26-06-2026, 06:40 PM
वर्तमान में...................
अगले दिन
आज पूजा समय से पहले ही बाबाजी के रूम में आ गई थी।
सुबह का नरम सूरज हवेली के ऊपरी कमरे में झाँक रहा था। हल्की सुनहरी धूप कमरे में फैली हुई थी। बाबा ने कमरे को पूजा के लिए खास तौर पर तैयार करवाया था - फर्श पर सफेद चादर बिछी हुई थी, चारों तरफ अगरबत्तियाँ जल रही थीं और हल्की मंद सुगंध हवा में तैर रही थी। रचयिता मैत्री।
बाबा शांत लेकिन गहरी आवाज में बोले, “पूजा… इंसान की तरह देवताओं को भी सुंदर स्त्रियाँ आकर्षित करती हैं। इसलिए आज तुम्हें पूर्ण शृंगार करना होगा। यह शृंगार बहुत शुद्ध और पवित्र हाथों से होना चाहिए। मैंने यह बात पहले इसलिए नहीं कही थी, क्योंकि शायद तुम्हें लज्जा आती।”
पूजा ने नजरें झुकाए हुए, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “बाबाजी, मैंने आपसे पहले ही कह दिया था कि इस काम में मैं कोई लज्जा नहीं करूँगी। आप जो भी आज्ञा दें, मैं तैयार हूँ। मुझे आप पर पूरा भरोसा है।”
बाबा की आँखों में एक गहरी चमक आई। उन्होंने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर… आज मैं तुम्हारा शृंगार खुद अपने हाथों से करूँगा। तुझे सजाऊंगा, सवारुंगा।”
पूजा ने धीरे से सिर हिलाया, “जी बाबाजी।”
बाबा: “पहले जाकर दूध से स्नान कर आओ। पूरा शरीर दूध से धोना, ताकि तुम्हारी त्वचा दूध जैसी चमकदार और मुलायम हो जाए।”
पूजा चुपचाप उठी और बाथरूम में चली गई। जब वह वापस आई, तो उसका गोरा शरीर दूध की महक से महका हुआ था। उसने सिर्फ हल्का सा ब्लाउज और पेटिकोट पहना हुआ था। उसके बाल अभी भी गीले थे और पीठ पर बिखरे हुए थे, जिससे पानी की कुछ बूँदें कमर पर बह रही थीं।
बाबा ने शृंगार का पूरा सामान पहले से ही तैयार रखा था - लिपस्टिक, रूज, आईलाइनर, काजल, ग्लिटर, बॉडी ऑयल, महँदी, सुगंधित तेल - सब कुछ।
“आओ पूजा…मेरे पास आ जाओ।” मैत्री की रचना है।
पूजा धीरे से बाबा के सामने जमीन पर बैठ गई। बाबा भी उनके बिल्कुल पास आकर बैठ गए। उनके घुटने पूजा के घुटनों को छू रहे थे। कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ आती जाती हवा की हल्की सरसराहट और दोनों की गरम साँसों की ध्वनि सुनाई दे रही थी।
बाबा ने पूजा की ठोड़ी को अपनी अँगुलियों से हल्के से ऊपर उठाया और उसकी आँखों में एक गहरी नजर डाली।
“तो पहले आँखों से शुरू करते हैं…तुम तैयार हो?”
“जी बाबाजी, मैं तैयार हूँ। आप आगे बढे।“
बाबा ने आईलाइनर की पेंसिल उठाई। पूजा ने आँखें बंद कर लीं। बाबा बहुत धीरे और सावधानी से उसकी पलकों पर आईलाइनर लगाने लगे। उनका गर्म साँस पूजा के चेहरे पर पड़ रहा था। हर बार पेंसिल जब उसकी पलक को छूती, पूजा का शरीर हल्का सा सिहर जाता।
बाबा धीमी, मादक आवाज में बोले, “पूजा… एक बात कहूँ?”
पूजा ने आँखें बंद रखते हुए नरम स्वर में कहा, “हाँ, कहिए बाबाजी…आपको पूछने के लिए रजामंदी कब से चाहिए?”
बाबा: “तुम्हारी आँखें बहुत सुंदर हैं। इनमें एक गहरी, आकर्षक मोहिनी है। जैसे कोई काली गहराई हो… जिसे देखकर कोई भी पुरुष अपना होश खो सकता है। पुरुष की क्या बात, लेकिन एक स्त्री जो तुम्हे देख ले, वह भी तुम्हारी तरफ आकर्षित हो ले या फिर एक गहरी खाई की तरह इर्षा भावना से तड़प उठे।”
और बहोत ही धीमे स्वरों से बोला, “उसमे मैं भी शामिल हूँ।“ लेकिन यह शब्द पूजा के कानो में पड़ ही गए। फनलवर संपादिका है।
पूजा की गर्दन तक लालिमा फैल गई। वह शर्मा गई, लेकिन कुछ बोली नहीं। उसकी साँसें थोड़ी तेज हो गईं। उसने एक मंद लेकिन बहोत ही कामुक मुस्कराहट अपने चहरे पर फेंका। वह कामुक मुसकुराहट बाबाजी के दिल को तार-तार करते हुए उसकी असर बाबाजी के लंड तक फ़ैल गई।
*****************************.
जुड़े रहिये दोस्तों।
मैत्री.
