा गई और खुद को संभालते हुए थोड़ा साइड में बैठ गई, लेकिन अब भी गुप्ता जी के बहुत करीब।
दोनों के हाथ आपस में मिले हुए थे।
नेहा का शरीर गुप्ता जी से चिपका हुआ था।
उसकी भारी, नंगी छातियाँ गुप्ता जी की छाती से सटी हुई थीं। शर्ट के खुले बटन की वजह से उसकी हल्के भूरे निप्पल सीधे उनके कुर्ते से रगड़ खा रहे थे।
गुप्ता जी की साँसें भारी हो गई थीं।
उनका एक हाथ नेहा की कमर पर था, दूसरा हाथ अभी भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को मसल रहा था।
गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में, मुस्कुराते हुए)
“अरे वाह बेटी...
इतना अच्छा लग रहा है...
आज तो अंकल की गोद में बैठकर पेग पिलाओ...”
नेहा का चेहरा शर्म से लाल था, लेकिन वो उठकर नहीं हटी।
उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — उसकी आँखों में शर्म, नशा और एक अजीब सी उत्तेजना थी।
नेहा: (काँपती हुई आवाज़ में)
“अंकल... आपका पेग...”
गुप्ता जी ने नेहा को और करीब खींच लिया। अब नेहा की एक जाँघ उनकी जाँघ पर थी और उनकी छाती नेहा के स्तनों से पूरी तरह दब रही थी।
नेहा कुछ सोचती, उससे पहले मैंने जोर से कहा,
सम: “नेहा... इसने तुम्हें बाहर ‘रंडी’ कहा... और भी गंदी-गंदी बातें कहीं...”
मेरी जालन से ऐसी शिकायत की, जैसे कोई छोटा बच्चा टीचर से शिकायत कर रहा हो।
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ भाव आया — शायद समझ, शायद थोड़ी निराशा।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।
उसने हाथ में जो ग्लास था, उसे गुप्ता जी की तरफ़ बढ़ा दिया।
गुप्ता जी ने ग्लास पकड़ लिया और नेहा के हाथ से ही पीने लगे।
जैसे मेरी बात का कोई असर ही नहीं हुआ हो।
गुप्ता जी: (नेहा के हाथ को थामे हुए, नशे में मुस्कुराते हुए)
“हाँ बेटी... ऐसे ही पिलाओ...
अच्छा लग रहा है...”
नेहा चुपचाप बैठी रही।
मैंने फिर से, इस बार और ज़ोर से कहा,
सम: “नेहा... सुन रही हो ना?
इसने तुम्हें रंडी कहा...”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की चमक थी — नशा, थोड़ी बगावत, और एक अजीब सी शांति।
उसने बहुत धीरे से मेरी तरफ़ देखकर कहा,
आधे से ज़्यादा ग्लास तो पहले ही छलक चुका था।
जो बचा था, वो गुप्ता जी ने नेहा के हाथों से एक ही घूँट में पी लिया।
गुप्ता जी: “आह... आहहहहह....”
पीने के बाद उन्होंने जोर से आह भरी। फिर मेरी तरफ़ घूरते हुए बोले,
गुप्ता जी: “क्या बोल रहा था तू भड़वे?
क्या शिकायत कर रहा था?”
फिर वो नेहा की तरफ़ मुड़े। उनकी आँखों में नशा और गंदी भूख थी। उन्होंने नेहा की कमर पर हाथ कसकर रखा और बोले,
गुप्ता जी: “हाँ... कहा मैंने।
है मेरी बेटी रंडी।
इसका जिस्म किसी रंडी से भी बढ़कर है...”
नेहा का पूरा शरीर सख्त हो गया।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। लेकिन वो गुप्ता जी की गोद से उठकर भी नहीं हटी।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया और बोले,
गुप्ता जी: “देखो ना... ये स्तन... ये गांड़... ये जाँघें...
सब किसी प्रोफेशनल रंडी से भी ज्यादा माल हैं।
और तू... (मेरी तरफ़ देखकर)
इसे बाहर चुदवाता है... और घर लाकर मुझे दिखा रहा है...”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में शर्म थी, लेकिन उत्तेजना भी थी।
वो मेरी तरफ़ देखकर हल्के से काँप रही थी, लेकिन गुप्ता जी की गोद से पूरी तरह नहीं हटी।
गुप्ता जी: (नेहा के स्तन को घूरते हुए)
“क्या बोला था तू... रंडी नहीं है?
