26-06-2026, 11:26 PM
गुप्ता जी की आँखें एकदम बड़ी हो गई थीं।
मैं वो नज़ारा नहीं देख पा रहा था जो गुप्ता जी देख रहे थे।
जब मैं नेहा को कमरे में छोड़कर बाहर गया था, तब वो सिर्फ़ क्रीम कलर की पैंटी में थी। अब भी वही हालत थी — नंगी छातियाँ, पसीने से चमकता शरीर, पैंटी का पतला कपड़ा उसकी चूत पर चिपका हुआ।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शैतानी अँगुली मारी और नेहा की तरफ़ देखकर बोले,
गुप्ता जी: “बेटी... क्या एक पेग मिलेगा?
मेरी व्हिस्की तो खत्म हो गई है।”
मैं वहीं खड़ा था।
सिगरेट मेरे हाथ में जल रही थी, लेकिन मैं उसे पी भी नहीं पा रहा था। धुआँ धीरे-धीरे मेरे चेहरे के सामने उठ रहा था।
मैंने गुप्ता जी को अंदर जाते हुए देखा था — लड़खड़ाते कदम, नशे में झूमता बदन, लेकिन आँखों में वो भूख जो मैं पहले कभी नहीं देखा था।
अंदर से नेहा की एक हल्की-सी, घबराई हुई आवाज़ आई थी — शायद “अंकल...?” या कुछ और, लेकिन मुझे साफ़ नहीं सुनाई दिया। शायद वो चीखना चाहती थी, शायद वो घबरा गई थी।
मेरा दिमाग अभी भी प्रोसेस कर रहा था।
ये सच में हो रहा है?
क्या मैं सपना देख रहा हूँ?
क्या मैं अभी जाग जाऊँगा?
मेरा दिमाग अभी भी प्रोसेस कर रहा था।
ये सच में हो रहा है?
क्या मैं सपना देख रहा हूँ?
क्या मैं अभी जाग जाऊँगा?
सब कुछ स्लो मोशन में चल रहा था।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, गले में सूखापन था, हाथ काँप रहे थे।
ज़िंदगी में पहली बार मेरा दिमाग किसी सिचुएशन में इस तरह फ्रीज हो गया था।
फिर...
क्लिक।
दरवाज़े की ऑटोमैटिक लॉक होने की वो आवाज़।
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
मैं तेज़ी से दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
दिमाग में सैकड़ों ख्याल एक साथ घूम रहे थे:
गुप्ता जी अंदर कहाँ होंगे?
नेहा कहाँ होगी? क्या वो अभी भी सिर्फ पैंटी में ही खड़ी है?
क्या गुप्ता जी ने उसे छू लिया होगा?
क्या नेहा घबरा रही होगी? चीख रही होगी? या... या कुछ और?
क्या वो दरवाज़ा अंदर से बंद कर चुके हैं?
अगर अंदर से बंद हो गया तो... तो क्या होगा?
मेरा हाथ काँपता हुआ दरवाज़े के हैंडल पर गया।
मैंने हैंडल दबाया...
