2 hours ago
राज और नीशा — फिर मिलते हैं
राज ने नीशा को फोन किया — "मिलना है।"
वे फिर उसी कैफे में मिले — इस बार राज के चेहरे पर गुस्सा था — और एक अजीब सी बेचैनी भी।
"यह कौन है?" उसने फोटो नीशा के सामने रखी — उसकी आवाज़ काँप रही थी।
नीशा ने फोटो देखी — उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई — जैसे उसे पता हो कि यह दिन आएगा।
"यह विशाल है," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "सुमन का पुराना बॉयफ्रेंड।"
राज की आँखें फटी रह गईं — "पुराना बॉयफ्रेंड? पर वह — वह तो — मेरे घर क्यों आता है?"
"क्योंकि," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी चमक थी — "वह अब भी सुमन के साथ है। सुमन अब भी उससे मिलती है — चुपके से — जब तुम ऑफिस जाते हो — या जब तुम सोते हो — या जब तुम घर से बाहर होते हो — तो वह आता है और वे... करते हैं जो करते हैं।"
राज का चेहरा — उस पर अब गुस्सा नहीं था — बस एक ठंडी खालीपन थी।
कैफे का वह कोना। शाम के 7 बज रहे थे। बाहर अंधेरा हो रहा था। राज और नीशा आमने-सामने बैठे थे। राज का चेहरा पहले से ही तनाव से भरा हुआ था — और अब नीशा उसे और बताने वाली थी।
नीशा ने अपनी कॉफी का एक घूँट लिया। उसकी आँखों में एक चमक थी — जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को घेर रहा हो।
"जीजू," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक मिठास थी, पर उसके पीछे एक जहर छिपा था — "यह आदमी — विशाल — सुमन का पहला बॉयफ्रेंड नहीं है।"
राज की आँखें फटी रह गईं।
"तो फिर कौन है?" उसने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।
"यह करण है," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "सुमन का पहला प्यार। और वह भी शादीशुदा है।"
राज का चेहरा और भी सफेद पड़ गया। उसके हाथ काँपने लगे।
"करण और सुमन — वे एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे," नीशा ने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट थी — "पर वे शादी नहीं कर पाए। क्योंकि करण की शादी पहले से ही तय थी — उसके परिवार ने उसे किसी और से ब्याह दिया था। सुमन ने उसे छोड़ दिया — पर वे अब भी मिलते हैं — चुपके से — जब भी मौका मिलता है।"
राज की साँसें रुक गईं। उसने सोचा — तो यह करण — वही है जो मेरे घर आता है — जब मैं ऑफिस होता हूँ — जब मैं सोता हूँ — जब मैं बाहर होता हूँ।
"वे कहाँ मिले?" राज ने पूछा — उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था — बस एक ठंडी खालीपन थी।
"ऑफिस में," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक चमक थी — "चार साल पहले — जब सुमन नौकरी करती थी।"
"सुमन एक बड़ी कंपनी में काम करती थी," नीशा ने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी शान थी — "बहुत अच्छी नौकरी थी — बहुत अच्छी सैलरी थी — उस समय उसकी सैलरी उसके बॉस के बराबर थी।"
"कैसे?" राज ने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जिज्ञासा थी।
"क्योंकि," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक जहर था — "उसने अपने बॉस को अपना आशिक बना लिया था।"
राज का मुँह खुला रह गया।
"उसका बॉस — उसका नाम था शर्मा जी," नीशा ने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "वह सुमन का बहुत दीवाना था। वह उसे अपने साथ ऑफिस की बिजनेस ट्रिप पर ले जाता था — और वे एक ही होटल में रुकते थे — उसी कमरे में — आप समझ रहे हैं न, जीजू?"
