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Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#69
"अब," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक आदेश था — "उठो — और सोफे पर लेट जाओ — मैं तुम्हें और दिखाऊंगी — कि सुमन क्या करती थी — और मैं क्या कर सकती हूँ।"
राज उठा — और सोफे पर लेट गया — उसका लंड हवा में सीधा खड़ा था — उसके सिरे से बूँद टपक रही थी — और उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी — जो पूछ रही थी — 'क्या होगा अब?'
नीशा उसके ऊपर चढ़ गई — उसकी स्कर्ट ऊपर चढ़ गई थी — उसकी जाँघें नंगी थीं — और वह राज के लंड के ठीक ऊपर बैठी थी — पर अभी अंदर नहीं लिया था — बस ऊपर — बाहर — उसके लंड के सिरे को अपनी चूत के ऊपरी होंठों से छू रही थी — और वह गीली थी — बहुत गीली — उसका पानी राज के लंड पर टपक रहा था।
"देखो," उसने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी धुन थी — "जब सुमन अपने बॉस के ऊपर बैठती थी — तो वह ऐसे ही बैठती थी — उसके लंड को अपनी चूत के बाहर रगड़ती थी — और फिर — धीरे-धीरे — उसे अंदर लेती थी — और वह कराहती थी — 'आह — आह — और — आह' — और वह उसके स्तनों को दबाती थी — और उसके निप्पल को दाँतों से दबाती थी — और फिर — वह झूलना शुरू कर देती थी — जैसे कोई नाव समुद्र में — और वह चीखती थी — 'और — और — रुक मत — मैं आ रही हूँ'।"

नीशा ने अपनी कमर नीचे की — और धीरे-धीरे — राज का लंड उसकी चूत के अंदर चला गया — पूरा — एक बार में — उसकी चूत उसे चूस लिया — उसके अंदर की गर्मी ने राज के लंड को जला दिया — और नीशा की आँखें बंद हो गईं — उसका मुँह खुला — और उससे एक लंबी कराह निकली —

"अह्ह्ह्ह..."

राज की साँसें रुक गईं — उसका लंड नीशा की चूत के अंदर था — और वह उसे दबा रही थी — ऊपर-नीचे — जैसे कोई संगीत के ताल पर नाच रही हो — और उसके स्तन राज के चेहरे पर झूल रहे थे — और राज ने उन्हें पकड़ लिया — उन्हें दबाया — उसके निप्पल कड़े थे — और राज ने उन्हें अपने मुँह में ले लिया — चूसा — जोर से — और नीशा चीखी —**
"अह्ह्ह... राज... बहुत... बहुत अच्छा..."

"अब मैं चोदूँगा तुम्हें," राज ने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी — "जैसे सुमन का बॉस उसे चोदता था — वैसे ही — और तुम — तुम सोचो — कि तुम सुमन हो — और मैं तुम्हारा बॉस हूँ — और मैं तुम्हें चोद रहा हूँ — और तुम कराह रही हो — 'मुझे चोदो — और — और — रुक मत — मैं आ रही हूँ'।"

उसने नीशा को पलटा — उसे सोफे पर लिटाया — और उसके ऊपर चढ़ गया — उसका लंड नीशा की चूत के अंदर था — और वह उसे और गहरा चोद रहा था — जोर से — तेज़ — बिना रुके — जैसे कोई पागल घोड़ा दौड़ रहा हो — और नीशा चीख रही थी — उसकी आवाज़ कैफे के कोने में गूँज रही थी —
"आह — आह — और — और — रुक मत — रुक मत — मैं आ रही हूँ — मैं आ रही हूँ —"

राज और नीशा — दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे — उनके शरीर एक साथ काँपे — उनके मुँह से एक साथ चीख निकली — उनका बीज एक साथ बहा — राज का बीज नीशा की चूत के अंदर — और नीशा का पानी राज के लंड पर — और वे दोनों — वहाँ — उस कैफे के कोने में — एक साथ फट गए।

"अह्ह्ह्ह्ह..."

कुछ पलों के बाद — वे दोनों चुप हो गए — उनकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं — उनके शरीर एक दूसरे से चिपके हुए थे — और नीशा ने राज के कान में फुसफुसाया —
"अब तुम मेरे हो, राज — और मैं तुम्हारी हूँ — और हम दोनों मिलकर — सुमन को वह देंगे — जो वह चाहती है — और उससे भी अधिक — जो वह नहीं चाहती।"
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RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - 21-06-2026, 12:56 PM



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