क्लिक — लेकिन ये लॉक होने की आवाज़ नहीं थी।
दरवाज़ा अभी भी खुला था।
मैंने राहत की एक छोटी सी साँस ली, लेकिन मेरा दिल अभी भी दहाड़ रहा था।
मैंने बहुत धीरे-धीरे दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और अंदर झाँका।
दरवाज़ा जैसे-जैसे खुल रहा था, मुझे कमरा नज़र आ रहा था।
नेहा ने पूरी सेटिंग कर रखी थी —
डिम लाइट, सॉफ्ट म्यूजिक धीरे-धीरे बज रहा था, और कमरे में वो महक थी जो नेहा की बॉडी और शराब दोनों की थी।
दरवाज़ा आधा खुला तो सबसे पहले गुप्ता जी दिखे।
वो 3 सीटर सोफे के बीच में बैठे हुए थे।
इतने नशे में थे कि गर्दन से सिर संभाला नहीं जा रहा था — सिर बार-बार आगे झुक जा रहा था।
लेकिन उनके चेहरे पर एक घिनौनी, लार टपकती हुई मुस्कान थी।
उनकी टाँगें पूरी तरह फैली हुई थीं।
एक हाथ अपनी पैंट के ऊपर से लंड पर था — वो धीरे-धीरे मसल रहे थे, ख़ुजला रहे थे।
अभी तक तंबू नहीं बना था, शायद नशे की वजह से, लेकिन हाथ की हरकत साफ़ दिख रही थी।
गुप्ता जी के बाद मेरी नज़रें पूरे कमरे में नेहा को ढूँढने लगीं।
एक पल के लिए मेरी जान में जान आई।
नेहा ओपन किचन के स्लैब की तरफ़ मुँह करके खड़ी थी।
उसने जल्दी से एक धारीदार शर्ट डाल ली थी, जो उसकी गांड़ के ठीक नीचे तक आ रही थी।
शर्ट काफी बड़ी थी, लेकिन फिर भी उसकी मोटी, गोरी जाँघें पूरी तरह दिख रही थीं।
पैंटी के किनारे शर्ट के नीचे से हल्के-हल्के झाँक रहे थे।
ये हालत सिर्फ पैंटी में होने से तो कहीं बेहतर थी।
नेहा तीन ग्लास में पेग बना रही थी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। शर्ट के नीचे उसकी गांड़ का हल्का उभार साफ़ दिख रहा था। हर हल्की सी हरकत के साथ शर्ट ऊपर चढ़ रही थी।
दरवाज़े ने फिर “क्लिक” किया।
नेहा ने हल्की सी गर्दन घुमाकर मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में राहत थी, लेकिन शर्म और घबराहट भी थी।
नेहा: (बहुत धीमी आवाज़ में)
“आ गए... लॉक कर दो।”
वो सोच रही थी कि काश कोई उसे इस हालत में न देखे। लेकिन गुप्ता जी तो पहले से अंदर बैठे थे।
मैंने गुप्ता जी को देखते हुए दरवाज़ा लॉक कर दिया।
जब नेहा मुड़ी तो मुझे झटका लगा।
उसकी शर्ट के सिर्फ़ दो बटन बीच में लगे हुए थे।
ऊपर से पूरी तरह खुली हुई थी, नीचे से भी।
साफ़ दिख रहा था कि अंदर कुछ नहीं है।
ऊपर से इतनी खुली थी कि उसके आधे से ज़्यादा स्तन और गहरी क्लिवेज़ पूरी तरह नज़र आ रही थी।
नीचे से इतनी खुली थी कि उसकी पूरी पैंटी, ऊपरी पेट और गोल नाभि सब सामने था।
किसी और दिन ये मेरे लिए बेहद इरोटिक होता...
लेकिन आज मेरे साथ गुप्ता जी भी ये सब देख रहे थे।
नेहा के हाथों में ट्रे थी, जिसमें तीन ग्लास में व्हिस्की थी।
वो धीरे-धीरे हमारे सामने आई।
जब वो ट्रे को टेबल पर रखने के लिए झुकी, तो मैंने पीछे से देखा —
उसकी शर्ट ऊपर चढ़ गई थी। उसकी मोटी, गोल गांड़ पैंटी में साफ़ दिख रही थी। पैंटी का कपड़ा उसके गूदे में हल्का सा धँसा हुआ था।
गुप्ता जी का चेहरा देखकर पता चल रहा था कि जब नेहा झुकी तो उसके स्तन पूरी तरह उनके सामने आ गए थे।
उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं, मुँह थोड़ा खुला था।
गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में, घूरते हुए)
“वाह बेटी...”
नेहा जल्दी से सीधी हो गई। उसका चेहरा शर्म से गहरा लाल हो गया था।
उसने शर्ट को नीचे खींचने की कोशिश की, लेकिन वो बहुत छोटी थी — न ऊपर ढक पाई, न नीचे।
नेहा: (काँपती हुई आवाज़ में)
“अंकल... आपका पेग...”
उसने गुप्ता जी को ग्लास देते हुए उनकी तरफ़ नहीं देखा।
गुप्ता जी ने ग्लास लेते हुए जानबूझकर नेहा की उँगलियों को छू लिया।
गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए)
“धन्यवाद बेटी...