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया।
उनका पूरा चेहरा अब नेहा की तरफ़ था।
उनके होंठ नेहा के होंठों से सिर्फ़ दो-तीन इंच की दूरी पर थे।
उनकी गर्म, शराब वाली साँसें नेहा के चेहरे पर पड़ रही थीं।
गुप्ता जी: (बहुत धीमी, भारी आवाज़ में, नेहा की आँखों में देखते हुए)
“क्या हुआ बेटी...
अंकल के पास आने में शर्म आ रही है?”
गुप्ता जी: (बहुत धीमी, गंदी और नशे वाली आवाज़ में)
“बोल ना... है ना तू रंडी?”
नेहा चुप रही। उसका शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।
गुप्ता जी ने और करीब आकर, उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा,
गुप्ता जी: “बता ना मुझे... है ना तू...
अपने इस भड़वे पति के सामने... मेरे सामने... मेरी गोद में... इतने पास...
तुझमें जो रंडी है, वो तुझे भी नहीं पता...”
ये बोलते हुए उनके होंठ धीरे-धीरे नेहा के होंठों की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनकी गर्म, शराब वाली साँसें नेहा के होंठों को छू रही थीं।
नेहा की साँसें बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।
उसकी छाती गुप्ता जी की छाती से पूरी तरह दब रही थी।
उसने मेरी तरफ़ एक गहरी, लंबी नज़र डाली — उस नज़र में शर्म, डर, उत्तेजना और एक सवाल सब कुछ था।
मैं चुपचाप बैठा था।
मेरा पूरा शरीर तन गया था।
गुप्ता जी के होंठ नेहा के होंठों से बस छूने ही वाले थे...
एक आदमी मेरे घर में, मेरे सोफे पर, मेरी बीवी के साथ बैठकर उसे “रंडी” कह रहा था।
मुझमें गुस्सा उबाल खा रहा था, जैसे कोई मेरी इज्जत उतार रहा हो।
मेरा हाथ अपने आप मेरे लंड पर चला गया।
चेक करने के लिए।
वो पत्थर की तरह सख्त था।
दूसरा दिमाग इसे पसंद कर रहा था।
वहाँ नेहा की आधी आँखें बंद थीं।
गुप्ता जी के होंठ उसके होंठों से सिर्फ़ आधा इंच दूर थे।
उसकी साँसें भारी थीं। वो हर पल सोच रही थी कि अब हमला हो सकता है... लेकिन हमला नहीं हुआ।
उसने धीरे से आँखें खोलीं और गुप्ता जी की आँखों में देखा — जैसे पूछ रही हो, “क्या रह गया?”
गुप्ता जी ने अपनी पकड़ और कस ली और फिर से, बहुत धीमी लेकिन सख्त आवाज़ में दोहराया,
गुप्ता जी: “बोल ना... है ना तू रंडी...
मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ...”
नेहा की साँस अटक गई।
उसका चेहरा पूरी तरह लाल था। उसके स्तन गुप्ता जी की छाती से दबे हुए थे। शर्ट अब लगभग खुल चुकी थी।
गुप्ता जी ने उसकी कमर को और कसकर पकड़ लिया और उसके होंठों के और करीब आ गए। उनकी गर्म साँसें नेहा के होंठों को छू रही थीं।
गुप्ता जी: (फुसफुसाते हुए)
“बोल ना बेटी...
अंकल के सामने... अपने पति के सामने...
बोल... तू रंडी है...”
नेहा ने मेरी तरफ़ एक आखिरी नज़र डाली।
उसकी आँखों में शर्म, डर, नशा और एक अजीब सी हिम्मत थी।
नेहा के मुँह से हल्का सा “हाँ...” निकला।
शायद वो kiss लेने के चक्कर में मान रही थी।
उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसका शरीर गुप्ता जी से चिपका हुआ था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि जब मेरी बीवी इस तरह गरम होती है तो उसकी साँसें कैसे भारी हो जाती हैं।
लेकिन गुप्ता जी ने उसे इतनी आसानी से नहीं जाने दिया।
गुप्ता जी: (नेहा की कमर को कसकर पकड़े हुए, उसके होंठों के बहुत करीब)
“क्या हाँ?
बोल साफ़-साफ़...”
नेहा की गर्दन लाल हो गई। उसकी आँखें आधी बंद थीं। वो हल्के से काँप रही थी।
नेहा: (बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में)
“हाँ... मैं हूँ...
