Thread Rating:
  • 2 Vote(s) - 3 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Adultery वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman)
#59
रिजवान ने सुमन को जाने दिया था। लेकिन उसके चेहरे पर वह मुस्कान — वह मुस्कान जो कह रही थी, "अब तुम मेरी हो।"

सुमन रिजवान के घर से बाहर निकली। उसके पैर काँप रहे थे। उसकी चूत अब भी धड़क रही थी। उसके होठों पर रिजवान की जीभ का अहसास था। उसके स्तनों पर उसके हाथों की गर्मी। उसकी गर्दन पर वह लाल निशान — जो राज को बताएगा कि किसी और ने उसे छुआ है।
पर रिजवान ने उसे चोदा नहीं था। उसने सिर्फ उसकी चूत चूसी थी। और वही बात सुमन को और अधिक उसकी ओर खींच रही थी।
"अगर मैं तुम्हें आज चोद देता," रिजवान ने उसके जाने से पहले कहा था, "तो तुम सोचती — 'बस एक बार की बात थी।' पर मैंने तुम्हें नहीं चोदा। अब तुम सोचोगी — 'क्यों नहीं?' और वह सवाल तुम्हें मेरे पास वापस लाएगा।"
उसका प्लान काम कर गया था।
सुमन टैक्सी में बैठी। संदीप ने उसे उसके घर पहुँचाया। पर सुमन का मन वहाँ नहीं था। वह रिजवान के घर में थी — उसके सोफे पर, उसकी जीभ के नीचे, उसके हाथों के बीच।

उधर राज सुमन को अकेला छोड़ बिज़ी था, पर राज को ऐसा क्या हुआ जो वो सुमन को इस राह पे आया और अगर वो ऐसा चाहता तो तो शादी के 2 साल बाद है क्यूँ उसे कुछ ऐसा पता चला जिसके बारे में उसने सोचा भी नहीं था आखिर ऐसा क्या हुआ,

सुमन टैक्सी के अंदर बैठी थी। उसके पैर काँप रहे थेपर वह काँप थकान से नहीं थी, बल्कि रिजवान के घर की गर्मी से थी।

रिजवान की जीभ अब भी उसकी चूत पर थीउसका अहसास, उसका स्वाद, उसकी गहराई। रिजवान ने उसे चोदा नहीं था, पर उसकी चूत रिजवान की जीभ और उँगलियों से इतनी देर तक खेली गई थी कि वह अब जल रही थीएक ऐसी आग जो बुझती नहीं थी, बल्कि और भड़कती थी।

सुमन की चूत से पानी टपक रहा थाउसकी लेगिंग गीली हो चुकी थी। वह बेचैन थी। उसका शरीर अब रिजवान से भी अधिक चाहता थापर रिजवान ने उसे जाने दिया था। उसकी जीभ ने उसे पागल कर दिया था, और अब वह उस पागलपन को सहन नहीं कर सकती थी।

"संदीप..." उसने फुसफुसायाइतनी धीरे कि शायद उसे सुनाई दे।

पर संदीप ने सुन लिया। उसकी आँखें पीछे के शीशे में सुमन पर थींउसके गीले होठों पर, उसकी बेचैन साँसों पर, उसके पैरों के बीच उस गीले पैच पर।

"क्या हुआ, मैडम?" उसने पूछा।
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने हाथों को अपनी जांघों पर रखाऔर धीरे-धीरे, उन्हें ऊपर की तरफ सरकाना शुरू कर दिया। उसकी उँगलियाँ उसकी लेगिंग के ऊपर से उसकी चूत की तरफ बढ़ रही थीं। वहाँवह गीली थी। गरम। तैयार।

[b]अंधेरे में, संदीप की आँखों के सामनेसुमन ने अपनी उँगली अपनी लेगिंग के अंदर डाल दी।
[/b]

उसने अपनी लेगिंग की कमरबंद को धीरे से नीचे सरकायाबस इतना कि उसकी चूत नंगी हो जाएऔर अपनी उँगली अंदर डाल दी।

"अह्ह..." वह कराहीएक दबी हुई, रुकी हुई कराह।

उसकी चूत ने उसकी उँगली को अंदर चूस लिया। वह गीली थीइतनी गीली कि उसकी उँगली बिना किसी रुकावट के अंदर चली गई। उसने उसे अंदर-बाहर करना शुरू कियाधीरे-धीरे, अपनी साँसों की लय में। उसके मुँह से "आह... आह... आह..." निकल रहा था।

संदीप उसे पीछे के शीशे में देख रहा था। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं। उसका लंड उसकी पैंट में सख्त हो गया थाइतना सख्त कि उसे दर्द हो रहा था। उसने अपनी पैंट के ऊपर से उसे दबाया।

"मैडम..." उसने कहापर उसकी आवाज़ में अब कोई सवाल नहीं था। बस एक बेचैनी थी।

सुमन ने अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखों में एक अलग आग थीरिजवान की दी हुई, और अब संदीप को दिखाने वाली।
[b]"रुको मत," उसने कहा। "जारी रखो।"[/b]
Like Reply


Messages In This Thread
RE: वह आग जो कभी बुझती नहीं (Raj or Suman) - by Certified Addict - Yesterday, 11:37 PM



Users browsing this thread: Naresh987, 4 Guest(s)