बैठो ना... इतनी दूर खड़ी क्यों हो?”
हा इधर-उधर नज़र दौड़ा रही थी। वो समझ नहीं पा रही थी कि गुप्ता जी उसे कहाँ बैठने को कह रहे हैं।
उसके चेहरे पर कन्फ्यूजन, शर्म और नशे का मिश्रण था — मैंने उसे कभी इतना कन्फ्यूज नहीं देखा था।
उसने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
कुछ सोचा।
नशे की वजह से दिमाग पर बहुत ज़ोर लगाना पड़ा होगा।
फिर कुछ सोचकर वो मेरे पास वाले सिंगल सीटर सोफे पर बैठ गई।
मुझे लगा कि उसने एक पल के लिए गुप्ता जी के पास बैठने का भी मन बनाया था, लेकिन आखिरकार मेरे पास आने का फैसला किया।
नेहा अब मेरे बिल्कुल बगल में बैठी थी।
जब वो बैठी तो उसकी शर्ट और ऊपर चढ़ गई। उसकी गोरी, मोटी जाँघें पूरी तरह खुली हुई थीं। पैंटी का ऊपरी हिस्सा और नाभि साफ़ दिख रहे थे।
गुप्ता जी ने नेहा को घूरा। उनकी नज़रें उसकी जाँघों, पैंटी और खुली शर्ट पर घूम रही थीं।
गुप्ता जी ने हवा में ग्लास उठाया और बोले,
गुप्ता जी: “चीयर्स...!”
उनकी नज़रें अभी भी नेहा की पैंटी पर जमी हुई थीं।
एक हाथ अभी भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को धीरे-धीरे ख़ुजला रहा था — बिना किसी शर्म के, बिना किसी हिचक के।
मेरी बीवी के सामने।
मेरे सामने।
उन्हें साफ़ लग रहा था कि आज लॉटरी लग गई है।
उनका चेहरा नशे और उत्तेजना से चमक रहा था। वो सामान तैयार कर रहे थे — जैसे कोई शिकारी अपनी नज़र शिकार पर जमा कर बैठा हो।
मैंने नेहा के कान के पास मुँह ले जाकर बहुत धीरे से फुसफुसाया,
सम: “ये शर्ट...?”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके गाल अभी भी शर्म से लाल थे। उसने धीमी, नशीली आवाज़ में जवाब दिया,
नेहा: “वो... AC में ठंड लग रही थी...”
मेरा मतलब था कि “तुम सिर्फ शर्ट क्यों पहने हो?”
लेकिन नेहा ने गलत समझ लिया। उसे लगा मैं पूछ रहा हूँ कि “तुम नंगी क्यों नहीं हो?”
उसका चेहरा और ज़्यादा लाल हो गया। उसने मेरी आँखों में देखा, फिर शर्म से नज़रें झुका ली और बहुत धीरे से बोली,
नेहा: “मैं... मैं सोच रही थी कि तुम्हें पसंद आएगा...
अगर मैं... सिर्फ शर्ट में...”
वो वाक्य अधूरा छोड़ दिया। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।
मैंने नेहा के कान के पास मुँह ले जाकर बहुत धीरे से फुसफुसाया,
सम: “इसे अंदर आने क्यों दिया?”
नेहा ने मेरी तरफ़ चौंककर देखा। उसकी आँखें एक पल के लिए बड़ी हो गईं। फिर उसने शर्म और नशे वाली आवाज़ में कहा,
नेहा: “मुझे लगा... तुमने भेजा है...
मुझे लगा जो तुम सपने में देखते हो...
आज शायद तुम्हारा मन है...”
मैं मन ही मन सोच रहा था — ये तो कन्फ्यूजन हो गया।
नेहा ने सोचा कि मैंने ही गुप्ता जी को अंदर बुलाया है।
और मैं सोच रहा था कि नेहा ने उन्हें अंदर आने दिया।
दोनों एक-दूसरे को गलत समझ रहे थे।
मैं नेहा के कान में बहुत धीरे से बोला,
सम: “अब क्या?”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शरारती अँगुली मारी और थोड़ी तेज़ आवाज़ में (जिसमें नशा और हिम्मत दोनों थी) बोली,
नेहा: “Uncle अपने हैं... बुरा थोड़े मानेंगे?