रा... रंडी...”
जैसे ही ये शब्द उसके मुँह से निकले, गुप्ता जी की आँखों में एक जंगली चमक आ गई।
गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए, नेहा की कमर को और कसकर)
“वाह... अच्छी लड़की...
अब दोबारा बोल... ज़ोर से...
अपने पति के सामने... अंकल के सामने...
बोल — मैं रंडी हूँ...”
नेहा की साँसें और तेज़ हो गईं।
उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — शर्म, नशा और उत्तेजना का मिश्रण।
फिर उसने आँखें बंद कर लीं और हल्की, लेकिन साफ़ आवाज़ में बोली,
नेहा: “मैं... रंडी हूँ...”
गुप्ता जी ने संतुष्ट मुस्कान दी।
उनका एक हाथ नेहा की कमर से नीचे सरक गया और उसकी गांड़ को कसकर दबा लिया।
गुप्ता जी: (नेहा की आँखों में गहरी नज़र डालते हुए, बहुत धीमी और authoritative आवाज़ में)
“Good girl...”
गुप्ता जी: “बोल... uncle की रंडी बनेगी?”
दोनों की आँखें अब एक-दूसरे में गहरी तक धँसी हुई थीं।
जैसे कोई वॉश में हो।
समय रुक गया था।
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस उसकी आँखें गुप्ता जी की आँखों में डूबी रहीं।
फिर बहुत धीरे-धीरे, बिना शब्द निकाले, उसने हल्का सा सिर हिलाया।
हाँ।
एक छोटा, शर्मीला, लेकिन साफ़ इशारा।
गुप्ता जी की आँखों में एक जंगली संतोष की चमक आई।
उनके होंठ नेहा के होंठों से सिर्फ़ आधा इंच दूर थे। उनकी गर्म साँसें नेहा के चेहरे पर पड़ रही थीं।
गुप्ता जी: (बहुत धीरे से, लेकिन साफ़)
“बोल ना बेटी... ज़ोर से...
‘हाँ अंकल... मैं आपकी रंडी बनूँगी’...”
नेहा की साँसें अब बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।
उसके होंठ हल्के से खुले हुए थे।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ उसके होंठों के बिल्कुल करीब थे।
गुप्ता जी: (धीमी, लेकिन सख्त आवाज़ में)
“अगर uncle की रंडी बनना है... तो जो uncle कह रहे हैं, वो मानना पड़ेगा... समझी?”
नेहा कुछ नहीं बोली।
न हाँ में सिर हिलाया, न ना में।
बस चुपचाप उनकी आँखों में देखती रही।
सब समझ गए थे।
गुप्ता जी ने नेहा की ठोड़ी पकड़कर हल्का सा ऊपर उठाया और बोले,
गुप्ता जी: “अपना मुँह खोल...
और जीभ बाहर निकाल...”
नेहा एक पल के लिए रुकी।
फिर धीरे-धीरे उसने अपना मुँह खोला।
उसकी गुलाबी, नम जीभ धीरे से बाहर निकल आई।
गुप्ता जी ने अपनी जीभ बाहर निकाली।
मैंने देखा — दोनों की जीभें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
गुप्ता जी ने पहले तो नेहा की रसीली, गुलाबी जीभ को धीरे-धीरे चाटा। उनकी मोटी, गर्म जीभ नेहा की जीभ पर ऊपर से नीचे तक घूम रही थी। फिर उन्होंने नेहा की जीभ को हल्का सा काट लिया।
नेहा की आँखें बंद हो गई थीं।
वो बस महसूस कर रही थी। उसका पूरा शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।
गुप्ता जी ने अब और आगे बढ़कर नेहा के मुँह को पूरी तरह अपने मुँह में ले लिया।
ये किस अब बहुत गहरा और गंदा था।
उनकी जीभ नेहा के मुँह के अंदर घुस गई थी, उसके हर कोने को चाट रही थी।
नेहा की जीभ को चूस रहे थे, काट रहे थे, और फिर जोर-जोर से चाट रहे थे।
किस के दौरान नेहा की थूक और गुप्ता जी की थूक दोनों के होंठों पर और ठुड्डी पर बह रही थी।
गुप्ता जी ने जानबूझकर नेहा की निचली होंठ को काटा, फिर ऊपरी होंठ को चूसा।
नेहा बस आँखें बंद करके सब सह रही थी, कभी-कभी हल्की सिसकारी निकल जाती थी।
गुप्ता जी ने किस को थोड़ा और गहरा करते हुए नेहा की जीभ को अपने मुँह में खींच लिया और जोर से चूसने लगे, जैसे कोई फल चूस रहे हों।
गुप्ता जी: (किस के बीच में, भारी आवाज़ में)
“ममम... कितनी मीठी है तेरी जीभ रंडी...”