अगले दिन
आज पूजा समय से पहले ही बाबाजी के रूम में आ गई थी।
सुबह का नरम सूरज हवेली के ऊपरी कमरे में झाँक रहा था। हल्की सुनहरी धूप कमरे में फैली हुई थी। बाबा ने कमरे को पूजा के लिए खास तौर पर तैयार करवाया था - फर्श पर सफेद चादर बिछी हुई थी, चारों तरफ अगरबत्तियाँ जल रही थीं और हल्की मंद सुगंध हवा में तैर रही थी। रचयिता मैत्री।
बाबा शांत लेकिन गहरी आवाज में बोले, “पूजा… इंसान की तरह देवताओं को भी सुंदर स्त्रियाँ आकर्षित करती हैं। इसलिए आज तुम्हें पूर्ण शृंगार करना होगा। यह शृंगार बहुत शुद्ध और पवित्र हाथों से होना चाहिए। मैंने यह बात पहले इसलिए नहीं कही थी, क्योंकि शायद तुम्हें लज्जा आती।”
पूजा ने नजरें झुकाए हुए, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “बाबाजी, मैंने आपसे पहले ही कह दिया था कि इस काम में मैं कोई लज्जा नहीं करूँगी। आप जो भी आज्ञा दें, मैं तैयार हूँ। मुझे आप पर पूरा भरोसा है।”
बाबा की आँखों में एक गहरी चमक आई। उन्होंने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर… आज मैं तुम्हारा शृंगार खुद अपने हाथों से करूँगा। तुझे सजाऊंगा, सवारुंगा।”
पूजा ने धीरे से सिर हिलाया, “जी बाबाजी।”
बाबा: “पहले जाकर दूध से स्नान कर आओ। पूरा शरीर दूध से धोना, ताकि तुम्हारी त्वचा दूध जैसी चमकदार और मुलायम हो जाए।”
पूजा चुपचाप उठी और बाथरूम में चली गई। जब वह वापस आई, तो उसका गोरा शरीर दूध की महक से महका हुआ था। उसने सिर्फ हल्का सा ब्लाउज और पेटिकोट पहना हुआ था। उसके बाल अभी भी गीले थे और पीठ पर बिखरे हुए थे, जिससे पानी की कुछ बूँदें कमर पर बह रही थीं।
बाबा ने शृंगार का पूरा सामान पहले से ही तैयार रखा था - लिपस्टिक, रूज, आईलाइनर, काजल, ग्लिटर, बॉडी ऑयल, महँदी, सुगंधित तेल - सब कुछ।
“आओ पूजा…मेरे पास आ जाओ।” मैत्री की रचना है।
पूजा धीरे से बाबा के सामने जमीन पर बैठ गई। बाबा भी उनके बिल्कुल पास आकर बैठ गए। उनके घुटने पूजा के घुटनों को छू रहे थे। कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ आती जाती हवा की हल्की सरसराहट और दोनों की गरम साँसों की ध्वनि सुनाई दे रही थी।
बाबा ने पूजा की ठोड़ी को अपनी अँगुलियों से हल्के से ऊपर उठाया और उसकी आँखों में एक गहरी नजर डाली।
“तो पहले आँखों से शुरू करते हैं…तुम तैयार हो?”
“जी बाबाजी, मैं तैयार हूँ। आप आगे बढे।“
बाबा ने आईलाइनर की पेंसिल उठाई। पूजा ने आँखें बंद कर लीं। बाबा बहुत धीरे और सावधानी से उसकी पलकों पर आईलाइनर लगाने लगे। उनका गर्म साँस पूजा के चेहरे पर पड़ रहा था। हर बार पेंसिल जब उसकी पलक को छूती, पूजा का शरीर हल्का सा सिहर जाता।
बाबा धीमी, मादक आवाज में बोले, “पूजा… एक बात कहूँ?”
पूजा ने आँखें बंद रखते हुए नरम स्वर में कहा, “हाँ, कहिए बाबाजी…आपको पूछने के लिए रजामंदी कब से चाहिए?”
बाबा: “तुम्हारी आँखें बहुत सुंदर हैं। इनमें एक गहरी, आकर्षक मोहिनी है। जैसे कोई काली गहराई हो… जिसे देखकर कोई भी पुरुष अपना होश खो सकता है। पुरुष की क्या बात, लेकिन एक स्त्री जो तुम्हे देख ले, वह भी तुम्हारी तरफ आकर्षित हो ले या फिर एक गहरी खाई की तरह इर्षा भावना से तड़प उठे।”
और बहोत ही धीमे स्वरों से बोला, “उसमे मैं भी शामिल हूँ।“ लेकिन यह शब्द पूजा के कानो में पड़ ही गए। फनलवर संपादिका है।
पूजा की गर्दन तक लालिमा फैल गई। वह शर्मा गई, लेकिन कुछ बोली नहीं। उसकी साँसें थोड़ी तेज हो गईं। उसने एक मंद लेकिन बहोत ही कामुक मुस्कराहट अपने चहरे पर फेंका। वह कामुक मुसकुराहट बाबाजी के दिल को तार-तार करते हुए उसकी असर बाबाजी के लंड तक फ़ैल गई।
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जुड़े रहिये दोस्तों।
मैत्री.



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