है ना अंकल... आप किसी को थोड़े बोलोगे?
मैं घर में ऐसी रहती हूँ... घर में तो कोई कैसे भी रह सकता है ना...”
नेहा अब बात संभालने की कोशिश कर रही थी।
उसकी आवाज़ में शर्म थी, लेकिन साथ में एक हल्की शरारत और नशे का जोश भी था।
गुप्ता जी ने नेहा की बात सुनकर जोर से हँसे। उनकी आँखें नेहा की खुली शर्ट और पैंटी पर घूम रही थीं।
नेहा को अब कन्फ्यूजन साफ़ समझ में आ गया था।
लेकिन उसकी आँखों में कुछ और भी था।
वो भी समझ गई थी कि गुप्ता जी को अब हमारे बारे में काफी कुछ पता चल गया है — कि हमें किसी गैर मर्द के साथ जाने में, या ऐसे सिचुएशन में कोई प्रॉब्लम नहीं है।
नेहा ने गुप्ता जी की तरफ़ देखा।
उसकी शर्म अब थोड़ी कम हुई लग रही थी, लेकिन घबराहट अभी भी थी।
नेहा मेरे कान के पास आई। उसकी गर्म साँस मेरे कान को छू रही थी। उसने बहुत धीमी, नशीली और शरारती आवाज़ में फुसफुसाया,
नेहा: “क्या तुम थोड़े खेल के मूड में हो...?”
मैंने गर्दन घुमाकर उसे देखा।
उसकी आँखों में शर्म कम, और नशे के साथ एक नई हिम्मत थी।
मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।
गहरा किस।
बहुत गहरा।
जिसमें जीभ, लार, और पूरा जोश था।
वो जानबूझकर ज़ोर से किस कर रही थी — जैसे वो दिखाना चाहती हो कि हम दोनों को कोई शर्म नहीं है।
मैं वो नज़ारा नहीं देख पा रहा था जो गुप्ता जी देख रहे थे।
जब मैं नेहा को कमरे में छोड़कर बाहर गया था, तब वो सिर्फ़ क्रीम कलर की पैंटी में थी। अब भी वही हालत थी — नंगी छातियाँ, पसीने से चमकता शरीर, पैंटी का पतला कपड़ा उसकी चूत पर चिपका हुआ।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शैतानी अँगुली मारी और नेहा की तरफ़ देखकर बोले,
गुप्ता जी: “बेटी... क्या एक पेग मिलेगा?
मेरी व्हिस्की तो खत्म हो गई है।”
मैं वहीं खड़ा था।
सिगरेट मेरे हाथ में जल रही थी, लेकिन मैं उसे पी भी नहीं पा रहा था। धुआँ धीरे-धीरे मेरे चेहरे के सामने उठ रहा था।
मैंने गुप्ता जी को अंदर जाते हुए देखा था — लड़खड़ाते कदम, नशे में झूमता बदन, लेकिन आँखों में वो भूख जो मैं पहले कभी नहीं देखा था।
अंदर से नेहा की एक हल्की-सी, घबराई हुई आवाज़ आई थी — शायद “अंकल...?” या कुछ और, लेकिन मुझे साफ़ नहीं सुनाई दिया। शायद वो चीखना चाहती थी, शायद वो घबरा गई थी।
मेरा दिमाग अभी भी प्रोसेस कर रहा था।
ये सच में हो रहा है?
क्या मैं सपना देख रहा हूँ?
क्या मैं अभी जाग जाऊँगा?
मेरा दिमाग अभी भी प्रोसेस कर रहा था।
ये सच में हो रहा है?
क्या मैं सपना देख रहा हूँ?
क्या मैं अभी जाग जाऊँगा?
सब कुछ स्लो मोशन में चल रहा था।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, गले में सूखापन था, हाथ काँप रहे थे।
ज़िंदगी में पहली बार मेरा दिमाग किसी सिचुएशन में इस तरह फ्रीज हो गया था।
फिर...