नेहा बस काँप रही थी।
करीब ५ मिनट हो चुके थे।
मैं डरचक की तरह बैठा अपनी बीवी को देख रहा था।
वेनु और बेकार आदमी के बाद तीसरा आदमी अब मेरी बीवी का मुँह चूस रहा था।
गुप्ता जी नेहा को जोर से किस कर रहे थे। उनकी जीभ नेहा के मुँह में घुसी हुई थी, एक हाथ उसके खुले स्तन को मसल रहा था। नेहा की साँसें भारी थीं, आँखें बंद थीं।
फिर अचानक...
उसकी शर्ट और ऊपर चढ़ गई थी।
मैंने भी जवाब में उसे किस किया।
हमारे होंठ एक-दूसरे को चूस रहे थे, जीभें आपस में उलझ रही थीं।
नेहा ने जानबूझकर हल्की-हल्की सिसकारी भरी — loud enough कि गुप्ता जी सुन सकें।
गुप्ता जी चुपचाप बैठे हमें देख रहे थे।
उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं। हाथ अब भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को मसल रहे थे।
उनके चेहरे पर हैरानी, उत्तेजना और एक अजीब सी विजय का भाव था।
नेहा ने किस के बीच में मेरे कान में फुसफुसाया,
नेहा: “देख रहे हैं ना वो..."
फिर उसने और गहरा किस किया।
मैं समझ गया था —
नेहा अब खेलने के मूड में आ चुकी थी।
और वो चाहती थी कि गुप्ता जी सब देखें।
किस खत्म होने के बाद हम दोनों ने एक साथ गुप्ता जी की तरफ़ देखा।
अब किसी में कोई शर्म नहीं बची थी।
गुप्ता जी हमें देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने अपना ग्लास उठाया और एक घूँट में पूरा खाली कर दिया। उनकी आँखें अभी भी नेहा की खुली शर्ट और पैंटी पर घूम रही थीं।
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ में पड़े पूरे भरे ग्लास को देखा।
वो मुस्कुराई, फिर मेरे कान के पास आई और बहुत मीठी, नशीली आवाज़ में बोली,
नेहा: “बेबी... तुम भी पियो ना...”
उसने एक हाथ से मेरा ग्लास पकड़ा और मेरे होंठों पर लगा दिया।
जैसे वो चाह रही हो कि मैं और ज़्यादा नशे में चला जाऊँ...
आज कुछ भी ऐसा न सोच सकूँ जो वास्तविक लगे।
मैंने ग्लास का घूँट लिया। नेहा ने ग्लास को और झुकाया, जिससे ज़्यादा व्हिस्की मेरे मुँह में चली गई। कुछ बूँदें मेरे होंठों से नीचे टपक गईं, मेरी गर्दन पर।
नेहा ने आगे बढ़कर उन बूँदों को अपनी जीभ से चाट लिया।
फिर मेरी आँखों में देखकर बोली,
नेहा: “आज रात... कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं...”
गुप्ता जी हमें देख रहे थे। उनकी मुस्कान अब और चौड़ी हो गई थी।
उन्होंने अपना खाली ग्लास टेबल पर रखा और बोले,
गुप्ता जी: “वाह बेटी...
अंकल को भी तो कुछ दो...
या... अंकल खुद ले लें?”
किस खत्म होने के बाद नेहा बैठी रही। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर गुप्ता जी की तरफ़ मुड़ी।
गुप्ता जी double meaning में बात कर रहे थे। उनकी मुस्कान और नज़र से साफ़ लग रहा था कि वो kiss लेना चाहते हैं या peg, कुछ समझ नहीं आ रहा था।
नेहा ने जानबूझकर peg ही समझ लिया। वो हल्के से मुस्कुराई और बोली,
नेहा: “क्यों नहीं अंकल... बहुत है...”
