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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#70
रिजवान अपने घर में अकेला बैठा था। उसके हाथ में मोबाइल था — और उसके दिमाग में सुमन थी।
वह सोच रहा था — राज — वह कहाँ है? वह क्या कर रहा है? क्या वह सच में बैंगलोर गया है? या वह कहीं और है?
रिजवान ने सुमन से पूछा था — "राज कहाँ है?"
सुमन ने बताया था — "बैंगलोर। ऑफिस का काम है। तीन दिन के लिए गया है।"
पर रिजवान को यकीन नहीं था। उसने सोचा — अगर राज सच में बैंगलोर गया है — तो वह किसके साथ है? क्या वह अकेला है? या किसी और के साथ?
रिजवान ने अपने कॉन्टैक्ट्स को खंगालना शुरू किया — उसके देश में बहुत कॉन्टैक्ट्स थे — पुराने दोस्त — नए दोस्त — जान-पहचान वाले — और उन सब में से — एक था — शाहिद।

शाहिद बैंगलोर के एक पाँच सितारा होटल में काम करता था — वह होटल के सिक्योरिटी और रिसेप्शन विभाग में था — उसके पास होटल की हर जानकारी थी — कौन कब आता है — कौन कब जाता है — किसके साथ कौन है — और किसके कमरे में क्या हो रहा है — वह सब जानता था।

रिजवान ने शाहिद को फोन किया — रात के 10 बज रहे थे — पर शाहिद ने उठा लिया।

"कौन?" शाहिद ने पूछा — उसकी आवाज़ में नींद थी।

"मैं, रिजवान," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक गंभीरता थी — "एक काम है — बहुत ज़रूरी — अगर तूने कर दिया — तो मैं तुझे एक ऐसी चीज़ दूँगा — जो तूने कभी सोची नहीं होगी।"

"क्या चीज़?" शाहिद ने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जिज्ञासा थी।
रिजवान ने अपने फोन से सुमन की एक फोटो भेजी — वह फोटो — जो उसने दुकान पर ली थी — जब सुमन काउंटर पर झुकी हुई थी — उसकी गांड बाहर — उसकी चूत का उभार — और उसका चेहरा — आधा दिख रहा था — पर उसके शरीर का पूरा आकर्षण — साफ दिख रहा था।

शाहिद ने फोटो देखी — उसकी आँखें फटी रह गईं — उसका लंड तुरंत सख्त हो गया — उसने अपनी पैंट में हाथ डाला — उसे दबाया — और फोन पर बोला —

"यह... यह कौन है?" उसने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लालच थी।

"यह सुमन है," रिजवान ने कहा — उसकी आवाज़ में एक मुस्कान थी — "मेरी... दोस्त — और अगर तूने मेरा काम कर दिया — तो मैं तुझे इसकी चूत दिलवाऊँगा — इसी होटल में — तेरे होटल में — जब तू चाहे — जैसे तू चाहे — और जितनी बार तू चाहे।"

"सच?" शाहिद ने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना थी — "यह सच है?"

"सच," रिजवान ने कहा — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "बस तू मेरा काम कर दे — बाकी मैं देख लूँगा।"

"क्या काम?" शाहिद ने पूछा — उसकी आवाज़ में अब कोई नींद नहीं थी।
"राज," रिजवान ने कहा — उसकी आवाज़ में एक कठोरता थी — "राज नाम का एक आदमी तेरे होटल में है — पता कर — वह किसके साथ है — किस कमरे में है — और वह क्या कर रहा है — और सब कुछ — मुझे बता — हर एक चीज़ — चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो — मुझे बता।"

शाहिद ने फोन रखा — और वह अपने काम में जुट गया — उसके पास होटल के सारे रिकॉर्ड थे — वह कंप्यूटर पर गया — और राज का नाम सर्च किया —

राज कुमार — चेक-इन — आज सुबह — कमरा नंबर 412 — और उसके साथ — एक और नाम — नीशा — नीशा शर्मा — उसी कमरे में — एक ही बुकिंग — एक ही एंट्री — और वे दोनों — एक साथ — आज सुबह — होटल में आए थे — और तब से — अभी तक — वे बाहर नहीं आए हैं।

शाहिद ने रिजवान को फोन किया —

"रिजवान," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी चमक थी — "राज कमरे नंबर 412 में है — और उसके साथ एक औरत है — नीशा नाम — वे एक साथ आए हैं — और वे अभी तक बाहर नहीं आए हैं — क्या मुझे — कुछ और जानना है?"
"हाँ," रिजवान ने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मुस्कान थी — "मुझे बता — वे क्या कर रहे हैं — अंदर — क्या सुनाई देता है — क्या आवाज़ें आ रही हैं — उनके कमरे से — मुझे सब बता — हर एक आवाज़ — हर एक कराह — हर एक चीख — मुझे सब चाहिए — क्योंकि — यही तो मेरा खेल है।"
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 4 hours ago



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