क्लिक।
दरवाज़े की ऑटोमैटिक लॉक होने की वो आवाज़।
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
मैं तेज़ी से दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
दिमाग में सैकड़ों ख्याल एक साथ घूम रहे थे:
गुप्ता जी अंदर कहाँ होंगे?
नेहा कहाँ होगी? क्या वो अभी भी सिर्फ पैंटी में ही खड़ी है?
क्या गुप्ता जी ने उसे छू लिया होगा?
क्या नेहा घबरा रही होगी? चीख रही होगी? या... या कुछ और?
क्या वो दरवाज़ा अंदर से बंद कर चुके हैं?
अगर अंदर से बंद हो गया तो... तो क्या होगा?
मेरा हाथ काँपता हुआ दरवाज़े के हैंडल पर गया।
मैंने हैंडल दबाया...
क्लिक — लेकिन ये लॉक होने की आवाज़ नहीं थी।
दरवाज़ा अभी भी खुला था।
मैंने राहत की एक छोटी सी साँस ली, लेकिन मेरा दिल अभी भी दहाड़ रहा था।
मैंने बहुत धीरे-धीरे दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और अंदर झाँका।
दरवाज़ा जैसे-जैसे खुल रहा था, मुझे कमरा नज़र आ रहा था।
नेहा ने पूरी सेटिंग कर रखी थी —
डिम लाइट, सॉफ्ट म्यूजिक धीरे-धीरे बज रहा था, और कमरे में वो महक थी जो नेहा की बॉडी और शराब दोनों की थी।
दरवाज़ा आधा खुला तो सबसे पहले गुप्ता जी दिखे।
वो 3 सीटर सोफे के बीच में बैठे हुए थे।
इतने नशे में थे कि गर्दन से सिर संभाला नहीं जा रहा था — सिर बार-बार आगे झुक जा रहा था।
लेकिन उनके चेहरे पर एक घिनौनी, लार टपकती हुई मुस्कान थी।
उनकी टाँगें पूरी तरह फैली हुई थीं।
एक हाथ अपनी पैंट के ऊपर से लंड पर था — वो धीरे-धीरे मसल रहे थे, ख़ुजला रहे थे।
अभी तक तंबू नहीं बना था, शायद नशे की वजह से, लेकिन हाथ की हरकत साफ़ दिख रही थी।
गुप्ता जी के बाद मेरी नज़रें पूरे कमरे में नेहा को ढूँढने लगीं।
एक पल के लिए मेरी जान में जान आई।
नेहा ओपन किचन के स्लैब की तरफ़ मुँह करके खड़ी थी।
उसने जल्दी से एक धारीदार शर्ट डाल ली थी, जो उसकी गांड़ के ठीक नीचे तक आ रही थी।
शर्ट काफी बड़ी थी, लेकिन फिर भी उसकी मोटी, गोरी जाँघें पूरी तरह दिख रही थीं।
पैंटी के किनारे शर्ट के नीचे से हल्के-हल्के झाँक रहे थे।
ये हालत सिर्फ पैंटी में होने से तो कहीं बेहतर थी।
नेहा तीन ग्लास में पेग बना रही थी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। शर्ट के नीचे उसकी गांड़ का हल्का उभार साफ़ दिख रहा था। हर हल्की सी हरकत के साथ शर्ट ऊपर चढ़ रही थी।
दरवाज़े ने फिर “क्लिक” किया।
नेहा ने हल्की सी गर्दन घुमाकर मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में राहत थी, लेकिन शर्म और घबराहट भी थी।
नेहा: (बहुत धीमी आवाज़ में)
“आ गए... लॉक कर दो।”
वो सोच रही थी कि काश कोई उसे इस हालत में न देखे। लेकिन गुप्ता जी तो पहले से अंदर बैठे थे।
मैंने गुप्ता जी को देखते हुए दरवाज़ा लॉक कर दिया।
जब नेहा मुड़ी तो मुझे झटका लगा।
उसकी शर्ट के सिर्फ़ दो बटन बीच में लगे हुए थे।
ऊपर से पूरी तरह खुली हुई थी, नीचे से भी।
साफ़ दिख रहा था कि अंदर कुछ नहीं है।
ऊपर से इतनी खुली थी कि उसके आधे से ज़्यादा स्तन और गहरी क्लिवेज़ पूरी तरह नज़र आ रही थी।
नीचे से इतनी खुली थी कि उसकी पूरी पैंटी, ऊपरी पेट और गोल नाभि सब सामने था।
किसी और दिन ये मेरे लिए बेहद इरोटिक होता...