वो उठी।
जैसे ही वो उठी, उसकी शर्ट और खुल गई।
अब उसके हल्के भूरे रंग के निप्पल के किनारे साफ़ दिख रही थी। शर्ट का पतला कपड़ा उसके निप्पल्स पर चिपका हुआ था, जिससे उनकी शेप और सख्ती दोनों उभरकर सामने आ गई थी।
नेहा किचन स्लैब की तरफ़ गई और peg बनाने लगी।
नेहा ने ट्रे में तीन ग्लास तैयार किए।
जब वो ट्रे लेकर हमारे पास आई और झुकी तो उसके स्तन गुप्ता जी के सामने पूरी तरह लटक गए।
नेहा: (गुप्ता जी को ग्लास देते हुए)
“लीजिए अंकल...”
नेहा ने गुप्ता जी की तरफ़ ग्लास बढ़ाया।
मैंने तुरंत बीच में बोल दिया,
सम: “अंकल, मुझे लगता है आपको नहीं पीना चाहिए।
आपसे बोला भी नहीं जा रहा है।
आपने बहुत पी रखी है।”
गुप्ता जी ने एकदम से मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें नशे और गुस्से से लाल हो गई थीं। उन्होंने तेज़ आवाज़ में जवाब दिया,
गुप्ता जी: “चुप कर मादरचोद...
मुझे मत सिखा कि कितनी पीनी चाहिए!”
उनकी आवाज़ में इतना गुस्सा था कि कमरे में सन्नाटा छा गया।
नेहा का हाथ हल्का सा काँप गया।
गुप्ता जी ने नेहा से ग्लास छीन लिया और एक घूँट में आधा ग्लास खाली कर दिया। फिर नेहा की तरफ़ घूरते हुए बोले,
गुप्ता जी: “बेटी... तू तो दे रही है ना...
ये मादरचोद बीच में क्यों बोल रहा है?
नेहा मेरी तरफ़ असहाय नज़र से देख रही थी।
मैंने गुस्से को कंट्रोल करते हुए कहा,
सम: “अंकल... अब बस भी करिए।
आपको घर जाना चाहिए।”
गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखकर घिनौनी मुस्कान दी और बोले,
गुप्ता जी: “घर?
अभी तो पार्टी शुरू हुई है...
तेरी बीवी ने मुझे बुलाया है... और तू बीच में बोल रहा है?
चुप बैठ...”
नेहा ने हाथ बढ़ाकर ग्लास आगे किया।
गुप्ता जी ने ग्लास लेने की बजाय नेहा का हाथ थाम लिया और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।
नेहा लड़खड़ाई। आधा पेग उसके हाथ से छलक गया और गुप्ता जी के कुर्ते पर गिर गया।
गुप्ता जी: (नेहा को अपनी गोद की तरफ़ खींचते हुए, नशे में हँसते हुए)
“बेटी... ऐसे पिला ना...
जैसे तूने अपने इस कुत्ते को पिलाया था...”
नेहा उनके कंधे पर हाथ रखकर खुद को संभाल रही थी। उसकी शर्ट अब लगभग पूरी तरह खुल चुकी थी।
नेहा जब गुप्ता जी की तरफ़ झुकी तो पहले तो वो पूरी तरह उनके ऊपर गिर गई।
उसके भारी स्तन गुप्ता जी की छाती से ज़ोर से टकराए। गुप्ता जी ने तुरंत दोनों हाथों से नेहा की कमर पकड़ ली।
नेहा घबरा गई और खुद को संभालते हुए थोड़ा साइड में बैठ गई, लेकिन अब भी गुप्ता जी के बहुत करीब।
दोनों के हाथ आपस में मिले हुए थे।
नेहा का शरीर गुप्ता जी से चिपका हुआ था।
उसकी भारी, नंगी छातियाँ गुप्ता जी की छाती से सटी हुई थीं। शर्ट के खुले बटन की वजह से उसकी हल्के भूरे निप्पल सीधे उनके कुर्ते से रगड़ खा रहे थे।
गुप्ता जी की साँसें भारी हो गई थीं।
उनका एक हाथ नेहा की कमर पर था, दूसरा हाथ अभी भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को मसल रहा था।
गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में, मुस्कुराते हुए)
“अरे वाह बेटी...
इतना अच्छा लग रहा है...
आज तो अंकल की गोद में बैठकर पेग पिलाओ...”