राज का चेहरा अब पूरी तरह सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ काँप रहे थे — पर उसके अंदर एक अजीब सी गर्मी भी पैदा हो रही थी — शायद क्रोध — या शायद कुछ और — जो वह स्वयं समझ नहीं पा रहा था।
"सुमन ने अपने बॉस के साथ मिलकर कई बड़े-बड़े बिजनेस डील्स किए," नीशा ने कहना जारी रखा — "करोड़ों रुपये के डील्स — और वह बॉस की सबसे पसंदीदा एम्प्लॉयी बन गई थी।"
राज ने नीशा को फोन किया — "मिलना है।"
वे फिर उसी कैफे में मिले — इस बार राज के चेहरे पर गुस्सा था — और एक अजीब सी बेचैनी भी।
"यह कौन है?" उसने फोटो नीशा के सामने रखी — उसकी आवाज़ काँप रही थी।
नीशा ने फोटो देखी — उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई — जैसे उसे पता हो कि यह दिन आएगा।
"यह विशाल है," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "सुमन का पुराना बॉयफ्रेंड।"
राज की आँखें फटी रह गईं — "पुराना बॉयफ्रेंड? पर वह — वह तो — मेरे घर क्यों आता है?"
"क्योंकि," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी चमक थी — "वह अब भी सुमन के साथ है। सुमन अब भी उससे मिलती है — चुपके से — जब तुम ऑफिस जाते हो — या जब तुम सोते हो — या जब तुम घर से बाहर होते हो — तो वह आता है और वे... करते हैं जो करते हैं।"
राज का चेहरा — उस पर अब गुस्सा नहीं था — बस एक ठंडी खालीपन थी।
कैफे का वह कोना। शाम के 7 बज रहे थे। बाहर अंधेरा हो रहा था। राज और नीशा आमने-सामने बैठे थे। राज का चेहरा पहले से ही तनाव से भरा हुआ था — और अब नीशा उसे और बताने वाली थी।
नीशा ने अपनी कॉफी का एक घूँट लिया। उसकी आँखों में एक चमक थी — जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को घेर रहा हो।
"जीजू," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक मिठास थी, पर उसके पीछे एक जहर छिपा था — "यह आदमी — विशाल — सुमन का पहला बॉयफ्रेंड नहीं है।"
राज की आँखें फटी रह गईं।
"तो फिर कौन है?" उसने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।
"यह करण है," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "सुमन का पहला प्यार। और वह भी शादीशुदा है।"
राज का चेहरा और भी सफेद पड़ गया। उसके हाथ काँपने लगे।
"करण और सुमन — वे एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे," नीशा ने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट थी — "पर वे शादी नहीं कर पाए। क्योंकि करण की शादी पहले से ही तय थी — उसके परिवार ने उसे किसी और से ब्याह दिया था। सुमन ने उसे छोड़ दिया — पर वे अब भी मिलते हैं — चुपके से — जब भी मौका मिलता है।"
राज की साँसें रुक गईं। उसने सोचा — तो यह करण — वही है जो मेरे घर आता है — जब मैं ऑफिस होता हूँ — जब मैं सोता हूँ — जब मैं बाहर होता हूँ।
"वे कहाँ मिले?" राज ने पूछा — उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था — बस एक ठंडी खालीपन थी।
"ऑफिस में," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक चमक थी — "चार साल पहले — जब सुमन नौकरी करती थी।"
"सुमन एक बड़ी कंपनी में काम करती थी," नीशा ने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी शान थी — "बहुत अच्छी नौकरी थी — बहुत अच्छी सैलरी थी — उस समय उसकी सैलरी उसके बॉस के बराबर थी।"
"कैसे?" राज ने पूछा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जिज्ञासा थी।
"क्योंकि," नीशा ने कहा — उसकी आवाज़ में एक जहर था — "उसने अपने बॉस को अपना आशिक बना लिया था।"
राज का मुँह खुला रह गया।
"उसका बॉस — उसका नाम था शर्मा जी," नीशा ने कहना शुरू किया — उसकी आवाज़ में एक गहराई थी — "वह सुमन का बहुत दीवाना था। वह उसे अपने साथ ऑफिस की बिजनेस ट्रिप पर ले जाता था — और वे एक ही होटल में रुकते थे — उसी कमरे में — आप समझ रहे हैं न, जीजू?"
राज का चेहरा अब पूरी तरह सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ काँप रहे थे — पर उसके अंदर एक अजीब सी गर्मी भी पैदा हो रही थी — शायद क्रोध — या शायद कुछ और — जो वह स्वयं समझ नहीं पा रहा था।
"सुमन ने अपने बॉस के साथ मिलकर कई बड़े-बड़े बिजनेस डील्स किए," नीशा ने कहना जारी रखा — "करोड़ों रुपये के डील्स — और वह बॉस की सबसे पसंदीदा एम्प्लॉयी बन गई थी।"


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