लेकिन आज मेरे साथ गुप्ता जी भी ये सब देख रहे थे।
नेहा के हाथों में ट्रे थी, जिसमें तीन ग्लास में व्हिस्की थी।
वो धीरे-धीरे हमारे सामने आई।
जब वो ट्रे को टेबल पर रखने के लिए झुकी, तो मैंने पीछे से देखा —
उसकी शर्ट ऊपर चढ़ गई थी। उसकी मोटी, गोल गांड़ पैंटी में साफ़ दिख रही थी। पैंटी का कपड़ा उसके गूदे में हल्का सा धँसा हुआ था।
गुप्ता जी का चेहरा देखकर पता चल रहा था कि जब नेहा झुकी तो उसके स्तन पूरी तरह उनके सामने आ गए थे।
उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं, मुँह थोड़ा खुला था।
गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में, घूरते हुए)
“वाह बेटी...”
नेहा जल्दी से सीधी हो गई। उसका चेहरा शर्म से गहरा लाल हो गया था।
उसने शर्ट को नीचे खींचने की कोशिश की, लेकिन वो बहुत छोटी थी — न ऊपर ढक पाई, न नीचे।
नेहा: (काँपती हुई आवाज़ में)
“अंकल... आपका पेग...”
उसने गुप्ता जी को ग्लास देते हुए उनकी तरफ़ नहीं देखा।
गुप्ता जी ने ग्लास लेते हुए जानबूझकर नेहा की उँगलियों को छू लिया।
गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए)
“धन्यवाद बेटी...
बैठो ना... इतनी दूर खड़ी क्यों हो?”
हा इधर-उधर नज़र दौड़ा रही थी। वो समझ नहीं पा रही थी कि गुप्ता जी उसे कहाँ बैठने को कह रहे हैं।
उसके चेहरे पर कन्फ्यूजन, शर्म और नशे का मिश्रण था — मैंने उसे कभी इतना कन्फ्यूज नहीं देखा था।
उसने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
कुछ सोचा।
नशे की वजह से दिमाग पर बहुत ज़ोर लगाना पड़ा होगा।
फिर कुछ सोचकर वो मेरे पास वाले सिंगल सीटर सोफे पर बैठ गई।
मुझे लगा कि उसने एक पल के लिए गुप्ता जी के पास बैठने का भी मन बनाया था, लेकिन आखिरकार मेरे पास आने का फैसला किया।
नेहा अब मेरे बिल्कुल बगल में बैठी थी।
जब वो बैठी तो उसकी शर्ट और ऊपर चढ़ गई। उसकी गोरी, मोटी जाँघें पूरी तरह खुली हुई थीं। पैंटी का ऊपरी हिस्सा और नाभि साफ़ दिख रहे थे।
गुप्ता जी ने नेहा को घूरा। उनकी नज़रें उसकी जाँघों, पैंटी और खुली शर्ट पर घूम रही थीं।
गुप्ता जी ने हवा में ग्लास उठाया और बोले,
गुप्ता जी: “चीयर्स...!”
उनकी नज़रें अभी भी नेहा की पैंटी पर जमी हुई थीं।
एक हाथ अभी भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को धीरे-धीरे ख़ुजला रहा था — बिना किसी शर्म के, बिना किसी हिचक के।
मेरी बीवी के सामने।
मेरे सामने।
उन्हें साफ़ लग रहा था कि आज लॉटरी लग गई है।
उनका चेहरा नशे और उत्तेजना से चमक रहा था। वो सामान तैयार कर रहे थे — जैसे कोई शिकारी अपनी नज़र शिकार पर जमा कर बैठा हो।
मैंने नेहा के कान के पास मुँह ले जाकर बहुत धीरे से फुसफुसाया,
सम: “ये शर्ट...?”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके गाल अभी भी शर्म से लाल थे। उसने धीमी, नशीली आवाज़ में जवाब दिया,
नेहा: “वो... AC में ठंड लग रही थी...”