नेहा का चेहरा शर्म से लाल था, लेकिन वो उठकर नहीं हटी।
उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — उसकी आँखों में शर्म, नशा और एक अजीब सी उत्तेजना थी।
नेहा: (काँपती हुई आवाज़ में)
“अंकल... आपका पेग...”
गुप्ता जी ने नेहा को और करीब खींच लिया। अब नेहा की एक जाँघ उनकी जाँघ पर थी और उनकी छाती नेहा के स्तनों से पूरी तरह दब रही थी।
नेहा कुछ सोचती, उससे पहले मैंने जोर से कहा,
सम: “नेहा... इसने तुम्हें बाहर ‘रंडी’ कहा... और भी गंदी-गंदी बातें कहीं...”
मेरी जालन से ऐसी शिकायत की, जैसे कोई छोटा बच्चा टीचर से शिकायत कर रहा हो।
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ भाव आया — शायद समझ, शायद थोड़ी निराशा।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।
उसने हाथ में जो ग्लास था, उसे गुप्ता जी की तरफ़ बढ़ा दिया।
गुप्ता जी ने ग्लास पकड़ लिया और नेहा के हाथ से ही पीने लगे।
जैसे मेरी बात का कोई असर ही नहीं हुआ हो।
गुप्ता जी: (नेहा के हाथ को थामे हुए, नशे में मुस्कुराते हुए)
“हाँ बेटी... ऐसे ही पिलाओ...
अच्छा लग रहा है...”
नेहा चुपचाप बैठी रही।
मैंने फिर से, इस बार और ज़ोर से कहा,
सम: “नेहा... सुन रही हो ना?
इसने तुम्हें रंडी कहा...”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की चमक थी — नशा, थोड़ी बगावत, और एक अजीब सी शांति।
उसने बहुत धीरे से मेरी तरफ़ देखकर कहा,
आधे से ज़्यादा ग्लास तो पहले ही छलक चुका था।
जो बचा था, वो गुप्ता जी ने नेहा के हाथों से एक ही घूँट में पी लिया।
गुप्ता जी: “आह... आहहहहह....”
पीने के बाद उन्होंने जोर से आह भरी। फिर मेरी तरफ़ घूरते हुए बोले,
गुप्ता जी: “क्या बोल रहा था तू भड़वे?
क्या शिकायत कर रहा था?”
फिर वो नेहा की तरफ़ मुड़े। उनकी आँखों में नशा और गंदी भूख थी। उन्होंने नेहा की कमर पर हाथ कसकर रखा और बोले,
गुप्ता जी: “हाँ... कहा मैंने।
है मेरी बेटी रंडी।
इसका जिस्म किसी रंडी से भी बढ़कर है...”
नेहा का पूरा शरीर सख्त हो गया।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। लेकिन वो गुप्ता जी की गोद से उठकर भी नहीं हटी।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया और बोले,
गुप्ता जी: “देखो ना... ये स्तन... ये गांड़... ये जाँघें...
सब किसी प्रोफेशनल रंडी से भी ज्यादा माल हैं।
और तू... (मेरी तरफ़ देखकर)
इसे बाहर चुदवाता है... और घर लाकर मुझे दिखा रहा है...”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में शर्म थी, लेकिन उत्तेजना भी थी।
वो मेरी तरफ़ देखकर हल्के से काँप रही थी, लेकिन गुप्ता जी की गोद से पूरी तरह नहीं हटी।
गुप्ता जी: (नेहा के स्तन को घूरते हुए)
“क्या बोला था तू... रंडी नहीं है?
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया।
उनका पूरा चेहरा अब नेहा की तरफ़ था।
उनके होंठ नेहा के होंठों से सिर्फ़ दो-तीन इंच की दूरी पर थे।
उनकी गर्म, शराब वाली साँसें नेहा के चेहरे पर पड़ रही थीं।
गुप्ता जी: (बहुत धीमी, भारी आवाज़ में, नेहा की आँखों में देखते हुए)
“क्या हुआ बेटी...
अंकल के पास आने में शर्म आ रही है?”
गुप्ता जी: (बहुत धीमी, गंदी और नशे वाली आवाज़ में)
“बोल ना... है ना तू रंडी?”
नेहा चुप रही। उसका शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।
गुप्ता जी ने और करीब आकर, उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा,
गुप्ता जी: “बता ना मुझे... है ना तू...
अपने इस भड़वे पति के सामने... मेरे सामने... मेरी गोद में... इतने पास...
तुझमें जो रंडी है, वो तुझे भी नहीं पता...”