मेरा मतलब था कि “तुम सिर्फ शर्ट क्यों पहने हो?”
लेकिन नेहा ने गलत समझ लिया। उसे लगा मैं पूछ रहा हूँ कि “तुम नंगी क्यों नहीं हो?”
उसका चेहरा और ज़्यादा लाल हो गया। उसने मेरी आँखों में देखा, फिर शर्म से नज़रें झुका ली और बहुत धीरे से बोली,
नेहा: “मैं... मैं सोच रही थी कि तुम्हें पसंद आएगा...
अगर मैं... सिर्फ शर्ट में...”
वो वाक्य अधूरा छोड़ दिया। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।
मैंने नेहा के कान के पास मुँह ले जाकर बहुत धीरे से फुसफुसाया,
सम: “इसे अंदर आने क्यों दिया?”
नेहा ने मेरी तरफ़ चौंककर देखा। उसकी आँखें एक पल के लिए बड़ी हो गईं। फिर उसने शर्म और नशे वाली आवाज़ में कहा,
नेहा: “मुझे लगा... तुमने भेजा है...
मुझे लगा जो तुम सपने में देखते हो...
आज शायद तुम्हारा मन है...”
मैं मन ही मन सोच रहा था — ये तो कन्फ्यूजन हो गया।
नेहा ने सोचा कि मैंने ही गुप्ता जी को अंदर बुलाया है।
और मैं सोच रहा था कि नेहा ने उन्हें अंदर आने दिया।
दोनों एक-दूसरे को गलत समझ रहे थे।
मैं नेहा के कान में बहुत धीरे से बोला,
सम: “अब क्या?”
नेहा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शरारती अँगुली मारी और थोड़ी तेज़ आवाज़ में (जिसमें नशा और हिम्मत दोनों थी) बोली,
नेहा: “Uncle अपने हैं... बुरा थोड़े मानेंगे?
है ना अंकल... आप किसी को थोड़े बोलोगे?
मैं घर में ऐसी रहती हूँ... घर में तो कोई कैसे भी रह सकता है ना...”
नेहा अब बात संभालने की कोशिश कर रही थी।
उसकी आवाज़ में शर्म थी, लेकिन साथ में एक हल्की शरारत और नशे का जोश भी था।
गुप्ता जी ने नेहा की बात सुनकर जोर से हँसे। उनकी आँखें नेहा की खुली शर्ट और पैंटी पर घूम रही थीं।
नेहा को अब कन्फ्यूजन साफ़ समझ में आ गया था।
लेकिन उसकी आँखों में कुछ और भी था।
वो भी समझ गई थी कि गुप्ता जी को अब हमारे बारे में काफी कुछ पता चल गया है — कि हमें किसी गैर मर्द के साथ जाने में, या ऐसे सिचुएशन में कोई प्रॉब्लम नहीं है।
नेहा ने गुप्ता जी की तरफ़ देखा।
उसकी शर्म अब थोड़ी कम हुई लग रही थी, लेकिन घबराहट अभी भी थी।
नेहा मेरे कान के पास आई। उसकी गर्म साँस मेरे कान को छू रही थी। उसने बहुत धीमी, नशीली और शरारती आवाज़ में फुसफुसाया,
नेहा: “क्या तुम थोड़े खेल के मूड में हो...?”
मैंने गर्दन घुमाकर उसे देखा।
उसकी आँखों में शर्म कम, और नशे के साथ एक नई हिम्मत थी।
मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।
गहरा किस।
बहुत गहरा।
जिसमें जीभ, लार, और पूरा जोश था।
वो जानबूझकर ज़ोर से किस कर रही थी — जैसे वो दिखाना चाहती हो कि हम दोनों को कोई शर्म नहीं है।


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