ये बोलते हुए उनके होंठ धीरे-धीरे नेहा के होंठों की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनकी गर्म, शराब वाली साँसें नेहा के होंठों को छू रही थीं।
नेहा की साँसें बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।
उसकी छाती गुप्ता जी की छाती से पूरी तरह दब रही थी।
उसने मेरी तरफ़ एक गहरी, लंबी नज़र डाली — उस नज़र में शर्म, डर, उत्तेजना और एक सवाल सब कुछ था।
मैं चुपचाप बैठा था।
मेरा पूरा शरीर तन गया था।
गुप्ता जी के होंठ नेहा के होंठों से बस छूने ही वाले थे...
एक आदमी मेरे घर में, मेरे सोफे पर, मेरी बीवी के साथ बैठकर उसे “रंडी” कह रहा था।
मुझमें गुस्सा उबाल खा रहा था, जैसे कोई मेरी इज्जत उतार रहा हो।
मेरा हाथ अपने आप मेरे लंड पर चला गया।
चेक करने के लिए।
वो पत्थर की तरह सख्त था।
दूसरा दिमाग इसे पसंद कर रहा था।
वहाँ नेहा की आधी आँखें बंद थीं।
गुप्ता जी के होंठ उसके होंठों से सिर्फ़ आधा इंच दूर थे।
उसकी साँसें भारी थीं। वो हर पल सोच रही थी कि अब हमला हो सकता है... लेकिन हमला नहीं हुआ।
उसने धीरे से आँखें खोलीं और गुप्ता जी की आँखों में देखा — जैसे पूछ रही हो, “क्या रह गया?”
गुप्ता जी ने अपनी पकड़ और कस ली और फिर से, बहुत धीमी लेकिन सख्त आवाज़ में दोहराया,
गुप्ता जी: “बोल ना... है ना तू रंडी...
मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ...”
नेहा की साँस अटक गई।
उसका चेहरा पूरी तरह लाल था। उसके स्तन गुप्ता जी की छाती से दबे हुए थे। शर्ट अब लगभग खुल चुकी थी।
गुप्ता जी ने उसकी कमर को और कसकर पकड़ लिया और उसके होंठों के और करीब आ गए। उनकी गर्म साँसें नेहा के होंठों को छू रही थीं।
गुप्ता जी: (फुसफुसाते हुए)
“बोल ना बेटी...
अंकल के सामने... अपने पति के सामने...
बोल... तू रंडी है...”
नेहा ने मेरी तरफ़ एक आखिरी नज़र डाली।
उसकी आँखों में शर्म, डर, नशा और एक अजीब सी हिम्मत थी।
नेहा के मुँह से हल्का सा “हाँ...” निकला।
शायद वो kiss लेने के चक्कर में मान रही थी।
उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसका शरीर गुप्ता जी से चिपका हुआ था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि जब मेरी बीवी इस तरह गरम होती है तो उसकी साँसें कैसे भारी हो जाती हैं।
लेकिन गुप्ता जी ने उसे इतनी आसानी से नहीं जाने दिया।
गुप्ता जी: (नेहा की कमर को कसकर पकड़े हुए, उसके होंठों के बहुत करीब)
“क्या हाँ?
बोल साफ़-साफ़...”
नेहा की गर्दन लाल हो गई। उसकी आँखें आधी बंद थीं। वो हल्के से काँप रही थी।
नेहा: (बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में)
“हाँ... मैं हूँ...
रा... रंडी...”
जैसे ही ये शब्द उसके मुँह से निकले, गुप्ता जी की आँखों में एक जंगली चमक आ गई।
गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए, नेहा की कमर को और कसकर)
“वाह... अच्छी लड़की...
अब दोबारा बोल... ज़ोर से...
अपने पति के सामने... अंकल के सामने...
बोल — मैं रंडी हूँ...”
नेहा की साँसें और तेज़ हो गईं।
उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — शर्म, नशा और उत्तेजना का मिश्रण।
फिर उसने आँखें बंद कर लीं और हल्की, लेकिन साफ़ आवाज़ में बोली,
नेहा: “मैं... रंडी हूँ...”
गुप्ता जी ने संतुष्ट मुस्कान दी।
उनका एक हाथ नेहा की कमर से नीचे सरक गया और उसकी गांड़ को कसकर दबा लिया।
गुप्ता जी: (नेहा की आँखों में गहरी नज़र डालते हुए, बहुत धीमी और authoritative आवाज़ में)
“Good girl...”
गुप्ता जी: “बोल... uncle की रंडी बनेगी?”
दोनों की आँखें अब एक-दूसरे में गहरी तक धँसी हुई थीं।
जैसे कोई वॉश में हो।
समय रुक गया था।
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस उसकी आँखें गुप्ता जी की आँखों में डूबी रहीं।
फिर बहुत धीरे-धीरे, बिना शब्द निकाले, उसने हल्का सा सिर हिलाया।
हाँ।
एक छोटा, शर्मीला, लेकिन साफ़ इशारा।
गुप्ता जी की आँखों में एक जंगली संतोष की चमक आई।
उनके होंठ नेहा के होंठों से सिर्फ़ आधा इंच दूर थे। उनकी गर्म साँसें नेहा के चेहरे पर पड़ रही थीं।
गुप्ता जी: (बहुत धीरे से, लेकिन साफ़)
“बोल ना बेटी... ज़ोर से...
‘हाँ अंकल... मैं आपकी रंडी बनूँगी’...”
नेहा की साँसें अब बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।
उसके होंठ हल्के से खुले हुए थे।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ उसके होंठों के बिल्कुल करीब थे।
गुप्ता जी: (धीमी, लेकिन सख्त आवाज़ में)
“अगर uncle की रंडी बनना है... तो जो uncle कह रहे हैं, वो मानना पड़ेगा... समझी?”
नेहा कुछ नहीं बोली।
न हाँ में सिर हिलाया, न ना में।
बस चुपचाप उनकी आँखों में देखती रही।
सब समझ गए थे।
गुप्ता जी ने नेहा की ठोड़ी पकड़कर हल्का सा ऊपर उठाया और बोले,
गुप्ता जी: “अपना मुँह खोल...
और जीभ बाहर निकाल...”
नेहा एक पल के लिए रुकी।
फिर धीरे-धीरे उसने अपना मुँह खोला।
उसकी गुलाबी, नम जीभ धीरे से बाहर निकल आई।
गुप्ता जी ने अपनी जीभ बाहर निकाली।
मैंने देखा — दोनों की जीभें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
गुप्ता जी ने पहले तो नेहा की रसीली, गुलाबी जीभ को धीरे-धीरे चाटा। उनकी मोटी, गर्म जीभ नेहा की जीभ पर ऊपर से नीचे तक घूम रही थी। फिर उन्होंने नेहा की जीभ को हल्का सा काट लिया।
नेहा की आँखें बंद हो गई थीं।
वो बस महसूस कर रही थी। उसका पूरा शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।
गुप्ता जी ने अब और आगे बढ़कर नेहा के मुँह को पूरी तरह अपने मुँह में ले लिया।
ये किस अब बहुत गहरा और गंदा था।
उनकी जीभ नेहा के मुँह के अंदर घुस गई थी, उसके हर कोने को चाट रही थी।
नेहा की जीभ को चूस रहे थे, काट रहे थे, और फिर जोर-जोर से चाट रहे थे।
किस के दौरान नेहा की थूक और गुप्ता जी की थूक दोनों के होंठों पर और ठुड्डी पर बह रही थी।
गुप्ता जी ने जानबूझकर नेहा की निचली होंठ को काटा, फिर ऊपरी होंठ को चूसा।
नेहा बस आँखें बंद करके सब सह रही थी, कभी-कभी हल्की सिसकारी निकल जाती थी।
गुप्ता जी ने किस को थोड़ा और गहरा करते हुए नेहा की जीभ को अपने मुँह में खींच लिया और जोर से चूसने लगे, जैसे कोई फल चूस रहे हों।
गुप्ता जी: (किस के बीच में, भारी आवाज़ में)
“ममम... कितनी मीठी है तेरी जीभ रंडी...”
नेहा बस काँप रही थी।
करीब ५ मिनट हो चुके थे।
मैं डरचक की तरह बैठा अपनी बीवी को देख रहा था।
वेनु और बेकार आदमी के बाद तीसरा आदमी अब मेरी बीवी का मुँह चूस रहा था।
गुप्ता जी नेहा को जोर से किस कर रहे थे। उनकी जीभ नेहा के मुँह में घुसी हुई थी, एक हाथ उसके खुले स्तन को मसल रहा था। नेहा की साँसें भारी थीं, आँखें बंद थीं।
फिर अचानक...


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